🕉️ अरण्य काण्ड · सर्ग 13

अगस्त्य ऋषि द्वारा राम को पंचवटी जाने का निर्देश

अरण्यकाण्ड के तेरहवें सर्ग में भगवान राम, सीता और लक्ष्मण की भेंट महर्षि अगस्त्य से होती है। अगस्त्य ऋषि राम का अतिथि सत्कार करते हैं, उन्हें दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान करते हैं और पंचवटी में निवास करने का निर्देश देते हैं, जहाँ वे राक्षसों का संहार कर सकें।

0 सम्पूर्ण श्लोक
13 सर्ग संख्या
26 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

अरण्यकाण्ड के तेरहवें सर्ग में भगवान राम, सीता और लक्ष्मण की भेंट महर्षि अगस्त्य से होती है। अगस्त्य ऋषि राम का अतिथि सत्कार करते हैं, उन्हें दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान करते हैं और पंचवटी में निवास करने का निर्देश देते हैं, जहाँ वे राक्षसों का संहार कर सकें।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

चित्रकूट तथा अन्य आश्रमों में निवास करते हुए राम, सीता व लक्ष्मण दण्डकारण्य में आगे बढ़ते हैं और अनेक ऋषियों से मिलते हैं। उनके निर्देशानुसार वे महर्षि अगस्त्य के आश्रम पहुँचते हैं। अगस्त्य ऋषि उनका अत्यन्त आदर-सत्कार करते हैं। वे राम को विष्णु के उस प्रसिद्ध धनुष को प्रदान करते हैं जो इन्द्र ने उन्हें दिया था, साथ ही अक्षय तूणीर, एक दिव्य खड्ग तथा बाण भी देते हैं। इसके पश्चात् अगस्त्य ऋषि राम को पंचवटी जाने का परामर्श देते हैं, जो गोदावरी नदी के तट पर स्थित एक रमणीय एवं ऋषियों के लिए उपयुक्त स्थान है। वहाँ राक्षसों का आतंक अधिक है, किन्तु वह स्थान राम की शक्ति के अनुकूल है। अगस्त्य के आशीर्वाद एवं अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित होकर राम, सीता व लक्ष्मण पंचवटी के लिए प्रस्थान करते हैं। यह सर्ग राम के वनवास की दिशा निर्धारित करता है तथा आगामी घटनाओं की भूमिका तैयार करता है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अरण्यकाण्ड – सर्ग १३

(अगस्त्य ऋषि का उपदेश और पंचवटी गमन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयोदशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : दण्डकारण्य में भ्रमण करते हुए राम, सीता और लक्ष्मण अनेक ऋषियों से मिल चुके हैं। उनके निर्देश पर अब वे महर्षि अगस्त्य के आश्रम पहुँचते हैं। अगस्त्य, जो दक्षिण दिशा के अधिपति एवं अत्यन्त तेजस्वी मुनि हैं, राम का अभिनन्दन करते हैं और उन्हें वनवास के लिए उपयुक्त स्थान पंचवटी जाने की सलाह देते हैं। साथ ही वे राम को दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान करते हैं।

🙏 अगस्त्य आश्रम में स्वागत और सत्कार (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः प्रविश्य ते सर्वे ददृशुस्तं महामुनिम् ।
अगस्त्यं दीप्यमानं तेजसा दीप्तिमिव ज्वलनम् ॥
तमासीनं महाभागं ददर्श रघुनन्दनः ।
सीतया सह धर्मात्मा लक्ष्मणेन च धन्विना ॥
तानागतान् समालोक्य अगस्त्यो मुनिपुंगवः ।
उत्थाय सहसा राममालिङ्गन् परिषस्वजे ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रविश्य = प्रवेश करके; ते = वे; सर्वे = सब; ददृशुः = देखा; तम् = उस; महामुनिम् = महान मुनि को; अगस्त्यम् = अगस्त्य को; दीप्यमानम् = दीप्तिमान्; तेजसा = तेज से; दीप्तिम् = ज्वलन्त; इव = जैसे; ज्वलनम् = अग्नि; तम् = उन; आसीनम् = बैठे हुए; महाभागम् = महाभाग को; ददर्श = देखा; रघुनन्दनः = रघुनन्दन; सीतया = सीता के; सह = साथ; धर्मात्मा = धर्मात्मा; लक्ष्मणेन = लक्ष्मण के; च = और; धन्विना = धनुषधारी; तान् = उन्हें; आगतान् = आये हुए; समालोक्य = देखकर; अगस्त्यः = अगस्त्य; मुनिपुंगवः = मुनिश्रेष्ठ; उत्थाय = उठकर; सहसा = सहसा; रामम् = राम को; आलिङ्गन् = गले लगाकर; परिषस्वजे = आलिंगन किया।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् आश्रम में प्रवेश करके उन सबने उस महामुनि अगस्त्य को देखा, जो तेज से जलती हुई अग्नि के समान प्रकाशित हो रहे थे। बैठे हुए उन महाभाग को रघुनन्दन राम ने सीता और धनुषधारी लक्ष्मण के साथ देखा। उन्हें आया देखकर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य तुरन्त उठे और राम को गले लगा लिया।
🔍 व्याख्या : अगस्त्य ऋषि का राम के प्रति अपार स्नेह और सम्मान दिखाया गया है। वे उन्हें देखते ही उठ खड़े होते हैं और आलिंगन करते हैं, जो एक बड़े मुनि के लिए असाधारण है।
॥ श्लोक ४-१० ॥
📖 भावार्थ (संक्षेप): अगस्त्य ने राम को आसन देकर बैठाया, पाद्य-अर्घ्य से पूजा की और यथोचित भोजन कराया। फिर कुशल-क्षेम पूछा। राम ने अपनी कुशलता और ऋषियों के कृपापात्र होने की बात कही। इस प्रकार आतिथ्य के पश्चात् अगस्त्य ने राम से कहा कि तुम यहाँ सुखपूर्वक निवास करो।

🛡️ अगस्त्य द्वारा दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
अगस्त्य उवाच –
इदं धनुः परं ब्रह्मन् विष्णोर्विक्रमसम्भृतम् ।
वैजयन्तीं च मे खड्गं ददौ शक्रः सवासवः ॥
तूणी चाक्षयसायकौ दिव्यौ शराश्च निर्मलाः ।
गृहाणेदं महाबाहो यथाकाममरिन्दम ॥
एतेनास्त्रप्रदानेन रक्षसां निधनं कुरु ।
पञ्चवट्यां वसन् राम सुखं प्राप्स्यसि मानद ॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ने कहा – हे ब्रह्मन्! यह धनुष परम उत्तम है, जो भगवान विष्णु के पराक्रम से उत्पन्न हुआ है। यह वैजयन्ती नामक खड्ग तथा तूणीर (तरकस) जिसमें अक्षय बाण हैं, दिव्य और निर्मल हैं – ये सब इन्द्र ने मुझे दिए थे। हे महाबाहो! हे शत्रुदमन! इन्हें तुम अपनी इच्छानुसार ग्रहण करो। इन अस्त्रों के प्रदान से राक्षसों का नाश करो। हे मानद! पंचवटी में निवास करके तुम सुख को प्राप्त करोगे।
🔍 व्याख्या : अगस्त्य राम को वे अस्त्र देते हैं जो स्वयं इन्द्र ने उन्हें दिए थे। यह अस्त्र राम के बाहुबल को और बढ़ा देते हैं। साथ ही वे पंचवटी में रहने का स्पष्ट निर्देश देते हैं।
॥ श्लोक १६-२० ॥
📖 भावार्थ (संक्षेप): राम ने अगस्त्य से हाथ जोड़कर कहा – हे भगवन्! आपकी कृपा से मैं कृतार्थ हूँ। आपके दिए अस्त्र मेरे लिए वरदान हैं। मैं इन्हें धारण करूँगा और राक्षसों का संहार करूँगा। तब अगस्त्य ने उन्हें आशीर्वाद दिया।

🌿 पंचवटी के लिए प्रस्थान (श्लोक २१-३४)

॥ श्लोक २१-२६ ॥
अगस्त्य उवाच –
पञ्चवटीति विख्याता गोदावर्यास्तटे शुभा ।
रम्या नानाविधैर्वृक्षैः पुष्पितैः फलशोभितैः ॥
तत्र वासः सुखो राम राक्षसानां भयावहः ।
सीतया सह धर्मज्ञ तपश्चर्या सुखावहा ॥
गच्छ तत्र मुनिश्रेष्ठ वत्स्यस्व विगतज्वरः ।
इत्युक्त्वा प्रददौ रामं मार्गं चैव महामुनिः ॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ने कहा – गोदावरी के तट पर पंचवटी नामक प्रसिद्ध स्थान है, जो अत्यन्त शुभ है। वहाँ नाना प्रकार के पुष्पित और फलों से सुशोभित वृक्ष हैं। हे धर्मज्ञ राम! वहाँ वास करना सुखद है, राक्षसों के लिए भयावह है, और सीता के साथ तपस्या करना सुखावह है। हे मुनिश्रेष्ठ! वहाँ जाओ और निर्भय होकर निवास करो। ऐसा कहकर महामुनि ने राम को मार्ग भी बता दिया।
🔍 व्याख्या : पंचवटी के सौन्दर्य और उपयुक्तता का वर्णन करते हुए अगस्त्य उसे राम के निवास के लिए सर्वोत्तम बताते हैं। यहीं पर आगे चलकर सीता हरण की घटना होगी।
॥ श्लोक २७-३४ ॥
📖 भावार्थ (संक्षेप): अगस्त्य के निर्देशानुसार राम, सीता और लक्ष्मण आश्रम से विदा हुए। मार्ग में उन्होंने अनेक सुन्दर वन, पर्वत और सरोवर देखे। अन्त में वे गोदावरी नदी के तट पर स्थित पंचवटी क्षेत्र में पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक सुन्दर स्थान देखा जो आश्रम बनाने के योग्य था। लक्ष्मण ने वहाँ एक कुटी बनाई और राम-सीता वहाँ निवास करने लगे।
इस प्रकार अगस्त्य के वचनानुसार राम ने पंचवटी में आश्रम स्थापित किया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏹 दिव्य अस्त्रों का प्रसाद

अगस्त्य द्वारा राम को विष्णु का धनुष तथा इन्द्र के अस्त्र देना यह दर्शाता है कि राम का कार्य केवल मानवीय नहीं, अपितु दैवीय उद्देश्यों से परिपूर्ण है। यह अस्त्र आगे खर-दूषण आदि के वध में सहायक होते हैं।

🗺️ पंचवटी का चयन

अगस्त्य का पंचवटी जाने का निर्देश राम के वनवास की दिशा निर्धारित करता है। यह स्थान राक्षसों के आतंक का केन्द्र था, और यहीं राम का सीधा संघर्ष रावण से होगा। इस प्रकार यह सर्ग आगे की सम्पूर्ण कथा की भूमिका तैयार करता है।

🔱 अगस्त्य की महिमा

अगस्त्य ऋषि दक्षिण के प्रमुख मुनि हैं। राम का उनसे मिलना और उनके निर्देश पर चलना यह दर्शाता है कि राम सदैव महर्षियों के वचनों का पालन करते हैं। अगस्त्य ने विन्ध्य पर्वत को नत किया था और सम्पूर्ण दक्षिण में आर्य धर्म का प्रसार किया था।

✨ सीता का साथ

पूरे वर्णन में सीता का उल्लेख है। अगस्त्य उनके साथ तपस्या की बात कहते हैं। यह दाम्पत्य सहधर्मिता को रेखांकित करता है।

🎯 शिक्षा : गुरु के निर्देशानुसार कार्य करने से सफलता मिलती है। राम ने अगस्त्य के वचन को शिरोधार्य किया और पंचवटी में निवास किया, जहाँ उन्होंने अनेक राक्षसों का संहार किया। हमें भी सज्जनों और ज्ञानियों के परामर्श का पालन करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।

🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!