🙏 कहेहु तात अस मोर प्रनामा
सब प्रकार प्रभु पूरनकामा (The Complete Lord, Remover of Devotees' Sorrows)
🌟 प्रसंग परिचय – भक्त की विनम्र प्रार्थना
श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड में यह अत्यंत मार्मिक चौपाई आती है, जहाँ हनुमान जी या कोई भक्त भगवान श्रीराम से प्रार्थना कर रहा है – “कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥ दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥” अर्थात् हे प्रभु! मेरा यह प्रणाम स्वीकार करें। आप सभी प्रकार से पूर्ण एवं सर्वसमर्थ हैं। आप दीनों पर दया करने वाले हैं – यह आपका प्रतिज्ञात स्वभाव है। हे नाथ! इसी अपने दयालु स्वभाव को स्मरण करके मेरे भारी से भारी संकट को दूर कर दीजिए।
यह चौपाई भक्ति का सर्वोत्तम उदाहरण है – भक्त ने पूर्ण विश्वास के साथ प्रभु के चरणों में अपनी व्यथा रख दी है। वह न तो संकट की गणना करता है, न ही अपनी योग्यता का बखान। केवल प्रभु के “दीन दयाल” स्वरूप का स्मरण करके उनसे सहायता माँगता है।
📖 चौपाई का अर्थ (Meaning of the Chaupai)
🕉️ हिंदी अर्थ
कहेहु तात अस मोर प्रनामा।
“हे प्रभु! यह (मेरा) प्रणाम स्वीकार कीजिए।”
सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
“आप सब प्रकार से पूर्ण और सब मनोरथों को सिद्ध करने वाले हैं।”
दीन दयाल बिरिदु संभारी।
“आप दीनों पर दया करने वाले हैं – इस अपने स्वभाव को स्मरण करके,”
हरहु नाथ मम संकट भारी॥
“हे नाथ! मेरे भारी संकट को दूर कर दीजिए।”
🌍 English Meaning
Accept this my salutation, O Lord.
You are completely capable and fulfiller of all desires.
Remembering Your vow of being compassionate to the humble,
O Master, remove my heavy afflictions.
🕉️ रामचरितमानस में संदर्भ (Context in Ramcharitmanas)
यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में उस समय आती है जब हनुमान जी समुद्र लाँघकर लंका पहुँचते हैं, सीता जी से मिलते हैं और लंका दहन करके वापस लौटते हैं। प्रायः यह चौपाई हनुमान जी के मुख से राम-सीता की वंदना के रूप में या श्रीराम के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए कही गई है। कुछ संस्करणों में यह भक्त (हनुमान) की ओर से भगवान राम को संकट हरने की प्रार्थना है।
तुलसीदास जी ने इस चौपाई के माध्यम से यह दिखाया है कि सच्चा भक्त किस प्रकार प्रभु के सामने अपनी विनती रखता है – पूर्ण विनम्रता, अटूट विश्वास और प्रभु के गुणों के स्मरण के साथ।
✨ “दीन दयाल बिरिदु” – भगवान का अद्वितीय स्वभाव
- दीन दयाल : भगवान का स्वरूप ही करुणा है। वे दीनों, निर्बलों, शरणागतों पर विशेष दया रखते हैं।
- बिरिदु (प्रतिज्ञा) : यह केवल गुण नहीं, उनका वचन है – “मैं अपने भक्त की रक्षा करूँगा।” राम ने वनवास जाते समय भी निज भक्तों की रक्षा का वचन दिया था।
- संकट हरने की शक्ति : “सब प्रकार प्रभु पूरनकामा” – भगवान सभी प्रकार से समर्थ हैं। वे सबकी मनोकामनाएँ पूर्ण कर सकते हैं, विशेषकर अपने भक्तों की।
शरणागति का मंत्र
यह चौपाई शरणागति का सूत्र है – “मैं दीन हूँ, आप दयालु हैं, अतः मेरी रक्षा कीजिए।”
आध्यात्मिक दृष्टि : यह चौपाई हमें सिखाती है कि भगवान के सामने अपनी व्यथा रखने के लिए हमें अपनी योग्यता या तप का बखान नहीं करना है। केवल प्रभु की दयालुता को स्मरण करते हुए उनके चरणों में अपना भार रख देना ही सच्ची प्रार्थना है।
🙏 शरणागति का मर्म – जीवन में उतारें ये सीखें
🔱 “सब प्रकार प्रभु पूरनकामा” – प्रभु की पूर्णता
भगवान राम ने अपने जीवन में अनेक असंभव कार्यों को संभव किया – समुद्र पर सेतु बनाना, रावण जैसे महाबली का वध करना, भक्तों के संकटों को हरना। यही उनकी “पूर्णता” है।
🌟 प्रभु की सामर्थ्य
- अहिल्या का उद्धार – केवल चरण-स्पर्श से
- समुद्र पर पुल बनवाना – केवल संकल्प मात्र से
- लंका विजय – मात्र भक्त हनुमान के सहारे
- भक्तों के संकट हरना – सबके लिए समान रूप से
🙏 भक्त के लिए
भक्त के लिए प्रभु की पूर्णता का अर्थ है कि उसकी कोई भी समस्या प्रभु के लिए असम्भव नहीं है। चाहे वह भौतिक हो, मानसिक हो या आध्यात्मिक – सब कुछ प्रभु की शक्ति के अधीन है।
📜 पौराणिक एवं आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य (Mythological & Spiritual Perspective)
इस चौपाई में वर्णित “दीन दयाल बिरिदु” का उल्लेख पूरे रामायण में बार-बार आता है। भगवान राम ने स्वयं कहा है – “जो मेरी शरण में आता है, उसका मैं सब प्रकार से पालन करता हूँ।”
आध्यात्मिक दृष्टि से, यह चौपाई “शरणागति” का सूत्र है। शरणागति के छह अंगों में से एक है – “भारन्यास” अर्थात अपना सारा भार प्रभु पर छोड़ देना। यहाँ भक्त ने अपने संकटों का भार प्रभु पर डाल दिया है, किन्तु पहले उसने प्रभु की सामर्थ्य और दयालुता को स्वीकार किया है।
इस चौपाई का नियमित पाठ करने वाले भक्त को आत्मविश्वास और शांति मिलती है। वह जानता है कि उसके जीवन का भार प्रभु संभाल लेंगे।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1 : यह चौपाई किसने कही है – हनुमान जी या कोई अन्य भक्त?
उत्तर : अधिकांश संस्करणों में यह चौपाई हनुमान जी के मुख से कही गई मानी जाती है। यह उनके श्रीराम के प्रति समर्पण और उनसे सहायता की प्रार्थना का रूप है।
प्रश्न 2 : इस चौपाई का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
उत्तर : इसे किसी भी संकट के समय, या नियमित प्रार्थना के रूप में पढ़ा जा सकता है। विशेषकर जब मन व्याकुल हो, यह चौपाई प्रभु की दयालुता का स्मरण कराके शांति देती है।
प्रश्न 3 : क्या भगवान सचमुच “दीन दयाल” हैं? क्या वे सभी के संकट हरते हैं?
उत्तर : हाँ, भगवान का स्वरूप ही करुणा है। परन्तु उनकी कृपा का अनुभव श्रद्धा और समर्पण से ही होता है। यह चौपाई उसी श्रद्धा का अभ्यास कराती है।
प्रश्न 4 : क्या इस चौपाई में भक्त ने कोई माँग की है?
उत्तर : हाँ, उसने संकट हरने की माँग की है, किन्तु यह माँग बिना किसी अहंकार के, केवल प्रभु के स्वभाव को स्मरण करके की गई है। यह शरणागति का उत्तम रूप है।
🕉️ जीवन में उतारें यह शिक्षा (Apply in Life)
- प्रार्थना में विनम्रता : जब भी आप प्रार्थना करें, पहले प्रभु को प्रणाम करें और उनकी महिमा का स्मरण करें।
- प्रभु की सामर्थ्य पर विश्वास : कठिन परिस्थितियों में यह विश्वास रखें कि प्रभु सब कुछ कर सकते हैं।
- दयालु स्वभाव का स्मरण : प्रभु से प्रार्थना करते समय उनके “दीन दयाल” गुण का स्मरण अवश्य करें।
- भार प्रभु पर छोड़ें : अपने संकटों का बोझ स्वयं ढोने के बजाय, प्रभु के चरणों में रख दें।
🙌 महान संतों के विचार (Words of Saints)
“दीन दयाल भगवान का यह बिरद (प्रतिज्ञा) है कि जो भी उनकी शरण में आता है, उसकी रक्षा करना वे अपना कर्तव्य समझते हैं।”
- स्वामी रामसुखदास
“यह चौपाई सिखाती है कि भक्त को केवल अपनी दीनता और प्रभु की दयालुता को सामने रखकर ही प्रार्थना करनी चाहिए। और कुछ नहीं चाहिए।”
- संत तुलसीदास