अरण्य काण्ड अध्याय 35

रावण का मारीच के पास जाना

अरण्यकाण्ड के पैंतीसवें सर्ग में रावण, शूर्पणखा से राम-सीता के विषय में सुनकर, मारीच के आश्रम जाता है। वह मारीच को स्वर्णमृग का रूप धारण कर राम को वन में दूर ले जाने के लिए मनाता है, ताकि वह सीता का हरण कर सके। मारीच राम के पराक्रम से भयभीत होकर पहले मना करता है, परन्तु रावण के क्रोध और दबाव के कारण अन्ततः विवश होकर सहमति दे देता है।

विवरण

शूर्पणखा की बात सुनकर और उसकी नाक-कान कटने का प्रतिशोध लेने की इच्छा से रावण सीता हरण की योजना बनाता है। वह जानता है कि राम अत्यन्त बलशाली हैं, अतः वह सीता को अकेला पाने के लिए छल की आवश्यकता समझता है। इस कार्य के लिए वह अपने पुराने सहयोगी मारीच को चुनता है, जो मायावी राक्षस है और स्वर्णमृग का रूप धारण कर सकता है। रावण रथ पर सवार होकर समुद्र के तट पर स्थित मारीच के आश्रम पहुँचता है। वहाँ मारीच उसका यथोचित सत्कार करता है। रावण अपनी योजना बताता है – मारीच सुनहरे मृग का रूप बनाकर राम की कुटिया के पास विचरे, सीता उसे देखकर लुभाएँ और राम को उसके पीछे भेजें। राम के जाने के बाद लक्ष्मण को भी किसी बहाने से हटाकर वह सीता का हरण कर लेगा। मारीच यह सुनते ही भयभीत हो जाता है। वह राम की वीरता का वर्णन करते हुए रावण को समझाता है कि यह कार्य अत्यन्त खतरनाक है। वह कहता है कि राम ने खर-दूषण सहित चौदह हजार राक्षसों का संहार किया है, और वह स्वयं भी पूर्व में राम के बाण से घायल होकर बचा था। वह रावण को इस दुष्कर्म से विरत होने की सलाह देता है। किन्तु रावण अपने अहंकार और क्रोध में मारीच की बात नहीं सुनता। वह मारीच को धमकी देता है कि यदि उसने सहायता नहीं की तो वह उसे मार डालेगा। मारीच रावण के क्रोध से डरकर और अपनी मृत्यु निश्चित जानकर अन्ततः उसकी बात मान लेता है। वह जानता है कि राम के हाथों मरना श्रेयस्कर होगा, क्योंकि रावण के क्रोध से बचना असम्भव है। इस प्रकार मारीच स्वर्णमृग बनने को तैयार हो जाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग ३५

(रावण का मारीच के पास जाना – मारीच की चेतावनी)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : शूर्पणखा के वृत्तान्त से कुपित होकर रावण सीता के हरण का निश्चय करता है। वह जानता है कि राम अकेले में सीता को छोड़ेंगे नहीं, अतः उसे छल की आवश्यकता है। इसके लिए वह अपने पुराने सहयोगी मायावी राक्षस मारीच के पास जाता है, जो समुद्र तट पर तपस्या कर रहा है। यह सर्ग उसी भेंट और मारीच की विवशता का वर्णन करता है।

🚩 रावण का मारीच के आश्रम में गमन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः शूर्पणखावाक्याच्छ्रुत्वा रामस्य च क्षयम् ।
जगाम रावणो द्रष्टुं मारीचं नाम राक्षसम् ॥
स समुद्रमनुप्राप्य वेलां प्राप्य महाबलः ।
ददर्शाश्रममालोक्य मारीचस्य दुरात्मनः ॥
तमापतन्तं सहसा रावणं राक्षसेश्वरम् ।
दृष्ट्वैव मारीचः प्रत्युत्थायाभ्यवादयत् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; शूर्पणखावाक्यात् = शूर्पणखा के वचनों को; श्रुत्वा = सुनकर; रामस्य = राम का; च = और; क्षयम् = नाश (यहाँ पराक्रम); जगाम = गया; रावणः = रावण; द्रष्टुम् = देखने को; मारीचम् = मारीच को; नाम = नामक; राक्षसम् = राक्षस; सः = वह; समुद्रम् = समुद्र के; अनुप्राप्य = निकट पहुँचकर; वेलाम् = तट को; प्राप्य = पाकर; महाबलः = महाबली; ददर्श = देखा; आश्रमम् = आश्रम; आलोक्य = देखकर; मारीचस्य = मारीच का; दुरात्मनः = दुरात्मा (मारीच) का; तम् = उसे; आपतन्तम् = आते हुए; सहसा = सहसा; रावणम् = रावण को; राक्षसेश्वरम् = राक्षसराज को; दृष्ट्वा = देखकर; एव = ही; मारीचः = मारीच; प्रत्युत्थाय = उठकर; अभ्यवादयत् = अभिवादन किया।
📖 भावार्थ : शूर्पणखा के वचनों को सुनकर और राम के पराक्रम को जानकर रावण मारीच नामक राक्षस से मिलने गया। वह महाबली रावण समुद्र के तट पर पहुँचा और दुरात्मा मारीच के आश्रम को देखा। राक्षसराज रावण को आते देख मारीच तुरन्त उठकर उसका अभिवादन करने लगा।
🔍 व्याख्या : रावण का मारीच के पास जाना दर्शाता है कि वह अपने उद्देश्य के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है। मारीच पूर्व में राम द्वारा पराजित हो चुका था, अतः राम के बल से भयभीत था।

🗣️ रावण द्वारा योजना का प्रस्ताव (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
तमुवाच ततो रावणो मारीचं राक्षसेश्वरः ।
सहायं मम भव वधे रामस्य सह लक्ष्मणः ॥
मृगरूपं विधाय त्वं रामस्याश्रमतः प्रिये ।
सीतायाः प्रियकामार्थं रामं चापहर स्वयम् ॥
अहं तु हरणं सीतायाः करिष्ये विजने वने ।
लक्ष्मणे चापि निर्याते रामे च मृगमायया ॥
📖 भावार्थ : तब राक्षसराज रावण ने मारीच से कहा: "तुम राम और लक्ष्मण के वध में मेरे सहायक बनो। सुनहरे मृग का रूप धारण करके तुम राम के आश्रम के पास जाओ और सीता को प्रिय लगने वाले उस मृग के पीछे राम को दूर ले जाओ। जब राम मृग की माया में फँसकर चले जाएँ और लक्ष्मण भी किसी कारण हट जाएँ, तब मैं एकान्त वन में सीता का हरण कर लूँगा।"
🔍 व्याख्या : रावण की योजना पूर्णतः छल पर आधारित है। वह राम के बल को देखते हुए प्रत्यक्ष युद्ध से बचना चाहता है।

⚠️ मारीच की चेतावनी और राम का यशोगान (श्लोक ११-१८)

॥ श्लोक ११-१८ ॥
मारीचस्तु वचः श्रुत्वा रावणस्य दुरात्मनः ।
प्राञ्जलिः प्राह सव्रीडं रामस्य बलमुद्यतः ॥
न त्वया सह योद्धव्यं रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।
यो हत्वा खरदूषणौ चतुर्दश सहस्रकान् ॥
एक एव महाबाहुः सीतायाः प्रियकाम्यया ।
तं कथं योद्धुमिच्छामि येनाहं पूर्वमर्दितः ॥
रामबाणाभिनिर्दग्धो गतप्राण इव च्युतः ।
मोक्षितश्च तदा तेन हनूमानिति मे मतिः ॥
न चैनं शक्यते जेतुं त्रिदशैरपि संगतैः ।
तथा वीर्यो महातेजा रामः सत्यपराक्रमः ॥
📖 भावार्थ : दुरात्मा रावण के वचन सुनकर मारीच ने हाथ जोड़कर लज्जा सहित राम के बल का वर्णन करते हुए कहा: "हे रावण! अक्लिष्टकर्मा राम से तुम्हें युद्ध नहीं करना चाहिए। जिसने अकेले ही खर-दूषण सहित चौदह हजार राक्षसों का वध कर दिया, वह महाबाहु राम सीता के प्रिय की इच्छा से ऐसा कर सकते हैं। मैं उनसे कैसे युद्ध करना चाहूँ, जिनके द्वारा मैं पूर्व में पीड़ित किया जा चुका हूँ? राम के बाण से झुलसकर मैं मृतप्राय हो गया था और तब हनूमान् द्वारा छुड़ाया गया – ऐसा मेरा मानना है। यह राम तो समस्त देवताओं के द्वारा भी नहीं जीता जा सकता, इतने वीर्य और महातेजा हैं वे सत्यपराक्रमी राम।"
🔍 व्याख्या : मारीच राम के बल से भलीभाँति परिचित है। वह स्वयं किष्किन्धाकाण्ड में राम के हाथों मारा गया था (वानररूप में), और यहाँ वह उस घटना का स्मरण करता है।

😠 रावण का आग्रह और मारीच की स्वीकृति (श्लोक १९-२४)

॥ श्लोक १९-२४ ॥
रावणस्तु वचः श्रुत्वा मारीचस्य भयार्दितः ।
क्रोधसंरक्तनयनो मारीचमिदमब्रवीत् ॥
सखे मारीच यद्यद्य न करिष्यसि मद्वचः ।
अद्य त्वां निहनिष्यामि प्राणैः प्रियतरं यदि ॥
मारीचस्तु भयत्रस्तो रावणस्य दुरात्मनः ।
अवश्यं कार्यमित्याह रावणेन सुदुःखितः ॥
अहं करोमि तत्सर्वं यत्त्वमिच्छसि रावण ।
रामस्यापि भयं नास्ति मृत्युरेव ध्रुवो मम ॥
एवमुक्त्वा मारीचः स रावणेन सह प्रभुः ।
प्रययौ राक्षसेन्द्रस्य वचनात् त्वरितस्तदा ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : रावण ने मारीच के भयभीत वचनों को सुनकर क्रोध से लाल-नेत्र होकर कहा: "हे मारीच सखा! यदि तू मेरी बात नहीं मानेगा तो आज ही मैं तुझे मार डालूँगा, चाहे तू मुझे प्राणों से भी प्रिय क्यों न हो।" मारीच दुरात्मा रावण के भय से काँप उठा और अत्यन्त दुःखी होकर बोला: "मैं वह सब करूँगा जो तुम चाहते हो। राम से भय नहीं है, मेरी मृत्यु निश्चित है (पर तुमसे बचना असम्भव है)।" ऐसा कहकर मारीच रावण के साथ त्वरित होकर राक्षसेन्द्र के वचन के अनुसार चल दिया।
🔍 व्याख्या : रावण का क्रोध और मारीच की विवशता स्पष्ट है। मारीच जानता है कि राम के हाथों मरना ही उसके लिए श्रेयस्कर होगा, क्योंकि रावण के क्रोध से बचना असम्भव है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🎭 छल का आरम्भ

यह सर्ग रामायण के उस नाटकीय मोड़ का प्रारम्भ है जहाँ रावण छल का सहारा लेता है। अब तक राक्षसों से सीधा युद्ध होता था, किन्तु यहाँ माया और छल का प्रयोग होगा।

🕊️ मारीच की विवशता

मारीच राम की महिमा जानता है और उनसे डरता है, फिर भी रावण के अहंकार और क्रोध के सामने वह असहाय है। यह बताता है कि दुष्ट के साथ रहने पर बुद्धिमान भी विवेक खो बैठता है।

⚡ राम का अप्रत्यक्ष प्रभाव

इस सर्ग में राम स्वयं नहीं हैं, फिर भी उनका पराक्रम मारीच के वचनों में जीवित है। मारीच उनकी वीरता का बखान करता है, जिससे राम की अद्भुत कीर्ति प्रकट होती है।

🔥 रावण का अहंकार

रावण मारीच की चेतावनी को अनसुना कर देता है और अपने क्रोध में अंधा होकर योजना पर अड़ा रहता है। यह उसके विनाश की जड़ है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि अहंकार और क्रोध मनुष्य को विवेकहीन बना देते हैं। रावण ने मारीच के उचित परामर्श को नहीं सुना और अपने विनाश को निमंत्रण दिया। मारीच की भाँति हमें दुष्ट के दबाव में आकर अनुचित कार्य नहीं करना चाहिए, भले ही उसके परिणाम भयानक हों।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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