रावण का लंका की ओर प्रस्थान
अयोध्या काण्ड का यह सर्ग दण्डकारण्य में शूर्पणखा द्वारा अपने भाई रावण के पास पहुँचने और उसे खर-दूषण के वध का समाचार देने से आरम्भ होता है। बहन की विरूप दशा और भाइयों के वध से क्रोधित होकर रावण, सीता का हरण करने की योजना बनाते हुए, लंका की ओर प्रस्थान करता है।
विवरण
यह सर्ग उस नाटकीय मोड़ का सूत्रपात है जहाँ रावण स्वयं राम से भिड़ने का निश्चय करता है। शूर्पणखा, जिसकी नाक और कान राम-लक्ष्मण ने काट दिए थे, पूरी तरह विकृत अवस्था में रावण के पास जाती है। वह राम, लक्ष्मण और सीता का वर्णन करती है। वह रावण को उकसाती है कि वह सीता का हरण करके अपनी बहन के अपमान और खर-दूषण की मृत्यु का बदला ले। रावण, जो पहले से ही सीता के रूप-सौंदर्य की कहानी सुनकर काम-विह्वल हो जाता है, अपने सारथी को बुलाकर तुरंत पुष्पक विमान तैयार करने का आदेश देता है। वह अपने मंत्रियों और परिवार को संक्षिप्त निर्देश देकर, अकेले ही मारीच की सहायता लेने की योजना के साथ, लंका की ओर प्रस्थान करता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग १०४
(रावण का लंका की ओर प्रस्थान – दुर्योजना का आरम्भ)
🔆 प्रस्तावना : पंचवटी में शूर्पणखा का अपमान और खर-दूषण का संहार हो चुका है। विकृतांगी शूर्पणखा अब अपने भाई, लंकापति रावण, के पास पहुँचती है। उसके कटे हुए नाक-कान और करुण विलाप से रावण का क्रोध जागृत होता है। साथ ही, सीता के अद्भुत रूप का वर्णन उसके हृदय में कामाग्नि प्रज्वलित कर देता है। यह सर्ग रावण के अधर्म के मार्ग पर प्रस्थान का प्रथम चरण है।
👹 शूर्पणखा का करुण विलाप और रावण को उकसाना (श्लोक १-१०)
रावणस्य सहोदरा प्रविवेश गृहं तदा ॥
सा ददर्श तदा भ्रातरं रावणं राक्षसेश्वरम् ।
आसीनं सिंहसंकाशं दीप्तमानं यथा हुतम् ॥
तां दृष्ट्वा विकृतां राजा रावणो राक्षसाधिपः ।
पप्रच्छ किमिदं भद्रे कृतं ते केन रक्षसा ॥
सा च दीनस्वरा दीना कृपणं पर्यदेवयत् ।
वधं शूरस्य संग्रामे खरस्य च दूषणस्य च ॥
उवाच परमक्रुद्धः कम्पयन्निव रोदसी ॥
कस्य तेजोभिभूतस्य का चेयं विकृता कृता ।
आख्याहि मे महाभागे कस्त्वां कर्तुमिहार्हति ॥
🌺 सीता के रूप का वर्णन और रावण का मोह (श्लोक ११-१८)
प्रहर्षमतुलं लेभे वाक्यं चेदमुवाच ह ॥
रामो नाम महातेजा दाशरथिरिति श्रुतः ।
लक्ष्मणो नाम च भ्राता तस्य वीर्यवतां वरः ॥
तस्य भार्या महाभागा सीता नाम यशस्विनी ।
यस्यार्थे तौ नरव्याघ्रौ तापसौ संशितव्रतौ ॥
या शक्या नोपमातुं वै पृथिव्यामप्सरोगणैः ।
तां द्रष्टुकामस्त्वं राजन् सीतां पद्मनिभेक्षणाम् ॥
न रामं प्रति ते क्रोधः कर्तव्यो राक्षसेश्वर ॥
सीताहरणदोषेण रामस्य वधमिच्छसि ।
इत्युक्त्वा विररामाथ राक्षसी रावणं प्रति ॥
🚀 रावण का संकल्प और लंका प्रस्थान (श्लोक १९-२५)
स्मरन् रूपं च सीताया मुमोह च मुमोह च ॥
स सारथिमुवाचेदं वाक्यं राक्षसपुङ्गवः ।
योजयस्व रथं शीघ्रं सूत लङ्कागमं प्रति ॥
न ह्यहं तत्र वत्स्यामि यत्र सीता न मे प्रिया ।
तामिच्छामि नरेन्द्रस्य रामस्य महिषीं प्रियाम् ॥
आरुरोह रथं दिव्यं युक्तं परमवाजिभिः ॥
प्रययौ च ततः शीघ्रं लङ्कामभिमुखस्तदा ।
सीताहरणदुर्धर्षो मनसा कर्म दुष्करम् ॥
चिन्तयन् राघवं वीरं वधोपायं च राक्षसः ।
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🔥 काम और क्रोध का अंधकार
इस सर्ग में रावण के पतन के दो प्रमुख कारण - काम (वासना) और क्रोध - एक साथ उभरकर सामने आते हैं। शूर्पणखा के अपमान से क्रोध और सीता के रूप-वर्णन से काम-विह्वलता उसे विवेकहीन बना देती है। यह अधर्मी जीवन की दो सबसे बड़ी दुर्बलताएँ हैं।
👺 शूर्पणखा की भूमिका
शूर्पणखा इस पूरे प्रकरण की उद्दीपक पात्र है। वह केवल अपना बदला लेना चाहती है और इसके लिए वह अपने भाई को भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ती। वह जानती है कि रावण के क्रोध और अहंकार को भड़काकर ही वह अपना उद्देश्य पूरा कर सकती है।
⏳ विनाश के बीज
रावण का यह निर्णय (सीता हरण) उसके वंश, राज्य और स्वयं उसके विनाश का कारण बनता है। यहाँ से कथा का सूत्र लंका की ओर मुड़ता है, और दर्शक/पाठक उस त्रासदी को आते हुए देख सकता है, जिसकी नींव इसी सर्ग में रखी गई है।
🏹 विधि का विधान
राम के वनवास का मुख्य उद्देश्य राक्षसों का संहार था। रावण का यह कदम उसी दैवी योजना को गति प्रदान करता है। रावण सोचता है कि वह अपनी इच्छा से यह कदम उठा रहा है, किंतु यह उसके विनाश की लीला का ही एक भाग है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि काम और क्रोध पर नियंत्रण न रखने से मनुष्य का विवेक नष्ट हो जाता है और वह ऐसे निर्णय ले बैठता है, जो उसके लिए घातक सिद्ध होते हैं। कुसंगति और उकसावे में आकर लिए गए निर्णय सदा विनाशकारी होते हैं। रावण जैसा महापराक्रमी भी जब इनसे ग्रस्त हो जाता है, तो उसका पतन निश्चित है।