अरण्य काण्ड अध्याय 23

खर की सेना के सामने अपशकुन

अरण्यकाण्ड का तेईसवाँ सर्ग युद्ध की पूर्व संध्या का वर्णन करता है। खर की विशाल सेना के आक्रमण के लिए प्रस्थान करने पर भयंकर अपशकुन प्रकट होते हैं। आकाश, पशु-पक्षी और प्रकृति के अंग युद्ध में खर की पराजय और राम की विजय के संकेत देते हैं, किन्तु मदांध खर उनकी उपेक्षा कर देता है।

विवरण

पूर्व सर्ग में शूर्पणखा द्वारा उकसाए जाने पर खर ने चौदह हजार राक्षसों की एक विशाल सेना बनाकर राम का वध करने का निश्चय किया। इस सर्ग के प्रारम्भ में वह सेना सहित जनस्थान से राम की ओर प्रस्थान करता है। किन्तु ज्यों ही यह भयानक सेना आगे बढ़ती है, चारों ओर भयंकर अपशकुन होने लगते हैं। आकाश से रुधिर की वर्षा होती है, गीधों के झुण्ड सेना के ऊपर मण्डलाने लगते हैं। सूर्य मलिन हो जाता है, पशु भयंकर स्वरों से चिल्लाने लगते हैं। खर का बायाँ नेत्र, बायाँ हाथ और बायीं जाँघ फड़कने लगती है, जो अशुभ का सूचक है। सेना के हाथी, घोड़े और सैनिक अकस्मात् भय से व्याकुल हो उठते हैं। वायु तीव्र गति से धूल उड़ाती हुई बहती है और सूर्य बादलों से ढक जाता है। प्रकृति के ये सभी संकेत स्पष्ट रूप से खर की सेना के विनाश और राम की विजय की ओर इशारा कर रहे थे। किन्तु खर अपने बल के मद में चूर होकर और समय के प्रभाव से मोहित होकर, इन स्पष्ट अपशकुनों की उपेक्षा कर देता है और राम का सामना करने के लिए आगे बढ़ता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग २३

(खर की सेना के सामने अपशकुन – प्रस्थान और अमंगल)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयोविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : शूर्पणखा की चीत्कार से कुपित होकर खर ने चौदह हजार राक्षसों की विशाल सेना बनाई। अब वह सेना, मृत्यु के मुख की ओर बढ़ रही है, युद्ध की अभिलाषा में धधक रही है। किन्तु प्रकृति, जो सब कुछ देखती है, अपने रोम-रोम से उनके विनाश के संकेत देने लगती है। इस सर्ग में वाल्मीकि ने उन अशुभ निमित्तों का वर्णन किया है, जिन्हें देखकर किसी भी बुद्धिमान को युद्ध से विरत हो जाना चाहिए था।

⚔️ सेना का प्रस्थान और आकाश में अपशकुन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः प्रयाते राजेन्द्रे खरे राममभिद्रुते ।
उत्पाता घोररूपास्तु बभूवुर्विजयं प्रति ॥
रुधिरं चापि गगनात्पपात धरणीतले ।
चुक्षुभुश्च महानागा वेपथुश्चापि जज्ञिरे ॥
ववुर्वाताः सधूमाश्च चकम्पे च वसुंधरा ।
निर्घाताश्चापि निर्घोषा बभूवुर्भीमदर्शनाः ॥
दिवि सूर्यः परिवृतः करालो रक्तमण्डलः ।
बभूव ग्रसते चैव प्रकृत्या रौद्रदर्शनः ॥
शिवा चाशिवसंकाशा स्वरमुत्सृज्य भैरवम् ।
वमन्त्यो रुधिरं वक्त्रैर्नदन्त्यः संत्रसन्ति च ॥
🔹 भावार्थ : तत्पश्चात् राजन्! जब खर राम का वध करने के लिए प्रस्थान कर रहा था, उस समय उसकी विजय के प्रति भयंकर उत्पात (अपशकुन) होने लगे। आकाश से धरती पर रुधिर वर्षा होने लगी। महान हाथी (सेना के) काँपने लगे और व्याकुल हो गए। धूम के साथ वायु चलने लगी और पृथ्वी काँप उठी। आकाश में भीषण दिखने वाले निर्घात (उल्कापात) और भयंकर शब्द हुए। सूर्यमण्डल रक्तवर्ण का और भयंकर दिखने लगा, मानो वह ग्रस लिया गया हो, जो स्वभावतः भयानक था। शिवाएँ (सियारिनें) अशुभ स्वरूप धारण करके भयंकर स्वर निकालने लगीं और मुँह से रुधिर वमन करती हुई भयभीत करने लगीं।
🔍 व्याख्या : सेना के जनस्थान से निकलते ही प्रकृति का सारा संतुलन बिगड़ गया। रुधिर वर्षा, सूर्य का मलिन होना और उल्कापात जैसे लक्षण स्पष्ट रूप से यह संकेत दे रहे थे कि यह सेना वापस नहीं लौटेगी।
॥ श्लोक ६-१० ॥
गृध्राश्च भीमस्वनाः खरनादाः
काकाश्च वक्त्रैर्ज्वलितैर्वभूवुः ।
अभ्रेषु विद्युत्पतनं च घोरं
सनिर्घातं चाशनिपातनं च ॥
बभूव चोल्कापतनं महद्धि
दिशश्च सर्वाः प्रदिशश्च दीप्ताः ।
राहुः सपक्षो ग्रहणं चकार
जहार चान्यो ग्रह उग्रतेजाः ॥
चन्द्रार्कौ च ग्रस्तमुखौ प्रकाशतः
क्षपासु चाग्नेः पतनं महद्भुतम् ।
ववुश्च वाताः परुषं समन्तात्
सनिर्घाताः क्षुभिताश्चाशिवाय ॥
प्रससाद न चाकाशं रजसा समवृतं तदा ।
बभूव तिमिरं घोरं दिशश्च प्रतिपेदिरे ॥
गृध्राः कङ्काः शिवाः श्येनाः काका वनचराः खगाः ।
अन्वयुस्तां महासेनां मण्डलानि च चक्रिरे ॥
📖 भावार्थ : गीध भयंकर स्वरों से चिल्लाने लगे और कौवों के मुँह अग्नि की ज्वाला के समान दिखने लगे। बादल रहित आकाश में भी घोर बिजली गिरने लगी और वज्रपात के साथ भयंकर शब्द हुए। आकाश में उल्कापात हुआ और सभी दिशाएँ एवं उपदिशाएँ जल उठीं। राहु ने (अपने समय से बिना) ग्रहण कर लिया और एक अन्य उग्र तेजस्वी ग्रह ने (चन्द्रमा को) ग्रस लिया। चन्द्रमा और सूर्य का मुख ग्रस्त-सा दिखने लगा। रात्रि में अग्नि का आकाश से गिरना आश्चर्यजनक था। चारों ओर अमंगलकारी, क्रोधित निर्घात वायु रूखी होकर चलने लगी। आकाश निर्मल नहीं रहा, वह रज से व्याप्त हो गया। चारों ओर भयंकर अंधकार छा गया और दिशाएँ भी व्याकुल हो गईं। गीध, कंक, सियार, बाज, कौवे और वन में विचरने वाले सभी पक्षी उस महासेना के पीछे-पीछे चलने लगे और उनके मण्डल बनाने लगे।
🔍 व्याख्या : प्रकृति के ये सारे लक्षण विनाश के सूचक हैं। मांसभक्षी पक्षियों का सेना के पीछे-पीछे चलना और मण्डल बनाना यह दर्शाता है कि वे जानते हैं कि उन्हें भोजन मिलने वाला है।

👁️ खर के शारीरिक लक्षण (श्लोक ११-१६)

॥ श्लोक ११-१६ ॥
तथा यान्तं महासेनां खरं राममभिद्रुतम् ।
निमित्तानि दुराधर्षं समन्तात् पर्यवारयन् ॥
खरं तु सहसा यान्तं प्रेक्ष्य सर्वे निशाचराः ।
शुशुचुर्भयसंत्रस्ताः प्रहृष्टश्चापि दूषणः ॥
ततः प्रवाति वाते च रौद्रे निर्घातशब्दवति ।
बभूव तिमिरं चोग्रं दिशश्च प्रतिपेदिरे ॥
खरस्य वामो बाहुश्च नेत्रं च पर्यवेदयत् ।
ऊरुश्च वामः सहसा स्पन्दते च मुहुर्मुहुः ॥
विवर्णवदनश्चापि बभूव रणदुर्मदः ।
क्षीणस्वरश्च निर्ह्रादी बभूव क्षयशंसिवान् ॥
एतानि बहुरूपाणि निमित्तानि महाबल ।
समीपे राघवस्यैव खरस्यापि बभूविरे ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार जब खर अपनी महासेना के साथ राम की ओर बढ़ रहा था, उस दुर्धर्ष खर को अनेक अपशकुनों ने चारों ओर से घेर लिया। खर को सहसा जाते देख सभी राक्षस भय से व्याकुल होकर शोक करने लगे, केवल दूषण प्रसन्न था (अपने बल के मद में)। फिर भयंकर निर्घात शब्द युक्त वायु चलने लगी, घोर अंधकार छा गया और दिशाएँ व्याकुल हो गईं। खर के बाएँ बाँह में, बायीं आँख में और बाईं जाँघ में बार-बार फड़कन होने लगी। वह रण में मदान्ध खर का मुख विवर्ण हो गया। उसका स्वर क्षीण हो गया और उसमें भी विनाश के सूचक लक्षण दिखने लगे। हे महाबलशाली राम! ये बहुरूपी अपशकुन खर के समीप ही प्रकट हुए।
🔍 व्याख्या : प्राचीन भारतीय युद्धनीति के अनुसार वामांग का स्फुरण अशुभ माना जाता है। खर के सारे अंग उसके विनाश की घोषणा कर रहे थे, किन्तु वह अहंकार में अंधा था।

😱 सेना का हाहाकार और खर की उपेक्षा (श्लोक १७-२८)

॥ श्लोक १७-२२ ॥
ततस्त्रिशिराः संक्रुद्धः प्रत्युवाच खरं तदा ।
निमित्तानीमान्यसुभग न भयं जनयन्ति मे ॥
अहं हि बलिनां श्रेष्ठो राक्षसानां महाबलः ।
न मेऽस्ति सदृशः कश्चिद्युद्धेषु प्रहरत्स्वपि ॥
निमित्तानि च घोराणि सृजन्त्विह सहस्रशः ।
न त्वेवाहं परित्रस्तो राघवस्य भयान्नृप ॥
एवमुक्त्वा तु ते सर्वे खरं समभिपूजयन् ।
प्रहृष्टमनसः सर्वे निमित्तानि न पूजयन् ॥
ततस्ते प्रययुः सर्वे यत्र रामो महाबलः ।
विनाशकाले संप्राप्ते मृत्युकालवशं गताः ॥
तान्प्रयातान्विनाशाय रामम्प्रति निशाचरान् ।
ददर्श भगवान्सूर्यो रक्तो रक्तान्तलोचनः ॥
📖 भावार्थ : तब त्रिशिरा ने क्रोधित होकर खर से कहा: "हे सुभग! ये निमित्त मुझे भय उत्पन्न नहीं करते। मैं राक्षसों में महाबलशाली और बलवानों में श्रेष्ठ हूँ। युद्ध में प्रहार करने में मेरे समान कोई नहीं है। ये भयंकर निमित्त चाहे हजारों की संख्या में उत्पन्न हो जाएँ, किन्तु हे राजन! मैं राघव के भय से कभी भयभीत नहीं हो सकता।" ऐसा कहकर त्रिशिरा सहित सभी ने खर की प्रशंसा की और हर्षित मन से सबने उन निमित्तों की उपेक्षा की। तब वे सब, अपने विनाश के समय आने पर और मृत्यु के वश में होकर, जहाँ महाबली राम थे, वहाँ की ओर चल पड़े। विनाश के लिए राम की ओर जाते हुए उन राक्षसों को भगवान सूर्य ने रक्तवर्ण और रक्त-अन्त नेत्रों से देखा।
🔍 व्याख्या : "जिसकी बुद्धि नहीं रहती, वह अशकुन नहीं देखता" - यही दशा खर और उसके अनुयायियों की हुई। त्रिशिरा ने अपने बल के मद में भविष्य के स्पष्ट संकेतों को अनदेखा कर दिया।
॥ श्लोक २३-२८ ॥
गृध्रा हि मण्डलान्येव चक्रुराकाशगोचराः ।
प्रतिलोमं च ववृषुर्विहायश्च विहंगमाः ॥
वामं चक्रुश्च मृगयूथानि समन्ततः ।
व्याहरन्ति च रौद्राणि दृश्यन्ते चापि भैरवाः ॥
न च स्म सूर्यः संतापं करोति स्म निशाचरान् ।
रामं प्रति महाबाहो यातांस्तान्रोमहर्षणम् ॥
एतानि बहुरूपाणि निमित्तानि महाबल ।
राम तव जये विद्धि खरस्य च पराजये ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : आकाश में विचरण करने वाले गीधों ने सेना के ऊपर मण्डल बनाए और पक्षियों ने प्रतिकूल रूप से उनपर वर्षा की। चारों ओर से मृगों के झुण्ड ने (सेना की) बायीं ओर चक्कर लगाया और भयंकर शब्द करने वाले तथा भैरव दिखने वाले जीव दिखाई देने लगे। उन निशाचरों को राम के पास जाते देख सूर्य ने उन्हें ताप नहीं दिया (जो शत्रु को अशुभ होता है)। हे महाबाहो राम! तू इन बहुरूपी निमित्तों को अपनी विजय और खर के पराजय का सूचक जान।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦅 निमित्त-विज्ञान

यह सर्ग प्राचीन भारतीय निमित्त-विज्ञान (शकुन-अपशकुन) का अद्भुत उदाहरण है। युद्ध से पूर्व प्रकृति, पशु-पक्षी और मनुष्य के शरीर में दिखने वाले लक्षणों के आधार पर परिणाम का अनुमान लगाया जाता था। वाल्मीकि ने इसका अत्यन्त विस्तार से वर्णन किया है।

🚩 अहंकार का परिणाम

त्रिशिरा का कथन कि "ये निमित्त मुझे भय नहीं देते," उसके अहंकार को दर्शाता है। बल के मद में चूर व्यक्ति चेतावनी के संकेतों को अनदेखा कर देता है, जो उसके विनाश का कारण बनता है।

🌅 सूर्य का रक्तवर्ण होना

सूर्य का राम की ओर जाते राक्षसों को ताप न देना और उनका रक्तवर्ण होना, यह सिद्ध करता है कि देवता भी धर्म की ओर हैं। राक्षस अब देवताओं के कोप के पात्र बन चुके हैं।

⚫ काल का प्रभाव

विनाशकाले संप्राप्ते मृत्युकालवशं गताः यह पंक्ति बताती है कि जब मनुष्य का विनाश निकट होता है, तो उसकी बुद्धि मारी जाती है। सेना सब कुछ देखते हुए भी विनाश की ओर ही बढ़ी।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि प्रकृति के संकेतों और अपने विवेक की आवाज को कभी अनसुना नहीं करना चाहिए। अहंकार और मद के कारण यदि हम चेतावनियों को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो विनाश अवश्यंभावी है। साथ ही, यह भी कि अधर्म का पथ छोड़कर धर्म के पथ पर चलने वाले की प्रकृति स्वयं रक्षा करती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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