राम का लक्ष्मण से सीता के बारे में पूछना

इस सर्ग में, भगवान राम वनवास के दौरान सीता की दिनचर्या और मानसिक स्थिति के बारे में लक्ष्मण से पूछते हैं। वे सीता के स्वास्थ्य और आनंद की चिंता करते हैं, और लक्ष्मण उन्हें आश्वस्त करते हैं।

विवरण

वनवास के दिन बीत रहे थे। एक दिन भगवान राम ने देखा कि सीता थोड़ी उदास और थकी हुई प्रतीत हो रही हैं। वे चिंतित हुए और लक्ष्मण से उनके बारे में पूछा। लक्ष्मण ने बताया कि सीता धैर्यपूर्वक वनवास सहन कर रही हैं और राम की सेवा में ही अपना सुख मानती हैं। इस संवाद में राम का वात्सल्य और सीता के प्रति प्रेम प्रकट होता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग १०८

(राम का लक्ष्मण से सीता के बारे में पूछना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टोत्तरशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : चित्रकूट में निवास करते हुए राम, लक्ष्मण और सीता वनवास के दिन व्यतीत कर रहे थे। एक दिन राम ने देखा कि सीता के मुख पर थोड़ी उदासी छा गई है। वे तुरंत चिंतित हुए और लक्ष्मण से उनके विषय में पूछा। यह सर्ग उस संवाद का वर्णन करता है, जिसमें राम का सीता के प्रति असीम प्रेम और लक्ष्मण की समझदारी झलकती है।

🤔 राम का चिंतन और सीता की दशा (श्लोक १-३)

॥ श्लोक १ ॥
ततः कदाचिद् रामस्तु वने वन्येन जीवन् ।
ददर्श जानकीं दीनां मुखेन परिशुष्यता ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; कदाचित् = एक दिन; रामः = राम; तु = तो; वने = वन में; वन्येन = वन्य फलों से; जीवन् = जीवन बिताते हुए; ददर्श = देखा; जानकीम् = जानकी को; दीनाम् = दीन-हीन; मुखेन = मुख से; परिशुष्यता = सूखे हुए के समान।
📖 भावार्थ : उसके बाद एक दिन वन में वन्य फलों पर निर्वाह करते हुए राम ने जानकी को देखा, जिनका मुख कुछ सूखा-सा और दीन-सा प्रतीत हो रहा था।
🔍 व्याख्या : राम की दृष्टि बड़ी सूक्ष्म थी। सीता ने कोई शिकायत नहीं की, लेकिन उनके मुख की कांति से राम ने उनकी मनोदशा को पहचान लिया।
॥ श्लोक २ ॥
स चिन्तयामास तदा धर्मज्ञः सत्यविक्रमः ।
कच्चित्सीता सुखं वने वसति धर्मचारिणी ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मज्ञ और सत्यविक्रम राम ने सोचा, "क्या सीता जो धर्मपरायण हैं, वन में सुखपूर्वक निवास कर रही हैं?"
॥ श्लोक ३ ॥
इति संचिन्त्य रामस्तु लक्ष्मणं परवीरहा ।
उवाच प्रियमन्विच्छन् सीतायाः प्रियकाम्यया ॥
📖 भावार्थ : ऐसा सोचकर परवीरहा राम ने लक्ष्मण को बुलाया और सीता के प्रिय की इच्छा से उनके कल्याण की बात पूछी।

❓ राम का लक्ष्मण से प्रश्न (श्लोक ४-७)

॥ श्लोक ४ ॥
लक्ष्मण! पश्य वैदेहीं वनवासे तपस्विनीम् ।
कच्चिन्नोद्विजते सौम्य नित्यं भरतवत्सला ॥
📖 भावार्थ : हे लक्ष्मण! वैदेही को देखो, जो वनवास में तपस्विनी की भाँति रह रही हैं। हे सौम्य! क्या वे उद्विग्न तो नहीं होतीं? वे तो नित्य भरत की भाँति स्नेह करने वाली हैं।
॥ श्लोक ५ ॥
कच्चित्सा राजपुत्री त्वां सेवते भरतर्षभ ।
न च क्लाम्यति चेदानीं मत्सकाशे तपस्विनी ॥
📖 भावार्थ : क्या वह राजपुत्री (सीता) तुम्हारी सेवा करती है, हे भरतश्रेष्ठ? और क्या वह तपस्विनी मेरे पास रहकर भी क्लांत नहीं हो रही है?
॥ श्लोक ६-७ ॥
न हि सा सुखमर्हति वने वासं तपस्विनी ।
मया सह गता दीनाऽकृतार्था जनकात्मजा ॥
तस्या मनः परीक्षस्व लक्ष्मण त्वं समाहितः ।
यथा न विमनाः सीता मयि स्नेहपरायणा ॥
📖 भावार्थ : वह तपस्विनी वनवास के सुख योग्य नहीं है। मेरे साथ आकर वह दीन और अकृतार्थ हो गई है, हे जनकात्मज! हे लक्ष्मण! तुम समाहित होकर उसके मन की बात जानो, ताकि सीता जो मुझमें स्नेहपरायण है, विमना न हो।

🗣️ लक्ष्मण का आश्वासन (श्लोक ८-१२)

॥ श्लोक ८ ॥
एवमुक्त्वा तु रामेण लक्ष्मणः शुभलक्षणः ।
प्रत्युवाच महाप्राज्ञः सीतामन्विच्छया तदा ॥
📖 भावार्थ : राम के इस प्रकार कहने पर शुभलक्षण लक्ष्मण, जो महाप्राज्ञ थे, सीता के विषय में पूछने के भाव से बोले।
॥ श्लोक ९ ॥
न ते वने विषीदन्ती न च क्लाम्यति मैथिली ।
त्वयि स्नेहपरा नित्यं त्वदधीना हि जानकी ॥
📖 भावार्थ : हे राम! मैथिली वन में न तो उदास होती है और न ही क्लांत होती है। वह तो सदा तुम्हीं में स्नेहपरायण है और तुम्हीं पर आश्रित है।
॥ श्लोक १० ॥
फलमूलाशनं देवी त्वद्भक्त्या प्रतिगृह्णती ।
न मन्दमिव मन्यते त्वत्प्रियार्थं हि सा सदा ॥
📖 भावार्थ : देवी सीता तुम्हारी भक्ति के कारण फल-मूल का आहार ग्रहण करती हैं और उसे मन्द (साधारण) नहीं मानतीं, क्योंकि वह सदा तुम्हारे प्रिय के लिए ही रहती है।
॥ श्लोक ११-१२ ॥
न चास्या विक्रिया काचिद् दृश्यते रघुनन्दन ।
प्रसन्नवदना नित्यं त्वत्प्रसादादनिन्दिता ॥
तस्मात्त्वं मा कृथा शोकं सीतायाः प्रिय कांक्षया ।
अहं सदा सावधानो वैदेहीपरिपालने ॥
📖 भावार्थ : हे रघुनन्दन! उसमें कोई विकार नहीं दिखता। वह नित्य प्रसन्नवदना है, तुम्हारे प्रसाद से अनिन्दित है। इसलिए तुम सीता के प्रिय की इच्छा से शोक मत करो। मैं सदा वैदेही के परिपालन में सावधान हूँ।

😊 राम का संतोष (श्लोक १३-१५)

॥ श्लोक १३ ॥
लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा रामः सत्यपराक्रमः ।
प्रहृष्टवदनो भूत्वा लक्ष्मणं प्रत्यभाषत ॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण के वचन सुनकर सत्यपराक्रम राम प्रसन्न मुख हो गए और लक्ष्मण से बोले।
॥ श्लोक १४ ॥
साधु साधु महाप्राज्ञ लक्ष्मण त्वं सहायवान् ।
यथा मम मनस्तुष्टं त्वयि स्नेहपरायणे ॥
📖 भावार्थ : साधु साधु! हे महाप्राज्ञ लक्ष्मण! तुम बड़े सहायक हो। जैसे मेरा मन तुममें स्नेहपरायण है, वैसे ही तुमने मुझे संतोष दिया।
॥ श्लोक १५ ॥
इत्युक्त्वा परिष्वज्य लक्ष्मणं रघुनन्दनः ।
सीतामभ्यागमद्धृष्टो वन्यमूलफलान्वितः ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर रघुनन्दन राम ने लक्ष्मण को गले लगाया और प्रसन्न होकर सीता के पास गए, वन्य मूल-फल लेकर।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💑 राम का पतिप्रेम

इस सर्ग में राम के हृदय की कोमलता और पत्नी के प्रति उनका असीम प्रेम दृष्टिगोचर होता है। वनवास के कष्टों में भी वे सीता की मानसिक स्थिति की चिंता करते हैं।

🛡️ लक्ष्मण का कर्तव्यपालन

लक्ष्मण न केवल राम के प्रति वफादार हैं, बल्कि सीता के संरक्षण का भी पूरा ध्यान रखते हैं। वे राम को आश्वस्त करते हैं कि सीता सुरक्षित और संतुष्ट हैं।

🌿 सीता का आदर्श चरित्र

हालाँकि सीता इस सर्ग में मूक हैं, उनका धैर्य और राम के प्रति समर्पण लक्ष्मण के वर्णन से स्पष्ट होता है। वे वनवास को भी सहर्ष स्वीकार करती हैं।

🎯 धर्म और करुणा का संगम

राम धर्म का पालन करते हुए भी करुणा से परिपूर्ण हैं। यह शास्त्रों में वर्णित आदर्श राजा के लक्षणों को चरितार्थ करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि परिवार के प्रति संवेदनशीलता और चिंता एक सशक्त व्यक्तित्व के लक्षण हैं। राम की तरह हमें भी अपने प्रियजनों की भावनाओं को समझना चाहिए और उनके कल्याण के लिए सदा तत्पर रहना चाहिए। लक्ष्मण की तरह हमें भी अपने कर्तव्यों का पालन निष्ठा से करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे अष्टोत्तरशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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