सीता का विलाप

इस सर्ग में वनवास के दौरान सीता, राम के कष्टों और राजमहल के सुखों को याद करते हुए अत्यंत दुःखी होती हैं। वे अपनी व्यथा और विरह-वेदना को व्यक्त करती हैं, जिससे राम और लक्ष्मण भी भावुक हो जाते हैं।

विवरण

यह सर्ग चित्रकूट पर्वत पर स्थित पर्णकुटी में घटित होता है। राम, सीता और लक्ष्मण वनवास के कुछ दिन वहाँ बिता चुके हैं। एक दिन सीता प्रातःकाल पर्णकुटी के बाहर बैठकर प्रकृति के सौंदर्य को निहार रही थीं। अयोध्या के वैभव और वर्तमान कठिनाइयों के बीच तुलना करते हुए उनका हृदय विदीर्ण हो उठता है। वे राम के प्रति अपने असीम प्रेम और समर्पण का वर्णन करती हैं, साथ ही अपने भाग्य पर दुःख प्रकट करती हैं कि उनके कारण राम को यह कष्ट सहना पड़ रहा है। राम और लक्ष्मण उन्हें सांत्वना देते हैं और धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहने का उपदेश देते हैं। यह सर्ग सीता के आदर्श पत्नीत्व, त्याग और संयम का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग १०५

(सीता का विलाप – विरह-वेदना का सागर)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चाधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : चित्रकूट की रमणीय वाटिका में राम-सीता-लक्ष्मण कुटीर बनाकर निवास कर रहे हैं। प्रकृति का सौन्दर्य चरम पर है, किन्तु सीता के हृदय में अयोध्या का वैभव और राम के राज्य से वंचित होने की पीड़ा बार-बार उमड़ रही है। इसी संवेग में वे विलाप कर उठती हैं। यह सर्ग उनके अन्तर्मन की गहरी व्यथा का साक्षात्कार कराता है।

🌄 चित्रकूट का प्रभात और सीता का हृदय (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः प्रभाते विमले कृताह्निकविधिर्मुनिः ।
रामः सीतां सुमित्रासुतमुवाच प्रियं वचः ॥
किमिदं त्वं वरारोहे ध्यानं चिन्तयसे विभो ।
ननु सर्वं सुखं प्राप्तं वनवासेपि सुन्दरि ॥
इति रामस्य वचनं श्रुत्वा सीता मनस्विनी ।
उवाच भर्तारं दीनं वचनं साश्रुलोचना ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रभाते = प्रभात काल में; विमले = पवित्र; कृताह्निकविधिः = दैनिक कृत्य करके; मुनिः = मुनि के समान (राम); रामः = राम; सीताम् = सीता को; सुमित्रासुतम् = लक्ष्मण को; उवाच = बोले; प्रियम् = प्रिय; वचः = वचन; किम् इदम् = यह क्या; त्वम् = तुम; वरारोहे = श्रेष्ठ नितम्बवाले (हे सुन्दरि); ध्यानम् = ध्यान; चिन्तयसे = सोच रही हो; विभो = प्रभु; ननु = निश्चय ही; सर्वम् = सब; सुखम् = सुख; प्राप्तम् = प्राप्त है; वनवासेऽपि = वनवास में भी; सुन्दरि = हे सुन्दरी; इति = इस प्रकार; रामस्य = राम के; वचनम् = वचन; श्रुत्वा = सुनकर; सीता = सीता; मनस्विनी = दृढ़चित्त वाली; उवाच = बोलीं; भर्तारम् = पति से; दीनम् = करुण; वचनम् = वचन; साश्रुलोचना = अश्रुपूर्ण नेत्रों वाली।
📖 भावार्थ : उसके बाद पवित्र प्रभातकाल में दैनिक कृत्यों से निवृत्त होकर मुनिवत् राम ने सीता और लक्ष्मण से प्रिय वचन कहे, "हे सुन्दरि! तुम इस प्रकार ध्यानमग्न होकर क्या सोच रही हो? हे प्रभु! क्या वनवास में भी सब प्रकार का सुख प्राप्त नहीं है?" राम के ऐसे वचन सुनकर दृढ़चित्ता सीता ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपने पति से दीन वचन कहे।
🔍 व्याख्या : राम सदा सीता के मनोभावों को पहचानते हैं। वे समझ गए कि सीता किसी गहरे विचार में डूबी हैं, अतः वे उनसे कोमलता से पूछते हैं। सीता के नेत्रों में आँसू देखकर उनका हृदय द्रवित हो उठता है।
॥ श्लोक ४-६ ॥
स्मरन्ती नाथ वैदेही अयोध्यां सुखितां पुरीम् ।
मातरं पितरं चैव स्वजनं बान्धवांस्तथा ॥
कथं नु नाथ वैदेही विलपन्ती सुदुःखिता ।
नूनं मामेव कौसल्या जननी जनयिष्यति ॥
इत्येवं बहुधा सीता विलप्य करुणं वचः ।
रामं समीक्ष्य शोकेन भृशमार्ताभवत्तदा ॥
📖 भावार्थ : "हे नाथ! वैदेही सीता सुखी अयोध्या नगरी, माता-पिता, स्वजनों और बन्धु-बान्धवों को स्मरण कर रही हैं। हे नाथ! क्या वैदेही अत्यन्त दुःखी होकर विलाप नहीं कर रही हैं? निश्चय ही मेरी जननी कौसल्या मुझे ही (दुःख देने के लिए) जानेगी।" इस प्रकार बहुत प्रकार से करुण वचनों से विलाप करके सीता ने राम की ओर देखा और शोक से अत्यन्त पीड़ित हो गईं।
🔍 व्याख्या : सीता अपने को ही राम के कष्टों का कारण मानती हैं। उनका यह विलाप पत्नी के त्याग और आत्मग्लानि को दर्शाता है।

💔 सीता के विलाप के बोल (श्लोक ७-१८)

॥ श्लोक ७-१२ ॥
अहो कष्टमिदं नाथ यत्त्वं वनमुपागतः ।
मत्कृते नृपशार्दूल त्यक्त्वा राज्यं सुखोचितम् ॥
इक्ष्वाकूणां कुलं नूनं विनाशं समुपागतम् ।
यत्र त्वं शोकसन्तप्तो वनवासमुपागतः ॥
न मे पिता न मे माता न भ्राता न सुहृज्जनः ।
त्वमेव गतिरित्येवं त्वयि सर्वं समर्पितम् ॥
तवायत्तमिदं सर्वं यदि त्वं दुःखितो भवान् ।
ततो दुःखतरं किं नु ममेदं जीवितं वृथा ॥
विना त्वां न क्षणमपि जीवितुं नोत्सहे प्रभो ।
यदि त्वं गमनं कुर्याः सार्धमेव व्रजाम्यहम् ॥
📖 भावार्थ : "हे नाथ! यह बड़ा कष्ट है कि आप, जो सुख के योग्य हैं, राज्य त्यागकर मेरे कारण वन में आ गए। हे नृपशार्दूल! निश्चय ही इक्ष्वाकु कुल का विनाश हो गया, जहाँ आप शोक से सन्तप्त होकर वनवास को आ गए। मेरा न पिता है, न माता, न भ्राता, न सुहृद्-जन; आप ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं। इस प्रकार मैंने आप में सब कुछ समर्पित कर दिया है। आप पर ही सब कुछ आधारित है। यदि आप दुःखी होते हैं, तो मेरे लिए इससे बढ़कर और क्या दुःख होगा? आपके बिना एक क्षण भी जीवित रहना मेरे लिए असम्भव है। यदि आप कहीं जाएँ, तो मैं भी आपके साथ ही चलूँगी।"
🔍 व्याख्या : सीता ने राम के प्रति अपनी पूर्ण निष्ठा और आत्मीयता को उढ़ेल दिया है। वे राम के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकतीं। यह दाम्पत्य प्रेम का उत्कृष्ट उदाहरण है।
॥ श्लोक १३-१८ ॥
रामः सीतावचः श्रुत्वा भृशं शोकसमन्वितः ।
उवाच परमोदारो वाक्यं वाक्यविशारदः ॥
न त्वं शोचितुमर्हासि जानकि धर्मचारिणि ।
यदर्थं राज्यमुत्सृज्य वनमागतवानहम् ॥
धर्म एव परो लोके धर्म एव परं सुखम् ।
धर्मेण सर्वमाप्नोति धर्मः सर्वस्य कारणम् ॥
मा शोकं कुरु वैदेहि मा चिन्तां मा च विह्वलम् ।
अहं त्वां पालयिष्यामि यथा पूर्वं तथा प्रिये ॥
इत्युक्त्वा भाष्य रामस्तु लक्ष्मणं समचोदयत् ।
गृहाण क्षीरफलानि सीतायै देहि मा चिरम् ॥
📖 भावार्थ : सीता के वचन सुनकर राम अत्यन्त शोक से युक्त हुए। तदनन्तर परम उदार एवं वाक्य-विशारद राम ने कहा, "हे जानकि! हे धर्मचारिणि! तुम शोक करने योग्य नहीं हो। मैंने जिस धर्म के लिए राज्य त्यागकर वन प्रवेश किया है, वही धर्म इस लोक में परम है, धर्म ही परम सुख है। धर्म से ही सब कुछ प्राप्त होता है, धर्म ही सबका कारण है। हे वैदेही! शोक मत करो, चिन्ता मत करो और विह्वल मत होओ। हे प्रिये! मैं तुम्हारी पालना पहले की तरह ही करूँगा।" ऐसा कहकर राम ने लक्ष्मण को आदेश दिया, "जाकर दूध और फल ले आओ और सीता को दे दो, देर मत करो।"

🛡️ लक्ष्मण का सीता को धैर्य बंधाना (श्लोक १९-२४)

॥ श्लोक १९-२२ ॥
लक्ष्मणस्तु तदा राज्ञः प्रियं वाक्यमनुत्तमम् ।
श्रुत्वा प्रहृष्टवदनः प्रत्युवाच महीपतिम् ॥
आज्ञापय नरश्रेष्ठ करिष्ये तव शासनम् ।
सीतायै फलमूलानि क्षीरं चैव ददाम्यहम् ॥
इत्युक्त्वा स तु धर्मात्मा जगाम फलमूलवान् ।
आनीय सीतायै प्रादात् सा च भुक्त्वा सुखी बभौ ॥
एवं ते वनवासे तु वर्तमाना यथासुखम् ।
रामः सीतां समाश्वास्य स्वकुटीरमुपागमत् ॥
📖 भावार्थ : तब लक्ष्मण ने राम का वह अनुपम प्रिय वचन सुनकर प्रसन्न मुख से कहा, "हे नरश्रेष्ठ! आप आज्ञा दें, मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। मैं सीता के लिए फल-मूल और दूध लेकर आता हूँ।" ऐसा कहकर धर्मात्मा लक्ष्मण फल-मूल लेने गए और लाकर सीता को दिए। सीता ने भोजन किया और सुखी हुईं। इस प्रकार वे तीनों वनवास में सुखपूर्वक रहते हुए, राम सीता को धैर्य बंधाकर अपनी कुटीर में चले गए।

📜 धर्म का महत्त्व और संयम

॥ श्लोक २५-२८ ॥
धर्म एव परं यत्र सत्यमेव परं बलम् ।
राज्यं त्यक्त्वा वनं यातो रामः प्रियहिते रतः ॥
सीता च धर्मनिरता पतिव्रता पतिव्रता ।
लक्ष्मणश्च महातेजाः सेवते भ्रातरं गुरुम् ॥
एवं ते धर्मनिरताः सर्वे सुखमवाप्नुयुः ।
यथा रामः सुखी नित्यं तथा सर्वे भवन्तु च ॥
📖 भावार्थ : जहाँ धर्म ही परम है, सत्य ही परम बल है, वहाँ राम ने राज्य त्यागकर वन को प्रस्थान किया और प्रिय-हित में रत रहे। सीता भी धर्मनिरता और पतिव्रता धर्म का पालन करती हैं। महातेजस्वी लक्ष्मण अपने गुरुतुल्य भाई की सेवा करते हैं। इस प्रकार वे सभी धर्म में रत होकर सुख प्राप्त करते हैं। जैसे राम सदा सुखी हैं, वैसे ही सब सुखी हों।
🔍 व्याख्या : इस सर्ग में राम, सीता और लक्ष्मण के धर्मपरायण जीवन का आदर्श चित्रण है। सीता का विलाप अन्ततः धैर्य और संयम में बदल जाता है, क्योंकि वे राम के उपदेश से पुनर्बलित होती हैं। यह सर्ग हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म और कर्तव्य का पालन ही मनुष्य को सच्चा सुख देता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👸 सीता के आदर्श पत्नीत्व का चित्रण

इस सर्ग में सीता का विलाप उनके पति के प्रति गहरे समर्पण और अनन्य प्रेम को दर्शाता है। वे न केवल राम के कष्टों को अपने कष्टों से अधिक मानती हैं, बल्कि स्वयं को दोषी भी ठहराती हैं। यह पतिव्रता धर्म की पराकाष्ठा है।

☸️ राम का धर्मोपदेश

राम ने सीता को जो उपदेश दिया, वह जीवन के सर्वोच्च मूल्यों की ओर संकेत करता है। "धर्म ही परम सुख है" – यह सन्देश मानव को भौतिक सुखों से ऊपर उठकर आध्यात्मिक आनन्द की ओर ले जाता है।

🙇 लक्ष्मण का सेवाभाव

लक्ष्मण ने तत्परता से राम की आज्ञा का पालन किया और सीता के लिए फल-मूल लाए। उनका यह सेवाभाव आदर्श अनुज का उदाहरण है।

🌿 वनवास में भी सुख की अनुभूति

इस सर्ग से यह भी स्पष्ट होता है कि यदि मनुष्य संतुष्ट और धर्मनिष्ठ हो, तो वनवास में भी वह सुखी रह सकता है। प्रकृति का सान्निध्य और परस्पर प्रेम ही सच्चा सुख है।

🎯 शिक्षा : जीवन में दुःख और विपदाएँ आती हैं, लेकिन धर्म और संयम के बल पर उनका सामना करना चाहिए। सीता का विलाप हमें यह सिखाता है कि अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में कोई बुराई नहीं, किन्तु अन्ततः धैर्य और कर्तव्य-पालन ही सच्चा मार्ग है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे पञ्चाधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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