अरण्य काण्ड अध्याय 67

राम की जटायु से भेंट

अरण्यकाण्ड का सड़सठवाँ सर्ग राम और लक्ष्मण की जटायु से भेंट का वर्णन करता है। मरणासन्न जटायु राम को सीता के हरण की सूचना देता है और रावण द्वारा दक्षिण दिशा में ले जाने की बात बताता है। राम जटायु की दशा देखकर शोकाकुल होते हैं और उसकी अंतिम क्रिया करते हैं।

विवरण

सीता की खोज में व्याकुल राम और लक्ष्मण दण्डकारण्य के विभिन्न प्रदेशों में भटक रहे थे। वे गुफाओं, नदियों और पर्वतों की तलहटी में सीता के चिह्न ढूँढ़ रहे थे। अचानक उनकी दृष्टि एक भीषण दृश्य पर पड़ी – एक विशाल गिद्ध भूमि पर पड़ा था, जिसका शरीर बाणों से छलनी था और रक्त से लथपथ था। समीप जाकर राम ने उसे पहचाना – यह जटायु थे, जिनसे उनकी भेंट चित्रकूट में हुई थी। राम ने द्रवित होकर जटायु को गोद में उठाया और पूछा कि यह दशा किसने की। जटायु ने क्षीण स्वर में बताया कि रावण ने सीता का हरण किया है। उन्होंने रावण को रोकने का भरसक प्रयास किया, उससे घोर युद्ध किया, परन्तु अन्ततः रावण के बाणों से घायल होकर धराशायी हो गए। उन्होंने राम को आश्वस्त किया कि सीता सुरक्षित है और रावण उन्हें दक्षिण दिशा की ओर ले गया है। राम ने जटायु के त्याग और बलिदान की प्रशंसा की तथा उन्हें पितृ तुल्य बताया। जटायु ने राम की गोद में अन्तिम साँस ली और मोक्ष को प्राप्त हुए। राम ने अत्यन्त शोकाकुल होकर लक्ष्मण की सहायता से जटायु का दाह संस्कार किया तथा जलांजलि दी। इसके बाद दोनों भाई दक्षिण की ओर प्रस्थान कर गए।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ६७

(राम की जटायु से भेंट – जटायु का बलिदान)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सीता की खोज में व्याकुल राम और लक्ष्मण वन-वन भटक रहे हैं। तभी उन्हें घायल अवस्था में जटायु दिखते हैं। यह सर्ग उस मार्मिक भेंट और जटायु द्वारा सीता हरण का समाचार देने की कथा कहता है। राम का शोक और जटायु का बलिदान इस सर्ग के केन्द्र में हैं।

🦅 जटायु का दर्शन (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १-२ ॥
ततो ददर्श रामस्तु जटायुं नाम गृध्रराट् ।
शरैर्भिन्नं महाबाहुः पतितं रुधिरोक्षितम् ॥
तं दृष्ट्वा राघवो वीरः सीतामार्गमनुव्रतः ।
उपागम्य महातेजाः परिष्वज्य च दुःखितः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; ददर्श = देखा; रामः = राम ने; तु = तो; जटायुम् = जटायु को; नाम = नाम वाले; गृध्रराट् = गिद्धराज; शरैः = बाणों से; भिन्नम् = विदीर्ण; महाबाहुः = महाबाहु राम; पतितम् = गिरे हुए; रुधिरोक्षितम् = रक्त से लथपथ; तम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; राघवः = राघव; वीरः = वीर; सीतामार्गमनुव्रतः = सीता के मार्ग का अनुसरण करने वाले; उपागम्य = समीप जाकर; महातेजाः = महातेजस्वी; परिष्वज्य = गले लगाकर; च = और; दुःखितः = दुःखी हुए।
📖 भावार्थ : तब महाबाहु राम ने जटायु नामक गिद्धराज को देखा, जो बाणों से छिन्न-भिन्न, धरती पर गिरा हुआ और रक्त से लथपथ था। सीता के पथ का अनुसरण करने वाले वीर राघव ने उसे देखकर समीप जाकर, महातेजस्वी राम ने उसे गले लगाया और दुःखी हुए।
🔍 व्याख्या : राम सीता की खोज में व्याकुल थे। उन्होंने जटायु को इस दयनीय अवस्था में देखा तो वे द्रवित हो गए और तुरन्त उनके पास गए।
॥ श्लोक ३-४ ॥
राम राम महाबाहो जानकी हृता बलात् ।
रावणेन दुरात्मना युध्यता मम पश्यतः ॥
स गृध्रराजो रामेण पृष्टस्तत्त्वेन वै तदा ।
आचचक्षे महाबाहुः सर्वं रावणचेष्टितम् ॥
📖 भावार्थ : (जटायु बोले) हे राम! हे महाबाहो! दुष्टात्मा रावण ने मेरे देखते-देखते युद्ध करके जानकी का बलपूर्वक हरण कर लिया। उस गृध्रराज ने राम के पूछने पर तत्त्व से रावण के सारे चेष्टित बता दिए।
🔍 व्याख्या : जटायु ने राम को तुरन्त सीता हरण का समाचार दिया। उन्होंने बताया कि उन्होंने रावण का पूरा वृत्तांत देखा है।

📜 जटायु का वृत्तांत (श्लोक ७-१६)

॥ श्लोक ७-९ ॥
सीतां रक्षसि दुष्टात्मन्क्व वा यास्यसि दुर्मते ।
इत्युक्त्वा प्रहसन्राम युयुधे तेन संगतः ॥
स रावणो मया दृष्टः सीतया सह संगतः ।
आकाशमाश्रितो वीर त्वरमाणो महाबलः ॥
तस्याहं प्रहसन्वाक्यं श्रुत्वा राम त्वरान्वितः ।
उत्पत्य वेगवान्स्थानात्पक्षाभ्यां समयोधयम् ॥
📖 भावार्थ : (जटायु कहते हैं) हे दुष्टात्मा राक्षस! दुर्मते! सीता को लेकर तू कहाँ जाएगा? ऐसा कहकर मैं हँसते हुए उससे युद्ध करने लगा। हे वीर राम! मैंने उस रावण को सीता के साथ आकाश में जाते देखा, वह महाबली शीघ्रता कर रहा था। उसका हँसता हुआ वचन सुनकर मैंने तुरन्त अपने स्थान से वेगपूर्वक उड़ान भरी और पंखों से उससे युद्ध किया।
॥ श्लोक १०-१२ ॥
मया तस्य रणे भग्नौ चापबाणौ महात्मनः ।
रथाश्वौ च हतौ भूमौ पातितश्च महारथः ॥
स मां प्रहारैर्बहुभी रावणः समताडयत् ।
अहं च तं महाबाहो पक्षाभ्यां समताडयम् ॥
ततो मां रावणः क्रुद्धो बाणैः संताड्य दुःसहैः ।
पातयामास भूमौ मां छिन्नपक्षं नरर्षभ ॥
📖 भावार्थ : मैंने युद्ध में उस महात्मा (रावण) के धनुष-बाण तोड़ दिए, उसके रथ और घोड़ों को मार गिराया और उस महारथी को नीचे गिरा दिया। उस रावण ने मुझे बहुत प्रहार किए और मैंने भी उसे अपने पंखों से मारा। तब क्रोधित होकर रावण ने मुझे असह्य बाणों से बींधकर मेरे पंख काट डाले और मुझे भूमि पर गिरा दिया।
॥ श्लोक १३-१६ ॥
सीता तु रावणेनाद्य दक्षिणां दिशमाश्रिता ।
नीता राम महाबाहो तत्र गच्छ त्वरान्वितः ॥
इत्युक्त्वा विररामाथ जटायु रघुनन्दन ।
रामो जटायुना सार्धं शोकं प्राप सुदुःखितः ॥
📖 भावार्थ : हे महाबाहो राम! सीता को रावण ने आज ही दक्षिण दिशा में ले गया है। तुम शीघ्रतापूर्वक वहाँ जाओ। ऐसा कहकर जटायु राम के सामने रुक गए (मौन हो गए)। तब रघुनन्दन राम जटायु के साथ अत्यन्त दुःखी होकर शोक में डूब गए।

😢 राम का विलाप और जटायु का स्वर्गारोहण (श्लोक १७-२६)

॥ श्लोक १७-१९ ॥
हा सीते हा प्रिये साध्वि हा वन्ये हा मृगीदृशि ।
क्व गता त्वं विनिष्क्रान्ता हा नाथेति च राघवः ॥
अहो दैवमहो कालोऽहो धातुरचिन्तितम् ।
यदहं त्वां समासाद्य गतासुं शोचयाम्यहम् ॥
ततो रामो महातेजा जटायुं प्रेतमब्रवीत् ।
गच्छ राजन्सुखं स्वर्गं मया दृष्टो असि पक्षिराट् ॥
📖 भावार्थ : राम विलाप करने लगे – हा सीता! हे प्रिये! हे साध्वी! हे वन में रहने वाली! हे मृगनयनी! तू कहाँ चली गई? हा नाथ! राघव ने कहा – अहो दैव! अहो काल! अहो विधाता की अचिन्त्य गति! कि तुम्हें पाकर भी मैं तुम्हारी मृत्यु पर शोक कर रहा हूँ। तब महातेजस्वी राम ने मृत जटायु से कहा – हे राजन्! हे पक्षिराज! तुम सुखपूर्वक स्वर्ग को जाओ, मैंने तुम्हें देख लिया।
🔍 व्याख्या : राम ने जटायु को पितृ तुल्य माना और उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। साथ ही उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति का आशीर्वाद दिया।

🔥 अंतिम संस्कार और दक्षिण प्रस्थान (श्लोक २७-३४)

॥ श्लोक २७-२९ ॥
ततो रामो महातेजा जटायोः प्रेतकर्म तत् ।
चकार विधिवद्राजा लक्ष्मणेन सहानघः ॥
चितां चित्वा महाबाहुर्जटायोः पक्षिसत्तमः ।
ददाहैनं यथान्यायं सलिलं चापि दत्तवान् ॥
ततः कृतोदकः श्रीमान्लक्ष्मणेन सहानघः ।
प्रतस्थे दक्षिणां दिशं सीतामन्वेषितुं वने ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राजा राम ने लक्ष्मण के साथ विधिपूर्वक जटायु का अंतिम संस्कार किया। महाबाहु राम ने पक्षिश्रेष्ठ जटायु के लिए चिता बनाई, यथान्याय उनका दाह किया और जलांजलि दी। फिर अनघ श्रीराम ने लक्ष्मण सहित जलांजलि देकर सीता की खोज के लिए वन में दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया।
🔍 व्याख्या : राम ने जटायु का राजोचित सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया। इस प्रकार उन्होंने मित्रधर्म का पालन किया। फिर वे सीता की खोज में दक्षिण दिशा को चल पड़े।

🕊️ सीख : जटायु का बलिदान बताता है कि सज्जनों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देना भी धर्म है। राम ने जटायु को पितृतुल्य सम्मान देकर यह सिखाया कि मित्रता निभाने वाला सदैव पूजनीय होता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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