Durga Bhajan Lyrics गुरुवार विशेष (भगवान श्री हरि विष्णु व गुरुदेव)

दुर्गा स्तुति (Durga Stuti Lyrics in Hindi) - दुर्गे दर्शन दे

दुर्गा स्तुति 'दुर्गे दर्शन दे' का संपूर्ण पाठ, हिंदी अर्थ और विशेष लाभ पढ़ें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित भक्तिमय सामग्री।

आदिशक्ति भगवती दुर्गा की आराधना सनातन धर्म में परम कल्याणकारी मानी गई है। "दुर्गा स्तुति (दुर्गे दर्शन दे)" एक ऐसा ही अत्यंत लोकप्रिय और भावपूर्ण भजन है, जो भक्त के हृदय में मां दुर्गा के प्रति अनन्य श्रद्धा, समर्पण और करुणा का संचार करता है। इस भजन का मुख्य स्वर पूर्ण शरणागति (प्रपत्ति) का है, जहां एक व्याकुल साधक अपनी सांसारिक और आध्यात्मिक रिक्तता को भरने के लिए जगत जननी से दर्शन की गुहार लगाता है। नवरात्रि के पावन दिनों में, अथवा प्रत्येक मंगलवार और शुक्रवार को इस भजन का गायन करने से साधक के अंतःकरण की शुद्धि होती है और उसे मानसिक शांति, भय से मुक्ति तथा देवी की असीम अनुकंपा प्राप्त होती है। यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि मां और संतान के बीच के पवित्र संबंध की संगीतमय अभिव्यक्ति है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ दुर्गे दर्शन दे ॥

दुर्गे दर्शन दे, दुर्गे दर्शन दे,
मैया दर्शन दे, मैया दर्शन दे।
तेरे द्वारे खड़ा एक सवाली,
झोली भर दे मेरी खाली,
दुर्गे दर्शन दे, दुर्गे दर्शन दे।

अम्बे दर्शन दे, अम्बे दर्शन दे,
मैया दर्शन दे, मैया दर्शन दे।
तू ही जग की पालनहारी,
तू ही कष्ट निवारण हारी,
दुर्गे दर्शन दे, दुर्गे दर्शन दे।

सिंहवाहिनी, त्रिशूलधारिणी,
महिषासुर की मर्दनहारी।
भक्तों के संकट हरने वाली,
मैया दर्शन दे, मैया दर्शन दे।
दुर्गे दर्शन दे, दुर्गे दर्शन दे।

लाल चुनरिया सोहे अंग पे,
मुकुट विराजे शीश पे सुंदर।
हाथों में खड्ग और चक्र विराजे,
मैया दर्शन दे, मैया दर्शन दे।
दुर्गे दर्शन दे, दुर्गे दर्शन दे।

चरणों में तेरे शीश नवाऊं,
सुबह-शाम मैं महिमा गाऊं।
तेरी भक्ति का वरदान दे दे,
मैया दर्शन दे, मैया दर्शन दे।
दुर्गे दर्शन दे, दुर्गे दर्शन दे।

जय माता दी, जय माता दी,
कहते जाएं नर और नारी।
सच्चे दरबार की जय-जयकार,
मैया दर्शन दे, मैया दर्शन दे।
दुर्गे दर्शन दे, दुर्गे दर्शन दे।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस पावन भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा और मर्मस्पर्शी है। यहाँ भक्त स्वयं को एक 'सवाली' (याचक) के रूप में प्रस्तुत करता है, जो सांसारिक माया-मोह और दुखों से त्रस्त होकर जगत जननी के द्वार पर आया है। 'खाली झोली' केवल भौतिक अभावों का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह अंतःकरण की उस शून्यता को दर्शाती है जो ईश्वर की भक्ति के बिना अधूरी है। भक्त मां से प्रार्थना करता है कि हे मां दुर्गे! मुझे अपने दिव्य स्वरूप के दर्शन देकर कृतार्थ करें।

भजन के अगले भाग में मां के 'जग पालनहारी' और 'कष्ट निवारण हारी' रूपों की स्तुति की गई है। इसका अर्थ है कि संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन और पोषण करने वाली आदि शक्ति ही हमारे दुखों का अंत कर सकती है। जब भक्त पूर्ण समर्पण के साथ मां के चरणों में अपना शीश झुकाता है, तो उसका अहंकार नष्ट हो जाता है। यह भजन हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति में कोई दिखावा नहीं होता; इसमें केवल मां के प्रति निश्छल प्रेम और उनके दर्शन की तीव्र अभिलाषा होती है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन सनातन संस्कृति में देवी उपासना के व्यावहारिक और सुगम मार्ग को प्रदर्शित करता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • समर्पण भाव (शरणागति): इस भजन का प्रत्येक शब्द भक्त के निरहंकार भाव और मां के प्रति पूर्ण समर्पण को दर्शाता है।
  • सुलभता और सरलता: इसकी भाषा अत्यंत सरल और सुबोध है, जिससे कोई भी सामान्य भक्त इसे आसानी से गा सकता है और मां के ध्यान में लीन हो सकता है।
  • शक्ति और करुणा का समन्वय: इसमें एक ओर मां के संहारक रूप (महिषासुर मर्दिनी) का स्मरण है, तो दूसरी ओर उनके ममतामयी और कष्ट हरने वाले रूप की वंदना है।
  • मानसिक शांति: इस भजन के नियमित श्रवण और कीर्तन से मन के नकारात्मक विचार दूर होते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि मां की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष नियम और समय अत्यधिक फलदायी माने गए हैं:

सर्वोत्तम समय: सुबह ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) और संध्या काल की आरती के समय इस भजन का गायन सबसे उत्तम माना जाता है। विशेषकर नवरात्रि के नौ दिनों में इसका निरंतर पाठ घर के वातावरण को पवित्र बनाता है।

गायन की विधि:

  1. सर्वप्रथम स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा घर में मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  3. मां को लाल पुष्प, रोली और अक्षत अर्पित करें।
  4. पूर्ण एकाग्रता और श्रद्धा के साथ, ताली बजाते हुए या मंजीरे के साथ इस भजन का सस्वर गायन करें।
  5. भजन की समाप्ति के बाद मां की आरती करें और प्रसाद वितरित करें।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन साक्षात आदिशक्ति महामाया मां दुर्गा को समर्पित है। श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार, मां दुर्गा ही इस सृष्टि की आदि कारण हैं। वे ही महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती के रूप में प्रकट होकर सृष्टि का सृजन, पालन और संहार करती हैं।

भारतीय भक्ति परंपरा में अनेक संतों, जैसे स्वामी रामकृष्ण परमहंस, श्री चैतन्य महाप्रभु और आदि शंकराचार्य ने मातृ-भाव (देवी को मां के रूप में पूजना) को साधना का सबसे सुगम मार्ग बताया है। यह भजन उसी मातृ-भाव की परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जहां भक्त अपनी आराध्या को अपनी परम माता मानकर उनसे लाड लड़ाता है और दर्शन की जिद करता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन पारंपरिक लोक-भक्ति शैली पर आधारित है। उत्तर भारत के जागरणों, चौकियों और कीर्तनों में यह भजन दशकों से गाया जाता रहा है। इसकी रचना के पीछे लोक-कवियों की वह सहज भावना है जो शास्त्रीय जटिलताओं से दूर, सीधे हृदय से मां को पुकारती है। इस भजन की पृष्ठभूमि में सामूहिक संकीर्तन की महिमा छिपी है, जहां अनेक भक्त मिलकर एक स्वर में 'जय माता दी' का उद्घोष करते हैं, जिससे संपूर्ण वातावरण दिव्य स्पंदनों से भर जाता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें लोकभाषा के मधुर शब्दों का समावेश है। इसकी काव्य शैली 'गेय' (गाए जाने योग्य) है। इसमें प्रयुक्त अलंकार और बिंब अत्यंत सजीव हैं; जैसे 'लाल चुनरिया सोहे अंग पे' और 'सिंहवाहिनी' शब्द मां के दिव्य और तेजस्वी स्वरूप का सजीव चित्र भक्त की आंखों के सामने उपस्थित कर देते हैं। अंतरा और मुखड़े का संतुलन इस प्रकार बनाया गया है कि गाते समय भक्त स्वतः ही भाव-विभोर होकर नृत्य करने लगता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और व्यावहारिक सीख देता है:

  • अहंकार का त्याग: 'द्वारे खड़ा एक सवाली' पंक्ति हमें सिखाती है कि ईश्वर के सामने हमें अपने पद, प्रतिष्ठा और धन का अहंकार छोड़कर एक बालक की भांति जाना चाहिए।
  • धैर्य और विश्वास: मां के दर्शन की प्रतीक्षा करना भक्त के धैर्य और अटूट विश्वास की परीक्षा है।
  • बुराइयों पर विजय: महिषासुर मर्दिनी का स्मरण हमें अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ और मोह रूपी असुरों को नष्ट करने की प्रेरणा देता है।
  • सामूहिकता की भावना: 'जय माता दी कहते जाएं नर और नारी' पंक्ति सामाजिक समरसता और सामूहिक प्रार्थना की शक्ति को रेखांकित करती है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
सवाली याचक या प्रार्थना करने वाला साधक जो ईश्वर से कृपा की याचना करता है।
सिंहवाहिनी सिंह (शेर) की सवारी करने वाली मां दुर्गा का शौर्य और निर्भयता का प्रतीक।
मर्दनहारी नाश करने वाली अज्ञान और बुराइयों का समूल नाश करने वाली शक्ति।
शीश नवाऊं सिर झुकाना पूर्ण समर्पण और अहंकार की आहुति देना।
पालनहारी पोषण करने वाली समस्त चराचर जगत को ऊर्जा और जीवन देने वाली।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"दुर्गे दर्शन दे, दुर्गे दर्शन दे... तेरे द्वारे खड़ा एक सवाली..."
हे मां दुर्गे! आप मुझे अपने साक्षात दर्शन दीजिए। मैं आपके द्वार पर एक याचक बनकर खड़ा हूं। मेरी यह प्रार्थना स्वीकार करें और मेरी खाली झोली को अपनी कृपा और भक्ति के रंग से भर दीजिए।

"तू ही जग की पालनहारी, तू ही कष्ट निवारण हारी..."
हे माता! आप ही इस संपूर्ण चराचर जगत का पालन-पोषण करने वाली हैं। इस संसार में ऐसा कोई दुख या संकट नहीं है जिसका निवारण आपके पास न हो। आप मेरे भी कष्टों को दूर करें।

"सिंहवाहिनी, त्रिशूलधारिणी, महिषासुर की मर्दनहारी..."
सिंह पर सवार होकर दुष्टों का दलन करने वाली और अपने हाथों में त्रिशूल धारण करने वाली मां! आपने जैसे महिषासुर नामक भयंकर राक्षस का वध कर देवताओं को अभयदान दिया था, वैसे ही मेरे भीतर के विकारों का भी नाश करें।

"चरणों में तेरे शीश नवाऊं, सुबह-शाम मैं महिमा गाऊं..."
मैं आपके पावन चरणों में बारंबार प्रणाम करता हूं। मेरी यही अभिलाषा है कि मैं सुबह और शाम केवल आपकी ही महिमा का गान करूं और मुझे आपकी अनन्य भक्ति का वरदान प्राप्त हो।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के साथ मां दुर्गा के इन दिव्य मंत्रों का जाप करने से साधना का फल कई गुना बढ़ जाता है:

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: जो शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी हैं और जो सभी मंगलों में मंगल रूप हैं, उन नारायणी को नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, उन्हें बारंबार नमस्कार है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण महत्वपूर्ण जानकारी
भजन का नाम दुर्गे दर्शन दे (दुर्गा स्तुति)
मुख्य आराध्य मां दुर्गा (आदिशक्ति)
भजन का भाव समर्पण, करुणा, वात्सल्य और शरणागति
भाषा सरल हिंदी (भक्ति रस प्रधान)
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, दुर्गा पूजा, मंगलवार, शुक्रवार, जागरण
मुख्य संदेश अहंकार का त्याग और ईश्वर पर अटूट विश्वास

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य उद्देश्य मां दुर्गा के प्रति पूर्ण समर्पण व्यक्त करना और उनसे अपने जीवन के कष्टों को दूर करने तथा भक्ति का वरदान प्राप्त करने की प्रार्थना करना है।

इस भजन को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में या शाम की आरती के समय गाना अत्यंत शुभ माना जाता है। नवरात्रि के दौरान इसका गायन विशेष फलदायी होता है।

हाँ, इस भजन का पाठ प्रतिदिन करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है।

आध्यात्मिक रूप से 'खाली झोली' का अर्थ है साधक के हृदय की वह शून्यता जो सांसारिक सुखों से नहीं भर सकती, उसे केवल मां की दिव्य कृपा और ज्ञान से ही भरा जा सकता है।

मां दुर्गा ने देवताओं और मनुष्यों को अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए महिषासुर नामक भयंकर राक्षस का वध किया था, इसलिए उन्हें 'महिषासुर मर्दिनी' कहा जाता है।

इस भजन के साथ "ॐ दुं दुर्गायै नमः" या "सर्वमंगल मांगल्ये..." श्लोक का जाप करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है।

हाँ, इसकी भाषा अत्यंत सरल होने के कारण बच्चे भी इसे आसानी से सीख और गा सकते हैं, जिससे उनमें अच्छे संस्कार और एकाग्रता का विकास होता है।

पूजा करते समय और भजन गाते समय साधक का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना सर्वोत्तम माना जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों, जैसे श्रीमद्देवीभागवत पुराण और श्री दुर्गा सप्तशती के दार्शनिक सिद्धांतों के आधार पर तैयार किया गया है। भजन के व्यावहारिक और आध्यात्मिक पक्षों का गहन विश्लेषण कर इसे पाठकों के लिए सुगम बनाया गया है। (संपादकीय रूप से तैयार सामग्री)

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्देवीभागवत पुराण - मातृ महिमा खंड
  • श्री दुर्गा सप्तशती - गीताप्रेस गोरखपुर
  • पारंपरिक लोक भजन संग्रह एवं संकीर्तन परंपरा

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 03 Nov 2026

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