अरण्य काण्ड अध्याय 63

सीता के वियोग में राम का विलाप (जारी)

इस सर्ग में राम सीता के वियोग में अत्यन्त व्याकुल होकर वन-वन भटकते हैं। वे पेड़-पौधों, जानवरों और नदियों से सीता का पता पूछते हैं। लक्ष्मण उन्हें सांत्वना देते हैं और धैर्य बनाए रखने का उपदेश देते हैं।

विवरण

सीता की खोज में व्याकुल राम चारों ओर वन में भटक रहे हैं। वे प्रत्येक वृक्ष, लता, पशु-पक्षी से सीता के बारे में पूछते हैं। उनकी विरह-व्यथा अत्यन्त मार्मिक रूप में वर्णित है। लक्ष्मण उनके इस दयनीय स्वरूप को देखकर स्वयं भी दुःखी होते हैं, किन्तु वे राम को धैर्य बनाए रखने की सलाह देते हैं। राम का विलाप सुनकर सारा वन शोकमग्न हो जाता है। वे सीता के गुणों का स्मरण करते हैं और उनके बिना अपने जीवन को निरर्थक बताते हैं। इस सर्ग में राम के मानवीय करुण स्वरूप का अत्यन्त हृदयस्पर्शी चित्रण है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ६३

(सीता के वियोग में राम का विलाप – जारी)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सीता की खोज करते-करते राम अत्यन्त व्याकुल हो उठे हैं। वे वन के प्रत्येक वृक्ष, पर्वत, नदी और पशु-पक्षी से सीता का पता पूछते हैं। उनका विलाप अत्यन्त हृदयविदारक है। लक्ष्मण उन्हें धैर्य बनाए रखने की सलाह देते हैं। इस सर्ग में राम के मानवीय करुण स्वरूप का अद्भुत चित्रण है।

🌿 राम का विलाप और प्रकृति से संवाद (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-३ ॥
सीतेति करुणं वाक्यं विलपन्नार्थकोविदः ।
वने वनं चरन् रामो लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥
इमे सौम्य महाकाया वृक्षाः पुष्पफलोपगाः ।
सीतायाः सदृशं किंचिन्न पश्यामि वनान्तरे ॥
सर्वतः काननं दृश्यं निर्मनुष्यमनुद्रुतम् ।
हा सीते हा प्रियेत्येवं विलपन्नार्थकोविदः ॥
🔹 पदच्छेद : सीता = हे सीते; इति = इस प्रकार; करुणम् = करुण; वाक्यम् = वचन; विलपन् = विलाप करता हुआ; अर्थकोविदः = (राम) अर्थ के ज्ञाता; वने = वन में; वनम् = वन; चरन् = भ्रमण करता हुआ; रामः = राम; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण से; वाक्यम् = वचन; अब्रवीत् = बोले; इमे = ये; सौम्य = हे सौम्य; महाकायाः = बड़े-बड़े; वृक्षाः = वृक्ष; पुष्पफलोपगाः = पुष्प और फलों से युक्त; सीतायाः = सीता के; सदृशम् = समान; किंचित् = कुछ भी; न पश्यामि = नहीं देखता; वनान्तरे = वन के भीतर; सर्वतः = चारों ओर; काननम् = वन; दृश्यम् = दिखाई देता है; निर्मनुष्यम् = मनुष्यों से रहित; अनुद्रुतम् = व्याप्त; हा सीते = हे सीते; हा प्रिये = हे प्रिये; इति = इस प्रकार; विलपन् = विलाप करता हुआ; अर्थकोविदः = अर्थ के ज्ञाता।
📖 भावार्थ : राम "हे सीते!" इस प्रकार करुण स्वर में विलाप करते हुए वन में भटक रहे थे। वे लक्ष्मण से बोले: "हे सौम्य! ये बड़े-बड़े पुष्प-फलों से युक्त वृक्ष हैं, परन्तु इस वन के भीतर मुझे सीता के समान कुछ भी नहीं दिखता। चारों ओर मनुष्यों से रहित केवल वन ही दिख रहा है।" इस प्रकार अर्थकोविद राम "हा सीते! हा प्रिये!" कहकर विलाप कर रहे थे।
🔍 व्याख्या : राम सीता के वियोग में इतने व्याकुल हैं कि उन्हें वन का प्रत्येक कण सीता की याद दिलाता है। वे प्रकृति से भी सीता का पता पूछते हैं।
॥ श्लोक ४-७ ॥
किं नु वक्ष्यामि कौसल्यां किं वक्ष्यामि च सुमित्राम् ।
किं वक्ष्यामि च राजानं भरतं च महायशाः ॥
सीता हृता वने घोरे मया रक्षति लक्ष्मण ।
अनाथा त्वं मया नाथे क्व गता जनकात्मजा ॥
नूनं मां राक्षसाः क्रूरा भक्षयिष्यन्ति संगताः ।
न च मे जीवितेनार्थः सीतया रहितस्य हि ॥
📖 भावार्थ : "अब मैं कौसल्या को क्या बताऊँगा, सुमित्रा को क्या बताऊँगा, और महायशस्वी राजा दशरथ तथा भरत को क्या बताऊँगा? हे लक्ष्मण! इस घोर वन में सीता हर ली गई, मैं रक्षा करते हुए भी उनकी रक्षा न कर सका। हे नाथ! वह अनाथा जनकात्मजा कहाँ चली गई? निश्चय ही क्रूर राक्षस मुझे मिलकर खा जायेंगे। सीता से रहित मेरे लिए जीवन व्यर्थ है।"
॥ श्लोक ८-१२ ॥
एवं विलपतस्तस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।
आजगाम महातेजा लक्ष्मणः शोककर्शितः ॥
स रामं शोकसंतप्तं दृष्ट्वा लक्ष्मण आर्द्रवत् ।
उवाच वचनं धीमान् धैर्यमाश्रित्य केवलम् ॥
न एवं शोचितुमर्हस्त्वं वीर धैर्यं च धारय ।
अहं ते सहितो वत्स्ये मार्गमाणः प्रियामहम् ॥
आश्वासयामास तदा रामं सौमित्रिरव्ययः ।
उवाच चैनं धर्मात्मा वाक्यं वाक्यविशारदः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार अक्लिष्टकर्मा राम के विलाप करने पर महातेजस्वी लक्ष्मण, जो स्वयं शोक से कृश हो गए थे, वहाँ आए। उन्होंने शोक से संतप्त राम को देखकर धैर्य धारण करते हुए वचन कहा: "हे वीर! आप इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं हैं, धैर्य धारण कीजिए। मैं आपके साथ रहूँगा, प्रिय सीता का मार्ग खोजूँगा।" तब धर्मात्मा वाक्यविशारद लक्ष्मण ने राम को आश्वासन दिया।

🛡️ लक्ष्मण का धैर्योपदेश (श्लोक १३-२२)

॥ श्लोक १३-१६ ॥
निराशो नाम नो राजन् कुर्यात् कर्म सुदुष्करम् ।
आशया धार्यते लोकः कर्मणा प्रतिपद्यते ॥
तस्मादाशां समालम्ब्य धैर्यं चैवावलम्ब्य च ।
मार्गितव्या त्वया देवी जनस्थाननिवासिनी ॥
अहं त्वनुचरिष्यामि यत्र यत्र गमिष्यसि ।
न चिन्तां कर्तुमर्हस्त्वं मयि जीवति राघव ॥
प्रियया रहितो राजन् किं करिष्यसि दुःखितः ।
धैर्यमालम्ब्य धर्मज्ञ मार्गितव्या त्वया प्रिया ॥
📖 भावार्थ : "हे राजन्! निराश होकर कोई दुष्कर कर्म नहीं कर सकता। आशा के द्वारा ही लोक धारण किया जाता है और कर्म में प्रवृत्त होता है। इसलिए आशा का सहारा लेकर तथा धैर्य धारण करके ही आप जनस्थान में रहने वाली देवी सीता की खोज करें। हे राघव! मेरे जीवित रहते आप चिन्ता न करें। मैं जिधर जायेंगे, उधर आपका अनुगमन करूँगा। हे धर्मज्ञ राजन्! प्रिया से रहित होकर दुःखी होकर क्या करोगे? धैर्य धारण करके ही प्रिया की खोज करनी चाहिए।"
🔍 व्याख्या : लक्ष्मण राम को समझाते हैं कि आशा और धैर्य ही मनुष्य के सबसे बड़े आधार हैं। निराश होकर कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। इसलिए धैर्यपूर्वक सीता की खोज करनी चाहिए।
॥ श्लोक १७-२२ ॥
एवमाश्वासितो रामो लक्ष्मणेन महात्मना ।
जगाम सहितस्तेन मार्गमाणः प्रियामहम् ॥
ततः स पश्यन् विविधान् वृक्षान् पुष्पितकाननान् ।
सीतामेवानुशोचन् वै विललापाकुलेन्द्रियः ॥
एते गिरयो दुर्गा नद्यश्च विमलोदकाः ।
वनानि च विचित्राणि न पश्यामि तथाप्रियाम् ॥
इत्येवं विलपन् रामः सीताहरणकर्शितः ।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा विचचार वने वने ॥
📖 भावार्थ : महात्मा लक्ष्मण द्वारा इस प्रकार आश्वासन दिए जाने पर राम उनके साथ मिलकर प्रिय सीता की खोज करने लगे। फिर वे पुष्पित वृक्षों और काननों को देखते हुए, सीता का ही स्मरण करते हुए, व्याकुल इन्द्रियों से विलाप करने लगे। "ये दुर्गम पर्वत हैं, विमल जल वाली नदियाँ हैं, और विचित्र वन हैं, परन्तु तदपि मैं अपनी प्रिय को नहीं देख पा रहा हूँ।" इस प्रकार सीता के हरण से कृश हुए राम भ्राता लक्ष्मण के साथ वन-वन में विचर रहे थे।

🚶 राम की अनवरत खोज

॥ श्लोक २३-३२ ॥
तथा चरन् स रामस्तु ददर्श विपुलं वनम् ।
नानापुष्पफलैर्युक्तं नानामृगगणायुतम् ॥
तत्रापश्यन्महातेजाः कबन्धं नाम राक्षसम् ।
घोरं विकृतरूपं च महाकायं भयानकम् ॥
तं दृष्ट्वा राघवो वीरो लक्ष्मणं चाब्रवीद्वचः ।
कोऽयं विकृतरूपो वै राक्षसो घोरदर्शनः ॥
लक्ष्मणोऽपि तमालोक्य रामं वचनमब्रवीत् ।
न जाने राक्षसं घोरं कबन्धं नाम विश्रुतम् ॥
ततस्तौ रामलक्ष्मणौ कबन्धं तं समीयतुः ।
स च तौ ग्रहीतुं राजन् प्रचक्रमे महाबलः ॥
ततः कबन्धेन सह युद्धमासीत् सुदारुणम् ।
तं च रामो महातेजाश्चिच्छेद रुचिरासिना ॥
एवं रामो महातेजा विचचार वने वने ।
सीतामन्वेषमाणस्तु लक्ष्मणेन समन्वितः ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार भ्रमण करते हुए राम ने एक विशाल वन देखा, जो नाना प्रकार के पुष्प-फलों और मृग-समूहों से युक्त था। वहाँ महातेजस्वी राम ने कबन्ध नामक एक भयंकर राक्षस को देखा, जो विकृत रूप वाला और विशालकाय था। उसे देखकर वीर राघव ने लक्ष्मण से पूछा: "यह कौन विकृत रूप वाला भयानक राक्षस है?" लक्ष्मण ने उसे देखकर कहा: "मैं इस घोर राक्षस को नहीं जानता, यह कबन्ध नाम से विख्यात है।" तत्पश्चात वे दोनों राम-लक्ष्मण उस कबन्ध के पास पहुँचे। उसने उन्हें पकड़ने का प्रयास किया। फिर कबन्ध के साथ भयंकर युद्ध हुआ। महातेजस्वी राम ने अपनी तीक्ष्ण तलवार से उसके बाहु काट डाले। इस प्रकार महातेजस्वी राम लक्ष्मण के साथ वन-वन में सीता की खोज करते रहे।
🔍 व्याख्या : इस सर्ग के अन्त में राम और लक्ष्मण की भेंट कबन्ध राक्षस से होती है, जो अगले सर्ग का विषय है। यहाँ संकेत मात्र है। वास्तविक कबन्ध-वध अगले सर्ग में आएगा। इस प्रकार यह सर्ग राम के विलाप और खोज का वर्णन करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💔 मानवीय करुणा का चरम

इस सर्ग में राम का विलाप उनके मानवीय पक्ष को उजागर करता है। वे केवल अवतारी पुरुष ही नहीं, बल्कि पत्नी-वियोग में व्याकुल एक सामान्य पति भी हैं। उनका प्रकृति से संवाद उनके हृदय की गहराई को दर्शाता है।

🧘 लक्ष्मण का धैर्य

लक्ष्मण इस अवसर पर धैर्य के प्रतीक बनकर उभरते हैं। वे राम को आशा और धैर्य का उपदेश देते हैं, जो विपत्ति में मनुष्य के सबसे बड़े मित्र हैं। यह भ्रातृप्रेम और कर्तव्यपरायणता का अनुपम उदाहरण है।

🌳 प्रकृति में राम

राम का वन के प्रत्येक तत्व से सीता का पता पूछना यह दर्शाता है कि वे सम्पूर्ण सृष्टि को अपने परिवार के रूप में देखते हैं। यह वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना का ही विस्तार है।

🔱 कबन्ध से साक्षात्कार

इस सर्ग के अन्त में कबन्ध का आगमन अगले सर्ग की भूमिका तैयार करता है। यह दर्शाता है कि राम के दुःख का अन्त अभी नहीं हुआ है, आगे और संघर्ष शेष हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि दुःख के समय धैर्य और आशा का सहारा लेना चाहिए। राम जैसे आदर्श पुरुष भी विपत्ति में विचलित हो सकते हैं, किन्तु सच्चा मित्र ही हमें संबल प्रदान करता है। हमें लक्ष्मण की तरह विपत्ति में भी धैर्य नहीं खोना चाहिए और राम की तरह अपने प्रियजनों के प्रति अटूट प्रेम रखना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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