अरण्य काण्ड अध्याय 50

रावण का जटायु से सामना

अरण्यकाण्ड के पचासवें सर्ग में रावण द्वारा सीता हरण के समय जटायु के वीरतापूर्ण प्रतिरोध का वर्णन है। जटायु रावण को रोकने के लिए युद्ध करता है, परन्तु रावण उसके पंख काट देता है। यह सर्ग जटायु के असाधारण साहस एवं रामभक्ति को प्रदर्शित करता है।

विवरण

सीता का हरण करने के बाद रावण उन्हें लेकर आकाश मार्ग से लंका की ओर बढ़ रहा है। सीता की चीख-पुकार सुनकर वृद्ध गृध्रराज जटायु जाग उठता है। वह रावण को देखता है और तत्काल उसे रोकने का निश्चय करता है। जटायु रावण के सम्मुख जाकर कहता है – “हे दशानन! तू धर्मात्मा राम की पत्नी का हरण कर रहा है, यह अत्यन्त अधर्म है। तू इन्हें छोड़ दे, नहीं तो मैं तुझे यहाँ से जीवित नहीं जाने दूँगा।” रावण इन बातों की उपेक्षा करता है और जटायु पर आक्रमण कर देता है। दोनों में भीषण युद्ध होता है। जटायु अत्यन्त वीरता से लड़ता है, अपनी चोंच एवं पंजों से रावण के शरीर को बींधता है, उसके रथ और घोड़ों को क्षतिग्रस्त करता है। लेकिन रावण अपनी तलवार से जटायु के पंख और पैर काट देता है। घायल और पंखहीन होकर जटायु पृथ्वी पर गिर पड़ता है। रावण उसे मृत समझकर सीता को लेकर आगे बढ़ जाता है। यह सर्ग जटायु के बलिदान और राम के प्रति उसकी निष्ठा को अत्यन्त मार्मिकता से प्रस्तुत करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ५०

(रावण का जटायु से सामना – जटायु युद्ध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : मारीच का वध करके राम-लक्ष्मण सीता की रक्षा के लिए आश्रम की ओर लौट रहे थे, पर तब तक रावण छद्म वेश में आकर सीता का हरण कर चुका था। अब वह सीता को लेकर आकाश मार्ग से लंका की ओर बढ़ रहा है। सीता की करुण पुकार सुनकर ऋष्यमूक पर्वत के निकट रहने वाला गृध्रराज जटायु जाग उठता है। वह रावण को देखता है और अपने प्राणों की परवाह किए बिना उसका सामना करता है। यह सर्ग उसी वीरतापूर्ण मुठभेड़ का वर्णन करता है।

🌤️ सीता का विलाप और जटायु की प्रतिज्ञा (श्लोक १-७)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः प्रववृते युद्धं रावणस्य च पक्षिणः ।
जटायोश्च महाबाहो रामस्य प्रियकाम्यया ॥
सीतां समादाय तु रावणस्तदा
वेगेन यातो गगनं सुदुःखितः ।
तमापतन्तं सहसा विहायसा
जगाद वाक्यं स्फुटमुग्रतेजसम् ॥
तिष्ठ तिष्ठ क्व यासि त्वं मम पृष्ठगतो यदि ।
न मोक्ष्यसे मया राजन् रामस्य महिषीं प्रियाम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रववृते = प्रारम्भ हुआ; युद्धम् = युद्ध; रावणस्य = रावण का; च = और; पक्षिणः = पक्षी; जटायोः = जटायु का; च = तथा; महाबाहो = हे महाबाहो; रामस्य = राम के; प्रियकाम्यया = प्रिय की इच्छा से; सीताम् = सीता को; समादाय = लेकर; तु = तो; रावणः = रावण; तदा = तब; वेगेन = वेग से; यातः = गया; गगनम् = आकाश में; सुदुःखितः = अत्यन्त दुःखी; तम् = उसको; आपतन्तम् = आते हुए; सहसा = सहसा; विहायसा = आकाश में; जगाद = बोला; वाक्यम् = वचन; स्फुटम् = स्पष्ट; उग्रतेजसम् = उग्र तेजस्वी; तिष्ठ तिष्ठ = ठहर, ठहर; क्व = कहाँ; यासि = जा रहे हो; त्वम् = तुम; मम = मेरी; पृष्ठगतः = पीठ पर बैठे हुए; यदि = यदि; न = नहीं; मोक्ष्यसे = छोड़ूँगा; मया = मुझसे; राजन् = हे राजन्; रामस्य = राम की; महिषीम् = पत्नी; प्रियाम् = प्रिय को।
📖 भावार्थ : हे महाबाहो! तब राम के प्रिय की कामना से रावण और पक्षी (जटायु) के बीच युद्ध आरम्भ हुआ। सीता को लेकर रावण बड़े वेग से आकाश में जा रहा था। उसे आकाश में आते देख जटायु ने उग्रतापूर्वक स्पष्ट वचन कहा – “ठहर, ठहर! तू कहाँ जा रहा है? यदि तू मेरी पीठ पर (मेरे सामने) है तो मैं तुझे राम की प्रिय पत्नी को लेकर जीवित नहीं जाने दूँगा।”
॥ श्लोक ४-७ ॥
वृद्धोऽहं त्वं युवा धन्वी बलवान् समरद्विषाम् ।
तथापि न त्वया सीता नेतुमुत्सह्यते बलात् ॥
नैतत्कार्यं त्वया राजन् कुलपुंसां समीक्ष्यताम् ।
अधर्मो हि महांस्तात रामाद् धर्मपरादपि ॥
नूनं त्वं नाभिजानासि रामं दशरथात्मजम् ।
यस्येयं वैशसी वृत्तिर्वर्तते त्वयि दारुणा ॥
अवश्यं हि त्वया त्याज्या सीता जनकनन्दिनी ।
नो चेत्त्वां सशरं भूत्वा प्राणैर्व्यापारयाम्यहम् ॥
📖 भावार्थ : “मैं वृद्ध हूँ, तू युवा है, धनुषधारी है, शत्रुओं के बीच बलवान् है। फिर भी तू सीता को बलपूर्वक नहीं ले जा सकता। हे राजन्! यह कार्य तुझे नहीं करना चाहिए। कुलीन पुरुषों को यह योग्य नहीं लगता। हे तात! धर्मपरायण राम से भी यह बड़ा अधर्म है। निस्सन्देह तू दशरथपुत्र राम को नहीं जानता, जिसके कारण तुझ पर यह दारुण दशा आने वाली है। निश्चय ही तुझे जनकनन्दिनी सीता को छोड़ना ही होगा। नहीं तो मैं शरयुक्त होकर तुझे प्राणों से हाथ धो दूँगा।”

⚔️ रावण-जटायु भीषण युद्ध (श्लोक ८-१८)

॥ श्लोक ८-१२ ॥
इत्युक्त्वा तेन रामार्थे युयुधे पक्षिसत्तमः ।
रावणेन सुसंक्रुद्धो विनदन्नभिवर्तत ॥
ततो रावणमापत्या जटायुरकृतव्रणम् ।
चकार रुधिरं तीक्ष्णैर्नखैर्दशनकैरपि ॥
भल्लूकराजसंकाशो रावणं पक्षिसत्तमः ।
पक्षाभ्यां परिगृह्याजौ ताडयामास वक्षसि ॥
स गृध्रराजेन समेत्य रावणः
सुसंविग्नः समरे भीमदर्शनः ।
विनद्य चोच्चैः सहसा विहायसा
जघान चञ्च्वा च नखैश्च वीर्यवान् ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर राम के लिए उस पक्षिश्रेष्ठ ने अत्यन्त क्रोधित होकर रावण से युद्ध किया। जटायु ने रावण पर झपट्टा मारा और तीक्ष्ण नखों-दाँतों से उसे घायल कर दिया। भालूराज के समान वह पक्षिश्रेष्ठ युद्ध में रावण को पंखों से जकड़कर वक्षःस्थल पर आघात करने लगा। रावण उस गृध्रराज से युद्ध करता हुआ अत्यन्त भयभीत हुआ, पर उसने ऊँचा नाद करके जटायु को चोंच और नखों से घायल किया।
॥ श्लोक १३-१८ ॥
तयोर्युद्धमभूद् घोरं पक्षिणो रक्षसा सह ।
आकाशे तुमुलं चित्रं रोमहर्षणमद्भुतम् ॥
ततः क्रुद्धो दशग्रीवो जटायुमवधीद् बली ।
खड्गेन सुमहातेजा नखपक्षसमुत्करम् ॥
पक्षौ चास्य सुसंक्रुद्धश्चिच्छेद रजनीचरः ।
पद्भ्यां च मुखतश्चैव चिच्छेदासीन्महीतले ॥
स च्छिन्नपक्षो निपपात भूतले
जटायुरार्तः पतगाधिपस्तदा ।
ददर्श रामं च महानुभावं
विवत्स्यमानं सह लक्ष्मणेन ॥
📖 भावार्थ : उन दोनों – पक्षी और राक्षस – का घोर, अद्भुत और रोमांचकारी युद्ध आकाश में हुआ। तब क्रोधित दशग्रीव रावण ने खड्ग से जटायु के नख और पंख सहित भाग काट डाले। उस राक्षस ने क्रोध में आकर उसके पंख काट दिए और पैरों तथा मुख पर भी प्रहार किया। तब वह पक्षीश्रेष्ठ जटायु, जिसके पंख कट चुके थे, पृथ्वी पर गिर पड़ा। वहाँ गिरकर उसने लक्ष्मण सहित महानुभाव राम को (अपनी अन्तिम दृष्टि से) देखा।
🔍 व्याख्या : रावण की तलवार के वार से जटायु के पंख कट जाते हैं और वह धराशायी हो जाता है। परन्तु उसकी दृष्टि अब भी राम की ओर है – यह उसकी अनन्य भक्ति को दर्शाता है।

🕊️ जटायु का बलिदान और रावण का अभिमान (श्लोक १९-२५)

॥ श्लोक १९-२१ ॥
तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ गृध्रराजं महाबलम् ।
रावणो हर्षमापन्नो जग्राह च महाबलः ॥
आदाय च ततः सीतां जगाम गगनं प्रति ।
विहाय निहतं गृध्रं जटायुमरिमर्दनः ॥
ततः सीता तु संप्रेक्ष्य जटायुं निहतं भुवि ।
रुरोद सुस्वरं दीना रामरामेति चुक्रुशे ॥
📖 भावार्थ : भूमि पर गिरे हुए उस महाबली गृध्रराज को देखकर रावण अत्यन्त हर्षित हुआ और उसने (सीता को) पकड़ा। फिर उस शत्रु का दमन करने वाले रावण ने मृत जटायु को छोड़कर सीता को लेकर आकाश मार्ग पकड़ लिया। तब सीता ने जटायु को भूमि पर मृत देखा और अत्यन्त दीन होकर ऊँचे स्वर में विलाप करते हुए “राम! राम!” पुकारने लगीं।
॥ श्लोक २२-२५ ॥
ततस्तु रावणो गत्वा लङ्कामेव प्रवेशयत् ।
सीतां विविधसंत्रासां रक्षोगृहवशं गताम् ॥
जटायुस्तु महातेजा रामस्य प्रियकाम्यया ।
प्राणांस्त्यक्त्वा गतः स्वर्गं यत्र रामः सनातनः ॥
एवं युद्धं समभवद् रावणस्य च पक्षिणः ।
जटायोर्भरतश्रेष्ठ रामस्य प्रियकाम्यया ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे पञ्चाशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् रावण लंका को गया और सीता को, जो नाना प्रकार से भयभीत थीं, अपने राक्षसगृह में डाल दिया। महातेजस्वी जटायु ने राम के प्रिय की इच्छा से प्राण त्याग कर स्वर्ग प्राप्त किया, जहाँ सनातन राम (नारायण) विराजमान हैं। हे भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार रावण और पक्षी जटायु के बीच राम के प्रिय की कामना से यह युद्ध हुआ।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦅 जटायु का अप्रतिम शौर्य

जटायु अत्यन्त वृद्ध है, फिर भी वह रावण जैसे शक्तिशाली राक्षस को चुनौती देता है। यह साहस केवल शारीरिक बल पर नहीं, बल्कि राम के प्रति प्रेम और धर्म की रक्षा की भावना पर आधारित है।

⚖️ धर्म और अधर्म का संघर्ष

जटायु रावण को धर्म का उपदेश देता है, पर रावण अहंकारवश नहीं मानता। यह प्रसंग दर्शाता है कि अधर्मी को परिणाम भुगतने पड़ते हैं, भले ही वह क्षणिक विजय प्राप्त कर ले।

💔 करुणा और वीरता का संगम

सीता का विलाप और जटायु का बलिदान पाठक के हृदय को द्रवित कर देता है। यह सर्ग वाल्मीकि की करुण रस के प्रति अद्भुत निपुणता दिखाता है।

🔱 रामभक्ति की पराकाष्ठा

जटायु ने बिना किसी स्वार्थ के राम के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उसकी भक्ति कर्मयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है।

🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि अपनी क्षमता से अधिक शक्तिशाली विपत्ति के सामने भी धर्म की रक्षा के लिए डटे रहना चाहिए। जटायु ने युद्ध हारकर भी मन नहीं हारा, उसकी अंतिम दृष्टि राम पर थी। सच्चा वीर वही है जो धर्म के लिए प्राणों की आहुति दे दे।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे पञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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