ऋषि शरभंग का आश्रम

अरण्यकाण्ड के पाँचवें सर्ग में भगवान राम, सीता और लक्ष्मण महर्षि शरभंग के आश्रम में जाते हैं। शरभंग राम के दर्शन से पुलकित होकर उन्हें अपने तप का फल अर्पित करना चाहते हैं, किन्तु राम उसे विनयपूर्वक अस्वीकार कर देते हैं। तत्पश्चात शरभंग अग्नि में प्रवेश कर ब्रह्मलोक को प्रस्थान करते हैं। अन्य ऋषि राम के समक्ष राक्षसों की समस्या रखते हैं।

विवरण

दण्डक वन में प्रवेश के पश्चात राम, सीता और लक्ष्मण विभिन्न ऋषियों के आश्रमों का भ्रमण करते हुए महर्षि शरभंग के आश्रम पहुँचते हैं। शरभंग अत्यन्त तेजस्वी और तपस्वी ऋषि हैं, जो उस समय ब्रह्मलोक जाने की तैयारी में थे, किन्तु राम के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। राम को देखकर वे अत्यन्त हर्षित होते हैं और उनका विधिवत सत्कार करते हैं। वे राम से कहते हैं कि उन्होंने अपने तप के बल से ब्रह्मलोक प्राप्त कर लिया है, और अब वे वहाँ जाने से पूर्व राम के दर्शन की अभिलाषा रखते थे। वे राम से प्रार्थना करते हैं कि वे अपने समस्त तप और ब्रह्मलोक के फल को स्वीकार करें। किन्तु राम विनम्रतापूर्वक उसे अस्वीकार करते हुए कहते हैं कि वे स्वयं अपने कर्मों से तप और लोकों की प्राप्ति करेंगे; दूसरे के तप के फल को ग्रहण करना उचित नहीं है। शरभंग राम के उत्तर से संतुष्ट होते हैं और अग्नि में प्रवेश कर भस्म हो जाते हैं, तत्पश्चात दिव्य रूप धारण कर ब्रह्मलोक को चले जाते हैं। उसके बाद अन्य ऋषि-मुनि वहाँ एकत्र होते हैं और राम से दण्डक वन में निवास करने वाले राक्षसों के आतंक की व्यथा सुनाते हैं। वे राम से रक्षा की याचना करते हैं। राम उन्हें अभयदान देते हैं और राक्षसों के वध का संकल्प दोहराते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ५

(ऋषि शरभंग का आश्रम – तपोफल का अर्पण और ब्रह्मलोक गमन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : दण्डकारण्य में प्रवेश के बाद राम, सीता और लक्ष्मण ऋषियों के आश्रमों का भ्रमण कर रहे हैं। इसी क्रम में वे महर्षि शरभंग के आश्रम पहुँचते हैं। शरभंग अत्यन्त तेजस्वी तपस्वी हैं, जो राम के दर्शन की प्रतीक्षा में ब्रह्मलोक जाना टाले हुए थे। यह सर्ग उनके मिलन, तपोफल के अर्पण और शरभंग के ब्रह्मलोक-गमन की अद्भुत कथा प्रस्तुत करता है।

🌿 शरभंग आश्रम में प्रवेश और ऋषि का स्वागत (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः प्रविश्य रामस्तु शरभङ्गाश्रमं महत् ।
ददर्श तापसं तत्र दीप्यमानमिव श्रिया ॥
तमापतन्तं सहसा रामं दृष्ट्वा महातपाः ।
हर्षेण महता युक्तः स्वागतं वाक्यमब्रवीत् ॥
दिष्ट्या प्राप्तोऽसि काकुत्स्थ द्रष्टुं मां तपसि स्थितम् ।
इदमासनमासीद्य त्वया सार्धमरिन्दम ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रविश्य = प्रवेश करके; रामः = राम; तु = तो; शरभङ्गाश्रमम् = शरभंग के आश्रम में; महत् = महान; ददर्श = देखा; तापसम् = तपस्वी को; तत्र = वहाँ; दीप्यमानम् = दीप्तिमान; इव = जैसे; श्रिया = शोभा से; तम् = उसे; आपतन्तम् = आते हुए; सहसा = सहसा; रामम् = राम को; दृष्ट्वा = देखकर; महातपाः = महान तपस्वी; हर्षेण = हर्ष से; महता = बड़े; युक्तः = युक्त; स्वागतम् = स्वागत का; वाक्यम् = वाक्य; अब्रवीत् = बोले; दिष्ट्या = सौभाग्य से; प्राप्तः = प्राप्त हुए; असि = आप; काकुत्स्थ = ककुत्स्थ वंशी; द्रष्टुम् = देखने के लिए; माम् = मुझे; तपसि = तप में; स्थितम् = स्थित; इदम् = यह; आसनम् = आसन; आसीद्य = बैठिए; त्वया = आपके साथ; सार्धम् = साथ; अरिन्दम = शत्रुओं को दमन करने वाले।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् राम उस महान शरभंग आश्रम में प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने एक तपस्वी को देखा जो अपनी शोभा से दीप्तिमान हो रहे थे। उस महातपस्वी ने राम को आते देखकर अत्यन्त हर्षित होकर स्वागत-वचन कहे: "हे काकुत्स्थ! सौभाग्य से आप मुझ तपस्वी के दर्शन के लिए प्राप्त हुए हैं। हे शत्रुदमन! आप मेरे साथ इस आसन पर पधारिए।"
॥ श्लोक ४-६ ॥
पूजां चास्मै यथान्यायं शरभङ्गो महातपाः ।
चकार परया भक्त्या रामायाक्लिष्टकर्मणे ॥
ततः कथान्ते धर्मज्ञः शरभङ्गो महातपाः ।
उवाच रामं काकुत्स्थं वाक्यं धर्मार्थसंहितम् ॥
इदं तपः समुदितं ब्रह्मलोकं च शाश्वतम् ।
प्रतिच्छ राघवात्मानं मत्तः श्रेयोऽभिकाङ्क्षया ॥
📖 भावार्थ : तब महातपस्वी शरभंग ने अक्लिष्टकर्मा राम की परम भक्ति से यथान्याय पूजा की। फिर बातचीत के पश्चात् धर्मज्ञ महातपस्वी शरभंग ने राम से धर्म और अर्थ से युक्त वाक्य कहा: "हे राघव! यह मेरा समुन्नत तप और शाश्वत ब्रह्मलोक है। श्रेय की अभिलाषा से आप इसे मुझसे ग्रहण करें।"

🙏 तपोफल का अर्पण और राम का अस्वीकार (श्लोक ७-१२)

॥ श्लोक ७-९ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण शरभङ्गो महातपाः ।
उवाच वाक्यं धर्मज्ञो रामं सत्यपराक्रमम् ॥
अहमेव तपः प्राप्स्ये ब्रह्मलोकं च शाश्वतम् ।
मा त्वं कृथा मनः क्लेशं गम्यतां ब्रह्मणः सदः ॥
श्रुत्वा तु वचनं तस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।
शरभङ्गो महातेजाः प्रहृष्टवदनोऽब्रवीत् ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार महातपस्वी शरभंग के कहे जाने पर सत्यपराक्रमी राम ने धर्मज्ञ होकर वाक्य कहा: "मैं स्वयं ही तप और शाश्वत ब्रह्मलोक की प्राप्ति करूँगा। आप मन का क्लेश न करें। आप ब्रह्मलोक को प्रस्थान कीजिए।" अक्लिष्टकर्मा राम के उस वचन को सुनकर महातेजस्वी शरभंग प्रसन्न मुख से बोले।
॥ श्लोक १०-१२ ॥
साधु साधु महाबाहो युक्तमाह त्वमात्मना ।
अहमप्यनुगच्छामि यत्र ते वसतिः सदा ॥
इत्युक्त्वा ज्वलनं प्राज्ञः प्रविवेश महातपाः ।
शरभङ्गो ददाहाङ्गं ब्रह्मलोकं जगाम च ॥
तस्य तद्दह्यमानस्य शरीरं भास्करद्युति ।
ज्वालाभिः परितो दीप्तं ददृशुर्वनवासिनः ॥
📖 भावार्थ : "साधु साधु! हे महाबाहो! तुमने आत्मयोग्य वचन कहा। मैं भी उस स्थान को जाता हूँ जहाँ तुम्हारी सदा वासना है।" ऐसा कहकर महातपस्वी प्राज्ञ शरभंग ने अग्नि में प्रवेश किया, अपने शरीर को जला डाला और ब्रह्मलोक को चले गए। उनके जलते हुए शरीर को, जो सूर्य के समान दीप्त था, चारों ओर से ज्वालाओं से प्रदीप्त देख वनवासियों ने देखा।

🛡️ अन्य ऋषियों का आगमन और रक्षा याचना (श्लोक १३-२०)

॥ श्लोक १३-१६ ॥
ततस्ते तापसाः सर्वे समेत्य रघुनन्दनम् ।
ऊचुः परमसन्तुष्टा वाक्यं धर्मार्थसंहितम् ॥
राम राम महाबाहो लोकानां हितकाम्यया ।
इमे वसन्ति दुष्टात्मा राक्षसा मांसभोजनाः ॥
बाधन्ते तपसि स्नातान् ब्राह्मणान् वेदपारगान् ।
तेषां निग्रहमिच्छामो त्वयि शस्त्रभृतां वरे ॥
त्वं हि नः शरणं वीर वनवासान् दिदृक्षया ।
प्राप्तो राजीवपत्राक्ष रक्षसां भयवर्धन ॥
📖 भावार्थ : तब वे सब तपस्वी रघुनन्दन राम के पास आकर एकत्र हुए और अत्यन्त संतुष्ट होकर धर्म एवं अर्थ से युक्त वाक्य बोले: "हे महाबाहो राम! लोकों के हित की कामना से सुनिए। यहाँ दुष्टात्मा मांसभोजी राक्षस रहते हैं। वे तप में स्नान करने वाले, वेदपारगत ब्राह्मणों को सताते हैं। हम उनके निग्रह की इच्छा रखते हैं, क्योंकि आप शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हैं। हे वीर! हमारी रक्षा के लिए आप ही शरण हैं। वनों को देखने की इच्छा से आये हुए कमलनयन आप राक्षसों के भय को बढ़ाने वाले हैं।"
॥ श्लोक १७-२० ॥
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा रामः सत्यपराक्रमः ।
प्रत्युवाच महातेजा ऋषीणां शरणार्थिनाम् ॥
हनिष्ये राक्षसान् सर्वान् युष्माकं भयवर्धनान् ।
अद्यप्रभृति वत्स्यामो दण्डकारण्यमुत्तमम् ॥
अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्तमेव मया पुरा ।
तदेव रक्षितुं यत्नः क्रियतां मुनिपुंगवाः ॥
एवमुक्त्वा महातेजा रामः सत्यपराक्रमः ।
न्यवसद्दण्डकारण्ये ऋषीणां शरणार्थिनाम् ॥
📖 भावार्थ : उन शरण चाहने वाले ऋषियों के वचन सुनकर महातेजा सत्यपराक्रमी राम ने उत्तर दिया: "तुम्हारे भय बढ़ाने वाले सब राक्षसों का मैं वध करूँगा। आज से मैं इस उत्तम दण्डकारण्य में निवास करूँगा। मैंने पहले ही सब प्राणियों को अभयदान दे रखा है; उसी अभय की रक्षा के लिए मैं प्रयत्न करूँगा, हे मुनिश्रेष्ठ!" ऐसा कहकर महातेजा सत्यपराक्रमी राम शरण चाहने वाले ऋषियों के लिए दण्डकारण्य में निवास करने लगे।

🏕️ राम का दण्डकारण्य में निवास और ऋषियों का अभय

॥ श्लोक २१-२८ ॥
ततो रामो धनुष्पाणिः सीतया लक्ष्मणेन च ।
विचचार वने तस्मिन् ऋषीणां शरणार्थिनाम् ॥
स तत्र तापसैः सार्धं कथाश्चक्रे महाबलः ।
आश्रमेषु च सर्वेषु वसन् रामो महायशाः ॥
ततस्ते तापसाः सर्वे रामेण समभिप्लुताः ।
विजहुर्भयमत्यर्थं राक्षसेभ्यो द्विजोत्तमाः ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : तब धनुष धारण किए हुए राम, सीता और लक्ष्मण के साथ, उस वन में शरण चाहने वाले ऋषियों के लिए विचरण करने लगे। वहाँ वे महाबली राम तपस्वियों के साथ कथाएँ करते और सब आश्रमों में निवास करते। तब उन राम से रक्षा पाकर वे सब द्विजश्रेष्ठ तपस्वी राक्षसों के भय से सर्वथा मुक्त हो गए।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार राम ने शरभंग के दर्शन किए, उनके तपोमय त्याग को देखा, और ऋषियों की प्रार्थना पर दण्डकारण्य में रहकर उनकी रक्षा का वचन दिया। यह सर्ग राम के वनवास के उस चरण का आरम्भ है जहाँ वे ऋषियों के संरक्षक बनकर राक्षसों का संहार करेंगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌀 त्याग और वैराग्य का आदर्श

शरभंग ऋषि ब्रह्मलोक के अधिकारी होकर भी राम के दर्शन की प्रतीक्षा करते हैं, जो भक्ति एवं गुरुजनों के प्रति सम्मान को दर्शाता है। राम का दूसरे के तप को अस्वीकार करना स्वावलम्बन और कर्मफल के प्रति उनकी दृढ़ निष्ठा को प्रकट करता है।

🔥 अग्नि-प्रवेश : योगाग्नि में शरीर त्याग

शरभंग का अग्नि-प्रवेश कोई साधारण मृत्यु नहीं, बल्कि महायोगियों की वह सिद्धि है जिसमें वे देह को योगाग्नि में जलाकर ब्रह्मलोक प्राप्त करते हैं। यह भारतीय परम्परा में समाधि और उत्तरकायिक गति का प्रतीक है।

🛡️ ऋषियों की रक्षा का संकल्प

राम ने पूर्व में भी राक्षसों के वध का संकल्प लिया था (बालकाण्ड में विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा)। अब वे उसे दोहराते हैं और ऋषियों को अभयदान देते हैं। यह राम के क्षत्रिय धर्म के प्रति अटल प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

🌄 ब्रह्मलोक और तपःसामर्थ्य

शरभंग द्वारा राम को ब्रह्मलोक अर्पित करने का प्रस्ताव यह सिद्ध करता है कि राम का तेज और पुण्य उनसे भी अधिक है। राम का इसे अस्वीकार करना उनकी सर्वोच्च स्थिति को भी प्रकट करता है कि वे किसी से भी कम नहीं हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि मनुष्य को अपने कर्मों पर विश्वास रखना चाहिए और दूसरों के परिश्रम के फल को हथियाने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। राम ने शरभंग के प्रस्ताव को विनयपूर्वक अस्वीकार किया और अपने बल पर सब कुछ प्राप्त करने का मार्ग चुना। साथ ही, जो संत एवं सज्जन पीड़ित हैं, उनकी रक्षा करना हर वीर का कर्तव्य है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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