अरण्य काण्ड अध्याय 73

कबंध द्वारा पम्पा सरोवर की महिमा बताना

अरण्यकाण्ड के तिहत्तरवें सर्ग में कबंध राम-लक्ष्मण को पम्पा सरोवर की महिमा बताते हैं, शबरी के आश्रम जाने का निर्देश देते हैं, और सुग्रीव से मैत्री करने की सलाह देते हैं।

विवरण

राक्षस कबंध का वध करने के बाद राम एवं लक्ष्मण उसके शरीर का दाह संस्कार करते हैं। कबंध के शरीर से एक दिव्य गंधर्व (विश्वावसु) प्रकट होता है, जो अपने शाप से मुक्ति पाने पर राम को धन्यवाद देता है और उन्हें आगे की यात्रा के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है। वह पम्पा सरोवर की पावनता, उसके तट पर स्थित मातंग ऋषि के आश्रम और वहाँ निवास करने वाली तपस्विनी शबरी के बारे में बताता है। साथ ही वह ऋष्यमूक पर्वत पर रहने वाले वानरराज सुग्रीव से मित्रता करने का सुझाव देता है, जो राम के कार्य में सहायक हो सकते हैं। तदनन्तर कबंध अन्तर्धान हो जाता है और राम-लक्ष्मण पम्पा की ओर प्रस्थान करते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ७३

(कबंध द्वारा पम्पा सरोवर की महिमा – शबरी एवं सुग्रीव का निर्देश)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राक्षस कबंध का वध करने के बाद राम एवं लक्ष्मण उसके शरीर का दाह संस्कार करते हैं। कबंध के शरीर से एक दिव्य गंधर्व (विश्वावसु) प्रकट होता है, जो अपने शाप से मुक्ति पाने पर राम को धन्यवाद देता है और उन्हें आगे की यात्रा के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है। वह पम्पा सरोवर की पावनता, उसके तट पर स्थित मातंग ऋषि के आश्रम और वहाँ निवास करने वाली तपस्विनी शबरी के बारे में बताता है। साथ ही वह ऋष्यमूक पर्वत पर रहने वाले वानरराज सुग्रीव से मित्रता करने का सुझाव देता है, जो राम के कार्य में सहायक हो सकते हैं।

✨ कबंध का दिव्य रूप में प्रकट होना (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः प्रेतशरीरात्तु कबन्धस्य महात्मनः ।
उत्तस्थौ विगतो दिव्यो रूपेणाप्रतिमो भुवि ॥
स राममभिगम्याथ कृताञ्जलिरभाषत ।
प्रीतियुक्तो महातेजा वचनं चेदमब्रवीत् ॥
राम राम महाबाहो लक्ष्मण च महाबल ।
अनुगृहीतावावां वां कृपया मुक्तबन्धनौ ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रेतशरीरात् = मृत शरीर से; तु = ही; कबन्धस्य = कबंध के; महात्मनः = महान आत्मा के; उत्तस्थौ = प्रकट हुआ; विगतः = दिव्य; दिव्यः = दिव्य; रूपेण = रूप से; अप्रतिमः = अनुपम; भुवि = पृथ्वी पर; सः = वह; रामम् = राम के पास; अभिगम्य = आकर; अथ = फिर; कृताञ्जलिः = हाथ जोड़कर; अभाषत = बोला; प्रीतियुक्तः = प्रेमपूर्वक; महातेजाः = महान तेजस्वी; वचनम् = वचन; च = और; इदम् = यह; अब्रवीत् = कहा; राम राम = हे राम; महाबाहो = महाबाहु; लक्ष्मण = हे लक्ष्मण; च = और; महाबल = महान बलवान; अनुगृहीतौ = कृतज्ञ; आवाम् = हम; वाम् = आप दोनों से; कृपया = कृपा से; मुक्तबन्धनौ = बन्धन मुक्त।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् उस महात्मा कबंध के मृत शरीर से एक दिव्य, अनुपम पुरुष प्रकट हुआ। वह महातेजस्वी राम के पास आया और हाथ जोड़कर प्रेमपूर्वक बोला: "हे महाबाहु राम, हे महाबलशाली लक्ष्मण, आप दोनों की कृपा से मैं इस शाप से मुक्त हुआ हूँ।"
🔍 व्याख्या : पूर्वजन्म में यह गंधर्व विश्वावसु था, जो शापवश कबंध राक्षस बन गया था। राम के द्वारा उसके बाहु काटने और शरीर जलाने पर उसे शापमुक्ति मिली।

🌊 पम्पा सरोवर की महिमा एवं शबरी का आश्रम (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१४ ॥
पम्पा नाम नदी पुण्या यत्र सिद्धाश्रमः स्मृतः ।
मातङ्गस्य महर्षेस्तु शबरी यत्र तिष्ठति ॥
तस्यास्तीरे महापुण्ये रम्ये चैव समन्ततः ।
वसन्ति बहवो योगाः सिद्धाश्च परमर्षयः ॥
तत्र स्नात्वा नरो राजन् गतश्रमो विशुध्यति ।
पितृदेवर्षिसिद्धानां प्रयच्छति तिलोदकम् ॥
गच्छध्वं त्वरितं तत्र द्रक्ष्यथ शबरीं शुभाम् ।
धर्मिष्ठां च कृतार्थां च तपसा दग्धकिल्बिषाम् ॥
📖 भावार्थ : "पम्पा नामक पुण्य नदी है, जहाँ सिद्धाश्रम है। वहाँ महर्षि मातंग का आश्रम है और उसमें शबरी रहती है। उस नदी के अत्यन्त पुण्यमय और रमणीय तट पर बहुत से योगी, सिद्ध और परमर्षि निवास करते हैं। हे राजन! वहाँ स्नान करने से मनुष्य थकान से मुक्त होकर पवित्र हो जाता है तथा पितरों, देवताओं, ऋषियों और सिद्धों को तिलोदक देता है। तुम शीघ्र ही वहाँ जाओ और उस शुभ, धर्मनिष्ठ, कृतार्थ एवं तप से पापमुक्त शबरी को देखो।"
🔍 व्याख्या : कबंध राम को पम्पा सरोवर की महिमा बताते हैं और वहाँ जाकर शबरी से मिलने का निर्देश देते हैं। शबरी अपनी भक्ति और तपस्या के लिए प्रसिद्ध हैं।

🐒 ऋष्यमूक पर्वत और सुग्रीव का निर्देश (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२४ ॥
ततो गच्छध्वमव्यग्रा ऋष्यमूकं गिरिं प्रति ।
तत्र सुग्रीवो नाम्नास्ति वानरो हरियूथपः ॥
स वालिना निरस्तश्च भ्रात्रा क्रोधवशंगतः ।
वसते सह वीरैश्च वानरैर्हरियूथपैः ॥
तस्य सख्यं विधत्तध्वं स वो हितकरः सखा ।
सीतायाश्च परिमार्गे सहायः स महाबलः ॥
यथा हि भवतां कार्यं सिद्धिमेष्यति राघव ।
तथा सुग्रीवसहिताः सर्व एव समर्थकाः ॥
📖 भावार्थ : "फिर तुम निश्चिंत होकर ऋष्यमूक पर्वत की ओर जाओ। वहाँ सुग्रीव नामक वानर रहता है, जो वानरों का सेनापति है। वह अपने भाई वाली के द्वारा क्रोधवश निष्कासित कर दिया गया है और वहाँ वीर वानरों एवं यूथपतियों के साथ रहता है। उससे मित्रता कर लो; वह तुम्हारा हितकारी सखा होगा। सीता की खोज में वह महाबली सहायक होगा। हे राघव! जैसे तुम्हारा कार्य सिद्ध होगा, वैसे ही सुग्रीव सहित ये सभी समर्थ हैं।"
🔍 व्याख्या : कबंध राम को सुग्रीव से मित्रता करने का सुझाव देते हैं, क्योंकि सुग्रीव सीता की खोज में सहायक होंगे। यही आगे चलकर राम-सुग्रीव मैत्री का आधार बनता है।

🌟 कबंध का अन्तर्धान और राम की आगे की यात्रा (श्लोक ३१-३५)

॥ श्लोक ३१-३५ ॥
इत्युक्त्वा तु महातेजा रामं सत्यपराक्रमम् ।
जगामाकाशमाविश्य दिव्येन स्वेन रूपिणा ॥
रामोऽपि सह सौमित्रिः प्रहृष्टवदनोऽब्रवीत् ।
गच्छावः पम्पामासाद्य द्रक्ष्यावः शबरीमिति ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार सत्यपराक्रमी राम से कहकर वह महातेजस्वी गंधर्व अपने दिव्य रूप से आकाश में प्रविष्ट होकर अन्तर्धान हो गया। राम भी प्रसन्न मुख से लक्ष्मण सहित बोले: "चलो, पम्पा सरोवर के पास जाकर शबरी से मिलें।"

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧭 मार्गदर्शक कबंध

कबंध का यह उपदेश राम को सही मार्ग दिखाता है। यह दर्शाता है कि संकट में भी सज्जनों को सहायता मिलती है।

🙏 भक्त शबरी का आश्रम

शबरी के आश्रम का उल्लेख भक्ति मार्ग की महिमा को दर्शाता है। राम वहाँ जाकर शबरी के जूठे बेर खाएँगे, जो प्रेम और भक्ति का प्रतीक है।

🤝 सुग्रीव-मैत्री का बीज

इस सर्ग में ही सुग्रीव से मित्रता का संकेत दिया गया है, जो आगे चलकर वानर सेना के सहयोग और रावण-वध का कारण बनता है।

🌄 पम्पा सरोवर का माहात्म्य

पम्पा सरोवर का वर्णन प्रकृति और आध्यात्मिक पवित्रता के संगम को दर्शाता है। यह स्थान राम की वन-यात्रा में महत्वपूर्ण पड़ाव है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चे मित्र और गुरु का मार्गदर्शन जीवन में आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है। कबंध ने न केवल अपना उद्धार किया, बल्कि राम को उनके लक्ष्य की ओर अग्रसर किया। हमें भी अपने अनुभवों से दूसरों का मार्गदर्शन करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे त्रिसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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