अरण्य काण्ड अध्याय 60

सीता के वियोग में राम का विलाप

अरण्यकाण्ड के साठवें सर्ग में राम, सीता के विछोह में अत्यन्त व्याकुल होकर विलाप करते हैं। वे वन के वृक्षों, पशुओं और नदियों से सीता के बारे में पूछते हैं। लक्ष्मण उन्हें धैर्य बँधाते हैं और सीता की खोज के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यह सर्ग राम के मानवीय करुण पक्ष को उजागर करता है।

विवरण

जटायु के मरणोपरान्त राम को सीता के हरण का पूर्ण विवरण मिल चुका है। वे अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगते हैं। उनका विलाप अत्यन्त मार्मिक है – वे सीता की सुरक्षा और उनके पुनर्मिलन की आशा में व्याकुल हो उठते हैं। लक्ष्मण उन्हें सान्त्वना देते हुए समझाते हैं कि शोक करने से कार्य सिद्ध नहीं होता। वे राम को धैर्य धारण कर सीता की खोज में जुटने का आग्रह करते हैं। राम वन के प्रत्येक वृक्ष, लता, पशु-पक्षी से सीता का पता पूछते हैं। यह सर्ग राम के मानवीय स्वरूप का अद्भुत चित्रण प्रस्तुत करता है, जहाँ वे एक सामान्य प्रेमी की भाँति विरह-व्यथा का अनुभव करते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ६०

(सीता के वियोग में राम का विलाप)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : जटायु के वध और सीता के हरण का समाचार सुनकर राम अत्यन्त व्यथित हो उठते हैं। वे सीता के वियोग में विह्वल होकर विलाप करने लगते हैं। लक्ष्मण उन्हें सान्त्वना देते हैं और धैर्य धारण करने को कहते हैं। यह सर्ग राम के करुण हृदय का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है।

😢 राम का करुण विलाप (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १ ॥
ततो रामो महातेजाः सीतावियोगदुःखितः ।
विललाप महाबाहुर्लक्ष्मणं प्रति दुःखितः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामः = राम; महातेजाः = महान तेज वाले; सीतावियोगदुःखितः = सीता के वियोग से दुःखी; विललाप = विलाप किया; महाबाहुः = महान भुजाओं वाले; लक्ष्मणं = लक्ष्मण को; प्रति = के प्रति; दुःखितः = दुःखी होकर।
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम, सीता के वियोग से अत्यन्त दुःखी होकर, महाबाहु लक्ष्मण के सम्मुख विलाप करने लगे।
🔍 व्याख्या : राम का यह विलाप उनके मानवीय स्वरूप को दर्शाता है। वे प्रभु होते हुए भी मनुष्य की भाँति शोक संतप्त होते हैं।
॥ श्लोक २ ॥
हा सीते सुकुमारि त्वं क्व गता मां विहाय वै ।
विना त्वया वने घोरे कथं प्राणान् धराम्यहम् ॥
🔹 पदच्छेद : हा = हाय; सीते = हे सीता; सुकुमारि = अति कोमलांगी; त्वम् = तुम; क्व = कहाँ; गता = चली गई; माम् = मुझे; विहाय = छोड़कर; वै = निश्चय ही; विना = बिना; त्वया = तुम्हारे; वने = वन में; घोरे = भयानक; कथम् = कैसे; प्राणान् = प्राणों को; धरामि = धारण करूँ; अहम् = मैं।
📖 भावार्थ : हाय! हे सुकुमारी सीते! तुम मुझे छोड़कर कहाँ चली गई? इस भयानक वन में तुम्हारे बिना मैं अपने प्राण कैसे धारण करूँ?
॥ श्लोक ३-८ ॥
इति विलप्य बहुधा रामः शोकसमन्वितः ।
पप्रच्छ वनदेवींश्च वृक्षांश्च मृगपक्षिणः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार बहुत प्रकार से विलाप करते हुए शोकाकुल राम ने वनदेवियों, वृक्षों, मृगों और पक्षियों से पूछा कि क्या तुमने मेरी प्रिय सीता को देखा है।

🧘 लक्ष्मण की सान्त्वना (श्लोक ९-१८)

॥ श्लोक ९ ॥
तमुवाच ततो लक्ष्मणः शोकसंतप्तमानसः ।
धैर्यमालम्ब्य धर्मात्मा रामं सम्पूर्णमानसः ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा लक्ष्मण ने धैर्य धारण करके शोक से संतप्त मन वाले राम से कहा।
॥ श्लोक १० ॥
न शोकेन विनश्यन्ति कार्याणि रघुनन्दन ।
प्रहृष्टः कार्यकालज्ञः कुर्यात्कार्याण्यनन्तरम् ॥
📖 भावार्थ : हे रघुनन्दन! शोक से कार्य नष्ट नहीं होते। प्रसन्न रहकर और समय की जानकारी रखते हुए, तत्काल कार्य करना चाहिए।
🔍 व्याख्या : लक्ष्मण राम को शोक न करके सीता की खोज में जुटने की प्रेरणा देते हैं।

🌳 प्रकृति से संवाद (श्लोक १९-२८)

रामः तु परमोदारः पप्रच्छ वनदेवताः ।
वृक्षान् गुल्मान् लताः पुष्पान् सीतायाः मार्गदर्शकान् ॥
... (संक्षेप में)
📖 भावार्थ : राम वनदेवताओं, वृक्षों, झाड़ियों, लताओं और पुष्पों से पूछते हैं कि क्या तुमने मेरी प्रियतमा को देखा है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💔 मानवीय करुणा

यह सर्ग राम के मानवीय पक्ष को उजागर करता है। प्रभु होते हुए भी वे सीता के वियोग में व्याकुल होते हैं, जिससे भक्तों को यह शिक्षा मिलती है कि भगवान ने मनुष्य-लीला में सभी भावों को अनुभव किया।

🧭 धैर्य का उपदेश

लक्ष्मण द्वारा दिया गया धैर्य का उपदेश हमें सिखाता है कि विपत्ति में घबराना नहीं चाहिए, बल्कि समय रहते उचित कार्यवाही करनी चाहिए।

🔍 खोज का प्रारम्भ

यह सर्ग आगे चलकर राम द्वारा सीता की खोज, कबन्ध-वध और सुग्रीव से मैत्री का आधार तैयार करता है।

🎯 शिक्षा : मनुष्य स्वाभाविक रूप से दुःख में विलाप करता है, परन्तु धैर्य और साहस के साथ आगे बढ़ना ही सफलता की कुंजी है। राम का विलाप हमें उनके प्रेम की गहराई का एहसास कराता है, तो लक्ष्मण की सान्त्वना हमें कर्तव्यपालन की प्रेरणा देती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे षष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।