अरण्य काण्ड अध्याय 70

कबंध की लंबी भुजाओं का काटा जाना

राम एवं लक्ष्मण, सीता की खोज करते हुए, दण्डकारण्य में एक भयंकर राक्षस कबंध से भिड़ जाते हैं। कबंध उन्हें अपनी लंबी भुजाओं से जकड़ लेता है। राम और लक्ष्मण उसकी दोनों भुजाएँ काट डालते हैं, जिससे कबंध मुक्त होता है और अपने शाप से उद्धार पाकर उन्हें ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव से मिलने का निर्देश देता है।

विवरण

अरण्यकाण्ड के इस सत्तरवें सर्ग में राम और लक्ष्मण सीता की खोज में दण्डकारण्य के विभिन्न भागों में भ्रमण कर रहे हैं। वे शरभंग, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य आदि ऋषियों से मिल चुके हैं और अब एक भीषण राक्षस कबंध से उनका सामना होता है। कबंध एक शापित गंधर्व है, जिसका शरीर रहित केवल एक धड़ है, जिसके मुख उसके उदर में स्थित है और जिसकी लंबी-लंबी भुजाएँ उसे अत्यन्त विकराल बनाती हैं। राम और लक्ष्मण को देखकर वह अपनी भुजाओं से उन्हें पकड़ लेता है। राम को अपनी असमर्थता का आभास होता है, किंतु लक्ष्मण की सलाह पर वे अपनी तलवारों से कबंध की दोनों भुजाएँ काट डालते हैं। भुजाओं के कटते ही कबंध नीचे गिरता है और उसे अपने पूर्व जन्म का ज्ञान हो जाता है। वह राम-लक्ष्मण से विनय करता है कि उसका अंतिम संस्कार करें। राम उसके शव को गड्ढे में डालकर अग्नि देते हैं। अग्नि से एक सुन्दर गंधर्व निकलता है और आकाश में चढ़ता है। जाते-जाते वह राम को सलाह देता है कि सीता की खोज के लिए उन्हें ऋष्यमूक पर्वत पर वानरराज सुग्रीव से मित्रता करनी चाहिए।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ७०

(कबंध की लंबी भुजाओं का काटा जाना – कबंध-वध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सीता की खोज में व्याकुल राम एवं लक्ष्मण जब घोर वन में भटक रहे थे, तब उनका सामना एक विकराल राक्षस से हुआ, जिसका नाम था कबंध। यह सर्ग उसी भयंकर युद्ध और अन्ततः कबंध के उद्धार की कथा प्रस्तुत करता है।

👹 कबंध का विकराल रूप और भुजाओं का बंधन (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः प्रवृत्ते संग्रामे राक्षसेन्द्रस्य धीमतः ।
बाहू प्रगृह्य विपुलौ जग्राह बलिनां वरः ॥
तौ दृष्ट्वा राघवौ वीरौ कबन्धेन समावृतौ ।
विषण्णवदनौ दीनौ नष्टसंज्ञावभूततुः ॥
स तु बाहुभिरायम्य तौ वीरौ राक्षसाधमः ।
प्रगृह्य बलवान् राजन् पुनरेवाब्रवीदिदम् ॥
कौ युवां केन वा दृष्टौ किमर्थमिह चागतौ ।
सत्यं कथयतां वीरौ यदि वां जीवितं प्रियम् ॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् उस बुद्धिमान् राक्षसेन्द्र (कबंध) ने अपनी विशाल भुजाओं को फैलाकर उन बलवानों में श्रेष्ठ (राम-लक्ष्मण) को जकड़ लिया। उन वीर राम-लक्ष्मण को कबंध द्वारा घिरा देख, वे दोनों विषण्ण मुख वाले, दीन और संज्ञाशून्य से हो गए। उस नीच राक्षस ने बलपूर्वक उन दोनों वीरों को भुजाओं में दबा लिया और फिर यह कहा: "तुम दोनों कौन हो? किसके द्वारा देखे गए हो? यहाँ किस प्रयोजन से आए हो? यदि तुम दोनों को जीवन प्रिय है तो सत्य कहो।"
🔍 व्याख्या : कबंध की भुजाएँ अत्यन्त लंबी और शक्तिशाली थीं। उसने राम-लक्ष्मण को सहज ही जकड़ लिया। दोनों क्षणभर के लिए अवाक् रह गए, पर शीघ्र ही लक्ष्मण ने राम को उपाय सुझाया।

⚔️ भुजाओं का काटा जाना और कबंध का गिरना (श्लोक ९-१६)

॥ श्लोक ९-१२ ॥
ततो लक्ष्मणमायान्तं रामः परमधार्मिकः ।
उवाच वाक्यं धर्मज्ञो बाहू छिन्द्धि महाबलौ ॥
स तथा च्छिन्नबाहुस्तु निपपात महीतले ।
रामबाणप्रणुन्नाङ्गो विसंज्ञो राक्षसाधमः ॥
ततस्तु राघवौ वीरौ कबन्धं निहतं रणे ।
ददृशाते महात्मानौ हर्षयुक्तौ बभूवतुः ॥
📖 भावार्थ : तब परम धार्मिक राम ने पास आते हुए लक्ष्मण से कहा, "हे धर्मज्ञ! इसकी महाबली भुजाओं को काट डालो।" (लक्ष्मण ने ऐसा ही किया) और उस राक्षसाधम की भुजाएँ कटते ही वह राम के बाणों से पीड़ित शरीर वाला, संज्ञारहित होकर भूमि पर गिर पड़ा। तब उन महात्मा वीर राघवों ने रणभूमि में मरे हुए कबंध को देखा और हर्ष से भर गए।

🔥 कबंध का मोक्ष और सुग्रीव का निर्देश (श्लोक १७-२८)

॥ श्लोक १७-२२ ॥
स तु छिन्नभुजः स्कन्धे रामं दृष्ट्वा कृताञ्जलिः ।
उवाच परमप्रीतः शनकै रघुनन्दनम् ॥
अहं गन्धर्वराजो वै दानवेन्द्रेण धीमता ।
शप्तः किल पुरा राम राक्षसत्वे नियोजितः ॥
तस्य शापस्य चान्तं वै कर्तुमर्हसि राघव ।
शरीरस्यास्य दाहेन स्वर्गलोकं गमिष्यति ॥
ततस्त्वां समनुप्राप्तं द्रक्ष्यामि सुग्रीवमृक्षराट् ।
ऋश्यमूके गिरौ राम स वै त्वां सह मित्रताम् ॥
📖 भावार्थ : कटी हुई भुजाओं वाला कबंध, राम को देखकर हाथ जोड़कर धीरे-धीरे बोला: "हे राम! मैं पूर्व में गन्धर्वराज था, किन्तु एक बुद्धिमान दानवेन्द्र ने मुझे शाप देकर राक्षस योनि में डाल दिया था। उस शाप का अन्त करने के लिए आप मेरे इस शरीर का दाह करें, जिससे मैं स्वर्गलोक को प्राप्त हो सकूँ। तत्पश्चात् हे राम! आप ऋश्यमूक पर्वत पर जाकर वानरराज सुग्रीव से मित्रता करें। वह आपकी सहायता करेगा।"
🔍 व्याख्या : कबंध वास्तव में एक शापित गन्धर्व था, जिसे इन्द्र के शाप से यह दुर्दशा प्राप्त हुई थी। राम के द्वारा भुजाएँ काटे जाने पर शाप समाप्त हुआ और अग्नि-संस्कार से उसे मुक्ति मिली। उसने राम को सुग्रीव से मैत्री का महत्वपूर्ण संकेत दिया, जो आगे चलकर सीता की खोज का मार्ग प्रशस्त करता है।
॥ श्लोक २३-२८ ॥
ततस्तस्य वचः श्रुत्वा रामः परमधार्मिकः ।
चकार विधिवद्दाहं गन्धर्वस्य महात्मनः ॥
स दग्ध्वा राक्षसं देहं गन्धर्वो दिव्यरूपधृक् ।
उत्पपात नभो गत्वा राममेवाभ्यपूजयत् ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे सप्ततितमः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : उसके वचन सुनकर परम धार्मिक राम ने विधिपूर्वक उस महात्मा गन्धर्व का दाह-संस्कार किया। राक्षस-शरीर के दग्ध होते ही वह गन्धर्व दिव्य रूप धारण कर आकाश में प्रकट हुआ और राम की स्तुति करता हुआ स्वर्गलोक चला गया।
इति सप्ततितमः सर्गः ॥

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🔗 किष्किन्धाकाण्ड की भूमिका

इस सर्ग में कबंध द्वारा दिया गया सुग्रीव का संकेत ही आगे चलकर राम-सुग्रीव मैत्री का कारण बनता है और इस प्रकार सीता की खोज को सफलता मिलती है।

🙏 शाप और उद्धार का चक्र

कबंध की कथा शाप और उद्धार के चक्र को दर्शाती है। राम के सान्निध्य से वह अपने पूर्व गौरव को प्राप्त होता है। यह राम की करुणा और पुण्यशीलता को उजागर करता है।

🎯 शिक्षा : प्रत्येक विपत्ति अन्ततः कल्याणकारी हो सकती है, यदि हम धैर्य और बुद्धि से काम लें। राम-लक्ष्मण ने कबंध के बंधन से घबराकर भी लक्ष्मण की सूझबूझ से उसका वध किया और फलस्वरूप सीता की खोज का सही मार्ग मिला। साथ ही, कबंध को भी शापमुक्ति मिली।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे सप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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