shanidev bhajan बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

शनि चलीसा (Shani Chalisha in Hindi)

भक्ति भजन "शनि चलीसा (Shani Chalisha in Hindi)" के हिन्दी लिरिक्स, भावार्थ, माहात्म्य और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)। सनातन भक्ति परंपरा के अनुसार संकीर्तन के लाभ और विधि पढ़ें।

प्रस्तावना एवं परिचय

मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

Bhaktilok

।। दोहा ।।

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल ।

दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल ।।

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज ।

करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज ।।

जयति जयति शनिदेव दयाला । 

करत सदा भक्तन प्रतिपाला ।।

चारि भुजा, तनु श्याम विराजै । 

माथे रतन मुकुट छवि छाजै ।।

परम विशाल मनोहर भाला । 

टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ।।

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके । 

हिये माल मुक्तन मणि दमके ।।

कर में गदा त्रिशूल कुठारा । 

पल बिच करैं आरिहिं संहारा ।।

पिंगल, कृष्णों, छाया, नन्दन । 

यम, कोणस्थ, रौद्र, दुख भंजन ।।

सौरी, मन्द, शनि, दश नामा । 

भानु पुत्र पूजहिं सब कामा ।।

जा पर प्रभु प्रसन्न है जाहीं । 

रंकहुं राव करैंक्षण माहीं ।।

पर्वतहू तृण होई निहारत । 

तृण हू को पर्वत करि डारत ।।

राज मिलत बन रामहिं दीन्हो । 

कैकेइहुं की मति हरि लीन्हों ।।

बनहूं में मृग कपट दिखाई । 

मातु जानकी गई चतुराई ।।

लखनहिं शक्ति विकल करि डारा । 

मचिगा दल में हाहाकारा ।।

रावण की गति-मति बौराई । 

रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई ।।

दियो कीट करि कंचन लंका । 

बजि बजरंग बीर की डंका ।।

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा । 

चित्र मयूर निगलि गै हारा ।।

हार नौलाखा लाग्यो चोरी । 

हाथ पैर डरवायो तोरी ।।

भारी दशा निकृष्ट दिखायो । 

तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो ।।

विनय राग दीपक महं कीन्हों । 

तब प्रसन्न प्रभु है सुख दीन्हों ।।

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी । 

आपहुं भरे डोम घर पानी ।।

तैसे नल परदशा सिरानी । 

भूंजी-मीन कूद गई पानी ।।

श्री शंकरहि गहयो जब जाई । 

पार्वती को सती कराई ।।

तनिक विलोकत ही करि रीसा । 

नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा ।।

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी । 

बची द्रौपदी होति उघारी ।।

कौरव के भी गति मति मारयो । 

युद्घ महाभारत करि डारयो ।।

रवि कहं मुख महं धरि तत्काला । 

लेकर कूदि परयो पाताला ।।

शेष देव-लखि विनती लाई । 

रवि को मुख ते दियो छुड़ई ।।

वाहन प्रभु के सात सुजाना । 

जग दिग्ज गर्दभ मृग स्वाना ।।

जम्बुक सिंह आदि नखधारी । 

सो फल जज्योतिष कहत पुकारी ।।

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं । 

हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं ।।

गर्दभ हानि करै बहु काजा । 

गर्दभ सिद्घ कर राज समाजा ।।

जम्बुक बुद्घि नष्ट कर डारै । 

मृग दे कष्ट प्रण संहारै ।।

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी । 

चोरी आदि होय डर भारी ।।

तैसहि चारि चरण यह नामा । 

स्वर्ण लौह चांजी अरु तामा ।।

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं । 

धन जन सम्पत्ति नष्ट करावै ।।

समता ताम्र रजत शुभकारी । 

स्वर्ण सर्व सुख मंगल कारी ।।

जो यह शनि चरित्र नित गावै । 

कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ।।

अदभुत नाथ दिखावैं लीला । 

करैं शत्रु के नशि बलि ढीला ।।

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई । 

विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ।।

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत । 

दीप दान दै बहु सुख पावत ।।

कहत रामसुन्दर प्रभु दासा । 

शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ।।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "शनि चलीसा (Shani Chalisha in Hindi) - Bhaktilok" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।

भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।

भजनों को गाने की सही विधि क्या है?

भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।

क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?

हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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