सीता का रावण से परिचय
अयोध्याकाण्ड के इस अद्भु� प्रसंग में रावण छल से अयोध्या में प्रवेश करता है और सीता से भेंट करता है। वह अपने वास्तविक रूप को छुपाकर एक तपस्वी का वेष धारण करता है और सीता के सौन्दर्य से मोहित होकर उनसे परिचय प्राप्त करता है। यह सर्ग रावण के मन में सीता के प्रति आसक्ति के बीज बोने का कारण बनता है।
विवरण
यह सर्ग अयोध्या की समृद्धि और राम के राज्याभिषेक की तैयारियों के बीच घटित होता है। एक दिन जब सीता महल के उद्यान में विश्राम कर रही थीं, तभी एक वृद्ध तपस्वी के वेश में रावण वहाँ पहुँचता है। वह सीता की अद्वितीय सुन्दरता देखकर मोहित हो जाता है। तपस्वी का रूप धारण कर वह सीता के पास जाता है और धर्म-चर्चा का बहाना बनाकर उनसे वार्तालाप करता है। सीता, अतिथि-सत्कार की भावना से उसका सम्मान करती हैं और अपना परिचय देती हैं। रावण धीरे-धीरे अपने वास्तविक रूप का संकेत देता है और सीता से उनके पति राम के बारे में पूछता है। सीता सरलता से राम के गुणों का वर्णन करती हैं। अंत में रावण अपना असली रूप प्रकट करता है और सीता को लंका चलने का निमंत्रण देता है। सीता क्रोधित होकर उसे धिक्कारती हैं और राम की वीरता से डराने का प्रयास करती हैं। रावण वहाँ से चला जाता है, लेकिन उसके हृदय में सीता के प्रति आसक्ति प्रबल हो जाती है। यह घटना आगे चलकर सीता हरण का कारण बनती है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग १००
(सीता का रावण से परिचय – आसक्ति का उदय)
🔆 प्रस्तावना : राम के राज्याभिषेक की तैयारियाँ चल रही हैं। अयोध्या उत्सव के रंग में रंगी है। उधर, लंकापति रावण अपने मंत्रियों से राम के पराक्रम की कथा सुनकर उनकी पत्नी सीता के रूप के बारे में जानने को उत्सुक होता है। वह छल से अयोध्या जाकर सीता को देखने का निश्चय करता है। यह सर्ग उसी छल-भेंट का वर्णन करता है।
🏰 रावण का अयोध्या प्रवेश और तपस्वी वेश (श्लोक १-८)
प्रविष्टो नगरीं लङ्कापतिर्दशाननः स्वयम् ॥
विधाय वेषं वृद्धस्य तापसस्य वनेचरः ।
जटी मुण्डी कमण्डल्वी छत्री दण्डी पदातिकः ॥
प्रविश्योद्यानमासाद्य यत्र सीता व्यवस्थिता ।
ददर्श तां वरारोहां पद्मपत्रायतेक्षणाम् ॥
उपसंक्रम्य धर्मात्मा सीतामिदमुवाच ह ॥
कासि कस्यासि भद्रं ते वद सुन्दरि मा चिरम् ।
इत्युक्ता सा तदा सीता रावणं वाक्यमब्रवीत् ॥
रामपत्नी वसिष्ठस्य नप्त्री जनकनन्दिनी ।
सीता नामास्मि राजेन्द्र तपस्विन्यतिथिप्रिया ॥
🕉️ रावण का आत्म-परिचय और सीता का सरलता (श्लोक ९-१६)
उवाच मधुरं वाक्यं स्मितपूर्वमिदं तदा ॥
अहं रावण नाम्ना वै राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ।
लङ्काधिपतिरव्यग्रः कामरूपधरो वशी ॥
त्वामहं प्रार्थये भीरु भज मां रूपशालिनीम् ।
लङ्कां गच्छावहे देवि रत्नभोगसमन्विताम् ॥
कोपसंरक्तनयना प्रत्युवाच दशाननम् ॥
कथं रामं परित्यज्य पतिं देवकृतं मम ।
त्वां भजेयं दुराचारं कीटं गजपतिं यथा ॥
रामस्य वीर्यमज्ञाय मामिच्छसि निशाचर ।
न चिरात्त्वं गमिष्यामि यमलोकं सराक्षसम् ॥
🔥 सीता का क्रोध और रावण का भयभीत होकर प्रस्थान (श्लोक १७-२५)
रावणस्तु भयाद्विप्रस्ततस्तत्र न कम्पते ॥
ततो लक्ष्मणमायान्तं ददर्श रणदुर्मदः ।
रामानुजं महात्मानं धन्विनं रणकर्कशम् ॥
तं दृष्ट्वा रावणः शीघ्रं तपस्वीवेषधारकः ।
अन्तर्धानं गतो भूत्वा लङ्कां प्रायान्महाबलः ॥
📢 लक्ष्मण का आगमन और सीता का संवाद
पप्रच्छ किमिदं देवि कुतस्ते भयमागतम् ॥
सीता तु कथयामास रावणस्य समागमम् ।
लक्ष्मणः परमक्रुद्धो रामाय त्वाचचक्ष ह ॥
रामस्तु श्रुत्वा संक्रुद्धो जगाद भ्रातरं वचः ।
मा भैस्त्यज भयं वीर रावणो मद्बलं विदन् ॥
न युद्ध्यति पुरः स्थित्वा छलेनैव स वर्तते ।
इति संभाष्य धर्मज्ञौ पुनरास्तां नरोत्तमौ ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👿 रावण का छल और कामासक्ति
इस सर्ग में रावण का तपस्वी वेष धारण करना और सीता से छल से परिचय प्राप्त करना उसके दुष्चरित्र और कामुकता को उजागर करता है। वह धर्म का आवरण लेकर अधर्म करता है, जो उसके पतन का कारण बनता है।
💪 सीता का साहस और पतिव्रता धर्म
सीता ने रावण के प्रलोभनों को ठुकराकर और उसे धिक्कारकर पतिव्रता धर्म का पालन किया। उनका तेज रावण को जला देता है, और वे राम के प्रति अटूट निष्ठा का परिचय देती हैं।
⚔️ राम का विवेक
राम लक्ष्मण को समझाते हैं कि रावण युद्ध में सामना नहीं करेगा, छल करेगा। यह राम की दूरदर्शिता और रावण की कायरता को दर्शाता है।
🌗 आगामी काण्डों की भूमिका
यह सर्ग सीता हरण की पृष्ठभूमि तैयार करता है। रावण के मन में सीता के प्रति जो आसक्ति उत्पन्न होती है, वही उसे सीता हरण के लिए उकसाती है, जो आगे चलकर राम-रावण युद्ध का कारण बनती है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि साधु का वेष धारण करने से कोई साधु नहीं बन जाता, और छल से कभी सत्य की प्राप्ति नहीं होती। स्त्री का पातिव्रत्य और साहस सबसे बड़ा कवच है। साथ ही, अधर्म के मार्ग पर चलने वाला अंत में पराजित होता है।