kali mata bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

अम्बे तू है जगदम्बे काली भजन इन हिंदी लिरिक्स

पढ़ें अम्बे तू है जगदम्बे काली भजन इन हिंदी लिरिक्स का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

"अम्बे तू है जगदम्बे काली" सनातन धर्म में आदि शक्ति माँ भगवती की आराधना का एक अत्यंत लोकप्रिय, जाग्रत और भावपूर्ण भजन है। यह भजन न केवल देवी दुर्गा और महाकाली के ममतामयी एवं दुष्टनाशिनी स्वरूपों का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है, बल्कि भक्त के हृदय में पूर्ण समर्पण और श्रद्धा का भाव भी जाग्रत करता है। हिंदू घरों, मंदिरों और विशेष रूप से शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व पर इस भजन का गायन आरती के रूप में अनिवार्य रूप से किया जाता है। इस भजन की प्रत्येक पंक्ति में माँ की असीम शक्ति, उनकी करुणा, और भक्त की दीनता का ऐसा अद्भुत चित्रण है जो श्रोता और गायक दोनों को भाव-विभोर कर देता है। प्रस्तुत शोधपरक लेख में हम इस कालजयी भजन के संपूर्ण लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, दार्शनिक महत्व, और इससे जुड़े आध्यात्मिक रहस्यों का गहन विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

अम्बे तू है जगदम्बे काली — सम्पूर्ण भजन लिरिक्स

अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली।
तेरे ही गुण गाएं भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥

तेरे भक्त जनों पर मैया, भीड़ पड़ी है भारी।
दानव दल पर टूट पड़ो माँ, करके सिंह सवारी॥
सौ-सौ सिंहों से बलशाली, है दस भुजाओं वाली।
दुखियों के दुखड़े निवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥

माँ-बेटे का है इस जग में, बड़ा ही निर्मल नाता।
पूत-कपूत सुने हैं पर ना, माता सुनी कुमाता॥
सब पर करुणा बरसाने वाली, अमृत बरसाने वाली।
दुखियों के दुखड़े निवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥

नहीं मांगते धन और दौलत, ना चांदी ना सोना।
हम तो मांगें माँ तेरे मन में, एक छोटा सा कोना॥
सबकी बिगड़ी बनाने वाली, लाज बचाने वाली।
सतियों के सत को संवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन आदि शक्ति के दो रूपों—सौम्य (अम्बे) और उग्र (काली)—की वंदना से प्रारंभ होता है। इसका मूल भाव पूर्ण शरणागति और निष्काम भक्ति है। भजन का मुख्य संदेश यह है कि जब मनुष्य संसार के समस्त कष्टों से थक जाता है, तब केवल जगदम्बा की शरण ही उसे परम शांति और सुरक्षा प्रदान करती है।

भजन के प्रथम भाग में माँ को 'जगदम्बे' (जगत की माता) और 'काली' (काल का संहार करने वाली) कहकर पुकारा गया है। भक्त कहता है कि हे माँ! संपूर्ण भारतवर्ष (या संपूर्ण सृष्टि) आपके ही दिव्य गुणों का गान करता है और हम सब मिलकर आपकी पावन आरती उतार रहे हैं। यहाँ 'आरती' का अर्थ केवल दीपक घुमाना नहीं, बल्कि अपने अहंकार को माँ के चरणों में समर्पित कर देना है।

दूसरे भाग में भक्त संसार के संकटों का वर्णन करता है। जब भी धर्म पर संकट आता है या भक्तों पर विपत्ति आती है, माँ अपने सिंह पर सवार होकर आती हैं। माँ की दस भुजाएं दसों दिशाओं से भक्तों की रक्षा का प्रतीक हैं। तीसरे भाग में माँ और संतान के पवित्र संबंध को दर्शाया गया है। संसार में पुत्र तो अपने कर्तव्य से विमुख होकर 'कपूत' हो सकता है, परंतु माँ कभी 'कुमाता' नहीं हो सकती। वह सदैव अपने बच्चों पर करुणा की वर्षा करती हैं। अंतिम भाग में निष्काम भक्ति की पराकाष्ठा है, जहाँ भक्त भौतिक सुखों का त्याग कर केवल माँ के हृदय में एक छोटा सा स्थान मांगता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन शाक्त संप्रदाय और सामान्य गृहस्थ भक्तों के बीच समान रूप से लोकप्रिय है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • द्वैत स्वरूप का समन्वय: इसमें माँ के ममतामयी 'अम्बे' रूप और संहारक 'काली' रूप का एक साथ स्मरण किया गया है, जो यह दर्शाता है कि सृष्टि का सृजन और विनाश दोनों एक ही शक्ति के अधीन हैं।
  • वात्सल्य रस की प्रधानता: "पूत-कपूत सुने हैं पर ना, माता सुनी कुमाता" यह पंक्ति भक्त को माँ के प्रति अगाध विश्वास और सुरक्षा की भावना प्रदान करती है।
  • शरणागति और निष्काम भाव: भजन का अंतिम अंतरा भक्त को सांसारिक लोभ (सोना, चांदी, धन) से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है।
  • सामूहिक संकीर्तन के अनुकूल: इसकी लय और ताल ऐसी है कि इसे सामूहिक रूप से गाए जाने पर वातावरण में तीव्र सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि माँ की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष अवसर और विधियां शास्त्रों एवं परंपराओं में अत्यंत फलदायी मानी गई हैं:

सर्वोत्तम समय: इस भजन का गायन संध्याकाल की आरती के समय करना सर्वोत्तम माना जाता है। इसके अतिरिक्त, नवरात्रि के नौ दिनों में सुबह और शाम दोनों समय इसका पाठ करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है।

गायन की विधि:

  • सर्वप्रथम पूजा स्थान पर माँ दुर्गा या माँ काली की प्रतिमा या चित्र के समक्ष घी का दीपक या कपूर प्रज्वलित करें।
  • हाथ में घंटी या मंजीरा लेकर पूरे परिवार के साथ ऊंचे और स्पष्ट स्वर में लयबद्ध होकर भजन गाएं।
  • गायन के समय अपना ध्यान माँ के ममतामयी स्वरूप पर केंद्रित रखें।
  • भजन की समाप्ति पर माँ को हलवे या ऋतुफल का भोग लगाएं और साष्टांग प्रणाम करें।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से आदिशक्ति माँ दुर्गा और उनके उग्र रूप माँ महाकाली को समर्पित है। सनातन दर्शन के अनुसार, महाकाली समय (काल) की अधिष्ठात्री देवी हैं और दुर्गा दुर्गति का नाश करने वाली हैं। इस भजन में प्रयुक्त 'भारती' शब्द माँ सरस्वती का भी संकेत करता है, जो ज्ञान की देवी हैं।

इस भजन की रचना पारंपरिक लोक-भक्ति धारा से प्रेरित है। यद्यपि इसके मूल रचयिता का नाम अज्ञात है, परंतु इसकी शैली आदिगुरु शंकराचार्य के 'देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम्' से अत्यधिक प्रभावित है, जिसमें उन्होंने "कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति" की रचना की थी। इस प्रकार, यह भजन प्राचीन शास्त्रीय ज्ञान और आधुनिक लोक-चेतना का एक सुंदर सेतु है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि भारतीय लोक संस्कृति और शाक्त परंपरा में रची-बसी है। मध्यकाल में जब भारत पर विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण हो रहे थे और जनमानस भयभीत था, तब देवी के रक्षक स्वरूप (सिंह वाहिनी, दस भुजाओं वाली) की आराधना को बल मिला। "दानव दल पर टूट पड़ो माँ" जैसी पंक्तियां समाज में वीरता और आत्मविश्वास का संचार करने के लिए लिखी गई थीं। समय के साथ यह भजन लोकगीत से उठकर शास्त्रीय भजनों की श्रेणी में शामिल हो गया और आज यह प्रत्येक हिंदू परिवार की दैनिक प्रार्थना का हिस्सा बन चुका है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें ब्रजभाषा और अवधी के शब्दों का भी प्रभाव दिखाई देता है। इसकी काव्य शैली अत्यंत प्रभावशाली है:

  • अलंकार योजना: इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है (जैसे 'दानव दल', 'सिंह सवारी')।
  • बिंब विधान: "सौ-सौ सिंहों से बलशाली, है दस भुजाओं वाली" पंक्ति पाठक के मन में माँ के अत्यंत भव्य और शक्तिशाली स्वरूप का सजीव बिंब निर्मित करती है।
  • गेयता: भजन की लयबद्धता और अंतरे का मुखड़े से जुड़ाव इसे अत्यंत गेय और कंठस्थ करने में सरल बनाता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन जीने के महत्वपूर्ण सूत्र सिखाता है:

  1. संकट में धैर्य और विश्वास: "भीड़ पड़ी है भारी" के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि जीवन में चाहे कितना भी बड़ा संकट क्यों न आए, ईश्वर पर विश्वास रखने से उसका निवारण अवश्य होता है।
  2. अहंकार और वासनाओं का दमन: 'दानव दल' हमारे भीतर के काम, क्रोध, लोभ और मोह रूपी विकार हैं। माँ से प्रार्थना की जाती है कि वे हमारे इन आंतरिक शत्रुओं का नाश करें।
  3. सच्चे प्रेम की परिभाषा: माँ और संतान का संबंध निस्वार्थ होता है। हमें भी ईश्वर से बिना किसी शर्त के प्रेम करना चाहिए।
  4. संतोष का महत्व: धन-दौलत की जगह माँ के चरणों में स्थान मांगना यह सिखाता है कि वास्तविक शांति आंतरिक संतोष और भक्ति से मिलती है, भौतिक वस्तुओं से नहीं।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द/वाक्यांश सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
जगदम्बे जगत की माता संपूर्ण ब्रह्मांड की जननी, आदिशक्ति।
खप्पर वाली हाथ में कपाल धारण करने वाली दुष्टों के अहंकार का नाश करने वाली माँ काली।
भारती भारत के लोग / माँ सरस्वती समस्त ज्ञानवान और भक्त जन।
भीड़ विपत्ति या भारी संकट सांसारिक कष्ट और अज्ञानता का अंधकार।
दानव दल राक्षसों का समूह मनुष्य के भीतर के दुर्गुण (काम, क्रोध, लोभ)।
कपूत बुरा या कर्तव्यहीन पुत्र भटका हुआ जीव जो ईश्वर को भूल गया है।
कुमाता बुरी माता जो कभी संभव नहीं है; माँ की करुणा असीम है।
सतियों के सत सत्य और चरित्र की रक्षा धर्म और मर्यादा का पालन करने वालों का संरक्षण।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: "अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली। तेरे ही गुण गाएं भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥"
भावार्थ: हे माँ! आप ही ममतामयी अम्बे हैं और आप ही संहारक काली हैं। हे खप्पर धारण करने वाली माँ दुर्गा, आपकी जय हो। संपूर्ण सृष्टि और समस्त भक्त आपके दिव्य गुणों का गान करते हैं। हम सब मिलकर आपकी पावन आरती उतार रहे हैं और स्वयं को आपके चरणों में समर्पित कर रहे हैं।

पंक्ति: "तेरे भक्त जनों पर मैया, भीड़ पड़ी है भारी। दानव दल पर टूट पड़ो माँ, करके सिंह सवारी॥"
भावार्थ: हे माता! आपके भक्तों पर सांसारिक कष्टों और अज्ञानता का भारी संकट आ पड़ा है। आप अपने सिंह पर सवार होकर शीघ्र आइए और हमारे दुखों तथा आंतरिक विकारों रूपी दानवों के समूह का समूल नाश कर दीजिए।

पंक्ति: "सौ-सौ सिंहों से बलशाली, है दस भुजाओं वाली। दुखियों के दुखड़े निवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥"
भावार्थ: आपका बल सौ-सौ सिंहों से भी अधिक है और आपकी दस भुजाएं दसों दिशाओं से हमारी रक्षा करती हैं। आप सभी दुखियों के कष्टों का निवारण करने वाली हैं, इसलिए हम सब आपकी आरती उतारते हैं।

पंक्ति: "माँ-बेटे का है इस जग में, बड़ा ही निर्मल नाता। पूत-कपूत सुने हैं पर ना, माता सुनी कुमाता॥"
भावार्थ: इस संसार में माता और पुत्र का संबंध सबसे पवित्र और निस्वार्थ होता है। पुत्र अपने मार्ग से भटक कर बुरा (कपूत) हो सकता है, लेकिन माता कभी अपने बच्चे के प्रति क्रूर या उपेक्षित (कुमाता) नहीं हो सकती। आपकी करुणा सदैव अपने बच्चों पर बनी रहती है।

पंक्ति: "नहीं मांगते धन और दौलत, ना चांदी ना सोना। हम तो मांगें माँ तेरे मन में, एक छोटा सा कोना॥"
भावार्थ: हे माँ! हम आपसे कोई भौतिक सुख, धन, दौलत, सोना या चांदी नहीं मांगते। हमारी केवल यही अभिलाषा है कि आपके करुणामयी हृदय में हमें एक छोटा सा स्थान मिल जाए, ताकि हम सदैव आपकी भक्ति में लीन रहें।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के गायन के पूर्व या पश्चात निम्नलिखित मंत्रों का जाप करने से साधना का फल बहुगुणित हो जाता है:

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: हे नारायणी! आप सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हैं। आप कल्याणकारिणी, सब पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली और गौरी हैं। आपको हमारा नमस्कार है।

ॐ क्रीं कालिकायै नमः

यह माँ काली का अत्यंत प्रभावशाली बीज मंत्र है, जो भय का नाश करता है और साधक को आंतरिक शक्ति प्रदान करता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण बिंदु महत्वपूर्ण जानकारी
भजन का नाम अम्बे तू है जगदम्बे काली
मुख्य आराध्य देवी माँ दुर्गा, माँ महाकाली, आदिशक्ति
काव्य रस भक्ति रस, वात्सल्य रस, वीर रस
भाषा सरल हिंदी (खड़ी बोली)
सर्वोत्तम अवसर नवरात्रि, दुर्गा पूजा, संध्या आरती, मंगलवार और शुक्रवार
मुख्य दार्शनिक संदेश पूर्ण शरणागति, निष्काम भक्ति, आंतरिक विकारों का शमन

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन आदिशक्ति माँ दुर्गा और उनके उग्र स्वरूप माँ महाकाली को समर्पित है। इसमें देवी के ममतामयी और रक्षक दोनों रूपों की स्तुति की गई है।

इस भजन को गाने का सबसे उत्तम समय संध्याकाल की आरती का है। इसके अलावा नवरात्रि के दौरान सुबह और शाम दोनों समय इसका गायन अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है।

इसका अर्थ है कि संसार में पुत्र अपने कर्तव्यों से विमुख होकर बुरा (कपूत) हो सकता है, लेकिन माता कभी अपने बच्चों के प्रति निष्ठुर या कुमाता नहीं हो सकती। यह माँ की असीम और निस्वार्थ करुणा को दर्शाता है।

हाँ, इस भजन में माँ के 'सिंह वाहिनी' और 'दस भुजाओं वाले' रक्षक रूप का वर्णन है। श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करने से मानसिक भय, चिंता और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।

इसका तात्पर्य यह है कि माँ भगवती उन सभी लोगों के चरित्र, सत्य और मर्यादा की रक्षा करती हैं जो धर्म के मार्ग पर चलते हैं। वे सत्यनिष्ठ लोगों की प्रतिष्ठा को बनाए रखती हैं।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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