जटायु और रावण का युद्ध
जटायु द्वारा रावण से भीषण युद्ध एवं रावण द्वारा जटायु के पंख काटने का वर्णन।
विवरण
रावण सीता का हरण करके आकाश मार्ग से लंका की ओर जा रहा था। मार्ग में उसे वृद्ध गिद्धराज जटायु दिखाई दिए, जो राम के मित्र थे। जटायु ने रावण को रोककर सीता को छोड़ने को कहा। रावण ने उसकी बात नहीं मानी और दोनों में भयंकर युद्ध छिड़ गया। जटायु ने अपनी तीक्ष्ण चोंच एवं पंजों से रावण के शरीर को घायल कर दिया और उसके रथ को नष्ट कर दिया। लेकिन अंत में रावण ने अपनी खड्ग से जटायु के पंख एवं पैर काट डाले। घायल जटायु धरती पर गिर पड़ा और रावण सीता को लेकर चला गया। बाद में राम एवं लक्ष्मण को वहाँ पहुँचने पर जटायु ने सीता के हरण की सूचना दी।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ५१
(जटायु और रावण का युद्ध)
🔆 प्रस्तावना : रावण जब सीता का हरण कर आकाश मार्ग से जा रहा था, तब मार्ग में वृद्ध गिद्धराज जटायु को देखा। जटायु दशरथ के मित्र और राम के भक्त थे। उन्होंने रावण को रोककर सीता को छोड़ने को कहा। रावण ने उनकी बात का अपमान किया और फिर दोनों में घोर युद्ध हुआ। इस सर्ग में उसी युद्ध का रोमांचक वर्णन है।
🦅 जटायु का रावण को रोकना (श्लोक १-८)
बभूव रावणं दृष्ट्वा सीतां चैव समीपतः ॥
स रावणं समासाद्य जटायुरकुतोभयः ।
अवातरत विहंगानां प्रवीरः परवीरहा ॥
तमुवाच ततो वाक्यं जटायु रजनीचरम् ।
क्व सीतां नयसे ब्रूहि मामकीं पापनिश्चय ॥
रामस्याहं हिते युक्तो राज्ञो दशरथस्य च ।
न त्वं नेतुं बलात्सीतां शक्तः सत्येन ते शपे ॥
⚔️ घोर युद्ध और रथ का विनाश (श्लोक ९-२०)
क्रोधमाहारयत्तीव्रं रावणो राक्षसेश्वरः ॥
स रावणो महातेजा जटायुषमवस्थितम् ।
अभ्यधावत संक्रुद्धो वज्रपाणिरिवासुरम् ॥
ततो युद्धमभूद्घोरं जटायुरावणान्तरे ।
रोमहर्षणमत्युग्रं देवासुररणोपमम् ॥
जटायुश्चरणाग्रेण रावणं समताडयत् ।
स रथात्पतितो भूमौ विसंज्ञः समपद्यत ॥
जटायुमभिदुद्राव चिच्छेद च शरोत्तमैः ॥
जटायुश्चापि तान्बाणान्पक्षाभ्यां प्रतिगृह्य च ।
चकार रावणं क्रोधात्पादप्रहारेण दुःखितम् ॥
ततो रथं जटायुस्तु चरणाभ्यां प्रमथ्य च ।
पातयामास सहसा साश्वं सध्वजं ससारथिम् ॥
स विनष्टरथो रावणः क्रोधसंरक्तलोचनः ।
जटायुमभिदुद्राव खड्गमादाय दीप्तिमत् ॥
🪶 रावण द्वारा जटायु के पंख काटना (श्लोक २१-३५)
जटायोश्छादये पक्षौ चिच्छेद च ननाद च ॥
स च्छिन्नपक्षो निपपात जटायुः
धरातले क्षतजसम्प्रकीर्णः ।
ततो रावणः सीतया सहाशु
जगाम लङ्कां प्रति दुष्टचेष्टः ॥
विललाप च सीता तं दृष्ट्वा गिरिगुहोपमम् ।
जटायुं पतितं भूमौ रावणेन बलीयसा ॥
रामागमनमाकाङ्क्षन्न प्राणानत्यजत्तदा ॥
रामश्च लक्ष्मणश्चैव तत्राजग्मतुराश्रमम् ।
ददृशाते च तं वृद्धं पतितं रुधिरोक्षितम् ॥
तौ दृष्ट्वा राघवौ वीरौ जटायुः प्राणयन्त्रितः ।
शशंस रावणस्यैतत्कर्म सीतापहारणम् ॥
💔 जटायु का बलिदान और राम का शोक (श्लोक ३६-३८)
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🦅 जटायु का आदर्श
जटायु ने अपनी आयु की परवाह न करते हुए राम की पत्नी की रक्षा का प्रयास किया। यह मैत्री और स्वामिभक्ति का अद्वितीय उदाहरण है।
⚡ रावण का पराक्रम
यद्यपि जटायु ने बड़ी वीरता दिखाई, परन्तु अन्त में रावण ने उसे परास्त किया। इससे रावण के असाधारण बल का भी पता चलता है, जिससे आगे के युद्ध की भीषणता का आभास होता है।
💔 सीता का दुःख
सीता ने जटायु के बलिदान को देखा और उनके लिए अश्रु बहाए। यह सीता के करुणामयी स्वरूप को दर्शाता है।
🙏 राम की कृतज्ञता
राम ने जटायु का अन्तिम संस्कार अपने पिता की भाँति किया। यह राम के कृतज्ञ हृदय को प्रकट करता है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें मित्रता, निष्ठा और कर्तव्यपालन की प्रेरणा मिलती है। जटायु ने अपने प्राणों की आहुति देकर भी धर्म की रक्षा की। हमें भी परोपकार और सत्य के लिए सदा तत्पर रहना चाहिए।