प्रस्तावना एवं परिचय
सम्पूर्ण मूल पाठ एवं पवित्र श्लोक
शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें
दोहा - सबसे बड़ा तेरा दरबार है तू ही सब का पालनहार है ।
सजा दे या करदे क्षमा सांवरे तू ही हमारी सरकार है।
महर करो जन के सुखरासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||1||
प्रथम शीश चरणों में नाऊँ,
किरपा दृष्टि रावरी चाहँू ||2||
माफ सभी अपराध कराऊँ,
आदि कथा सुछंद रच गाऊँ ||3||
भक्त सुजन सुनकर हरषासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||4||
कुरु पांडव में विरोध छाया,
समर महाभारत रचवाया ||5||
बलि एक बर्बरीक आया,
तीन सुबाण साथ में लाया ||6||
यह लखि हरि को आई हाँसी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||7||
मधुर वचन तब कृष्ण सुनाये,
समर भूमि केहि कारन आये ||8||
तीन बाण धनु कंध सुहाये,
अजब अनोखा रूप बनाये ||9||
बाण अपार वीर सब ल्यासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||10||
बर्बरीक इतने दल माहीं,
तीन वाण की गिनती नाहीं ||11||
योद्धा एक से एक निराले,
वीर बहादुर अति मतवाले ||12||
समर सभी मिल कठिन मचासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||13||
बर्बरीक मम कहना मानो,
समर भूमि तुम खेल न जानो ||14||
द्रोण गुरू कृपा आदि जुझारा,
जिनसे पारथ का मन हारा ||15||
तू क्या पेश इन्हों से पासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||16||
बर्बरीक हरि से यों कहता,
समर देखना मैं हूँ चाहता ||17||
कौन बली रण शूर निहारुँ,
वीर बहादुर कौन जुझारुँ ||18||
तीन लोक त्रावाण से मारुँ,
हँसता रहँू कभी नहिं हारुँ ||19||
सत्य कहूँ हरि झूठ न जानो,
दोनों दल इक तरफ हो मानो ||20||
एक वाण दल दोऊ खपासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||21||
बर्बरीक से हरि फरमावें,
तेरी बात समझ नहिं आवे ||22||
प्रान बचाओ तुम घर जाओ,
क्यों नादानपन दिखलाओ ||23||
तेरी जान मुफत में जासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||24||
अगर विश्वास न तुम्हें मुरारी,
तो कर लीजे जाँच हमारी ||25||
यह सुन कृष्ण बहुत हरषाये,
बर्बरीक से वचन सुनाये ||26||
मैं अब लेऊँ परीक्षा खासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||27||
पात विटप के सभी निहारो,
बेंध एक वाण से सब डारो ||28||
कह इतना इक पात मुरारी,
दबा लिया पद तले करारी ||29||
अजब रची माया अविनाशी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||30||
बर्बरीक धनु बाण चढ़ाया,
जानी जाय न हरि की माया ||31||
विटप निहार बली मुसकाया,
अजित अमर अहिल्यावती जाया ||32||
बली सुमिर शिव बाण चलासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||33||
बाण बली ने अजब चलाया,
पत्ते बेध विटप के आया ||34||
गिरा कृष्ण के चरनों माहीं,
विध पात हरि चरन हटाई ||35||
इनसे कौन फतेह किमि पासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||36
कृष्ण बली से कहे बताओ,
किस दल की तुम जीत कराओ ||37||
बली हार का दल बतलाया,
यह सुन कृष्ण सनका खाया ||38||
विजय किस तरह पारथ पासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||39||
छल करना कृष्ण ने विचारा,
बली से बोले नंद कुमारा ||40||
ना जाने क्या ज्ञान तुम्हारा,
कहना मानो बली हमारा ||41||
हो निज तरफ नाम पाजासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||42||
कहे बर्बरीक कृष्ण हमारा,
टूट न सकता प्रन है करारा ||43||
माँगे दान उसे मैं देता,
हारा देख सहारा देता ||44||
सत्य कहँू ना झूठ जरासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||45||
बेसक वीर बहादुर तुम हो,
जचते दानी हमें न तुम हो ||46||
कहे बर्बरीक हरि बतलाओ,
तुमको चहिये क्या फरमाओ ||47||
जो माँगे सो हमसे पासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||48||
बली अगर तुम सच्चे दानी,
तो मैं तुमसे कहूँ बखानी ||49||
समर भूमि बलि देने खातिर,
शीश चाहिए एक बहादुर ||50||
शीश दान दे नाम कमासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||51||
हम तुम तीनों अर्जुन माहीं,
शीश दान दे को बलदाई ||52||
जिसको आप योग्य बतलायें,
वही शीश बलिदान चढ़ायें ||53||
आवागमन मिटे चैरासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||54||
अर्जुन नाम समर में पावे,
तुम बिन सारथी कौन कहावे ||55||
मम शीश दान देहु भगवाना,
महाभारत देखन मन ललचाना ||56||
शीश शिखर गिरि पर धरवासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||57||
शीशदान बर्बरीक दिया है,
हरि ने गिरि पर धरा दिया है ||58||
समर अठारह रोज हुआ है,
कुरु दल सारा नाश हुआ है ||59||
विजय पताका पाण्डु फैहरासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||60||
भीम, नकुल सहदेव, पारथ,
करते निज तारीफ अकारथ ||61||
यों सोचें मन में यदुराया,
इनके दिल अभियान है छाया ||62||
हरि भक्तों का दुःख मिटासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||63||
पारथ,भीम आदि बलधरी,
से यों बोले गिरिवर धरी ||64||
किसने विजय समर में पाई,
पूछो सिर बर्बरीक से भाई ||65||
सत्य बात सिर सभी बतासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||66||
हरि सबको संग ले गिरवर पर,
सिर बैठा था मगन शिखर पर ||67||
जा पहँुचे झटपट नंदलाला,
पुनि पँूछा शिर से सब हाला ||68||
सिर दानी है खुद अविनाशी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||69||
हरि यों कहै सही फरमाओ,
समर विजयी है कौन बताओ ||70||
बली कहैं मैं सही बताऊँ,
नहिं पितु चाचा बली नाहिं ताऊ ||71||
भगवत ने पाई स्याबासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||72||
चक्र सुदर्शन है बलदाई,
काट रहा था दल जिमि काई ||73||
रूप द्रौपदी काली का धर,
हो विकराल ले कर में खप्पर ||74||
भर-भर रूधिर पिये थी प्यासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||75||
मैंने जो कुछ समर निहारा,
सत्य सुनाया हाल है सारा ||76||
सत्य वचन सुनकर यदुराई,
वर दीन्हा शिर को हर्षाई ||77||
श्याम रूप मम धरि पुजासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||78||
कलि में तुमको श्याम कन्हाई,
पूजेगें सब लोग-लुगाई ||79||
मन वचन कर्म से जो ध्यावेंगे,
मन इच्छा फल सब पायेंगे ||80||
‘सेवक’ सद्गति को पाजासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||81||
भक्तों को धनवान बनाना,
पत्नि गोद में सुमन खिलाना ||82||
रामकृष्ण वंश है शरन तिहारी,
श्रीपति यदुपति कंुज बिहारी ||83||
सब सुखदायक आनन्द रासी,
साँवलशाह खाटू के वासी ||84||
*** Singer - Sapna Vishwakarma ***
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।
🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ
यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "श्री श्याम चैरासी लिरिक्स (Shri Shyam Chairasee Lyrics in Hindi) - महर करो जन के सुखरासी Shyam Bhajan - Bhaktilok" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।
भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।
🔍 विशेष महत्त्व और लाभ
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।
🕒 साधना एवं गायन विधि
भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।
भजनों को गाने की सही विधि क्या है?
भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।
क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?
हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।
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