अरण्य काण्ड अध्याय 64

राम को सीता के फूल और आभूषण मिलना

राम और लक्ष्मण सीता की खोज में दण्डकारण्य में भ्रमण करते हैं। मार्ग में उन्हें सीता के गिरे हुए फूल, आभूषण और वस्त्र के टुकड़े मिलते हैं। राम उन्हें देखकर अत्यन्त दुःखी होते हैं और विलाप करने लगते हैं। लक्ष्मण उन्हें धैर्य बँधाते हैं और पुनः खोज प्रारम्भ करते हैं।

विवरण

जटायु से सीता हरण का समाचार सुनने के बाद राम और लक्ष्मण दक्षिण दिशा की ओर बढ़ते हैं। वे उस मार्ग पर पहुँचते हैं जहाँ से रावण सीता को ले गया था। वहाँ भूमि पर बिखरे हुए सीता के आभूषण, सूखे पुष्प और वस्त्र के टुकड़े देखकर राम अत्यन्त व्याकुल हो जाते हैं। वे उन आभूषणों को पहचानते हैं जो उन्होंने स्वयं सीता को दिए थे। यह दृश्य राम के हृदय को विदीर्ण कर देता है। वे विलाप करते हुए लक्ष्मण से कहते हैं कि सीता अवश्य ही भयभीत होकर इन्हें गिरा बैठी होंगी। लक्ष्मण धैर्यपूर्वक राम को समझाते हैं कि आभूषणों का मिलना यह संकेत है कि सीता जीवित हैं, अन्यथा ये आभूषण कहीं खो नहीं जाते। वे पुनः खोज जारी रखने का आग्रह करते हैं। इस प्रकार यह सर्ग राम के विरह-विलाप और लक्ष्मण के सांत्वना-वचनों से परिपूर्ण है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ६४

(राम को सीता के फूल और आभूषण मिलना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुःषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण द्वारा सीता के हरण के पश्चात् राम और लक्ष्मण उनकी खोज में वन-वन भटक रहे हैं। वे जटायु से मिल चुके हैं, जिसने रावण द्वारा हरण की सूचना दी थी। अब वे आगे बढ़ते हैं और उस मार्ग पर पहुँचते हैं जिधर से रावण सीता को ले गया था। वहाँ उन्हें सीता द्वारा गिराये गये फूल, आभूषण और वस्त्र के टुकड़े बिखरे मिलते हैं। यह सर्ग उसी मार्मिक दृश्य का वर्णन करता है, जहाँ राम इन चिह्नों को देखकर व्याकुल हो जाते हैं और विलाप करने लगते हैं।

💎 सीता के आभूषण एवं फूल भूमि पर बिखरे देखना (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः प्रविश्य रामस्तु दण्डकारण्यमव्ययम् ।
विचिन्वानो महातेजा ददर्श विविधान् द्रुमान् ॥
तेषां मध्ये महाबाहुः सीताया भूषणानि च ।
अपश्यद् राघवो भूमौ विकीर्णानि समन्ततः ॥
वसनं च महार्हं तद् यदासीत् सीतया धृतम् ।
क्षीणपुष्पाणि माल्यानि ददर्श जनकात्मजाः ॥
स तु दृष्ट्वा तदा रामो वैदेह्या भूषणानि च ।
शोकव्याकुलितो धीमान् लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रविश्य = प्रवेश करके; रामः = राम; तु = तो; दण्डकारण्यम् = दण्डकारण्य में; अव्ययम् = नित्य; विचिन्वानः = खोज करते हुए; महातेजाः = महान तेज वाले; ददर्श = देखा; विविधान् = अनेक प्रकार के; द्रुमान् = वृक्षों को; तेषाम् = उनके; मध्ये = बीच में; महाबाहुः = महान भुजाओं वाले; सीतायाः = सीता के; भूषणानि = आभूषण; च = और; अपश्यत् = देखा; राघवः = राघव ने; भूमौ = भूमि पर; विकीर्णानि = बिखरे हुए; समन्ततः = चारों ओर; वसनम् = वस्त्र; च = और; महार्हम् = अत्यन्त मूल्यवान; तत् = वह; यत् = जो; आसीत् = था; सीतया = सीता द्वारा; धृतम् = धारण किया हुआ; क्षीणपुष्पाणि = मुरझाये पुष्पों वाली; माल्यानि = मालाएँ; ददर्श = देखीं; जनकात्मजाः = जनकपुत्री (सीता) की; सः = उन; तु = तो; दृष्ट्वा = देखकर; तदा = तब; रामः = राम; वैदेह्याः = वैदेही के; भूषणानि = आभूषण; च = और; शोकव्याकुलितः = शोक से व्याकुल; धीमान् = बुद्धिमान; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण से; वाक्यम् = वचन; अब्रवीत् = बोले।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् महातेजस्वी राम दण्डकारण्य में प्रवेश करके खोज करने लगे। वहाँ उन्होंने अनेक प्रकार के वृक्ष देखे। उन्हीं वृक्षों के बीच महाबाहु राम ने भूमि पर बिखरे हुए सीता के आभूषण देखे, और वह अत्यन्त मूल्यवान वस्त्र भी देखा जिसे सीता धारण किये हुई थीं, तथा मुरझाये पुष्पों वाली मालाएँ भी देखीं। वैदेही के उन आभूषणों को देखकर राम शोक से व्याकुल हो गये और लक्ष्मण से इस प्रकार बोले।
🔍 व्याख्या : सीता के आभूषणों का इस प्रकार बिखरा मिलना यह दर्शाता है कि वे अवश्य ही भयभीत थीं और संभवतः उन्होंने जानबूझकर या अनजाने में ये आभूषण गिरा दिये थे ताकि राम को मार्ग का संकेत मिल सके। राम के लिए यह दृश्य अत्यन्त हृदयविदारक था।
॥ श्लोक ५-८ ॥
पश्य लक्ष्मण वैदेह्या भूषणानि समन्ततः ।
विकीर्णानि वने घोरे भयार्ताया न संशयः ॥
इदं हि माल्यं सीताया मया दत्तं विशेषतः ।
आभूषणं च वैदेह्या इदं मे प्रियदर्शनम् ॥
अद्यापि मन्मना सीता नूनं जीवति वा न वा ।
भूषणान्यस्य दृश्यन्ते भयाद् भ्रष्टानि सर्वशः ॥
एतच्छ्रुत्वा वचो राम लक्ष्मणः शोककर्शितः ।
उवाच वाक्यं धर्मज्ञो रामं सम्प्रति हर्षयन् ॥
📖 भावार्थ : "हे लक्ष्मण! देखो, वैदेही के ये आभूषण इस भयानक वन में चारों ओर बिखरे पड़े हैं। निस्संदेह वे भयभीत थीं। यह विशेष माला जो मैंने स्वयं सीता को दी थी, और वैदेही का यह आभूषण जो मुझे अत्यन्त प्रिय था, यहाँ पड़ा है। अब भी मेरा मन कहता है कि सीता जीवित है या नहीं? उसके ये आभूषण भय के कारण सब ओर गिर गये हैं।" राम के ऐसे शोकपूर्ण वचन सुनकर लक्ष्मण, जो स्वयं भी शोक से पीड़ित थे, धर्मज्ञ लक्ष्मण राम को सान्त्वना देते हुए बोले।

🛡️ लक्ष्मण द्वारा राम को धैर्य बँधाना (श्लोक ९-१६)

॥ श्लोक ९-१२ ॥
नैषा वैदेह्या दुःखार्ते भवान् शोकमुपागतः ।
यदि जीवति वैदेही द्रक्ष्यावः साधु मैथिलीम् ॥
अभूषणानि पश्यामो भूषणानि यदृच्छया ।
नूनं जीवति वैदेही यदेतानि न दृश्यते ॥
विकीर्णानि हि रत्नानि भयार्तया न संशयः ।
प्रहृष्टया च सीतया त्यक्तानीति मतिर्मम ॥
तस्मात् त्यज शोकं वीर वैदेह्याः प्रियकाम्यया ।
खोजं कुर्मः सुसंवीता यावत् पश्याम मैथिलीम् ॥
📖 भावार्थ : "हे दुःखार्त! आप यह शोक मत कीजिये। यदि वैदेही जीवित हैं तो हम अवश्य ही मैथिली को देखेंगे। हम यदृच्छया इन आभूषणों को देख रहे हैं, किन्तु स्वयं वैदेही दिखाई नहीं देतीं, इससे यही प्रतीत होता है कि वे जीवित हैं। निस्संदेह ये रत्न भयभीत सीता द्वारा गिराये गये हैं, अथवा मेरा मानना है कि प्रसन्नतापूर्वक भी त्यागे जा सकते हैं, किन्तु भय ही अधिक संभावित है। अतः हे वीर! वैदेही के प्रिय की कामना से आप शोक त्यागें। हम पूर्ण तत्परता से खोज करेंगे, जब तक मैथिली को न देख लें।"
🔍 व्याख्या : लक्ष्मण का यह कथन उनके धैर्य और बुद्धि का परिचायक है। वे राम को आश्वस्त करते हैं कि आभूषणों का मिलना ही इस बात का प्रमाण है कि सीता जीवित हैं, अन्यथा वे कहीं खो नहीं गये होते।
॥ श्लोक १३-१६ ॥
एवमुक्त्वा तु रामं तु लक्ष्मणः शोककर्शितम् ।
ययौ मार्गेण चोद्दिश्य येन रक्षोऽधमो गतः ॥
रामोऽपि लक्ष्मणेनोक्तो धैर्यमालम्ब्य वीर्यवान् ।
जगाम सहितस्तेन पुनर्मार्गं दिदृक्षया ॥
तौ गच्छन्तौ महावीर्यौ ददृशाते महापथि ।
विमर्दं बहुभूतानां राक्षसेन्द्रस्य धीमतौ ॥
सन्निपातं च भूतानां रुधिरौघं च सर्वशः ।
ददृशाते तदा वीरौ रामलक्ष्मणपूर्वजौ ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार शोकाकुल राम से कहकर लक्ष्मण उस मार्ग की ओर बढ़े जिधर राक्षसाधम रावण गया था। राम ने भी लक्ष्मण के वचनों से धैर्य धारण करके, उनके साथ उसी मार्ग पर खोज के लिए प्रस्थान किया। आगे बढ़ने पर उन दोनों महावीरों ने उस महान मार्ग पर बहुत से प्राणियों के समूह का विमर्द (रौंदा हुआ स्थान) देखा, और राक्षसेन्द्र के द्वारा किये गये प्राणियों के सन्निपात (एकत्रीकरण) तथा चारों ओर रुधिर की धाराएँ देखीं।

🔦 खोज जारी और रक्त के चिह्न

॥ श्लोक १७-२२ ॥
स तु दृष्ट्वा महाराज रामः परबलार्दनः ।
उवाच लक्ष्मणं वाक्यं शोकेनाभिपरिप्लुतः ॥
पश्य लक्ष्मण सीताया मार्गमेतं सुदारुणम् ।
रुधिरेण समाकीर्णं भयार्ताया न संशयः ॥
एवं ब्रुवाणौ तौ वीरौ जग्मतुस्तरसा तदा ।
यत्र तौ राक्षसौ दृष्ट्वा संग्रामे समतिष्ठताम् ॥
ततस्ते तापसाः सर्वे रामेण सहिता वने ।
विचिन्वन्तो महात्मानं ददृशुः पन्नगालयम् ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : वहाँ उन रक्त-चिह्नों को देखकर शोकाकुल राम ने लक्ष्मण से कहा: "हे लक्ष्मण! देखो, सीता का यह मार्ग अत्यन्त भयानक है और रुधिर से भरा हुआ है, निस्संदेह वह भयभीत थी।" ऐसा कहते हुए वे दोनों वीर तीव्रता से आगे बढ़े। फिर वहाँ पहुँचे जहाँ उन दोनों राक्षसों (जटायु और रावण) ने देखकर युद्ध किया था। तत्पश्चात् राम के साथ वन में खोज करते हुए उन तपस्वियों (राम-लक्ष्मण) ने उस महात्मा जटायु को देखा जो नागलोक (पाताल) के समान गुफा में पड़े थे। (आगे सर्ग ६५ में जटायु का मिलन होगा।)
🔍 व्याख्या : इस प्रकार इस सर्ग में राम को सीता के आभूषण मिलते हैं, और वे आगे बढ़कर युद्धस्थल पर पहुँचते हैं जहाँ उन्हें जटायु के मिलने का संकेत मिलता है। यह सर्ग राम के वियोग और धैर्य का अद्भुत चित्रण है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💔 राम का विरह-विलाप

इस सर्ग में राम के मानवीय स्वरूप का दर्शन होता है। वे सीता के वियोग में व्याकुल होकर विलाप करते हैं, जो उनके पत्नी-प्रेम को दर्शाता है। यह करुण रस का उत्कृष्ट उदाहरण है।

🧘 लक्ष्मण का धैर्य

लक्ष्मण इस अवसर पर राम को धैर्य बँधाते हैं। वे तर्क द्वारा सिद्ध करते हैं कि सीता जीवित हैं। यह लक्ष्मण के बुद्धिकौशल और भक्ति का परिचायक है।

🔱 आभूषणों का महत्त्व

ये आभूषण आगे चलकर सुग्रीव को दिखाये जायेंगे और सीता की खोज का आधार बनेंगे। यहाँ यह घटना उसी की भूमिका तैयार करती है।

⚔️ रक्त-चिह्न और युद्धस्थल

रक्त-चिह्न जटायु और रावण के भीषण युद्ध की ओर संकेत करते हैं, जिससे राम को यह ज्ञात होगा कि यहाँ कोई उनका हितैषी उनके लिए लड़ा है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि विपत्ति में धैर्य नहीं खोना चाहिए। राम जैसे धीरोदात्त चरित्र को भी शोक होता है, किन्तु वे धैर्य से उसे सहन करते हैं और आगे बढ़ते हैं। लक्ष्मण का मार्गदर्शन हमें बताता है कि मित्र का उचित परामर्श दुःख को कम कर सकता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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