ऋषियों और तपस्वियों का आगमन

अरण्यकाण्ड के छठे सर्ग में अनेक ऋषि-मुनियों एवं तपस्वियों का राम के आश्रम पर आगमन होता है। वे राम के दर्शन से परम प्रसन्न होते हैं और राक्षसों द्वारा उत्पीड़न की कथा सुनाकर राम से रक्षा की याचना करते हैं। राम उन्हें अभयदान देते हैं और राक्षसों के नाश का संकल्प दोहराते हैं।

विवरण

दण्डकारण्य में निवास करते हुए राम, सीता और लक्ष्मण की ख्याति चारों ओर फैल गई। उनके आश्रम पर दूर-दूर से ऋषि-मुनि एवं तपस्वी आने लगे। इस सर्ग में वर्णन है कि किस प्रकार विभिन्न आश्रमों के निवासी ऋषिगण राम के दर्शनों के लिए उमड़ पड़े। वे हाथ जोड़कर राम की स्तुति करते हैं और उन्हें अपने कष्टों से अवगत कराते हैं – कैसे राक्षस उनके यज्ञों में विघ्न डालते हैं, मुनियों को सताते हैं और तपोभूमि को अपवित्र करते हैं। राम उनकी व्यथा सुनकर अत्यन्त क्रोधित होते हैं और उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि वे शीघ्र ही राक्षसों का विनाश करेंगे। ऋषिगण राम की प्रतिज्ञा सुनकर आश्वस्त होते हैं और उन्हें आशीर्वाद देकर अपने-अपने आश्रमों को लौट जाते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ६

(ऋषियों और तपस्वियों का आगमन – रक्षा की प्रार्थना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षष्ठः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम ने दण्डकारण्य में ऋषियों को अभयदान दिया था। अब उनके आश्रम पर दूर-दूर से तपस्वी आने लगे हैं। यह सर्ग उनके आगमन, राक्षसों की व्यथा और राम के प्रति उनकी आशा का हृदयस्पर्शी वर्णन करता है।

🌿 ऋषियों का आगमन और राम का आदरपूर्ण स्वागत (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततस्ते तापसाः सर्वे राममभ्यागमन्मुदा ।
दृष्ट्वा रामं महात्मानं प्रहर्षमतुलं ययुः ॥
कृताञ्जलिपुटा भूत्वा ऊचुः परमविस्मिताः ।
राम राम महाबाहो शृणु कारुण्यमानस ॥
वयं तु तापसाः सर्वे दण्डकारण्यवासिनः ।
त्वयि धर्मभृतां श्रेष्ठ शरणार्थमुपागताः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; ते = वे; तापसाः = तपस्वी; सर्वे = सभी; रामम् = राम के पास; अभ्यागमन् = आए; मुदा = हर्ष के साथ; दृष्ट्वा = देखकर; रामम् = राम को; महात्मानम् = महान् आत्मा वाले; प्रहर्षम् = हर्ष को; अतुलम् = अद्वितीय; ययुः = प्राप्त हुए। कृताञ्जलिपुटाः = हाथ जोड़कर; भूत्वा = होकर; ऊचुः = बोले; परमविस्मिताः = अत्यन्त आश्चर्यचकित; राम राम = हे राम; महाबाहो = हे महाबाहु; शृणु = सुनो; कारुण्यमानस = दयालु मन वाले; वयम् = हम; तु = तो; तापसाः = तपस्वी; सर्वे = सभी; दण्डकारण्यवासिनः = दण्डकारण्य में रहने वाले; त्वयि = आप में; धर्मभृताम् = धर्म धारण करने वालों में; श्रेष्ठ = श्रेष्ठ; शरणार्थम् = शरण चाहने के लिए; उपागताः = आए हुए हैं।
📖 भावार्थ : तब वे सब तपस्वी हर्षपूर्वक राम के पास आए। महात्मा राम को देखकर उन्हें अपार हर्ष हुआ। हाथ जोड़कर अत्यन्त विस्मित होकर वे बोले: हे राम, हे महाबाहो, हे दयालु मन वाले, सुनिए। हम सब दण्डकारण्य में निवास करने वाले तपस्वी हैं। हे धर्मज्ञों में श्रेष्ठ, हम आपकी शरण में आए हैं।
🔍 व्याख्या : ऋषिगण राम के प्रति अगाध श्रद्धा रखते हैं। वे राम को केवल एक क्षत्रिय राजकुमार नहीं, बल्कि धर्म के रक्षक के रूप में देखते हैं।
॥ श्लोक ४-१० ॥
राक्षसाः कामरूपिणः घोराः सीदन्ति तापसान् ।
यज्ञविघ्नकराः पापा मांसशोणितभोजनाः ॥
तेषां त्राणं भवानेको रघुवीर न संशयः ।
वयं त्वां शरणं याता रक्ष रक्ष तपस्विनः ॥
एवमुक्त्वा तु ते सर्वे रामं प्राञ्जलयः स्थिताः ।
बाष्पपूर्णमुखाः सर्वे भयार्ताः करुणं तदा ॥
📖 भावार्थ : "कामरूप धारण करने वाले भयंकर राक्षस तपस्वियों को सता रहे हैं। वे पापी यज्ञों में विघ्न डालते हैं और मांस-रक्त भोजन करते हैं। उनसे रक्षा करने वाले आप ही एकमात्र हैं, हे रघुवीर! इसमें संशय नहीं। हम आपकी शरण में आए हैं, इन तपस्वियों की रक्षा कीजिए।" ऐसा कहकर वे सब हाथ जोड़े खड़े रहे। उस समय भय से व्याकुल उनके मुख आँसुओं से भर गए थे।
🔍 व्याख्या : ऋषियों की दीन-दशा देखकर राम का हृदय करुणा से भर गया। वे तत्काल रक्षा का निश्चय करते हैं।

🛡️ राम का ऋषियों को अभयदान और राक्षस-संहार की प्रतिज्ञा (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
तानुवाच ततो रामः परमार्थविदां वरः ।
न भेतव्यं मुनिश्रेष्ठा राक्षसेभ्यः कथंचन ॥
अहं वः शरणं प्राप्तो वधिष्ये राक्षसाधमान् ।
दण्डकारण्यमध्येऽस्मिन् युष्माकं भयनाशनः ॥
प्रतिज्ञा मम या पूर्वं सत्यमेव मयि स्थिता ।
रक्षिताश्च यथा यूयं तथा संपादयाम्यहम् ॥
आश्वासयदिमान् सर्वान् राघवः सत्यविक्रमः ।
ते च विज्ञाय रामस्य प्रतिज्ञां मुदिता द्विजाः ॥
📖 भावार्थ : तब परमार्थ के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ राम ने उनसे कहा: हे मुनिश्रेष्ठ! राक्षसों से किसी भी प्रकार न डरें। मैं आपकी शरण में आया हूँ, मैं उन अधम राक्षसों को मार डालूँगा। इस दण्डकारण्य के मध्य में मैं आपके भय का नाश करूँगा। पहले मैंने जो प्रतिज्ञा की थी वह सत्य ही मुझमें स्थित है। जैसे आप रक्षित हों, मैं वैसा ही करूँगा। सत्यविक्रम राघव ने उन सबको आश्वासन दिया। उन द्विजों ने राम की प्रतिज्ञा जानकर हर्ष मनाया।
॥ श्लोक १६-२० ॥
ततः प्रहृष्टास्ते सर्वे ऋषयो धर्मसंहिताः ।
आशीर्भिर्योजयामासू रामं सत्यपराक्रमम् ॥
जयस्व राम राक्षसान् धर्मस्तेऽस्तु सनातनः ।
लक्ष्मणः सह सीतया त्वया सह सुखी भवेत् ॥
इत्युक्त्वा ते महात्मानः प्रणम्य च पुनः पुनः ।
जग्मुराश्रममेवाग्रे हृष्टाः प्राप्तमनोरथाः ॥
📖 भावार्थ : तब वे सब धर्मसंहित ऋषि अत्यन्त प्रसन्न होकर सत्यपराक्रमी राम को आशीर्वाद देने लगे। "हे राम! आप राक्षसों पर विजय पाइए। आपका सनातन धर्म बना रहे। लक्ष्मण और सीता आपके साथ सुखी रहें।" ऐसा कहकर वे महात्मा बार-बार प्रणाम करके, हर्षित और मनोरथ पूर्ण करके अपने-अपने आश्रमों को चले गए।
🔍 व्याख्या : ऋषियों का आशीर्वाद राम के आगामी कार्यों के लिए मंगलकारी सिद्ध होता है। वे पूर्ण आश्वस्त होकर लौटते हैं।

🏕️ राम का दण्डकारण्य में निवास (श्लोक २१-२८)

॥ श्लोक २१-२८ ॥
ततः रामो महातेजा लक्ष्मणेन समन्वितः ।
सीतया च महाभागः तस्मिन् वनमुवास ह ॥
ऋषीणां वचनं श्रुत्वा राक्षसानां च दुष्कृतम् ।
चकार मतिमान् रामः संहारं घोररक्षसाम् ॥
अथ काले गते कस्मिन् शरभङ्गाश्रमं ययौ ।
तत्रापश्यन्मुनिश्रेष्ठं दिव्यज्ञानसमन्वितम् ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम, लक्ष्मण एवं महाभाग सीता के साथ उस वन में निवास करने लगे। ऋषियों के वचन और राक्षसों के दुष्कर्म सुनकर मतिमान राम ने घोर राक्षसों के संहार का विचार किया। फिर कुछ समय पश्चात् वे शरभंग के आश्रम को गए, जहाँ उन्होंने दिव्यज्ञान से युक्त उस मुनिश्रेष्ठ को देखा।
🔍 व्याख्या : यह सर्ग ऋषियों के आगमन के साथ समाप्त होता है और अगले सर्ग में शरभंग ऋषि के आश्रम के प्रस्थान की सूचना देता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🙏 ऋषियों की आस्था

इस सर्ग से स्पष्ट होता है कि ऋषिगण राम में कितनी आस्था रखते हैं। वे उन्हें रक्षक के रूप में देखते हैं और उनके आगमन से आतंक से मुक्ति की आशा बँधती है।

🗡️ राम का रणकौशल और करुणा

राम में एक ओर करुणा है तो दूसरी ओर राक्षसों के प्रति क्रोध। वे ऋषियों के दुःख से विचलित होते हैं और उनके रक्षार्थ कटिबद्ध हो जाते हैं।

⏳ समयचक्र की सूचना

अंत में शरभंग ऋषि के आश्रम जाने का उल्लेख आगे के सर्गों की भूमिका तैयार करता है, जहाँ राम को अगस्त्य आदि से भेंट होगी।

⚔️ प्रतिज्ञा का पुनरावर्तन

राम फिर से अपनी प्रतिज्ञा दोहराते हैं, जो उनके सत्य एवं धर्मपरायणता को दर्शाता है। वह वचन के पक्के हैं।

🎯 शिक्षा : सज्जनों की पुकार सुनकर उनकी रक्षा करना हर सक्षम व्यक्ति का धर्म है। राम ने ऋषियों की दशा देखकर तुरन्त उन्हें अभयदान दिया। हमें भी समाज के पीड़ितों की सहायता के लिए सदा तत्पर रहना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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