राम और लक्ष्मण का सीता की खोज में निकलना

इस सर्ग में, सीता की अनुपस्थिति देखकर राम अत्यंत व्याकुल हो जाते हैं। वे लक्ष्मण के साथ वन में सीता की खोज में निकलते हैं और मार्ग में विभिन्न जीवों एवं वृक्षों से सीता के बारे में पूछते हैं।

विवरण

पंचवटी में राम और लक्ष्मण जब शिकार से लौटते हैं और सीता को आश्रम में नहीं पाते, तो राम का हृदय विदीर्ण हो जाता है। वे विलाप करने लगते हैं – “हा सीते! हा प्रिये!” लक्ष्मण उन्हें धैर्य बंधाते हैं और दोनों सीता की खोज में वन के विभिन्न दिशाओं में जाते हैं। वे वृक्षों, पशुओं और नदियों से सीता के बारे में पूछते हैं, मानो वे सजीव हों। अंत में उन्हें एक घायल गिद्ध दिखाई देता है – जटायु। जटायु उन्हें रावण द्वारा सीता के हरण की सूचना देता है और फिर अपने प्राण त्याग कर स्वर्गारोहण करता है। राम उसका अंतिम संस्कार करते हैं और पुनः खोज में निकल पड़ते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग १०९

(राम और लक्ष्मण का सीता की खोज में निकलना – वियोग की प्रथम झलक)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकनवत्यधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पंचवटी में निवास के दौरान एक दिन राम और लक्ष्मण शिकार के लिए गए हुए थे। लौटने पर उन्होंने देखा कि सीता वहाँ नहीं हैं। आश्रम सूना पड़ा है। यह सर्ग उस भीषण वियोग के आरम्भ का वर्णन करता है – जब राम पहली बार सीता के लिए व्याकुल होकर वन-वन भटकते हैं।

😢 सीता को न पाकर राम का विलाप (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः प्रविश्य रामस्तु सह भ्रात्रा महावनम् ।
नापश्यत तदा सीतां विललापाकुलेन्द्रियः ॥
हा सीतेति महाबाहुर्विललाप सुदुःखितः ।
लक्ष्मणं चाब्रवीद्वाक्यं बाष्पसंदिग्धया गिरा ॥
क्व नु सीता वने लक्ष्मण गता सा मृगलोचना ।
यदि नोपैति मां भद्रे जीवितं न ध्रुवं मम ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रविश्य = प्रवेश करके; रामः = राम; सह = साथ; भ्रात्रा = भाई के; महावनम् = महान वन में; न = नहीं; अपश्यत = देखा; तदा = तब; सीताम् = सीता को; विललाप = विलाप किया; आकुलेन्द्रियः = व्याकुल इन्द्रियों वाले; हा = हाय; सीते = हे सीता; इति = इस प्रकार; महाबाहुः = महाबाहु; विललाप = विलाप किया; सुदुःखितः = अत्यन्त दुःखी; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण को; च = और; अब्रवीत् = बोले; वाक्यम् = वचन; बाष्पसंदिग्धया = आँसुओं से भरी; गिरा = वाणी से; क्व = कहाँ; नु = अब; सीता = सीता; वने = वन में; लक्ष्मण = हे लक्ष्मण; गता = गई; सा = वह; मृगलोचना = मृगनयनी; यदि = यदि; न = नहीं; उपैति = आती; माम् = मेरे पास; भद्रे = हे भद्रे; जीवितम् = जीवन; न = नहीं; ध्रुवम् = स्थिर; मम = मेरा।
📖 भावार्थ : फिर राम ने लक्ष्मण के साथ उस महावन में प्रवेश किया, किन्तु सीता को न देखकर वे अत्यन्त व्याकुल हो गए और विलाप करने लगे। महाबाहु राम अत्यन्त दुःखी होकर 'हा सीते' कहते हुए विलाप करने लगे। उन्होंने आँसुओं से भरी वाणी में लक्ष्मण से कहा – 'हे लक्ष्मण! वह मृगनयनी सीता वन में कहाँ चली गई? यदि हे भद्रे, वह मेरे पास नहीं आती तो मेरा जीवन निश्चित नहीं रहेगा।'
॥ श्लोक ५-८ ॥
इयं शाला निरानन्दा शून्या मुनिनिषेविता ।
कृत्स्नं च वनमाक्रान्तं राक्षसैर्बहुभिर्वृतम् ॥
नूनं नीता हृता वापि भक्षिता वापि राक्षसैः ।
न ह्यन्यथा मम प्राणाः प्रसह्य परितापिनः ॥
📖 भावार्थ : 'यह शाला (कुटी) आनन्दहीन और सूनी हो गई है जो पहले मुनियों से सेवित थी। सम्पूर्ण वन बहुत से राक्षसों से आक्रान्त है। निश्चय ही सीता को कोई राक्षस ले गया, हर लिया, या खा गया। अन्यथा मेरे ये प्राण इतने व्याकुल नहीं होते।'

🤝 लक्ष्मण का धैर्य बंधाना और खोज का निर्णय (श्लोक ९-१५)

॥ श्लोक ९-१२ ॥
लक्ष्मणस्तु महाप्राज्ञः प्रियं भ्रातुरुदीरयन् ।
उवाच वाक्यं धर्मज्ञो रामं सम्प्रति हर्षयन् ॥
न विषादे मनः कार्यं निर्वेदो न च मोहनः ।
खोचितव्यं त्वया वीर सीतायाः पदमिच्छता ॥
अहं त्वनुगमिष्यामि यत्र क्वचन राघव ।
मार्गेणानेन गच्छावः पश्यावः क्व गता प्रिया ॥
📖 भावार्थ : तब महाप्राज्ञ लक्ष्मण ने अपने भाई को प्रिय लगने वाली बात कही। धर्मज्ञ लक्ष्मण ने राम को सान्त्वना देते हुए कहा – 'मन में विषाद नहीं करना चाहिए, न ही निर्वेद और मोह को स्थान देना चाहिए। हे वीर! तुम्हें सीता के पदचिह्न ढूँढ़ने का प्रयास करना चाहिए। मैं तुम्हारे साथ चलूँगा, हे राघव! चाहे कहीं भी जाना पड़े। इस मार्ग से चलें और देखें कि प्रिया किधर गई है।'
॥ श्लोक १३-१५ ॥
तौ वनं घोरसंकाशं विचिन्वानौ महावलौ ।
अपश्यतां महाकायं जटायुं निष्टनन्ति च ॥
तं दृष्ट्वा राघवो वाक्यमब्रवीत्सह लक्ष्मणः ।
को भवानिह संवासं वसते रजनीचरः ॥
📖 भावार्थ : वे दोनों महाबली उस भयंकर वन में खोज करते हुए एक विशालकाय प्राणी को देखा जो कराह रहा था – वह जटायु थे। उन्हें देखकर राम और लक्ष्मण ने कहा – 'आप कौन हैं? क्या इस वन में रहने वाले राक्षस हैं?'

🦅 जटायु का समाचार और स्वर्गारोहण (श्लोक १६-३०)

॥ श्लोक १६-२० ॥
ततः श्रुत्वा जटायुस्तु राघवस्य वचः शनैः ।
उत्थाय सहसा वाक्यमब्रवीद्रामलक्ष्मणौ ॥
अहं जटायुर्नाम्नाहं गृध्रराजो महाबलः ।
सखा दशरथस्यास्मि राज्ञस्तातस्य धीमतः ॥
रावणेन हृता सीता क्रूरेणान्तर्जलं प्रति ।
मया दृष्टा च सा देवी क्रोशन्ती राक्षसैर्वृता ॥
अहं तु तेन युद्धेऽस्मिन्निपतितो महाबलः ।
पक्षौ च मे सुसंहत्य छिन्नौ तेन दुरात्मना ॥
📖 भावार्थ : तब जटायु ने राम के वचन सुनकर धीरे से उठकर राम-लक्ष्मण से कहा – 'मैं जटायु नाम का गृध्रराज हूँ, महाबली हूँ। मैं तुम्हारे पिता धीमान् राजा दशरथ का मित्र हूँ। सीता को क्रूर रावण द्वारा हरा लिया गया है, वह दक्षिण दिशा की ओर गया है। मैंने उस देवी को देखा, वह राक्षसों से घिरी चिल्ला रही थी। मैंने उस दुरात्मा से युद्ध किया और वहाँ मैं घायल हो गिरा। उस दुष्ट ने मेरे पंख काट डाले।'
॥ श्लोक २१-३० ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं जटायोर्भृशदुःखितः ।
लक्ष्मणं चाब्रवीद्वाक्यं साश्रुकण्ठो विमोहितः ॥
गता मे जीविता लक्ष्मण सीता नूनं यदृच्छया ।
रावणेन हृता भार्या क्रूरेणाक्लिष्टकर्मणा ॥
तौ तु संपूज्य तं गृध्रं रामलक्ष्मणौ यशस्विनौ ।
प्रेतकार्याणि चक्राते जटायोः सुसमाहितौ ॥
📖 भावार्थ : जटायु के वचन सुनकर राम अत्यन्त दुःखी हुए और आँसू भरे कण्ठ से लक्ष्मण से बोले – 'हे लक्ष्मण, अब मेरा जीवित रहना व्यर्थ है। मेरी भार्या सीता को उस क्रूर रावण ने हर लिया।' तब उन दोनों यशस्वी राम-लक्ष्मण ने जटायु का पूजन किया और उनके प्रेतकर्म (अन्तिम संस्कार) को बड़ी समाहिति से किया। जटायु ने राम को आशीर्वाद दिया और स्वर्ग सिधार गए।

🚩 पुनः खोज का संकल्प (श्लोक ३१-३८)

॥ श्लोक ३१-३८ ॥
ततः कृत्वा जलं तस्य रामः सत्यपराक्रमः ।
प्रतस्थे सह सौमित्रिर्दक्षिणां दिशमाश्रितः ॥
तौ गत्वा दूरमध्वानं ददृशाते महावने ।
राक्षसं विकृताकारं कबन्धं नाम नामतः ॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् सत्यपराक्रमी राम ने जटायु का जल-क्रिया करके, सौमित्रि (लक्ष्मण) के साथ दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया। वे दोनों उस महावन में दूर तक गए और वहाँ उन्होंने एक विकृताकार राक्षस को देखा, जो कबन्ध नाम से जाना जाता है। (यह आगे के सर्ग का सूत्र है।)

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

😢 वियोग की व्यथा

इस सर्ग में राम का विलाप अत्यन्त हृदयस्पर्शी है। यह दर्शाता है कि वे केवल एक आदर्श पुरुष ही नहीं, बल्कि एक प्रेमी पति भी हैं। उनका व्याकुल होना मानवीय पक्ष को उजागर करता है।

🦅 जटायु का बलिदान

जटायु ने अपने प्राणों की परवाह न करते हुए रावण से युद्ध किया। यह मित्रता और कर्तव्य का अनुपम उदाहरण है। राम द्वारा उनका अंतिम संस्कार करना उनके कृतज्ञता भाव को दर्शाता है।

🧭 दिशा का निर्धारण

जटायु के बताए अनुसार राम दक्षिण दिशा की ओर बढ़ते हैं। यही मार्ग आगे चलकर किष्किन्धा और फिर लंका तक जाता है। इस प्रकार यह सर्ग आगामी घटनाओं की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

🌱 आशा का संचार

यद्यपि सीता के हरण का समाचार अत्यन्त दुःखद है, फिर भी यह जानकर कि वह जीवित है, राम को एक आशा मिलती है। वे नए सिरे से खोज में जुट जाते हैं।

🎯 शिक्षा : संकट काल में धैर्य न खोना चाहिए। मित्र की बात को सुनकर उचित दिशा में प्रयास करना चाहिए। जटायु का बलिदान हमें सिखाता है कि असमर्थ होते हुए भी धर्म की रक्षा के लिए प्रयास करना चाहिए। राम का विलाप हमें याद दिलाता है कि दुःख को व्यक्त करना भी मानवीय है, किन्तु उससे उबरकर कर्मपथ पर चलना ही सच्चा पुरुषार्थ है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे एकनवत्यधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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