कबंध का दाह संस्कार का अनुरोध
अरण्यकाण्ड के इस सर्ग में राम और लक्ष्मण, राक्षस कबंध से भिड़ते हैं। राम द्वारा उसकी भुजाएँ काटने पर कबंध अपने वास्तविक स्वरूप (गन्धर्व) में प्रकट होता है और राम से प्रार्थना करता है कि वे उसका दाह-संस्कार करें, जिससे उसे मुक्ति मिल सके। इसके बाद कबंध राम को सुग्रीव से मित्रता करने का परामर्श देता है।
विवरण
पम्पा सरोवर के निकट भ्रमण करते हुए राम और लक्ष्मण एक भयंकर राक्षस कबंध से मिलते हैं, जो बिना सिर और गर्दन का है, उसका मुख उसकी छाती पर है और एक विशाल नेत्र है। वह अपनी लंबी भुजाओं से राम-लक्ष्मण को पकड़ लेता है। राम और लक्ष्मण संघर्ष करते हैं और अपनी तलवारों से उसकी भुजाएँ काट डालते हैं। मरते समय कबंध अपने पूर्व जन्म का वृत्तांत बताता है कि वह एक गन्धर्व था, जो शापवश इस रूप में आ गया। वह राम से विनती करता है कि वे उसका दाह-संस्कार करें, जिससे उसे शाप से मुक्ति मिले। राम ऐसा करते हैं। तब कबंध का गन्धर्व रूप प्रकट होता है और वह राम को सलाह देता है कि वे सुग्रीव नामक वानरराज से मित्रता करें, जो इस समय ऋष्यमूक पर्वत पर निवास कर रहा है और सीता की खोज में सहायता कर सकता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ७१
(कबंध का दाह-संस्कार अनुरोध – सुग्रीव-दर्शन का मार्ग)
🔆 प्रस्तावना : राम और लक्ष्मण सीता की खोज में दण्डकारण्य के विभिन्न प्रदेशों में भ्रमण कर रहे हैं। पम्पा सरोवर के तट पर पहुँचकर उनका सामना एक विचित्र राक्षस कबंध से होता है। यह सर्ग उस मुठभेड़, उसके वध, उसके दाह-संस्कार तथा उसके द्वारा दिए गए सुग्रीव-संदेश का वर्णन करता है। यह घटना राम की आगे की यात्रा की दिशा तय करती है।
👹 कबंध से भेंट और भुजाओं का छेदन (श्लोक १-१२)
ददर्शातिबलं घोरं राक्षसं भीमदर्शनम् ॥
उरोगतमुखं क्रूरं विशालाक्षं महोदरम् ।
दीर्घजिह्वं महानादं विकटाक्षं भयानकम् ॥
स तु कबन्धो नाम्नाऽऽसीद्राक्षसः क्रूरकर्मकृत् ।
तेन सार्धं समागम्य रामः सौमित्रिणा सह ॥
स तावतिबलौ वीरौ भुजाभ्यां परिषस्वजे ।
बलादाच्छिद्य विक्रम्य रामं सौमित्रिणा सह ॥
बाहू कबन्धस्य चिच्छेद रामः सत्यपराक्रमः ॥
स छिन्नबाहुः सहसा पपात धरणीतले ।
पृष्ट्वा चोवाच कौ त्वं वै विस्मितो राघवं तदा ॥
🔥 कबंध की कथा और दाह-संस्कार प्रार्थना (श्लोक १३-२५)
न्यवेदयत चात्मानं राक्षसाय महात्मने ॥
आवां दाशरथी वीरौ रामलक्ष्मण संज्ञितौ ।
सीतायाः परिमार्गार्थं प्रविष्टौ दण्डकानि वै ॥
तच्छ्रुत्वा राक्षसो वाक्यं प्रत्युवाच महाबलः ।
युवां मे परमं सौख्यं दृष्ट्वैव हृदि वर्तते ॥
शृणु राम महाबाहो यथा जातोऽस्म्यहं वने ।
गन्धर्वो वै महाभागः शापादिदं गतो वपुः ॥
यदि मां त्वं शरीरेऽस्मिन् दहेः संस्कारयुक्तितः ॥
तव संस्कारयोगेन गन्धर्वत्वं व्रजाम्यहम् ।
एतत्ते सर्वमाख्यातं यथावृत्तं ममानघ ॥
🕊️ दाह-संस्कार एवं कबंध का उपदेश (श्लोक २६-३८)
चकार दहनं तस्य लक्ष्मणेन सह प्रभुः ॥
स दग्ध्वा तु कबन्धोऽग्नौ गन्धर्वत्वमगात्पुनः ।
रूपं धार्य महातेजाः शक्रतुल्यपराक्रमः ॥
उवाच रामं धर्मज्ञं सुग्रीवो नाम वानरः ।
ऋष्यमूके गिरौ राजा वसते सचिवैः सह ॥
तस्य त्वं सख्यमागच्छ राम सौमित्रिणा सह ।
स हि ते कार्यसिद्ध्यर्थं सहायो भविता प्रभुः ॥
इत्युक्त्वा तु कबन्धोऽन्तर्दधे दिव्येन वर्चसा ।
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🔄 शाप और मुक्ति का चक्र
कबन्ध की कथा संसार में शाप और मुक्ति के नियम को दर्शाती है। राम की कृपा से उसे शाप से मुक्ति मिलती है। यह दर्शाता है कि भगवान के सान्निध्य से जीव का कल्याण होता है।
🤝 सुग्रीव-मित्रता का बीज
इस सर्ग में राम को सुग्रीव से मिलने का परामर्श मिलता है। यह घटना सम्पूर्ण रामायण की दिशा बदल देती है – इसी से वानरों से मित्रता, हनुमान-मिलन और फिर लंका-युद्ध की गाथा आगे बढ़ती है।
⚔️ राम की करुणा
राक्षस होते हुए भी कबन्ध की प्रार्थना सुनकर राम उसका दाह-संस्कार करते हैं और उसे मुक्ति दिलाते हैं। यह राम की सर्वसमावेशक करुणा और धर्मपरायणता को दर्शाता है।
🧭 मार्गदर्शन का महत्त्व
कबन्ध ने राम को सही मार्ग दिखाया। जीवन में भी उचित मार्गदर्शक (गुरु या मित्र) के बिना लक्ष्य की प्राप्ति कठिन है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि भले ही कोई कितना ही पतित क्यों न हो, भगवद्-कृपा से उसका उद्धार संभव है। साथ ही, मुसीबत में सही मार्गदर्शन मिलना अत्यन्त आवश्यक है। राम ने कबन्ध का संस्कार कर उसकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया और बदले में उन्हें सीता की खोज की दिशा मिली।