अरण्य काण्ड अध्याय 46

सीता की सुंदरता की रावण द्वारा प्रशंसा

रावण सीता को अपनी लंका ले जाकर उनकी सुन्दरता की प्रशंसा करता है और उन्हें अपनी रानी बनने का प्रस्ताव देता है। वह अपने ऐश्वर्य, धन-सम्पत्ति और भोग-विलास का वर्णन करता है, परन्तु सीता उसे धिक्कारती हैं और राम के प्रति अपनी अटल निष्ठा प्रकट करती हैं।

विवरण

रावण द्वारा सीता का हरण कर लंका ले जाने के पश्चात्, वह उन्हें अशोक वाटिका में रखता है। वहाँ वह सीता के पास आता है और उनके रूप-सौन्दर्य की मुक्त कंठ से प्रशंसा करता है। रावण कहता है कि वह स्वयं विश्व के प्रतापी राजाओं में से एक है, उसके पास अपार सम्पदा, ऐश्वर्य, और सुख-साधन हैं। वह सीता को अपनी प्रधान महिषी बनाना चाहता है। वह सीता को समझाता है कि वह वन में राम के साथ कष्ट भोगने के योग्य नहीं है, बल्कि उसे राजमहलों में रहना चाहिए। रावण अपने नाना प्रकार के भोग-विलास, उद्यान, वस्त्र, आभूषण आदि का वर्णन करता है। सीता उसकी बात सुनकर अत्यन्त क्रोधित होती हैं और उसे फटकारती हैं। वह रावण की तुलना एक कुत्ते से करती हैं जो घी का भोग लगा हुआ हविष्य (हवन सामग्री) चाटना चाहता है। वह राम की वीरता और उनके प्रति अपने प्रेम का उल्लेख करते हुए रावण को चेतावनी देती हैं कि राम उसका वध करके उसे छुड़ा लेंगे। इस प्रकार सीता अपनी पतिव्रता धर्म का पालन करती हैं और रावण के सभी प्रलोभनों को ठुकरा देती हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ४६

(सीता की सुन्दरता की रावण द्वारा प्रशंसा एवं प्रलोभन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण सीता को हर लंका ले आया है और अशोक वाटिका में रखा है। अब वह स्वयं वहाँ आता है और सीता के रूप-सौन्दर्य पर मोहित होकर उनकी प्रशंसा करता है। वह उन्हें अपनी रानी बनाने का प्रलोभन देता है और अपने ऐश्वर्य का वर्णन करता है। यह सर्ग रावण की कामुकता और सीता के पतिव्रता धर्म के अटल संकल्प का अद्भुत चित्रण प्रस्तुत करता है।

🌺 रावण की सीता से प्रशंसा और प्रलोभन (श्लोक १-१६)

॥ श्लोक १-२ ॥
रावण उवाच –
सीते मम वरारोहे रूपं ते प्रतिभाति मे ।
न त्वद्विधा मया दृष्टा स्त्री रूपवती क्वचित् ॥ १॥
सुकुमारि सुनासे त्वं सुललाटे सुलोचने ।
मुक्ताहारप्रभे चारु सीते सुन्दरि मे शृणु ॥ २॥
🔹 पदच्छेद : रावणः = रावण; उवाच = बोला; सीते = हे सीता; मम = मुझे; वरारोहे = हे उत्तम नितम्ब वाली; रूपम् = सौन्दर्य; ते = तुम्हारा; प्रतिभाति = प्रतीत होता है; मे = मुझे; न = नहीं; त्वद्विधा = तुम्हारे समान; मया = मेरे द्वारा; दृष्टा = देखी गई; स्त्री = स्त्री; रूपवती = सुन्दरी; क्वचित् = कहीं भी; सुकुमारि = हे सुकुमारी; सुनासे = हे सुन्दर नाक वाली; त्वम् = तुम; सुललाटे = हे सुन्दर ललाट वाली; सुलोचने = हे सुन्दर नेत्रों वाली; मुक्ताहारप्रभे = मोतियों के हार की सी आभा वाली; चारु = मनोहर; सीते = हे सीता; सुन्दरि = हे सुन्दरी; मे = मेरी; शृणु = सुनो।
📖 भावार्थ : रावण बोला – हे सीता! हे उत्तम नितम्बों वाली! तुम्हारा रूप मुझे अत्यन्त मनोहर प्रतीत होता है। तुम्हारे समान सुन्दर स्त्री मैंने कहीं नहीं देखी। हे सुकुमारी, हे सुन्दर नासिका वाली, हे सुन्दर ललाट वाली, हे सुन्दर नेत्रों वाली, हे मोतियों के हार की सी आभा वाली मनोहर सीते! हे सुन्दरी! मेरी बात सुनो।
🔍 व्याख्या : रावण सीता के रूप पर मुग्ध होकर उनके शारीरिक सौन्दर्य के विभिन्न अंगों का वर्णन करता है। वह उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उनकी चापलूसी कर रहा है।
॥ श्लोक ३-४ ॥
मम लङ्का पुरी रम्या सर्वतो रत्नमण्डिता ।
स्वर्गस्यापि च कैलासादपि श्रेष्ठा मता मम ॥ ३॥
तत्र त्वं भोगान् भोक्ष्यसे बहून् रत्नानि चैव ह ।
मम भार्या भव सीते त्यक्त्वा रामं वनाश्रितम् ॥ ४॥
🔹 पदच्छेद : मम = मेरी; लङ्का = लंका नामक; पुरी = नगरी; रम्या = सुन्दर; सर्वतः = सब ओर से; रत्नमण्डिता = रत्नों से सुसज्जित; स्वर्गस्यापि = स्वर्ग से भी; च = और; कैलासात् = कैलास पर्वत से भी; अपि = भी; श्रेष्ठा = श्रेष्ठ; मता = मानी गई; मम = मेरे द्वारा; तत्र = वहाँ; त्वम् = तुम; भोगान् = भोगों को; भोक्ष्यसे = भोगोगी; बहून् = अनेक; रत्नानि = रत्नों को; च = और; एव = ही; ह = निश्चय; मम = मेरी; भार्या = पत्नी; भव = हो जाओ; सीते = हे सीता; त्यक्त्वा = त्यागकर; रामम् = राम को; वनाश्रितम् = वनाश्रित को।
📖 भावार्थ : मेरी लंका नगरी अत्यन्त रमणीय है और सब ओर रत्नों से सुसज्जित है। वह मेरी दृष्टि में स्वर्ग और कैलास से भी श्रेष्ठ है। हे सीते! वहाँ तुम अनेक भोगों और रत्नों को भोगोगी। अतः वन में रहने वाले राम को त्यागकर मेरी पत्नी बन जाओ।
🔍 व्याख्या : रावण सीता को अपनी सम्पदा का लोभ देता है। वह लंका को स्वर्ग से भी बढ़कर बताता है ताकि सीता उसके प्रस्ताव को स्वीकार कर लें।

🛡️ सीता द्वारा रावण को फटकार (श्लोक १७-३२)

॥ श्लोक १७-१८ ॥
सीतोवाच –
किं त्वं रावण मामेवं ब्रवीषि वचनाद् बहु ।
शुनः खादितुकामस्य हविर्लिप्तं यथा घृतम् ॥ १७॥
नाहं त्यक्तुं समर्था तु रामं राजीवलोचनम् ।
इन्द्रादपि च देवाच्च सर्वलोकेश्वराद् ध्रुवम् ॥ १८॥
🔹 पदच्छेद : सीता = सीता; उवाच = बोली; किम् = क्यों; त्वम् = तुम; रावण = हे रावण; माम् = मुझसे; एवम् = इस प्रकार; ब्रवीषि = कह रहे हो; वचनात् = वचनों से; बहु = बहुत; शुनः = कुत्ते के; खादितुकामस्य = खाने की इच्छा वाले; हविर्लिप्तम् = हवि से लिप्त; यथा = जैसे; घृतम् = घी; न = नहीं; अहम् = मैं; त्यक्तुम् = त्यागने में; समर्था = समर्थ; तु = तो; रामम् = राम को; राजीवलोचनम् = कमल नेत्र वाले; इन्द्रात् = इन्द्र से भी; अपि = भी; च = और; देवात् = देवता से; च = भी; सर्वलोकेश्वरात् = सब लोकों के ईश्वर से; ध्रुवम् = निश्चय ही।
📖 भावार्थ : सीता बोलीं – हे रावण! तुम मुझसे ऐसी बातें क्यों कर रहे हो? यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई कुत्ता घी से सने हवि पदार्थ (हवन सामग्री) को खाना चाहता है। मैं कमल नेत्र वाले राम को त्यागने में कदापि समर्थ नहीं हूँ, चाहे वह इन्द्र, देवता या सभी लोकों का स्वामी ही क्यों न हो।
🔍 व्याख्या : सीता रावण को एक कुत्ते के समान नीच बताती हैं जो यज्ञ के घी से सने हुए हविष्य को चाटना चाहता है – अर्थात् वह राम की पत्नी पर बुरी दृष्टि डालकर अपने विनाश को निमंत्रण दे रहा है। वह स्पष्ट करती हैं कि राम उनके लिए सर्वोपरि हैं।
॥ श्लोक १९-२० ॥
रामेण हि मया सार्धं वनवासो महात्मना ।
नूनं त्वां स शरैस्तीक्ष्णैः पातयिष्यति राक्षसम् ॥ १९॥
न मे त्वत्तो भयं रावण रामादन्यत्र जायते ।
रामः प्राणैः प्रियतरो मम प्राणैरपि ध्रुवम् ॥ २०॥
🔹 पदच्छेद : रामेण = राम के साथ; हि = ही; मया = मेरे द्वारा; सार्धम् = सहित; वनवासः = वनवास; महात्मना = महात्मा के साथ; नूनम् = निश्चय ही; त्वाम् = तुमको; सः = वह; शरैः = बाणों से; तीक्ष्णैः = तीक्ष्ण; पातयिष्यति = गिरा देगा; राक्षसम् = राक्षस को; न = नहीं; मे = मुझे; त्वत्तः = तुमसे; भयम् = भय; रावण = हे रावण; रामात् = राम के अतिरिक्त; अन्यत्र = और कहीं से; जायते = उत्पन्न होता है; रामः = राम; प्राणैः = प्राणों से; प्रियतरः = अधिक प्रिय; मम = मेरे; प्राणैः = प्राणों से; अपि = भी; ध्रुवम् = निश्चय ही।
📖 भावार्थ : मैं महात्मा राम के साथ वनवास कर रही हूँ। वे निश्चय ही अपने तीक्ष्ण बाणों से तुम राक्षस को गिरा देंगे। हे रावण! मुझे तुमसे कोई भय नहीं है, भय तो केवल राम से (राम के वियोग का) है। राम मेरे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं।
🔍 व्याख्या : सीता रावण को चेतावनी देती हैं कि राम उसका वध करेंगे। वह निडर है क्योंकि उसे राम पर पूर्ण विश्वास है। साथ ही वह राम के प्रति अपने प्रेम को प्रकट करती हैं।

📜 सर्ग का समापन

॥ श्लोक ३२ ॥
इत्युक्त्वा रावणं सीता शापं दातुमनाः शुभा ।
तूष्णीमासीद् भृशं क्रुद्धा दहन्तीव च चक्षुषा ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार सीता ने रावण से कहा और अत्यन्त क्रोधित होकर उसे शाप देने के मानस से, मानो आँखों से जलाती हुई, चुप हो गईं।
🔍 व्याख्या : सीता का मौन उनके अत्यधिक क्रोध और रावण के प्रति घृणा को दर्शाता है। वह एक पतिव्रता स्त्री के सम्मान की रक्षा करती हैं।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 रावण का अहंकार और कामुकता

रावण अपनी सम्पदा और ऐश्वर्य पर इतना मोहित है कि वह सीता को भी भोग्या समझ बैठता है। उसे यह अहसास नहीं कि सीता का पातिव्रत्य धर्म किसी भी प्रलोभन से परे है।

🔥 सीता का पातिव्रत्य बल

सीता का रावण को फटकारना और राम के प्रति अडिग निष्ठा भारतीय नारी के आदर्श का प्रतीक है। वह राम को ही अपना सब कुछ मानती हैं और उनके अतिरिक्त किसी को स्वीकार नहीं करतीं।

⚡ राम के प्रति अटूट विश्वास

सीता को पूरा विश्वास है कि राम उन्हें अवश्य बचाएंगे। यह विश्वास ही उन्हें रावण के भय से मुक्त रखता है और वह निडर होकर उसका सामना करती हैं।

🕉️ धर्म की विजय

यह सर्ग दर्शाता है कि धर्म और सतीत्व की शक्ति किसी भी भौतिक ऐश्वर्य से परे होती है। सीता का अडिग संकल्प अंततः रावण के विनाश का कारण बनता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची निष्ठा और धर्म के बल पर कोई भी प्रलोभन और भय व्यर्थ हो जाते हैं। स्त्री-पुरुष को चाहिए कि वे अपने धर्म पर अटल रहें और किसी भी परिस्थिति में सद्मार्ग न छोड़ें।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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