अरण्य काण्ड अध्याय 43

स्वर्णमृग का प्रलोभन

रावण की प्रेरणा से मारीच सोने के मृग का रूप धारण कर राम के आश्रम के समीप आता है। उस मोहक मृग को देखकर सीता मोहित हो जाती हैं और राम से उसे पकड़ने या मारने का आग्रह करती हैं। राम मृग के पीछे जाते हैं, और मारीच राम के बाण से घायल होकर राम की आवाज़ की नकल कर हा लक्ष्मण पुकारता है, जिससे सीता भयभीत होकर लक्ष्मण को राम के पास भेज देती हैं। यह घटना रावण के लिए सीता हरण का अवसर तैयार करती है।

विवरण

यह अरण्यकाण्ड का अत्यन्त महत्वपूर्ण सर्ग है, जो सीता-हरण की भूमिका तैयार करता है। रावण ने मारीच को समझा-बुझाकर स्वर्णमृग बनने के लिए राजी किया। मारीच, यद्यपि राम के बाण के भय से काँप रहा था, रावण के आग्रह और अपने भाग्य को देखते हुए तैयार हो गया। वह एक अद्भुत सुनहरे मृग का रूप धारण करता है, जिसका शरीर रत्नों से जड़ित, सींग मणियों के समान, और त्वचा स्वर्णिम आभा लिए हुए थी। वह राम के आश्रम के समीप विचरने लगा। सीता उस अलौकिक मृग को देखकर मोहित हो गईं। उसका सौन्दर्य अवर्णनीय था – मानो चित्र में उकेरा गया हो। सीता ने राम से उस मृग को जीवित पकड़ने या मारकर उसकी सुनहरी खाल लाने का आग्रह किया। राम ने उनके प्रेम और उत्सुकता को देखते हुए मृग का पीछा करने का निश्चय किया। लक्ष्मण को सीता की रक्षा का आदेश देकर राम मृग के पीछे चल दिए। राम ने दूर तक उसका पीछा किया, और अन्त में उस पर बाण चला दिया। मारीच मायामृग राम के बाण से घायल होकर गिर पड़ा। मरते समय वह राम की आवाज़ की नकल करके हा लक्ष्मण! हा सीते! जैसी चीत्कार करने लगा। यह सुनकर सीता अत्यन्त व्याकुल हो गईं और उन्होंने लक्ष्मण से राम की सहायता के लिए जाने का आग्रह किया। लक्ष्मण ने राम के आदेश का हवाला देते हुए जाने से मना किया, किन्तु सीता के कठोर वचन और आरोपों से विवश होकर अन्ततः वे राम की खोज में चले गए। इस प्रकार यह सर्ग उस नाटकीय घटना का वर्णन करता है जिसने सीता के एकाकीपन और रावण के आगमन का मार्ग प्रशस्त किया।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ४३

(स्वर्णमृग का प्रलोभन – मारीच की माया)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण के आदेश से मारीच ने एक अद्भुत सुनहरे मृग का रूप धारण किया। उस मृग की सुन्दरता पर मोहित होकर सीता ने राम से उसे पाने की इच्छा प्रकट की। यह सर्ग उस इच्छा और उसके परिणामस्वरूप घटित घटनाओं का वर्णन करता है, जो अन्ततः सीता-हरण का कारण बनीं।

🦌 स्वर्णमृग का आगमन और सीता का मोह (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः प्रववृते घोरो मायामृग इवापरः ।
रूप्याभरणसंकाशः सर्वलक्षणलक्षितः ॥
स च रामाश्रमाभ्याशे विचचार मृगोत्तमः ।
ददर्श सीता तं मृगं रम्यं चित्रविभूषितम् ॥
तस्य रूप्यमयं चर्म सर्वं रत्नविभूषितम् ।
ताम्राक्षं काञ्चनप्रख्यं ददर्श सीता मृगं वने ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रववृते = प्रकट हुआ; घोरः = भयंकर; मायामृगः = माया का मृग; इव = समान; अपरः = दूसरा; रूप्याभरणसंकाशः = चाँदी के आभूषणों के समान चमकीला; सर्वलक्षणलक्षितः = सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त; सः = वह; च = और; रामाश्रमाभ्याशे = राम के आश्रम के समीप; विचचार = विचरण करने लगा; मृगोत्तमः = श्रेष्ठ मृग; ददर्श = देखा; सीता = सीता ने; तम् = उस; मृगम् = मृग को; रम्यम् = रमणीय; चित्रविभूषितम् = अनेक आभूषणों से विभूषित; तस्य = उसका; रूप्यमयम् = चाँदी का; चर्म = चमड़ा; सर्वम् = सारा; रत्नविभूषितम् = रत्नों से विभूषित; ताम्राक्षम् = ताम्र (लाल) नेत्रों वाला; काञ्चनप्रख्यम् = सोने के समान प्रकाश वाला; ददर्श = देखा; सीता = सीता ने; मृगम् = मृग को; वने = वन में।
📖 भावार्थ : तब वहाँ एक भयंकर मायावी मृग प्रकट हुआ, जो मानो दूसरा स्वर्णमृग ही था। वह चाँदी के आभूषणों के समान चमकीला था और सब लक्षणों से युक्त था। वह श्रेष्ठ मृग राम के आश्रम के समीप विचरण करने लगा। सीता ने उस रमणीय, चित्र-विचित्र आभूषणों से सजे हुए मृग को देखा। उसका शरीर चाँदी के समान (या स्वर्णमय) था, सब ओर रत्न विभूषित थे, आँखें लाल थीं और कान्ति सोने के समान थी – ऐसे उस मृग को सीता ने वन में देखा।
🔍 व्याख्या : मारीच ने अत्यन्त मोहक रूप धारण किया, जिसकी सुन्दरता पर सीता सहज ही मोहित हो गईं। यह मोह ही आगे की विपदा की जड़ बना।
॥ श्लोक ४-६ ॥
तं दृष्ट्वा सीता त्वरिता राममेवाभ्यचोदयत् ।
एष राजति राजेन्द्र मृगो दिव्यो वनौकसाम् ॥
हन्तुं जीवग्रहे वापि यतस्व सुमहद्वनम् ।
चर्म चास्य महार्हं स्याद्विस्मयो मे परो भवेत् ॥
📖 भावार्थ : उसे देखकर सीता ने शीघ्रता से राम से आग्रह किया: "हे राजेन्द्र! यह दिव्य मृग वनवासियों (हमारे) के लिए शोभायमान हो रहा है। आप इस विशाल वन में इस मृग को मारने या जीवित पकड़ने का प्रयास करें। इसका चमड़ा अत्यन्त मूल्यवान होगा और मुझे इससे बड़ा आश्चर्य (और आनन्द) होगा।"

🏹 राम का प्रयाण और मारीच का वध (श्लोक १३-२२)

॥ श्लोक १३-१५ ॥
रामस्तु वचनं श्रुत्वा सीतायाः प्रियकाम्यया ।
मृगं तं प्रेषयामास लक्ष्मणं रक्ष सीतया ॥
धनुर्गृहीत्वा खड्गं च रामो धन्वी महायशाः ।
जगाम मृगमन्विच्छन् शरैः संनतपर्वभिः ॥
तं दृष्ट्वा दूरतो रामो विस्फार्य बलवद्धनुः ।
अविध्यद्वै शरेणाजौ मृगं तं राक्षसं वने ॥
📖 भावार्थ : राम ने सीता के प्रिय की इच्छा से उनका वचन सुनकर लक्ष्मण से कहा, "तुम सीता की रक्षा करो।" फिर स्वयं धनुष और खड्ग लेकर महायशस्वी राम उस मृग की खोज में गए। दूर से ही राम ने उस मृग (राक्षस) को देखकर अपने बलशाली धनुष को चढ़ाकर वन में उस पर बाण चला दिया।
॥ श्लोक २०-२२ ॥
स रामबाणाभिहतो मारीचो युद्धदुर्मदः ।
विनद्य सुमहानादं जगाम धरणीतलम् ॥
स वै रामस्वरं कृत्वा सीताव्यसनकर्शितः ।
हा लक्ष्मणेति हे सीते इति चोच्चै रुराव ह ॥
📖 भावार्थ : राम के बाण से मारा गया वह युद्धदुर्मद मारीच, अत्यन्त भयंकर चीत्कार करते हुए धरती पर गिर पड़ा। फिर उसने राम की आवाज़ की नकल की और सीता के कारण हुए इस संकट में (मरते समय) ऊँचे स्वर में हे लक्ष्मण! हे सीते! इस प्रकार चिल्लाया।
🔍 व्याख्या : मारीच ने राम का स्वर बना कर पुकारा, जिससे सीता को लगा कि राम संकट में हैं। यह माया का अन्तिम चरण था।

😢 सीता का आग्रह और लक्ष्मण का प्रस्थान (श्लोक २३-३४)

॥ श्लोक २३-२६ ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सीता वैदेही त्वरा ।
लक्ष्मणं प्रेषयामास रामस्यानयने तदा ॥
लक्ष्मणस्तु निशम्यैतत्सीताया वचनं तदा ।
नैष युक्त इति प्राह रामस्यादेशमालवन् ॥
सीता तु रुदती वाक्यं लक्ष्मणं प्रत्यभाषत ।
अनुक्त्वा गच्छ सौमित्रे किं मां परिभविष्यसि ॥
एवमुक्तस्तु सीतया लक्ष्मणो भ्रातृवत्सलः ।
जगाम सहसा तत्र यत्र रामो महाबलः ॥
📖 भावार्थ : मारीच की वह पुकार सुनकर सीता अत्यन्त व्याकुल हो गईं और उन्होंने लक्ष्मण को राम के पास जाने के लिए कहा। लक्ष्मण ने यह सुनकर कहा, "यह उचित नहीं है, मैं राम के आदेश का पालन करूँगा (तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगा)।" तब सीता रोते हुए बोलीं, "हे सौमित्रे! बिना कुछ कहे चले जाओ, क्या तुम मेरा अपमान करोगे?" सीता के इस प्रकार कहने पर भ्रातृवत्सल लक्ष्मण शीघ्र ही उस स्थान पर गए जहाँ महाबली राम थे।
॥ श्लोक ३४ ॥
तस्मिन्प्रस्थितमात्रे तु राक्षसो रावणस्तदा ।
विज्ञाय वैकृतं काले जगामाश्रममन्तिकात् ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण के जाते ही राक्षस रावण ने उचित अवसर जानकर उस आश्रम के पास प्रवेश किया। इस प्रकार आर्ष (महर्षि वाल्मीकि प्रणीत) श्रीमद्रामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में तैंतालीसवाँ सर्ग पूर्ण होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🎭 माया और मोह

यह सर्ग माया (भ्रम) और मोह के प्रभाव को दर्शाता है। मारीच का मायावी रूप सीता के मन में मोह उत्पन्न करता है, जिससे वह विवेक खो बैठती हैं। यह मानवीय दुर्बलता का प्रतीक है।

⚖️ कर्तव्य और भावना का द्वन्द्व

लक्ष्मण के समक्ष कर्तव्य (राम की आज्ञा का पालन) और सीता की व्याकुल भावनाओं का द्वन्द्व है। अन्ततः भावना के आगे कर्तव्य झुकता है, जो आगे चलकर विपदा का कारण बनता है।

🔊 नकली आवाज़ का भ्रम

मारीच की नकली पुकार ने सीता को भ्रमित किया। यह दर्शाता है कि शत्रु किस प्रकार माया और छल का प्रयोग करता है। राम की आवाज़ सुनकर सीता ने उसे सत्य मान लिया, जो उनके मोह का ही परिणाम था।

🚪सीता-हरण की भूमिका

यह सर्ग सीता-हरण की घटना की पृष्ठभूमि तैयार करता है। जैसे ही लक्ष्मण आश्रम से दूर जाते हैं, रावण के आगमन का मार्ग खुल जाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि मोह और इच्छा से सावधान रहना चाहिए। सीता के मन में एक सुनहरे मृग को पाने की इच्छा ने उनके विवेक को आच्छादित कर दिया और इसका परिणाम भयंकर विपत्ति के रूप में सामने आया। साथ ही, परिस्थितियों के दबाव में कर्तव्यच्युत नहीं होना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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