जटायु-रावण युद्ध और जटायु का पराजित होना

जब रावण सीता का हरण करके आकाश मार्ग से लंका जा रहा था, तब जटायु ने उसे रोका। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। अंततः रावण ने जटायु के पंख काट दिए और उसे पराजित कर आगे बढ़ गया।

विवरण

यह सर्ग अयोध्याकाण्ड का एक अत्यंत मार्मिक प्रसंग है। सीता की खोज में राम-लक्ष्मण जब दंडकारण्य में भ्रमण कर रहे थे, तब उन्हें जटायु का घायल अवस्था में दर्शन होता है। जटायु ने उन्हें बताया कि किस प्रकार उसने रावण को सीता सहित आकाश में जाते देखा और उसे रोकने का प्रयास किया। जटायु ने रावण को युद्ध के लिए ललकारा। रावण ने जटायु के साथ घोर युद्ध किया। जटायु ने अपनी चोंच और पंजों से रावण के रथ और अस्त्र-शस्त्रों को नष्ट कर दिया। अंततः रावण ने अपनी तलवार से जटायु के पंख काट दिए, जिससे वह धरती पर गिर पड़ा। रावण सीता को लेकर अंतर्ध्यान हो गया। जटायु, राम-लक्ष्मण को अपनी अंतिम वाणी सुनाकर प्राण त्याग देता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग १०३

(जटायु-रावण युद्ध और जटायु का पराजित होना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयोत्तरशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्ववर्ती सर्गों में राम-लक्ष्मण सीता की खोज में वन-वन भटक रहे थे। उन्हें कबन्ध का उद्धार करके शबरी के आश्रम से होते हुए पम्पा सरोवर तक पहुँचने का मार्ग मिला। इसी बीच उन्हें एक भीषण युद्ध के चिह्न दिखते हैं और फिर वे घायल जटायु को देखते हैं। यह सर्ग उसी मिलन और जटायु द्वारा रावण-युद्ध का वर्णन करने की कथा है।

🦅 घायल जटायु के दर्शन (श्लोक १-७)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः प्रवृत्ते संग्रामे राघवस्य सुदारुणे ।
रावणेन बलीयांसो राक्षसा निहता रणे ॥
सीतायाश्च परित्राणे जटायुर्युद्धमुत्तमम् ।
चकार बलवान् राजा गृध्रराजो महाबलः ॥
तस्य रावणसंग्रामे विख्यातं कीर्तिवर्धनम् ।
जटायुषो महाबाहो श्रूयतां परमं यशः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रवृत्ते = प्रारंभ हुए; संग्रामे = युद्ध में; राघवस्य = राघव के लिए; सुदारुणे = अत्यंत भयंकर; रावणेन = रावण द्वारा; बलीयांसः = अत्यंत बलवान; राक्षसाः = राक्षस; निहताः = मारे गए; रणे = युद्ध में; सीतायाः = सीता के; च = और; परित्राणे = रक्षा के लिए; जटायुः = जटायु ने; युद्धम् = युद्ध; उत्तमम् = उत्तम; चकार = किया; बलवान् = बलवान; राजा = राजा; गृध्रराजः = गृध्रराज; महाबलः = महाबली; तस्य = उसका; रावणसंग्रामे = रावण के साथ युद्ध में; विख्यातम् = प्रसिद्ध; कीर्तिवर्धनम् = कीर्ति बढ़ाने वाला; जटायुषः = जटायु का; महाबाहो = हे महाबाहो (राम); श्रूयताम् = सुनो; परमम् = परम; यशः = यश।
📖 भावार्थ : तब राम के लिए अत्यंत भयंकर युद्ध प्रारंभ हुआ। रावण ने उस युद्ध में बलवान राक्षसों को मार गिराया। सीता की रक्षा के लिए गृध्रराज जटायु ने रावण से उत्तम युद्ध किया। हे महाबाहो राम! उस महाबली जटायु का रावण-युद्ध में किया हुआ वह परम यश कीर्तिवर्धक है, उसे सुनो।
॥ श्लोक ४-७ ॥
रामस्तु लक्ष्मणं वाक्यमुवाच परमाद्भुतम् ।
पश्य लक्ष्मण! पन्थानं राक्षसेन्द्रप्रमाथिनम् ॥
हतान् राक्षसशार्दूलान् पतितान् पृथिवीतले ।
रथान् भग्नान् हतानश्वान् गजांश्च निहतान् भुवि ॥
इतः स्त्रीचिह्नमासाद्य गतासुः पतितो महीम् ।
गृध्रराजो महाबाहुः शोणितेन परिप्लुतः ॥
📖 भावार्थ : राम ने लक्ष्मण से अद्भुत वाक्य कहा: "हे लक्ष्मण! देखो, राक्षसेन्द्र का संहार करने वाला यह मार्ग। पृथ्वी पर पड़े हुए इन राक्षसों को देखो, टूटे हुए रथों को, मरे हुए घोड़ों और गिरे हुए गजों को। यहाँ स्त्री के चिह्न के पास महाबाहु गृध्रराज रक्त से लथपथ धरती पर गिरा हुआ है और प्राण त्याग रहा है।"

⚔️ जटायु-रावण युद्ध का वृत्तांत (श्लोक ८-२२)

॥ श्लोक ८-१२ ॥
स रावणं समासाद्य वेगेन महता बली ।
उवाच गृध्रराजस्तु मा भैः सीते शुचिस्मिते ॥
अहं त्वां राक्षसेन्द्रस्य हस्ताद्दुष्टस्य रक्षसः ।
मोक्षयिष्यामि भद्रं ते रामस्यानुचरोऽस्म्यहम् ॥
ततः रावणमाहूय जटायुर्वाक्यमब्रवीत् ।
क्व नु यास्यसि दुर्बुद्धे सीतां त्यक्त्वा नरोत्तमाम् ॥
न मां युद्धे पराजित्य नयिष्यसि निशाचर ।
स्थिरो भव मुहूर्तं ते युद्धं दास्यामि दुर्मते ॥
इत्युक्त्वा रावणं राजा जटायुः परवीरहा ।
चकार युद्धं दुर्धर्षं गृध्रराक्षसयोर्वने ॥
📖 भावार्थ : उस महाबली गृध्रराज ने रावण को वेग से रोककर कहा, "हे सीते! भय मत करो। मैं इस दुष्ट राक्षस के हाथों से तुम्हें मुक्त कराऊँगा। मैं राम का अनुचर हूँ।" फिर जटायु ने रावण को पुकारकर कहा, "हे दुर्बुद्धे! तू इस नरोत्तमा सीता को छोड़कर कहाँ जाएगा? हे निशाचर! युद्ध में मुझे पराजित किए बिना तू इसे नहीं ले जा सकता। एक क्षण ठहर, मैं तुझे युद्ध दूँगा।" ऐसा कहकर जटायु ने रावण से घोर युद्ध किया।
॥ श्लोक १३-१८ ॥
ततः रावणमाहूय जटायुर्वाक्यमब्रवीत् ।
पक्षाभ्यां ताडयामास रावणं रजनीचरम् ॥
स रथं साश्वयन्तारं जटायुश्चरणैस्तथा ।
चकार भस्मसाद्वेगात्क्रोधदीप्तो महाबलः ॥
ततो रावणमापत्या चरणैर्नखरैरपि ।
जघान गृध्रराजस्तु पक्षाभ्यां च महाबलः ॥
रावणोऽपि महातेजा जटायुं युद्धदुर्मदम् ।
अस्त्रैरनेकधा विद्ध्वा व्यथयामास संयुगे ॥
ततः क्रोधसमाविष्टो जटायुः परवीरहा ।
उत्पपात महावेगो रावणस्य रथं प्रति ॥
चरणाभ्यां च चोंचा च रावणं समताडयत् ।
स रथाद्व्यथितो राजा रावणः पतितो भुवि ॥
📖 भावार्थ : तब जटायु ने अपने पंखों से रावण को आघात किया। क्रोध से दीप्त उस महाबली ने अपने पैरों से रावण के रथ, घोड़े और सारथि को तत्काल भस्म कर दिया। फिर गृध्रराज ने पंजों और पंखों से रावण पर प्रहार किया। रावण ने भी जटायु पर अनेक अस्त्रों से वार किया। तब क्रोध में भरकर जटायु अत्यंत वेग से रावण के रथ की ओर कूदा और अपने पैरों और चोंच से रावण को आघात किया। रथ से व्यथित होकर रावण धरती पर गिर पड़ा।
॥ श्लोक १९-२२ ॥
ततो रावणमुत्थाय खड्गमादाय दीप्तिमान् ।
जटायोः पक्षौ चिच्छेद पततस्तस्य संयुगे ॥
स हतपक्षो गृध्रराजो निपपात महीतले ।
रावणोऽपि ततः सीतामादाय गगनं ययौ ॥
ततो जटायुर्व्यथितो रुधिरेण समुक्षितः ।
चुक्रोश राम रामेति लक्ष्मणेति च दीनवत् ॥
रामस्तु लक्ष्मणं दृष्ट्वा जटायुं निहतं भुवि ।
पप्रच्छ किमिदं तात कथं चैतत्प्रदृश्यते ॥
📖 भावार्थ : तब रावण उठ खड़ा हुआ और अपनी दीप्तिमान तलवार निकालकर युद्ध में आकाश में उड़ते हुए जटायु के दोनों पंख काट दिए। पंख कटते ही गृध्रराज धरती पर गिर पड़ा। रावण सीता को लेकर आकाश में अंतर्ध्यान हो गया। तब घायल जटायु, रक्त से लथपथ, दीन स्वर में 'राम! राम! लक्ष्मण!' पुकारने लगा। राम ने लक्ष्मण के साथ जटायु को धरती पर गिरा देखकर पूछा, "हे तात! यह क्या है? यह कैसे हुआ?"

💔 जटायु का अंतिम वचन और प्राणत्याग (श्लोक २३-३८)

॥ श्लोक २३-३० ॥
ततो जटायुः संप्रेक्ष्य रामं दीनः कृताञ्जलिः ।
उवाच वचनं श्लक्ष्णं रामस्य प्रियकाम्यया ॥
यां वैदेहीं महाभागां त्वमिच्छसि नरोत्तम ।
सा रावणेन नीता च दण्डकारण्यवासिना ॥
अहमेनां यथाशक्ति रक्षमाणो महाबलः ।
रावणेन हृतां दृष्ट्वा युद्धमिच्छामि दुर्मतिम् ॥
स मया युध्यमानस्तु रथं त्यक्त्वा महाबलः ।
खड्गेन पक्षौ छित्वा मां गतः सीतामथाददे ॥
क्षन्तुमर्हसि मे राम यन्न शक्तोऽस्मि राक्षसम् ।
निहन्तुं तव नारीर्थं रावणं कालचोदितम् ॥
इत्युक्त्वा व्यथितो राजा जटायुः पतगेश्वरः ।
न्यमीलयत नेत्रे च राममेवानुचिन्तयन् ॥
📖 भावार्थ : तब जटायु ने राम को देखकर हाथ जोड़े और प्रिय वाणी में कहा, "हे नरोत्तम! जिस वैदेही को तुम चाहते हो, उस महाभागा सीता को दण्डकारण्य निवासी रावण हर ले गया। मैंने अपनी शक्ति भर उसकी रक्षा का प्रयत्न किया। उस दुर्मति रावण को सीता सहित देखकर मैंने युद्ध किया। उस महाबली ने मुझसे युद्ध करते हुए अपना रथ छोड़ दिया और तलवार से मेरे पंख काटकर सीता को ले गया। हे राम! मैं उस राक्षस को मार नहीं सका, इसके लिए मुझे क्षमा करना।" ऐसा कहकर व्यथित जटायु ने राम का चिंतन करते हुए अपने नेत्र मूँद लिए।
॥ श्लोक ३१-३८ ॥
रामस्तु वचनं श्रुत्वा जटायोः पतगेश्वरः ।
सीतावियोगसंतप्तो विललाप सुदुःखितः ॥
लक्ष्मणं चाब्रवीद्रामो गच्छ वैदेहिमार्गणे ।
जटायुं पाहि भद्रं ते नूनं प्राणान्परित्यजेत् ॥
ततः कृत्वा जलं रामो जटायोः परमार्चितम् ।
ददाह चितया तस्य गृध्रराजस्य धीमतः ॥
स्वर्गतं चाब्रवीद्वाक्यं राघवः प्रियदर्शनः ।
गच्छ तात गतिस्तुभ्यं मत्कृते यदुपस्थितम् ॥
📖 भावार्थ : जटायु के वचन सुनकर राम सीता-वियोग से अत्यंत दुःखी हुए और विलाप करने लगे। उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "जाओ, वैदेही का पता लगाओ, और जटायु की रक्षा करो, यह प्राण त्याग रहा है।" तब राम ने जटायु के लिए जलांजलि दी और उनका धीमान् गृध्रराज के लिए चिता बनाकर दाह-संस्कार किया। फिर राम ने स्वर्गगत जटायु से कहा, "हे तात! तुम्हें सद्गति प्राप्त हो, जो तुमने मेरे लिए यह किया।"

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦅 जटायु का बलिदान

जटायु ने अपने प्राणों की परवाह न करते हुए रावण को युद्ध में ललकारा। यह मित्रता और कर्तव्यनिष्ठा का अद्वितीय उदाहरण है। जटायु राम के पिता दशरथ के मित्र थे, इसलिए उन्होंने राम की पत्नी की रक्षा का बीड़ा उठाया।

💔 राम का शोक और करुणा

जटायु की दशा देखकर राम का विलाप और उनके प्रति संवेदना राम के करुण हृदय को दर्शाता है। उन्होंने जटायु का अंतिम संस्कार अपने पिता के समान किया, जो उनके कृतज्ञता और मर्यादा का प्रतीक है।

⚔️ युद्ध का वर्णन

इस सर्ग में जटायु-रावण युद्ध का सजीव चित्रण है। जटायु ने अपने पंजों और चोंच से रावण के रथ और अस्त्रों को नष्ट कर दिया, यह उसकी अदम्य वीरता को दर्शाता है।

🌿 सीता के पदचिह्न

जटायु द्वारा बताए गए मार्ग से राम को सीता की खोज की दिशा मिलती है। इस सर्ग में जटायु द्वारा दी गई जानकारी ही आगे राम को सुग्रीव और हनुमान से मिलने का अवसर देती है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हमें अपनी क्षमता के अनुसार धर्म की रक्षा के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए, भले ही सफलता न मिले। जटायु का बलिदान अमर है। सच्ची मित्रता और कर्तव्यपालन के लिए प्राणों की आहुति देना भी उचित है। राम द्वारा जटायु का अंतिम संस्कार करना हमें सिखाता है कि हमें उन लोगों का सम्मान करना चाहिए जो हमारे लिए कष्ट उठाते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे त्रयोत्तरशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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