Brihaspati Katha बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

श्री बृहस्पति देव की आरती (Shri Brihaspati Dev Ji Ki Aarti Lyrics)

श्री बृहस्पति देव की आरती (Brihaspati Dev Ki Aarti Lyrics) हिंदी अर्थ और लाभ सहित। पढ़ें संपूर्ण देवगुरु बृहस्पति आरती पाठ Bhaktilok पर।

श्री बृहस्पति देव की आरती (Shri Brihaspati Dev Ji Ki Aarti Lyrics ) | जय वृहस्पति देवा ( Jay Brihaspati Deva Lyrics ) - Bhakti lok

देवगुरु बृहस्पति जी सनातन धर्म में ज्ञान, बुद्धि, विवेक, समृद्धि, सौभाग्य और गुरुत्व के अधिष्ठाता देवता माने गए हैं। ज्योतिष शास्त्र में इन्हें देवताओं का गुरु और नवग्रहों में अत्यंत शुभ फल प्रदान करने वाला ग्रह माना गया है। भगवान बृहस्पति की कृपा से मनुष्य के जीवन में वैवाहिक सुख, संतान प्राप्ति, उत्तम शिक्षा, करियर में सफलता और आर्थिक समृद्धि का मार्ग प्रशスト होता है। गुरुवार के दिन देवगुरु बृहस्पति की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और उनके व्रत रखे जाते हैं। इस पवित्र अनुष्ठान में श्री बृहस्पति देव की आरती का गान करना साधक के जीवन के समस्त दुखों, संशयों और पापों का नाश कर आध्यात्मिक व भौतिक उन्नति प्रदान करता है। इस लेख में हम बृहस्पति देव की संपूर्ण आरती, उसका सरल हिंदी भावार्थ, पूजा विधि, और उसके आध्यात्मिक महत्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण आरती पाठ | Complete Aarti Lyrics

॥ श्री बृहस्पति देव की आरती ॥

ऊँ जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा ।
छिन छिन भोग लगाऊँ, कदली फल मेवा ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा ॥

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी ।
जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा ॥

चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता ।
सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा ॥

तन मन धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े ।
प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्घार खड़े ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा ॥

दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी ।
पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा ॥

सकल मनोरथ दायक, सब संशय हारो ।
विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा ॥

जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहित गावे ।
जेठानन्द आनन्दकर, सो निश्चय पावे ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा ॥

सब बोलो विष्णु भगवान की जय ।
बोलो वृहस्पतिदेव भगवान की जय ।

आरती का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Meaning & Bhavarth

बृहस्पति देव की यह आरती अत्यंत महिमामंडित और भक्ति रस से ओतप्रोत है। इसके प्रत्येक पद में देवगुरु की महानता और उनके शरणागत भक्तों पर होने वाली कृपा का वर्णन किया गया है। आरती के आरंभ में भक्तगण देवगुरु का आवाहन करते हुए उन्हें कदली फल (केला) और विभिन्न प्रकार के मेवे का भोग अर्पित करते हैं। सनातन परंपरा में बृहस्पति पूजन में केले के वृक्ष और पीले नैवेद्य का विशेष महत्व है।

मध्यवर्ती पंक्तियों में भक्त भगवान को 'पूरण परमात्मा', 'अन्तर्यामी', 'जगतपिता' और 'जगदीश्वर' के रूप में संबोधित करते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि बृहस्पति देव केवल ग्रहों के ही स्वामी नहीं हैं, बल्कि समस्त चराचर जगत के पालनहार श्री हरि विष्णु के ही स्वरूप हैं। उनका चरणामृत साधक के समस्त पापों (पातक) का शमन करने वाला और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है। जो भी भक्त अपना तन-मन-धन समर्पित करके सच्चे भाव से उनकी शरण में जाता है, बृहस्पति देव उसके संकटों को दूर करने के लिए तत्काल प्रकट होते हैं।

अंतिम चरणों में यह बताया गया है कि जो मनुष्य प्रेम और श्रद्धा के साथ इस आरती का गान करता है, उसके जीवन से समस्त विषय-विकार और संशय समाप्त हो जाते हैं तथा उसे आत्मानंद की प्राप्ति होती है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Words

शब्द / पदावली सरल अर्थ संदर्भ / प्रसंग
कदली फल केला बृहस्पति पूजन में प्रिय भोग सामग्री
अन्तर्यामी मन की बात जानने वाला भगवान बृहस्पति की सर्वज्ञता हेतु
चरणामृत चरणों का पवित्र जल समस्त पापों का नाश करने वाला
पातक हर्ता पापों को हरने वाला कष्टों और दोषों का निवारण
भव बंधन संसार के मोह-माया के बंधन मोक्ष प्राप्ति का मार्ग
विषय विकार काम, क्रोध, लोभ आदि मानसिक दुर्गुण आध्यात्मिक शुद्धि

आरती में वर्णित देवता की महिमा | Glory of the Deity

देवगुरु बृहस्पति (जिसे ग्रहराज गुरु भी कहा जाता है) देवलोक के प्रधानमंत्री और देवताओं के आचार्य हैं। पुराणों के अनुसार, वे अंगिरा ऋषि के पुत्र और महर्षि ब्रह्मणस्पति के रूप में वेदों में पूजित हैं। बृहस्पति देव की कृपा से जातक को बुद्धि, विवेक, उच्च शिक्षा, धर्मपरायणता और वाक्पटुता की प्राप्ति होती है। जिन जातकों की कुंडली में गुरु मजबूत होता है, उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में मान-सम्मान और नैतिक नेतृत्व का अवसर मिलता है। बृहस्पति देव की आराधना करने से विशेष रूप से वैवाहिक जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और कन्याओं के विवाह के मार्ग में आने वाले अड़चनें समाप्त होती हैं। इसके साथ ही, बृहस्पति व्रत कथा का श्रवण करने से घर में सुख-शांति और ऐश्वर्य का वास होता है।

आरती का धार्मिक महत्व एवं फल | Religious Significance & Traditional Benefits

गुरुवार का दिन भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति को समर्पित है। इस दिन व्रत रखने वाले और प्रात्यूष एवं संध्या काल में इस पावन आरती का पाठ करने वाले साधक को बृहस्पति देव की असीम अनुकंपा प्राप्त होती है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार:

  • बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि: विद्यार्थियों के लिए यह आरती अत्यंत लाभकारी है, जिससे एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ती है।
  • वैवाहिक सुख: जिन जातकों के विवाह में विलंब हो रहा हो, वे गुरुवार को पीला वस्त्र धारण कर इस आरती का पाठ करें तो शीघ्र ही शुभ परिणाम मिलते हैं।
  • आर्थिक संपन्नता: कर्ज मुक्ति और व्यापार में वृद्धि के लिए बृहस्पति देव का पूजन अचूक उपाय माना गया है।
  • पाप नाश: भगवान बृहस्पति के चरणामृत का पान और आरती गान से मानसिक संताप व नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।

आरती करने की सही विधि एवं थाली सज्जा | Aarti Vidhi & Thali Preparation

देवगुरु बृहस्पति की आरती को पूर्ण विधि-विधान के साथ करना चाहिए ताकि अनुष्ठान का पूर्ण फल प्राप्त हो सके:

  • थाली की सज्जा: चांदी, पीतल या तांबे की थाली में शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। कपूर, धूपबत्ती, पीले पुष्प, अक्षत (चावल), रोली और पीले नैवेद्य (विशेषकर बेसन के लड्डू या केले) को थाली में रखें।
  • आसन और वस्त्र: साधक को स्नान करके पीले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए, क्योंकि पीला रंग बृहस्पति देव का प्रिय रंग है।
  • पूजन स्थल: केले के पेड़ के समीप या घर के ईशान कोण में बृहस्पति देव (या भगवान विष्णु) की मूर्ति/चित्र स्थापित कर उनका पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन करें।
  • आरती का क्रम: दीपक प्रज्वलित करने के बाद प्रेम और तालबद्ध स्वर में "ऊँ जय वृहस्पति देवा..." का गान करें।

आरती करने का सही समय, दिशा एवं दीप घुमाने की विधि | Best Time & Movement

गुरुवार के दिन प्रातःकाल सूर्योदय के समय तथा संध्याकाल में गोधूलि बेला में यह आरती करना अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। आरती करते समय साधक का मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। दीप घुमाने की विधि में, सबसे पहले भगवान के चरणों में चार बार, नाभि या मध्य भाग में दो बार, और मुखमंडल पर तीन बार दीपक घुमाया जाता है। इसके पश्चात समस्त अंगों पर सात बार गोल घुमाकर आरती को संपूर्ण किया जाता है। आरती के अंत में दोनों हाथों से दीप की ज्योति को माथे से लगाकर चरणामृत ग्रहण किया जाता है।

आरती के दौरान घंटी, शंख एवं दीप का महत्व | Bell, Conch & Lamp Symbolism

सनातन पूजा पद्धति में आरती के समय घंटी और शंख बजाने का गहरा दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व है। घंटी की ध्वनि से उत्पन्न होने वाला नाद आसपास की नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करता है और मन को एकाग्र करता है। शंखनाद से ब्रह्मांडीय स्पंदन सक्रिय होता है जो सकारात्मक शक्तियों को आकर्षित करता है। घी का दीपक इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान का प्रकाश हमारे भीतर के अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर रहा है। इसके साथ ही, साधक अपनी समस्त बुराइयों को इस अग्नि में समर्पित करने का संकल्प लेता है।

घर में आरती कैसे करें एवं सावधानियां | Home Aarti & Rules

घर में बृहस्पति देव की आरती करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है:

    H3>सावधानियां
  • पूजा घर पूरी तरह स्वच्छ और पवित्र होना चाहिए।
  • आरती के समय शुद्ध गाय के घी का दीपक जलाना सर्वोत्तम माना जाता है।
  • आरती पूर्ण होने के बाद उपस्थित सभी भक्तों में प्रसाद का वितरण अवश्य करना चाहिए।
  • महिलाएं एवं पुरुष दोनों ही गुरुवार के व्रत और इस आरती का पाठ कर सकते हैं, बशर्ते वे पूर्ण शुचिता और संयम का पालन करें।

आरती का आध्यात्मिक संदेश एवं दैनिक जीवन सीख | Spiritual Message & Daily Life

यह आरती हमें यह सिखाती है कि जीवन में बिना गुरु के ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति असंभव है। देवगुरु बृहस्पति हमें सदाचार, विनम्रता, परोपकार और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। जिस प्रकार गुरु अपने शिष्यों के सभी संशयों को दूर कर उन्हें सही दिशा दिखाते हैं, उसी प्रकार हमें भी अपने जीवन में अहंकार का त्याग कर गुरु और ईश्वर की शरणागति स्वीकार करनी चाहिए। नियमित रूप से श्री बृहस्पति देव की आरती का गान करने से हमारे भीतर संतोष, करुणा और सेवाभाव का विकास होता है।

Quick Information Table | आरती की संक्षिप्त जानकारी

विवरण तथ्य
आरती का नाम श्री बृहस्पति देव की आरती (Shri Brihaspati Dev Ji Ki Aarti)
आराध्य देवता देवगुरु बृहस्पति / भगवान श्री हरि विष्णु
प्रमुख वार गुरुवार (Brihaspativar)
प्रिय भोग कदली फल (केला), बेसन के लड्डू, पीले मेवे
प्रिय रंग पीला (Yellow)
मुख्य लाभ बुद्धि, विवेक, वैवाहिक सुख, और संतान प्राप्ति
भाषा सरल हिंदी / ब्रजभाषा मिश्रित

मुख्य आध्यात्मिक सीख | Key Takeaways

  • देवगुरु बृहस्पति ज्ञान, विवेक और धर्म के सर्वोच्च प्रतीक हैं।
  • गुरुवार के दिन व्रत और आरती करने से वैवाहिक और पारिवारिक जीवन के कष्ट दूर होते हैं।
  • आरती का गान मन को शांत करता है और नकारात्मकता का नाश करता है।
  • सच्चे मन से शरणागत होने पर भगवान भक्तों के सभी संकटों का निवारण करते हैं।
  • पीले वस्त्र, केले का भोग और शुद्ध घी का दीपक बृहस्पति पूजन के अनिवार्य अंग हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: श्री बृहस्पति देव की आरती किस दिन की जानी चाहिए?

उत्तर: बृहस्पति देव की आरती विशेष रूप से गुरुवार के दिन प्रातः और संध्या काल में की जानी चाहिए। इसके अलावा बृहस्पति व्रत के दिन भी इसका पाठ करना अनिवार्य माना गया है।

प्रश्न 2: बृहस्पति देव की पूजा में कौन सा भोग चढ़ाना चाहिए?

उत्तर: बृहस्पति देव को कदली फल (केला), बेसन के लड्डू, चने की दाल और पीले मिष्ठान्न का भोग अत्यंत प्रिय है।

प्रश्न 3: बृहस्पति देव की आरती करने का क्या लाभ है?

उत्तर: इस आरती के पाठ से ज्ञान, बुद्धि, उत्तम स्वास्थ्य, वैवाहिक सुख, करियर में सफलता और आर्थिक समृद्धि की प्राप्ति होती है तथा पापों का नाश होता है।

प्रश्न 4: क्या महिलाएं बृहस्पति देव का व्रत रख सकती हैं?

उत्तर: हां, महिलाएं और पुरुष दोनों ही बृहस्पति देव का व्रत रख सकते हैं और इस आरती का गान कर सकते हैं। विशेषकर सुखी वैवाहिक जीवन और अच्छे वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत बहुत फलदायी माना जाता है।

प्रश्न 5: आरती के समय कौन से रंग के वस्त्र पहनना शुभ होता है?

उत्तर: बृहस्पति देव का प्रिय रंग पीला है, इसलिए पूजा के दौरान पीले वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

प्रश्न 6: क्या बृहस्पति देव और भगवान विष्णु एक ही हैं?

उत्तर: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवगुरु बृहस्पति को भगवान विष्णु का ही रूप या उनके अनुग्रह का प्रतीक माना जाता है, इसलिए कई स्थानों पर विष्णु जी की पूजा के साथ ही बृहस्पति पूजन किया जाता है।

प्रश्न 7: बृहस्पति देव की आरती का मुख्य भाव क्या है?

उत्तर: इस आरती का मुख्य भाव भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण, अपने संशयों और विकारों का नाश करना तथा गुरु की कृपा से जीवन को आलोकित करना है।

प्रश्न 8: क्या घर पर केले के पेड़ की पूजा करना अनिवार्य है?

उत्तर: यदि घर में केले का पेड़ उपलब्ध हो तो उसकी पूजा करना बहुत उत्तम है, अन्यथा आप भगवान विष्णु या बृहस्पति देव के चित्र के समक्ष भी पूजा और आरती संपन्न कर सकते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री सनातन धर्म के पौराणिक ग्रंथों, ज्योतिषीय परंपराओं और पारंपरिक व्रत कथाओं के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध पाठ, सही विधि और धार्मिक व आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • बृहस्पति व्रत कथा एवं पूजन पद्धति (धार्मिक ग्रंथ)
  • नारद पुराण एवं ज्योतिष शास्त्र ग्रंथ
  • सनातन वैदिक कर्मकांड एवं आरती संग्रह

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 04 Nov 2026

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