विराध का शाप और वध

अरण्यकाण्ड के चौथे सर्ग में राम-सीता-लक्ष्मण का दण्डकारण्य में भ्रमण, राक्षस विराध द्वारा सीता का हरण, राम-लक्ष्मण का उससे युद्ध, विराध के वध का प्रयास, अन्ततः उसे गड्ढे में दफनाकर वध, और मरते समय विराध द्वारा अपनी गंधर्व-कथा बताकर राम को शरभंग ऋषि के आश्रम जाने का सुझाव देना वर्णित है।

विवरण

दण्डकारण्य में प्रवेश के बाद राम, सीता और लक्ष्मण विभिन्न ऋषियों के आश्रमों में जाते हुए घोर वन में भ्रमण कर रहे थे। एक दिन वे एक भयंकर राक्षस के समीप पहुँचे, जिसका नाम विराध था। वह विशालकाय, विकराल, सिंह के समान बलशाली और अत्यन्त क्रूर था। उसने सीता को देखते ही उनपर मोहित होकर उन्हें उठा लिया और अपनी गोद में बैठाकर भागने लगा। राम और लक्ष्मण ने उसे रोका और उससे युद्ध किया। परन्तु विराध को कोई भी शस्त्र-अस्त्र नहीं लगते थे, वह अभेद्य था। तब विराध ने राम से कहा कि उसे मारना असम्भव है, उसने ब्रह्माजी से वरदान पाया है कि वह शस्त्रों से नहीं मर सकता। राम ने यह सुनकर गड्ढा खोदकर उसे दफनाने की योजना बनाई। लक्ष्मण ने तुरन्त गड्ढा खोदा और दोनों ने मिलकर विराध को उसमें धकेल दिया। जब विराध गड्ढे में दब गया तो उसे मृत्यु का भय हुआ और वह राम से बोला कि मैं वास्तव में तुम्बुरु नामक गंधर्व हूँ, जिसे कुबेर ने श्राप देकर राक्षस बना दिया था। तुमने मुझे इस श्राप से मुक्त किया है। अब मैं अपने लोक को जाता हूँ। मैं तुम्हें सुझाव देता हूँ कि तुम शरभंग ऋषि के आश्रम जाओ, वे तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे। इतना कहकर विराध ने अपना राक्षसी शरीर त्याग दिया और दिव्य गंधर्व रूप धारण कर आकाश में चला गया। तब राम, सीता और लक्ष्मण शरभंग के आश्रम की ओर चल पड़े।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ४

(विराध का शाप और वध – विराध-वध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुर्थः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : दण्डकारण्य में प्रवेश के बाद राम, सीता और लक्ष्मण विभिन्न ऋषियों के आश्रमों में जाते हुए घोर वन में भ्रमण कर रहे थे। एक दिन उनका सामना एक भयंकर राक्षस से हुआ – विराध। यह सर्ग उस भेंट, सीता-हरण, युद्ध और अन्ततः विराध के वध की अद्भुत कथा कहता है, जिसमें राम की शक्ति और करुणा दोनों दिखती हैं।

👹 विराध का आक्रमण और सीता-हरण (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः प्रविश्य तं देशं दण्डकारण्यमव्ययम् ।
ददर्श रामो धर्मात्मा विराधं नाम राक्षसम् ॥
महाकायं महावीर्यं महाबलपराक्रमम् ।
विक्षिपन्तं महानादं सिंहं गिरिगुहाशयम् ॥
स तु तान् दूरतो दृष्ट्वा रामलक्ष्मणसीतया ।
अभ्यधावत संक्रुद्धो यथा राहुः शशिप्रभम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रविश्य = प्रवेश करके; तम् = उस; देशम् = देश में; दण्डकारण्यम् = दण्डकारण्य; अव्ययम् = अविनाशी; ददर्श = देखा; रामः = राम; धर्मात्मा = धर्मात्मा; विराधम् = विराध; नाम = नाम; राक्षसम् = राक्षस; महाकायम् = विशाल शरीर वाला; महावीर्यम् = महान पराक्रमी; महाबलपराक्रमम् = महान बल एवं पराक्रम से युक्त; विक्षिपन्तम् = विचरते हुए; महानादम् = महानाद करते हुए; सिंहम् = सिंह; गिरिगुहाशयम् = पर्वत की गुफा में रहने वाला; सः = वह; तु = तो; तान् = उन्हें; दूरतः = दूर से; दृष्ट्वा = देखकर; रामलक्ष्मणसीतया = राम, लक्ष्मण और सीता को; अभ्यधावत = दौड़ा; संक्रुद्धः = अत्यन्त क्रोधित होकर; यथा = जैसे; राहुः = राहु; शशिप्रभम् = चन्द्रमा को।
📖 भावार्थ : उस अविनाशी दण्डकारण्य में प्रवेश करके धर्मात्मा राम ने विराध नामक राक्षस को देखा। वह विशालकाय, महापराक्रमी, महाबली था, और पर्वत की गुफा में रहने वाले सिंह की तरह भयंकर नाद करता हुआ विचर रहा था। उसने दूर से ही राम, लक्ष्मण और सीता को देखकर क्रोध में भरकर उन पर धावा बोल दिया, जैसे राहु चन्द्रमा पर आक्रमण करता है।
🔍 व्याख्या : राक्षस का सीता की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक था, क्योंकि सीता अद्वितीय सुन्दरी थीं। यहाँ राहु-चन्द्रोपमान से विराध के आक्रमण की भीषणता बताई गई है।
॥ श्लोक ४-६ ॥
स तु सीतामथालक्ष्य रामपत्नीं यशस्विनीम् ।
जग्राह विपुलां श्यामां मैथिलीं जनकात्मजाम् ॥
गृहीत्वा तु ततः सीतां विराधः क्रूरदर्शनः ।
उवाच रामं सौमित्रिं युवां गच्छतमञ्जसा ॥
इयं मे भार्या भविता युवयोः किं धनुष्मतोः ।
न हि शक्तौ मम क्रुद्धस्य युद्धे प्राणैर्विमोक्तुम् ॥
📖 भावार्थ : उस क्रूरदर्शी विराध ने यशस्विनी रामपत्नी मैथिली सीता को देखकर उन्हें पकड़ लिया। फिर सीता को गोद में लेकर उसने राम और लक्ष्मण से कहा: "तुम दोनों तुरन्त यहाँ से चले जाओ। यह मेरी पत्नी होगी। तुम धनुर्धारी होकर भी क्या कर सकते हो? मेरे क्रोधित होने पर तुम मुझसे युद्ध में अपने प्राण नहीं बचा सकते।"
🔍 व्याख्या : विराध ने सीता को पकड़कर राम की परीक्षा ली। वह अपने बल के घमंड में उन्हें तुच्छ समझ रहा था।
॥ श्लोक ७-१० ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रामः सौमित्रिणा सह ।
क्रोधमाहारयद् घोरं प्रदहन्निव राक्षसम् ॥
ततस्तु रामः संक्रुद्धो विराधं वाक्यमब्रवीत् ।
त्यज सीतां दुराचार यावदायुः प्रवर्तते ॥
एवमुक्त्वा धनुष्पाणिः शरानादाय वीर्यवान् ।
जघान राक्षसं रामो वज्रेणेन्द्रो यथा गिरिम् ॥
स तु बाणैः समासाद्य विराधो न व्यकम्पत ।
तदद्भुतमपश्यन्तौ रामलक्ष्मण सीतया ॥
📖 भावार्थ : उसकी बात सुनकर राम ने लक्ष्मण के साथ घोर क्रोध धारण किया, मानो उस राक्षस को जलाना चाहते हों। तब क्रोधित राम ने विराध से कहा: "हे दुराचारी! जब तक तेरा जीवन है, सीता को छोड़ दे।" ऐसा कहकर वीरवर राम ने धनुष उठाया और बाण लेकर उस राक्षस पर प्रहार किया, जैसे इन्द्र वज्र से पर्वत पर आघात करता है। परन्तु वे बाण विराध को लगने पर भी वह जरा भी नहीं काँपा। राम, लक्ष्मण और सीता ने यह अद्भुत दृश्य देखा।
🔍 व्याख्या : विराध को ब्रह्माजी से वरदान था कि वह शस्त्रों से नहीं मरेगा, इसलिए बाण व्यर्थ गए।

🕳️ विराध का वध – गड्ढे में दफनाना (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१३ ॥
ततो रामो महातेजा लक्ष्मणं प्रत्यभाषत ।
एष दुष्टः कृतघ्नश्च राक्षसो हन्तुमर्हति ॥
शस्त्रैरेष न शक्यो हि ब्रह्मदत्तवरो यतः ।
तस्मात् प्रविश्य भूमिं वै गर्तेऽस्मिन् विनिपात्यताम् ॥
इत्युक्त्वा खननं कृत्वा लक्ष्मणेन महात्मना ।
अवपात्य ततो रामो विराधं वाक्यमब्रवीत् ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम ने लक्ष्मण से कहा: "यह दुष्ट, कृतघ्न राक्षस मारे जाने योग्य है। ब्रह्मदत्त वर के कारण यह शस्त्रों से नहीं मर सकता। इसलिए इसे गड्ढे में डालकर भूमि में दफना देना चाहिए।" ऐसा कहकर उन्होंने लक्ष्मण से गड्ढा खुदवाया और उसमें विराध को गिराकर राम ने कहा।
॥ श्लोक १४-१७ ॥
निपात्य गर्ते तं रक्षो बहुमान्य महाबलम् ।
अथैनमब्रवीद्रामः सीताप्रियहिते रतः ॥
अद्य त्वां पातयिष्यावो गर्तेऽस्मिन् राक्षसाधम ।
यथा नोद्धरणं भूयः कर्तुमर्हसि संयुगे ॥
इत्युक्त्वा तौ महात्मानौ बाहुभ्यां परिरभ्य तम् ।
पातयामासतुर्गर्ते विराधं रामलक्ष्मणौ ॥
स तु गर्ते निपतितो विराधो राक्षसाधमः ।
ननाद बलवान् नादं वेपमानो मुहुर्मुहुः ॥
📖 भावार्थ : उस महाबली राक्षस को गड्ढे में गिराकर सीता के हित में लगे राम ने कहा: "हे अधम राक्षस! आज हम तुझे इस गड्ढे में डालते हैं, जिससे तू फिर युद्ध में उठ न सके।" ऐसा कहकर उन दोनों महात्माओं ने, राम और लक्ष्मण ने, बाहुपाश में जकड़कर विराध को गड्ढे में गिरा दिया। गड्ढे में गिरकर वह अधम राक्षस बार-बार काँपता हुआ जोर से चिल्लाया।
🔍 व्याख्या : राम की युक्ति से विराध का वरदान निष्फल हो गया। उसे शस्त्रों से न मरने का वर था, पर भूमि में दबने से वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।
॥ श्लोक १८-२० ॥
ततः स भग्नमन्युस्तु विराधो राममब्रवीत् ।
त्वया ह्यहं महाबाहो निहतः पूर्वकल्पितः ॥
न त्वं मानुषमत्याश्रित्य रूपं राजीवलोचन ।
जानामि त्वां सुरश्रेष्ठं विष्णुं सत्यपराक्रमम् ॥
स त्वं वै शरभंगस्याश्रमं गच्छस्व राघव ।
मोक्ष्यसे तत्र राम त्वं राजर्षेः स महात्मनः ॥
📖 भावार्थ : तब विराध का क्रोध शान्त हो गया और वह राम से बोला: "हे महाबाहो! तुमने मेरा पूर्वकल्पित वध किया है। हे कमलनयन! तुम मनुष्य रूप धारण करने वाले सुरश्रेष्ठ, सत्यपराक्रमी विष्णु हो, यह मैं जानता हूँ। हे राघव! तुम शरभंग ऋषि के आश्रम जाओ। वहाँ तुम उस महात्मा राजर्षि से मिलोगे और मुक्त होओगे।"
🔍 व्याख्या : मृत्यु के समय विराध को राम की दिव्यता का बोध हुआ। उसने उन्हें विष्णु माना और आगे के मार्ग का निर्देश दिया।

🎵 विराध की कथा – तुम्बुरु गंधर्व का शाप और मोक्ष (श्लोक २१-२७)

॥ श्लोक २१-२३ ॥
अहं तु तुम्बुरुर्नाम गन्धर्वः कामरूपधृक् ।
रूपयौवनमत्तस्तु ब्रह्मशापमवाप्तवान् ॥
कुबेरेणास्मि शप्तस्तु राक्षसत्वमुपागतः ।
प्रसादितस्तु देवेन कुबेरेण महात्मना ॥
शापस्यान्तमिमं प्राप्तो रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।
गच्छेयं स्थानमिष्टं मे गन्धर्वत्वमनुत्तमम् ॥
📖 भावार्थ : "मैं तुम्बुरु नामक गंधर्व हूँ, जो कामरूप धारण कर सकता हूँ। रूप और यौवन के मद में चूर होकर मैंने ब्रह्मा का शाप पाया था। कुबेर ने मुझे शाप दिया कि तू राक्षस हो जा। बाद में महात्मा कुबेर ने प्रसन्न होकर कहा था कि राम द्वारा तुझे शाप से मुक्ति मिलेगी। वही शापान्त अब अक्लिष्टकर्मा राम से प्राप्त कर मैं अपने इष्ट स्थान, उत्तम गंधर्वत्व को जा रहा हूँ।"
॥ श्लोक २४-२६ ॥
तस्मात्त्वं गच्छ रामाशु शरभंगस्य धीमतः ।
आश्रमं पुण्यकर्माणं सिद्धचारणसेवितम् ॥
स त्वां राजर्षयः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः ।
द्रष्टुमिच्छन्ति धर्मज्ञ तस्मात्त्वं गन्तुमर्हसि ॥
इत्युक्त्वा स महातेजा विराधो राक्षसाधमः ।
ज्योतिर्भूतः खमुत्पत्य दिव्यं स्थानमवाप्तवान् ॥
📖 भावार्थ : "इसलिए हे राम! तुम शीघ्र ही धीमान् शरभंग के पुण्य आश्रम में जाओ, जो सिद्धों और चारणों से सेवित है। हे धर्मज्ञ! वहाँ सब राजर्षि, सिद्ध और परमर्षि तुम्हें देखना चाहते हैं, इसलिए तुम्हें वहाँ जाना चाहिए।" ऐसा कहकर वह महातेजा राक्षसों में अधम विराध ज्योतिर्मय होकर आकाश में उठ गया और दिव्य स्थान को प्राप्त हुआ।
🔍 व्याख्या : विराध को राम के सान्निध्य से मुक्ति मिली। उसने राम को शरभंग ऋषि के आश्रम जाने की सलाह दी, जहाँ राम को और मुनियों के दर्शन होंगे।
॥ श्लोक २७ ॥
ततो रामो महातेजाः सौमित्रिसहितस्तदा ।
शरभंगाश्रमं गत्वा ददर्श स महामुनिम् ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम लक्ष्मण सहित शरभंग के आश्रम गए और उस महामुनि को देखा।
🔍 व्याख्या : यह श्लोक अगले सर्ग की भूमिका तैयार करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🛡️ राम की युक्ति

राम ने यहाँ बल से नहीं, बुद्धि से विराध को परास्त किया। यह सिखाता है कि जहाँ शस्त्र निष्फल हों, वहाँ उपाय से कार्य सिद्ध करना चाहिए। राम ने वरदान की सीमा को समझा और भूमि में दफनाने की योजना बनाई।

🎭 शाप और मोक्ष

विराध का तुम्बुरु होना दर्शाता है कि राम केवल राक्षसों का संहार ही नहीं, बल्कि शापग्रस्त आत्माओं का उद्धार भी करते हैं। यह राम की करुणा और दिव्यता को उजागर करता है।

🧘 शरभंग का आश्रम

यह सर्ग राम को अगले पड़ाव की ओर ले जाता है – शरभंग आश्रम, जहाँ उनकी भेंट अनेक ऋषियों से होगी और राक्षसों के आतंक की वास्तविकता का पता चलेगा। यह कथा-सूत्र को आगे बढ़ाता है।

🔱 सीता का माहात्म्य

सीता का हरण होने पर भी वे धैर्य नहीं खोतीं। यह घटना आगे सूर्पणखा-प्रसंग और रावण-हरण की पूर्वपीठिका भी है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि संकट में बुद्धि और धैर्य का प्रयोग करना चाहिए। राम ने क्रोध में आकर भी युक्ति नहीं छोड़ी। साथ ही, यह भी शिक्षा मिलती है कि भगवान के स्पर्श से सबसे बड़ा पापी भी मुक्ति पा सकता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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