अरण्य काण्ड अध्याय 71

कबंध का दाह संस्कार का अनुरोध

अरण्यकाण्ड के इस सर्ग में राम और लक्ष्मण, राक्षस कबंध से भिड़ते हैं। राम द्वारा उसकी भुजाएँ काटने पर कबंध अपने वास्तविक स्वरूप (गन्धर्व) में प्रकट होता है और राम से प्रार्थना करता है कि वे उसका दाह-संस्कार करें, जिससे उसे मुक्ति मिल सके। इसके बाद कबंध राम को सुग्रीव से मित्रता करने का परामर्श देता है।

विवरण

पम्पा सरोवर के निकट भ्रमण करते हुए राम और लक्ष्मण एक भयंकर राक्षस कबंध से मिलते हैं, जो बिना सिर और गर्दन का है, उसका मुख उसकी छाती पर है और एक विशाल नेत्र है। वह अपनी लंबी भुजाओं से राम-लक्ष्मण को पकड़ लेता है। राम और लक्ष्मण संघर्ष करते हैं और अपनी तलवारों से उसकी भुजाएँ काट डालते हैं। मरते समय कबंध अपने पूर्व जन्म का वृत्तांत बताता है कि वह एक गन्धर्व था, जो शापवश इस रूप में आ गया। वह राम से विनती करता है कि वे उसका दाह-संस्कार करें, जिससे उसे शाप से मुक्ति मिले। राम ऐसा करते हैं। तब कबंध का गन्धर्व रूप प्रकट होता है और वह राम को सलाह देता है कि वे सुग्रीव नामक वानरराज से मित्रता करें, जो इस समय ऋष्यमूक पर्वत पर निवास कर रहा है और सीता की खोज में सहायता कर सकता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ७१

(कबंध का दाह-संस्कार अनुरोध – सुग्रीव-दर्शन का मार्ग)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम और लक्ष्मण सीता की खोज में दण्डकारण्य के विभिन्न प्रदेशों में भ्रमण कर रहे हैं। पम्पा सरोवर के तट पर पहुँचकर उनका सामना एक विचित्र राक्षस कबंध से होता है। यह सर्ग उस मुठभेड़, उसके वध, उसके दाह-संस्कार तथा उसके द्वारा दिए गए सुग्रीव-संदेश का वर्णन करता है। यह घटना राम की आगे की यात्रा की दिशा तय करती है।

👹 कबंध से भेंट और भुजाओं का छेदन (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-५ ॥
तौ प्रविश्य महारण्यं रामः सौमित्रिणा सह ।
ददर्शातिबलं घोरं राक्षसं भीमदर्शनम् ॥
उरोगतमुखं क्रूरं विशालाक्षं महोदरम् ।
दीर्घजिह्वं महानादं विकटाक्षं भयानकम् ॥
स तु कबन्धो नाम्नाऽऽसीद्राक्षसः क्रूरकर्मकृत् ।
तेन सार्धं समागम्य रामः सौमित्रिणा सह ॥
स तावतिबलौ वीरौ भुजाभ्यां परिषस्वजे ।
बलादाच्छिद्य विक्रम्य रामं सौमित्रिणा सह ॥
🔹 पदच्छेद : तौ = वे दोनों; प्रविश्य = प्रवेश करके; महारण्यम् = महान वन में; रामः = राम; सौमित्रिणा = लक्ष्मण के; सह = साथ; ददर्श = देखा; अतिबलम् = अत्यन्त बलवान; घोरम् = भयंकर; राक्षसम् = राक्षस को; भीमदर्शनम् = भयानक दिखने वाला; उरोगतमुखम् = जिसका मुख छाती पर स्थित है; क्रूरम् = क्रूर; विशालाक्षम् = विशाल नेत्र वाला; महोदरम् = बड़े पेट वाला; दीर्घजिह्वम् = लम्बी जीभ वाला; महानादम् = बड़ी आवाज वाला; विकटाक्षम् = विकराल आँखों वाला; भयानकम् = डरावना; सः = वह; तु = तो; कबन्धः = कबन्ध; नाम्ना = नाम से; आसीत् = था; राक्षसः = राक्षस; क्रूरकर्मकृत् = क्रूर कर्म करने वाला; तेन = उसके; सार्धम् = साथ; समागम्य = मिलकर; रामः = राम; सौमित्रिणा = लक्ष्मण के; सह = साथ; सः = उसने; तौ = उन दोनों; अतिबलौ = अत्यन्त बलवान; वीरौ = वीरों को; भुजाभ्याम् = भुजाओं से; परिषस्वजे = जकड़ लिया; बलात् = बलपूर्वक; आच्छिद्य = पकड़कर; विक्रम्य = पराक्रम दिखाकर; रामम् = राम को; सौमित्रिणा = लक्ष्मण के; सह = साथ।
📖 भावार्थ : उस महावन में प्रवेश करके राम और लक्ष्मण ने एक अत्यन्त बलवान, भयंकर दिखने वाले राक्षस को देखा, जिसका मुख छाती पर था, विशाल नेत्र थे, बड़ा पेट था, लम्बी जीभ थी, वह बहुत ऊँची आवाज करता था और भयानक था। वह कबन्ध नाम का राक्षस था, जो क्रूर कर्म करता था। उससे मिलकर राम और लक्ष्मण उसके साथ युद्ध में उलझ गए। उसने उन दोनों अतिबल वीरों को अपनी भुजाओं से जकड़ लिया और बलपूर्वक पकड़ लिया।
🔍 व्याख्या : कबन्ध एक निराकार-सा राक्षस है, जिसका कोई सिर नहीं, केवल धड़ और लम्बी भुजाएँ हैं। वह राम-लक्ष्मण को पकड़ लेता है, किन्तु वे शीघ्र ही अपनी तलवारों से उसकी भुजाएँ काट देते हैं।
॥ श्लोक १०-१२ ॥
ततः स रामः सौमित्रिः खड्गाभ्यां च महाबलौ ।
बाहू कबन्धस्य चिच्छेद रामः सत्यपराक्रमः ॥
स छिन्नबाहुः सहसा पपात धरणीतले ।
पृष्ट्वा चोवाच कौ त्वं वै विस्मितो राघवं तदा ॥
📖 भावार्थ : तब सत्यपराक्रमी राम और महाबली लक्ष्मण ने तलवारों से कबन्ध की भुजाओं को काट डाला। भुजाएँ कटते ही कबन्ध तुरन्त भूमि पर गिर पड़ा और आश्चर्यचकित होकर राघव से पूछा, "तुम कौन हो?"

🔥 कबंध की कथा और दाह-संस्कार प्रार्थना (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-१८ ॥
रामस्तु तस्य तत्सर्वं श्रोतुमिच्छन् यथातथम् ।
न्यवेदयत चात्मानं राक्षसाय महात्मने ॥
आवां दाशरथी वीरौ रामलक्ष्मण संज्ञितौ ।
सीतायाः परिमार्गार्थं प्रविष्टौ दण्डकानि वै ॥
तच्छ्रुत्वा राक्षसो वाक्यं प्रत्युवाच महाबलः ।
युवां मे परमं सौख्यं दृष्ट्वैव हृदि वर्तते ॥
शृणु राम महाबाहो यथा जातोऽस्म्यहं वने ।
गन्धर्वो वै महाभागः शापादिदं गतो वपुः ॥
📖 भावार्थ : राम उसकी बात सुनना चाहते थे, अतः उन्होंने अपना परिचय दिया – "हम दोनों दशरथ-पुत्र राम और लक्ष्मण हैं, सीता की खोज में दण्डक वन में आए हैं।" यह सुनकर उस महाबली राक्षस ने कहा, "तुम्हें देखकर मेरे हृदय में परम सुख हुआ है। हे महाबाहो राम! सुनो कि मैं इस वन में कैसे उत्पन्न हुआ। मैं एक महाभाग गन्धर्व हूँ, जो शाप के कारण यह रूप धारण कर बैठा हूँ।"
🔍 व्याख्या : कबन्ध अपने पूर्व जन्म का वृत्तांत सुनाता है – वह गन्धर्वराज विश्वावसु का पुत्र था, जिसे शाप के कारण यह राक्षस योनि प्राप्त हुई।
॥ श्लोक २२-२५ ॥
तस्य शापस्य निर्मोक्षो मम स्याद्रघुनन्दन ।
यदि मां त्वं शरीरेऽस्मिन् दहेः संस्कारयुक्तितः ॥
तव संस्कारयोगेन गन्धर्वत्वं व्रजाम्यहम् ।
एतत्ते सर्वमाख्यातं यथावृत्तं ममानघ ॥
📖 भावार्थ : "हे रघुनन्दन! उस शाप से मुक्ति तभी मिलेगी जब तुम मेरे इस शरीर का विधिपूर्वक दाह-संस्कार करोगे। तुम्हारे द्वारा किए गए संस्कार से मैं अपने गन्धर्व स्वरूप को प्राप्त हो जाऊँगा। हे अनघ! मेरे साथ जो कुछ घटित हुआ, वह सब मैंने तुमसे कह दिया।"

🕊️ दाह-संस्कार एवं कबंध का उपदेश (श्लोक २६-३८)

॥ श्लोक २६-३२ ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं कबन्धस्य महात्मनः ।
चकार दहनं तस्य लक्ष्मणेन सह प्रभुः ॥
स दग्ध्वा तु कबन्धोऽग्नौ गन्धर्वत्वमगात्पुनः ।
रूपं धार्य महातेजाः शक्रतुल्यपराक्रमः ॥
उवाच रामं धर्मज्ञं सुग्रीवो नाम वानरः ।
ऋष्यमूके गिरौ राजा वसते सचिवैः सह ॥
तस्य त्वं सख्यमागच्छ राम सौमित्रिणा सह ।
स हि ते कार्यसिद्ध्यर्थं सहायो भविता प्रभुः ॥
इत्युक्त्वा तु कबन्धोऽन्तर्दधे दिव्येन वर्चसा ।
📖 भावार्थ : कबन्ध की बात सुनकर राघव ने लक्ष्मण के साथ मिलकर उसका दाह-संस्कार किया। अग्नि में जलकर कबन्ध पुनः गन्धर्व हो गया, अत्यधिक तेजस्वी रूप धारण किया, जो इन्द्र के समान पराक्रमी था। उसने धर्मज्ञ राम से कहा, "सुग्रीव नामक वानरराज ऋष्यमूक पर्वत पर अपने मंत्रियों के साथ रहता है। हे राम! तुम लक्ष्मण सहित उससे मित्रता कर लो। वही तुम्हारे कार्य की सिद्धि में सहायक होगा।" ऐसा कहकर कबन्ध दिव्य तेज से युक्त होकर अन्तर्धान हो गया।
🔍 व्याख्या : कबंध की सलाह राम के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध होती है। यही वह मोड़ है जो राम को सुग्रीव और फिर हनुमान से मिलाता है, और सीता की खोज का मार्ग प्रशस्त करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🔄 शाप और मुक्ति का चक्र

कबन्ध की कथा संसार में शाप और मुक्ति के नियम को दर्शाती है। राम की कृपा से उसे शाप से मुक्ति मिलती है। यह दर्शाता है कि भगवान के सान्निध्य से जीव का कल्याण होता है।

🤝 सुग्रीव-मित्रता का बीज

इस सर्ग में राम को सुग्रीव से मिलने का परामर्श मिलता है। यह घटना सम्पूर्ण रामायण की दिशा बदल देती है – इसी से वानरों से मित्रता, हनुमान-मिलन और फिर लंका-युद्ध की गाथा आगे बढ़ती है।

⚔️ राम की करुणा

राक्षस होते हुए भी कबन्ध की प्रार्थना सुनकर राम उसका दाह-संस्कार करते हैं और उसे मुक्ति दिलाते हैं। यह राम की सर्वसमावेशक करुणा और धर्मपरायणता को दर्शाता है।

🧭 मार्गदर्शन का महत्त्व

कबन्ध ने राम को सही मार्ग दिखाया। जीवन में भी उचित मार्गदर्शक (गुरु या मित्र) के बिना लक्ष्य की प्राप्ति कठिन है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि भले ही कोई कितना ही पतित क्यों न हो, भगवद्-कृपा से उसका उद्धार संभव है। साथ ही, मुसीबत में सही मार्गदर्शन मिलना अत्यन्त आवश्यक है। राम ने कबन्ध का संस्कार कर उसकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया और बदले में उन्हें सीता की खोज की दिशा मिली।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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