अरण्य काण्ड अध्याय 61

सीता के वियोग में राम का विलाप (जारी)

रावण द्वारा सीता के हरण के पश्चात् राम अत्यन्त व्याकुल होकर वन-वन में उन्हें खोजते हैं। इस सर्ग में उनका विलाप और भी मार्मिक हो उठता है। वे पेड़-पौधों, जानवरों और नदियों से सीता का पता पूछते हैं तथा अपनी पीड़ा प्रकट करते हैं। लक्ष्मण उन्हें धैर्य बंधाते हैं।

विवरण

सीता की खोज में व्याकुल राम चारों ओर विलाप करते हैं। वे प्रकृति के प्रत्येक तत्व से सीता का सन्देश पूछते हैं – वृक्षों से, लताओं से, पशु-पक्षियों से। उनका हृदय विरह-वेदना से विदीर्ण हो जाता है। वे सीता के बिना अपने जीवन को निरर्थक समझने लगते हैं। लक्ष्मण उन्हें सांत्वना देते हुए समझाते हैं कि धैर्य और पुरुषार्थ से ही सीता की खोज संभव है। वे राम को आश्वस्त करते हैं कि वे रावण का वध कर सीता को वापस लाएँगे। राम का विलाप करुण रस से परिपूर्ण है और भक्तों के हृदय को द्रवित कर देता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ६१

(सीता के वियोग में राम का विलाप – जारी)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण सीता को हर कर ले गया। राम और लक्ष्मण उन्हें खोजते हुए वन-वन भटक रहे हैं। पिछले सर्गों में उन्होंने जटायु से सीता के हरण का समाचार सुना और उसका अंतिम संस्कार किया। अब वे और गहरे वन में प्रवेश कर रहे हैं, और राम का विलाप निरंतर बढ़ता जा रहा है। यह सर्ग उसी विलाप की अगली कड़ी है।

🌿 राम का विलाप – प्रकृति से सीता का पता पूछना (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-४ ॥
स तु दीनः परित्रस्तो विललाप महास्वनः ।
वने वनचरैः सार्धं भ्रात्रा च सुमहात्मना ॥
हा सीते मृगशावाक्षि हा वैदेहि प्रिये मम ।
हा स्निग्धे हा सुके श्यामे क्व गता त्वमिह प्रिये ॥
किं मां न प्रतिभाषसे प्रिये त्वमपि भाषितुम् ।
एको वनान्ते विजने किमिदं त्वं विशेषतः ॥
इमे कुसुमिताः पादपा दर्शयन्ति मनोरमाः ।
त्वया विना प्रियार्हेण न मे शोभन्ति कर्हिचित् ॥
🔹 पदच्छेद : सः = वह; दीनः = दीन; परित्रस्तः = भयभीत; विललाप = विलाप किया; महास्वनः = ऊँचे स्वर से; वने = वन में; वनचरैः = वनचरों के साथ; भ्रात्रा = भाई; च = और; सुमहात्मना = महान आत्मा वाले; हा सीते = हे सीता; मृगशावाक्षि = मृग के बच्चे जैसी आँखों वाली; हा वैदेहि = हे वैदेही; प्रिये मम = मेरी प्रिय; हा स्निग्धे = हे स्नेहमयी; हा सुके = हे सुंदरी; श्यामे = हे श्याम वर्ण वाली; क्व गता = कहाँ चली गई; त्वम् = तुम; इह = यहाँ; प्रिये = हे प्रिय; किम् = क्यों; माम् = मुझसे; न = नहीं; प्रतिभाषसे = बोलती हो; प्रिये = हे प्रिय; त्वम् = तुम; अपि = भी; भाषितुम् = बोलने के लिए; एकः = अकेला; वनान्ते = वन के अन्त में; विजने = एकान्त में; किम् = क्या; इदम् = यह; त्वम् = तुम; विशेषतः = विशेष रूप से; इमे = ये; कुसुमिताः = खिले हुए; पादपाः = वृक्ष; दर्शयन्ति = दिखा रहे हैं; मनोरमाः = मनोहर; त्वया = तुम्हारे; विना = बिना; प्रियार्हेण = प्रिय के योग्य; न = नहीं; मे = मुझे; शोभन्ति = सुहाते; कर्हिचित् = कभी।
📖 भावार्थ : तब वे दीन और भयभीत राम वनचरों (वानरों) और अपने महान आत्मा वाले भाई के साथ ऊँचे स्वर में विलाप करने लगे। हे मृग-शावक जैसी आँखों वाली सीते! हे वैदेही! हे मेरी प्रिये! हे स्नेहमयी! हे सुंदरी श्यामले! तुम यहाँ कहाँ चली गई? हे प्रिये! तुम मुझसे बात क्यों नहीं करती? इस एकान्त वन के अन्त में तुम विशेष रूप से कहाँ हो? तुम्हारे बिना ये खिले हुए मनोहर वृक्ष भी मुझे कभी अच्छे नहीं लगते।
🔍 व्याख्या : राम अपने विरह-व्यथा में प्रकृति के हर कण में सीता को ढूँढ़ रहे हैं। वे पेड़-पौधों से भी पूछते हैं कि उनकी प्रियतमा कहाँ है। यहाँ उनका विलाप अत्यन्त करुण है।
॥ श्लोक ५-८ ॥
एषा पद्मपलाशाक्षी यत्र याता सुमध्यमा ।
तत्र यास्यामि ते ब्रूत किं करोमि वनेचराः ॥
इमे च बहवः पुष्पैः समन्तात् परिशोभिताः ।
न ते सीतां प्रपश्यामि हृदयेन विदूयता ॥
तामन्वेषे महाभागां लक्ष्मणेन सहानघ ।
या मे प्राणैः प्रिया भूयः प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥
अपि त्वं जानकीं पश्येर्लक्ष्मणेमां महावने ।
सीतां हृतां महाभागां रावणेन दुरात्मना ॥
📖 भावार्थ : "यह पद्मपलाश के समान नेत्रों वाली सुमध्यमा सीता जिधर गई हैं, मैं उधर ही जाऊँगा। हे वनचरो! बताओ, मैं क्या करूँ? ये सब ओर पुष्पों से शोभित वृक्ष हैं, पर दुःखी हृदय से मैं सीता को नहीं देख पा रहा हूँ। हे अनघ लक्ष्मण! मैं तुम्हारे साथ उस महाभागा सीता को खोज रहा हूँ, जो मुझे प्राणों से भी प्रिय और प्राणों से भी बढ़कर हैं। हे लक्ष्मण! क्या तुम इस महावन में दुरात्मा रावण द्वारा हर ली गई जानकी को देख पा रहे हो?"

💬 लक्ष्मण का धैर्य बंधाना (श्लोक १३-२४)

॥ श्लोक १३-२० ॥
तमुवाच ततो लक्ष्मणः परिसान्त्वयन्निव ।
नैवं शोकेन संयुक्तो भवितुं त्वमिहार्हसि ॥
वीर्यवान् बलवान् चैव सर्वशास्त्रविशारदः ।
धैर्यमालम्ब्य राम त्वं सीतामन्वेष्टुमर्हसि ॥
न हि शोकेण संतप्ता लभन्ते विपुलां श्रियम् ।
न चार्थान् न च कामांश्च तस्माच्छोकं परित्यज ॥
अहं ते सहितो वीर मार्गित्वा राक्षसालयम् ।
हत्वा रावणमाजौ त्वं प्राप्स्यसे जानकीं पुनः ॥
एवमाश्वासितो रामो लक्ष्मणेन महात्मना ।
जगाम सहितस्तेन द्रुममूलं मनोरमम् ॥
📖 भावार्थ : तब लक्ष्मण उन्हें सांत्वना देते हुए बोले: "आप इस प्रकार शोक से युक्त होने योग्य नहीं हैं। आप वीर्यवान, बलवान और सर्वशास्त्रों के विशारद हैं। हे राम! धैर्य धारण कर आप सीता की खोज करें। शोक से तप्त हुए मनुष्य न तो विपुल श्री प्राप्त करते हैं, न अर्थ और न काम। इसलिए शोक को त्याग दें। हे वीर! मैं आपके साथ मिलकर राक्षसों के घर को ढूँढ़ूँगा और युद्ध में रावण को मारकर आप पुनः जानकी को प्राप्त करेंगे।" इस प्रकार महात्मा लक्ष्मण द्वारा आश्वासित होकर राम उनके साथ एक मनोरम वृक्ष के नीचे जा बैठे।

💔 पुनः विलाप और करुण गाथा (श्लोक २५-३२)

॥ श्लोक २५-३२ ॥
तत्र संस्मृत्य वैदेहीं रामो दशरथात्मजः ।
बभूव परमोद्विग्नो मुहूर्तमिव चेतनः ॥
हा देवि सुभगे सीते हा मम प्राणसंश्रये ।
हा सदा प्रियभाषिण्याः क्व त्वं यातासि मां प्रति ॥
न त्वां पश्यामि वैदेहि हृतां रावणमायया ।
क्षिप्रं द्रक्ष्यामि ते नेतुं राक्षसं पापकारिणम् ॥
एवं विलपतस्तस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।
निश्चेरुर्नयनाद् वारि दुःखसंतापसम्भवम् ॥
ततस्तौ भ्रातरौ वीरौ दुःखितौ रामलक्ष्मणौ ।
चेरतुस्तद्वनं सर्वं सीतामन्वेषमाणकौ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : वहाँ दशरथनंदन राम ने वैदेही का स्मरण करके पुनः अत्यन्त व्याकुल होकर मूर्च्छित-से हो गए। "हे देवि! हे सुभगे सीते! हे मेरे प्राणों के आश्रय! हे सदा प्रिय बोलने वाली! तुम मुझे छोड़कर कहाँ चली गई? रावण की माया से हर ली गई वैदेही को मैं नहीं देख पा रहा हूँ। शीघ्र ही उस पापी राक्षस का वध करके तुम्हें देखूँगा।" इस प्रकार अक्लिष्टकर्मा राम के विलाप करने पर उनके नेत्रों से दुःख और संताप से उत्पन्न जल बह निकला। तब वे दोनों वीर भाई राम और लक्ष्मण दुःखी होते हुए सीता को खोजते हुए उस समस्त वन में घूमने लगे।
🔍 व्याख्या : राम का यह विलाप मानव हृदय की सहज करुणा को दर्शाता है। वे सीता के बिना स्वयं को अधूरा महसूस करते हैं। अन्त में वे खोज जारी रखने का संकल्प लेते हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💧 करुण रस का साक्षात् स्वरूप

यह सर्ग रामायण के करुण रस का उत्कृष्ट उदाहरण है। वियोग में व्याकुल राम का विलाप पाठक के हृदय को द्रवित कर देता है। वाल्मीकि ने यहाँ मानवीय भावनाओं का अत्यन्त मार्मिक चित्रण किया है।

🧘 लक्ष्मण की भूमिका

लक्ष्मण इस अवसर पर धैर्य के प्रतीक बनकर उभरते हैं। वे राम को समझाते हैं कि शोक से कार्य सिद्ध नहीं होता, धैर्य और पुरुषार्थ ही सफलता दिलाते हैं। यह जीवन में संयम और कर्तव्यपरायणता की शिक्षा देता है।

🌳 प्रकृति और मानव भावनाओं का सह-संबंध

राम का विलाप प्रकृति के साथ संवाद के रूप में है। वे वृक्षों, पुष्पों, पशुओं से प्रश्न करते हैं। यह दर्शाता है कि भारतीय चिन्तन में प्रकृति और मानव के मध्य अटूट सम्बन्ध है।

🔱 आदर्श पति और योद्धा का द्वन्द्व

राम एक ओर सीता के विरह में विह्वल प्रेमी हैं, तो दूसरी ओर उन्हें एक योद्धा के रूप में धैर्य धारण कर खोज और युद्ध के लिए तत्पर होना है। यह द्वन्द्व उनके चरित्र को और गहराई प्रदान करता है।

🎯 शिक्षा : कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य नहीं खोना चाहिए। शोक और विलाप से समस्या का समाधान नहीं होता, बल्कि साहस और पुरुषार्थ से ही विजय प्राप्त होती है। लक्ष्मण का उपदेश हमें यही सिखाता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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