अरण्य काण्ड अध्याय 65

लक्ष्मण द्वारा राम के क्रोध को शांत करना

राम सीता के वियोग में अत्यंत दुःखी एवं क्रोधित होते हैं। लक्ष्मण उन्हें धैर्य धारण करने और सीता की खोज के लिए योजना बनाने का उपदेश देते हैं।

विवरण

सीता की खोज में व्याकुल राम विलाप करते हैं और क्रोध में समस्त लोकों को नष्ट करने की भीषण प्रतिज्ञा करते हैं। तब लक्ष्मण उन्हें समझाते हैं कि क्रोध और शोक से कार्य सिद्ध नहीं होता। वे राम को धैर्यपूर्वक सीता की खोज करने की सलाह देते हैं और सुझाव देते हैं कि वे पम्पा सरोवर के तट पर जाकर वानरराज सुग्रीव से मित्रता करें, जो उनकी सहायता कर सकता है। राम लक्ष्मण के उपदेश को स्वीकार करते हैं और पम्पा जाने का निर्णय लेते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ६५

(लक्ष्मण द्वारा राम के क्रोध को शांत करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण द्वारा सीता के हरण के पश्चात् राम अत्यन्त दुःखी हैं। वे जटायु का अन्तिम संस्कार कर चुके हैं और सीता की खोज में व्याकुल हैं। इसी शोक और क्रोध की स्थिति में लक्ष्मण उन्हें धैर्य बँधाते हैं और आगे की राह सुझाते हैं। यह सर्ग उसी संवाद पर आधारित है।

😢 राम का विलाप और क्रोध (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-२ ॥
ततः सीतामपश्यन्तो विचिन्वन्तौ महावनम् ।
रामः सौमित्रिणा सार्धं शोकेन महताऽऽवृतौ ॥
निष्प्रभौ दीनवदनौ पर्यतप्येतां भृशम् ।
विहाय हृदयं नाथां सीतां रामो महाबलः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सीताम् = सीता को; अपश्यन्तौ = न देखते हुए; विचिन्वन्तौ = खोजते हुए; महावनम् = महान वन में; रामः = राम; सौमित्रिणा = लक्ष्मण के; सार्धम् = साथ; शोकेन = शोक से; महता = बड़े; आवृतौ = घिरे हुए; निष्प्रभौ = प्रभाहीन; दीनवदनौ = दीन मुख वाले; पर्यतप्येताम् = संतप्त हुए; भृशम् = अत्यधिक; विहाय = छोड़कर; हृदयम् = हृदय; नाथाम् = स्वामिनी को; सीताम् = सीता को; रामः = राम; महाबलः = महान बल वाले।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् राम और लक्ष्मण उस महान वन में सीता को न पाकर अत्यन्त शोक से घिर गए। वे प्रभाहीन और दीनवदन होकर अत्यधिक संतप्त हुए। महाबली राम ने हृदय की स्वामिनी सीता को खो दिया था।
॥ श्लोक ५-६ ॥
हा सीते मम प्राणेभ्योऽपि प्रियेति परिदेवयन् ।
क्रोधसंरक्तनयनो विललाप सुदुःखितः ॥
अद्यैव रावणं हत्वा सीतामानेष्य आहवे ।
अन्यथा किं मया कार्यं जीवितेनापि राघव ॥
🔹 पदच्छेद : हा = हाय; सीते = हे सीता; मम = मेरे; प्राणेभ्यः = प्राणों से; अपि = भी; प्रिया = प्रिय; इति = इस प्रकार; परिदेवयन् = विलाप करते हुए; क्रोधसंरक्तनयनः = क्रोध से लाल नेत्र वाले; विललाप = विलाप किया; सुदुःखितः = अत्यन्त दुःखी; अद्यैव = आज ही; रावणम् = रावण को; हत्वा = मारकर; सीताम् = सीता को; आनेष्ये = लाऊँगा; आहवे = युद्ध में; अन्यथा = अन्यथा; किम् = क्या; मया = मुझसे; कार्यम् = प्रयोजन; जीवितेन = जीवित रहने से; अपि = भी; राघव = हे राघव (स्वयं को संबोधित)।
📖 भावार्थ : "हा सीते! तुम मुझे प्राणों से भी प्रिय हो!" इस प्रकार विलाप करते हुए राम ने क्रोध से लाल नेत्रों से अत्यन्त दुःख प्रकट किया। उन्होंने कहा, "आज ही युद्ध में रावण को मारकर सीता को लाऊँगा। अन्यथा, हे राघव (स्वयं को संबोधित), इस जीवित रहने से क्या प्रयोजन?"

🛡️ लक्ष्मण की सांत्वना और उपदेश (श्लोक ११-३०)

॥ श्लोक ११-१२ ॥
तं शोकव्याकुलं दीनं रामं दशरथात्मजम् ।
उवाच लक्ष्मणो वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् ॥
नैषा बुद्धिः कुले जाते कर्तव्या रघुनन्दन ।
धैर्यमाश्रय राम त्वं मा स्म शोके मनः कृथाः ॥
🔹 पदच्छेद : तम् = उस; शोकव्याकुलम् = शोक से व्याकुल; दीनम् = दीन; रामम् = राम को; दशरथात्मजम् = दशरथ के पुत्र; उवाच = बोले; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; वाक्यम् = वचन; धर्मार्थसहितम् = धर्म और अर्थ से युक्त; हितम् = हितकारी; न = नहीं; एषा = यह; बुद्धिः = बुद्धि; कुले = कुल में; जाते = उत्पन्न; कर्तव्या = करने योग्य; रघुनन्दन = हे रघुनन्दन; धैर्यम् = धैर्य; आश्रय = धारण करो; राम = हे राम; त्वम् = तुम; मा स्म = मत करो; शोके = शोक में; मनः = मन; कृथाः = लगाओ।
📖 भावार्थ : उस शोक से व्याकुल और दीन दशरथनन्दन राम से लक्ष्मण ने धर्म और अर्थ से युक्त हितकारी वचन कहे: "हे रघुनन्दन! कुल में उत्पन्न व्यक्ति को ऐसी बुद्धि नहीं करनी चाहिए। हे राम! धैर्य धारण करो, शोक में मत डूबो।"
॥ श्लोक १८-२० ॥
विनाशे हि महाप्राज्ञ सीताया रघुनन्दन ।
किमिदं बालिशं रूपं यद्विषीदसि शोचसि ॥
उद्योगः क्रियतां वीर सीतायाः परिमार्गणे ।
सुग्रीवेण समागम्य वानरेण महात्मना ॥
पम्पातीरे निवत्स्यामः सुग्रीवसख्यमिच्छवः ।
स हि सर्वान् वनोद्देशान् वेत्ति राज्ये प्रतिष्ठितः ॥
🔹 पदच्छेद : विनाशे = विनाश (हरण) पर; हि = निश्चय ही; महाप्राज्ञ = हे महान बुद्धिमान; सीतायाः = सीता के; रघुनन्दन = हे रघुनन्दन; किम् = क्यों; इदम् = यह; बालिशम् = बचकाना; रूपम् = रूप; यत् = जो; विषीदसि = दुःखी हो रहे हो; शोचसि = शोक कर रहे हो; उद्योगः = प्रयास; क्रियताम् = किया जाए; वीर = हे वीर; सीतायाः = सीता की; परिमार्गणे = खोज में; सुग्रीवेण = सुग्रीव के साथ; समागम्य = मिलकर; वानरेण = वानर के साथ; महात्मना = महान आत्मा वाले; पम्पातीरे = पम्पा के तट पर; निवत्स्यामः = निवास करेंगे; सुग्रीवसख्यम् = सुग्रीव से मैत्री; इच्छवः = इच्छा रखने वाले; सः = वह; हि = ही; सर्वान् = समस्त; वनोद्देशान् = वन प्रदेशों को; वेत्ति = जानता है; राज्ये = राज्य में; प्रतिष्ठितः = स्थित।
📖 भावार्थ : "हे महाप्राज्ञ रघुनन्दन! सीता के विनाश (हरण) पर तुम यह बालिश (बचकाना) रूप क्यों धारण कर रहे हो, क्यों शोक कर रहे हो? हे वीर! सीता की खोज के लिए उद्योग करो। महात्मा वानर सुग्रीव से मिलकर उद्योग करो। हम सुग्रीव से मैत्री की इच्छा से पम्पा तट पर निवास करेंगे। वह राज्य स्थापित होने के कारण समस्त वन प्रदेशों को जानता है।"

🚶 पम्पा सरोवर जाने का निर्णय (श्लोक ३१-३४)

॥ श्लोक ३१-३२ ॥
लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा धर्मार्थसहितं हितम् ।
प्रत्युवाच ततो रामः संहृष्टेनान्तरात्मना ॥
युक्तमाह त्वया सौम्य नात्र कार्या विचारणा ।
गमिष्यामः सह भ्रातः पम्पातीरमनुत्तमम् ॥
🔹 पदच्छेद : लक्ष्मणस्य = लक्ष्मण के; वचः = वचन को; श्रुत्वा = सुनकर; धर्मार्थसहितम् = धर्म और अर्थ से युक्त; हितम् = हितकारी; प्रत्युवाच = उत्तर दिया; ततः = तब; रामः = राम ने; संहृष्टेन = हर्षित; अन्तरात्मना = अन्तरात्मा से; युक्तम् = युक्तियुक्त; आह = कहा; त्वया = तुमने; सौम्य = हे सौम्य; न = नहीं; अत्र = इस में; कार्या = करनी चाहिए; विचारणा = विचार; गमिष्यामः = जाएँगे; सह = साथ; भ्रातः = हे भ्राता; पम्पातीरम् = पम्पा तट; अनुत्तमम् = उत्तम।
📖 भावार्थ : लक्ष्मण के धर्म और अर्थयुक्त हितकारी वचन सुनकर राम ने अन्तरात्मा से हर्षित होकर उत्तर दिया: "हे सौम्य! तुमने युक्तियुक्त कहा, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं। हे भ्राता! हम उत्तम पम्पा तट को जाएँगे।"

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🛡️ लक्ष्मण का मार्गदर्शक रूप

इस सर्ग में लक्ष्मण केवल अनुज ही नहीं, बल्कि एक कुशल मार्गदर्शक के रूप में दिखते हैं। वे राम को उनके धर्म और कर्तव्य का स्मरण कराते हैं और संकट के समय धैर्य न खोने की सीख देते हैं।

🤝 सुग्रीव-मिलन की भूमिका

लक्ष्मण द्वारा सुझाया गया सुग्रीव से मैत्री का विचार आगे चलकर सीता की खोज और रावण-वध का मार्ग प्रशस्त करता है। यह सर्ग किष्किन्धाकाण्ड की घटनाओं की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

😢 मानवीय संवेदना और कर्तव्य का समन्वय

राम का विलाप उनके वैवाहिक प्रेम और मानवीय संवेदना को दर्शाता है, वहीं लक्ष्मण का उपदेश कर्तव्यपालन और विवेक का प्रतीक है। यह द्वन्द्व जीवन की वास्तविकता को उजागर करता है।

🧘 धैर्य का महत्त्व

लक्ष्मण बार-बार राम को धैर्य धारण करने की सलाह देते हैं। यह संदेश है कि विपरीत परिस्थितियों में धैर्य ही सफलता की कुंजी है।

🎯 शिक्षा : संकट के समय धैर्य न खोएँ, बुद्धि और विवेक से काम लें। सच्चा मित्र ही कठिन घड़ी में सही मार्ग दिखाता है। क्रोध और शोक में निर्णय लेना उचित नहीं, पहले मन को शांत करें फिर योजना बनाएँ।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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