Hindu • वर्ष २०२६

Jyeshtha Amavasya 2026 | Vat Savitri Vrat | Shani Jayanti | ज्येष्ठ अमावस्या 2026

वट सावित्री व्रत, शनि जयंती और अमावस्या का त्रिवेणी संगम | Sacred confluence of New Moon, Vat Savitri fasting for husband's longevity, and the birth anniversary of Lord Shani.

१६ मई २०२६, शनिवार तिथि व दिनांक
Hindu धार्मिक श्रेणी
२४४ कुल पाठक संख्या
१० मिनट पठन अवधि
महत्वपूर्ण सारांश: वट सावित्री व्रत, शनि जयंती और अमावस्या का त्रिवेणी संगम | Sacred confluence of New Moon, Vat Savitri fasting for husband's longevity, and the birth anniversary of Lord Shani.
पावन पर्व तिथि एवं समय निर्धारण
प्रारंभ / मुख्य तिथि: १६ मई २०२६, शनिवार
विशेष उत्सव क्षेत्र: India

Jyeshtha Amavasya 2026: वट सावित्री व्रत, शनि जयंती और पितृ तर्पण का दिव्य संयोग

Jyeshtha Amavasya, जिसे ज्येष्ठ अमावस्या के नाम से जाना जाता है, हिंदू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। यह ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि होती है। वर्ष 2026 में यह पुण्य दिवस शनिवार, 16 मई को मनाया जाएगा। इस दिन एक साथ तीन महत्वपूर्ण पर्वों का संगम हो रहा है: ज्येष्ठ अमावस्या (पितृ तर्पण और स्नान-दान के लिए उत्तम), वट सावित्री व्रत (विवाहित महिलाओं द्वारा पति की दीर्घायु के लिए वट वृक्ष की पूजा), और शनि जयंती (न्याय के देवता भगवान शनि का जन्मोत्सव)। तीनों पर्वों का एक साथ पड़ना इस दिन को अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली बना देता है।

✨ ज्येष्ठ अमावस्या, वट सावित्री और शनि जयंती का धार्मिक महत्व

ज्येष्ठ अमावस्या का पितृ कार्यों और गंगा स्नान के लिए विशेष महत्व है। इस दिन किए गए तर्पण और पिंडदान से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। वहीं, वट सावित्री व्रत की कथा सत्यवान और सावित्री के अमर प्रेम और सावित्री के धैर्य व बुद्धिमत्ता पर आधारित है। इस दिन विवाहित महिलाएं वट (बरगद) वृक्ष की परिक्रमा करती हैं और कच्चे सूत का धागा लपेटकर पति की लंबी आयु की कामना करती हैं।

इसी दिन भगवान शनि का जन्म भी मनाया जाता है। शनि देव सूर्य पुत्र हैं और कर्मफल दाता माने जाते हैं। शनिवार को अमावस्या पड़ने से यह दिन शनि संबंधी दोषों के निवारण के लिए अत्यंत प्रभावी हो जाता है।

🔭 ज्येष्ठ अमावस्या 2026: तिथि एवं शुभ मुहूर्त

16 मई 2026 को तीनों पर्व एक साथ मनाए जाएंगे। वट सावित्री व्रत के लिए पूजा का शुभ समय और शनि जयंती के लिए तेलाभिषेक का मुहूर्त जानना आवश्यक है।

📅 ज्येष्ठ अमावस्या / वट सावित्री व्रत 2026 तिथि एवं मुहूर्त (Date & Auspicious Timings)
  • अमावस्या तिथि प्रारंभ: 15 मई 2026, रात्रि 09:15 बजे से।
  • अमावस्या तिथि समाप्त: 16 मई 2026, रात्रि 11:02 बजे तक।
  • व्रत एवं स्नान-दान दिवस: 16 मई 2026, शनिवार (उदया तिथि अनुसार)।
  • वट सावित्री पूजा का श्रेष्ठ समय: 16 मई 2026, प्रातः 05:45 से 08:15 तक (प्रातः काल) या दोपहर 12:00 से 03:00 तक।
  • शनि जयंती तेलाभिषेक मुहूर्त: प्रातः 05:30 से 07:00 तक।
  • अभिजीत मुहूर्त: प्रातः 11:55 से 12:45 तक।
  • राहुकाल (Avoid): प्रातः 09:00 से 10:30 तक।

नोट: ये समय नई दिल्ली के लिए हैं। अन्य शहरों में स्थानीय पंचांग देखकर समय की पुष्टि अवश्य करें।

🌞 ज्योतिषीय विशेषताएँ एवं ग्रह स्थितियाँ (Astrological Significance & Planetary Configurations)

16 मई 2026 को अमावस्या, शनि जयंती और वट सावित्री व्रत का संयोग शनि और शुक्र ग्रहों से संबंधित समस्याओं के निवारण के लिए अत्यंत शुभ है।

  • सूर्य (Sun): वृषभ राशि में स्थित होंगे।
  • चंद्रमा (Moon): वृषभ राशि में ही सूर्य के साथ युति कर रहे होंगे, जिससे अमावस्या का योग बनेगा।
  • शनि (Saturn): कुंभ राशि में अपनी ही राशि में स्थित होंगे, जिससे 'शनि जयंती' का महत्व बढ़ जाता है।
  • गुरु (Jupiter): मिथुन राशि में स्थित होकर शनि पर तीसरी दृष्टि डाल रहे होंगे, जिससे शनि के अशुभ प्रभाव कम होंगे।
  • शुक्र (Venus): मेष राशि में स्थित होंगे। वट सावित्री व्रत शुक्र ग्रह को बल देता है, जिससे वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है।

शनिवार के दिन अमावस्या पड़ने से यह दिन 'शनि अमावस्या' कहलाता है। यह उन लोगों के लिए स्वर्णिम अवसर है जो जीवन में देरी, कुंडली में शनि की साढ़े साती या ढैय्या से परेशान हैं। वहीं, वट सावित्री व्रत करने से शुक्र और शनि के बीच यदि कोई अशुभ योग है तो उसका शमन होता है और दांपत्य जीवन में सामंजस्य बढ़ता है।

🔴 ज्योतिषीय उपाय (Astrological Remedies): इस दिन शनि मंदिर में जाकर सरसों का तेल, काला तिल, और काला कपड़ा चढ़ाएं। वट वृक्ष की पूजा करने से कुंडली में शुक्र और चंद्रमा के दोष दूर होते हैं। अमावस्या के दिन पितरों के निमित्त किए गए दान से पितृ दोष समाप्त होता है।

🛕 वट सावित्री व्रत पूजा विधि (Vat Savitri Vrat Puja Vidhi)

वट सावित्री व्रत के दिन विवाहित महिलाएं प्रातः काल उठकर स्नान करती हैं और सोलह श्रृंगार करती हैं। वे पास के बरगद के पेड़ के पास जाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठती हैं।

वट वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करें और उसे रोली, चावल, फूल चढ़ाएं। इसके बाद कच्चे सूत या लाल धागे को वृक्ष के तने के चारों ओर लपेटते हुए 7 या 11 परिक्रमा करें। परिक्रमा करते समय 'सत्यवान सावित्री' की कथा का स्मरण करें।

पूजा के बाद बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर सत्यवान-सावित्री की कथा सुनें या पढ़ें। व्रत का पारण करने से पहले किसी सुहागिन महिला को श्रृंगार का सामान या वस्त्र दान करें और अपनी सास या माता जी का आशीर्वाद लें।

🪐 शनि जयंती पूजन एवं तेलाभिषेक विधि (Shani Jayanti Rituals)

शनि जयंती के दिन भगवान शनि की विशेष पूजा की जाती है। शनि मंदिर में जाकर या घर पर शनि यंत्र के समक्ष सरसों का तेल, काले तिल, काले फूल और नीले वस्त्र चढ़ाएं। शनि देव को प्रिय 'शनि चालीसा' और 'दशरथ कृत शनि स्तोत्र' का पाठ करें।

इस दिन तेलाभिषेक का विशेष महत्व है। शनि प्रतिमा पर सरसों या तिल का तेल चढ़ाएं और 'ॐ शं शनैश्चराय नमः' मंत्र का 108 बार जाप करें। इस दिन काली गाय, कौवे, या गरीबों को भोजन कराना शनि देव को प्रसन्न करने का सबसे सरल उपाय है।

🗺️ भारत के प्रमुख स्थलों पर उत्सव (Regional Celebrations)

बिहार / झारखंड - वट सावित्री

यहाँ की महिलाएं बरगद के पेड़ की विशेष पूजा करती हैं और चूड़ी, सिंदूर और मिठाई का आदान-प्रदान करती हैं। सावित्री-सत्यवान की लोककथाओं का गायन होता है।

महाराष्ट्र - शनि जयंती और वट पूर्णिमा

शिंगणापुर और अन्य शनि मंदिरों में शनि जयंती पर भव्य आयोजन होता है। वहीं महिलाएं ज्येष्ठ पूर्णिमा तक व्रत रखकर वट वृक्ष की पूजा करती हैं।

उत्तर भारत - गंगा स्नान एवं शनि मंदिर

हरिद्वार और प्रयागराज में ज्येष्ठ अमावस्या पर गंगा स्नान के लिए श्रद्धालु आते हैं। वहीं दिल्ली और मेरठ के प्राचीन शनि मंदिरों में शनि जयंती की धूम रहती है।

दक्षिण भारत - शनि तैलाभिषेकम

तमिलनाडु और कर्नाटक में इस दिन शनि देव का तेलाभिषेकम किया जाता है। तिरुनल्लर के शनि मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है।

📿 प्रमुख मंत्र (Important Mantras)

वट सावित्री मंत्र

'वटस्य मूले तु शिवं प्रपन्ना, सावित्रि त्वं च सत्यवन्तम्। पुत्राश्च पौत्राश्च सुखं च वृद्धिं, देहि द्विजानां च शुभं सदा मे।।'

शनि बीज मंत्र

'ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।'

अमावस्या तर्पण मंत्र

'ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।'

🌿 सामाजिक एवं पर्यावरणीय संदेश

वट सावित्री व्रत हमें बरगद जैसे दीर्घजीवी वृक्षों के संरक्षण का संदेश देता है। यह पर्व नारी शक्ति और पतिव्रता धर्म का प्रतीक है। वहीं शनि जयंती हमें सिखाती है कि कर्म का फल अवश्य मिलता है, इसलिए सदैव न्याय और ईमानदारी के मार्ग पर चलना चाहिए। अमावस्या का दिन हमें अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देता है।

💡 महत्वपूर्ण सुझाव (Important Tips)

  1. वट सावित्री का व्रत कर रही महिलाएं पूरे दिन निर्जला या फलाहार रह सकती हैं। व्रत में चने की दाल और गुड़ का सेवन शुभ है।
  2. शनि जयंती पर यदि संभव हो तो काले कुत्ते या कौवे को भोजन कराएं।
  3. अमावस्या के दिन किसी भी पवित्र नदी में स्नान करें या घर में गंगाजल मिले पानी से स्नान करें।
  4. शनि मंदिर में दीपक जलाते समय केवल तिल या सरसों का तेल ही प्रयोग करें।
  5. इस दिन पितरों के नाम से ब्राह्मणों को भोजन कराना और वस्त्र दान करना अत्यंत पुण्यदायी है।

🙏 ज्येष्ठ अमावस्या, वट सावित्री व्रत एवं शनि जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ

इस पावन त्रिवेणी पर आप सभी को अनंत शुभकामनाएं। माता सावित्री की कृपा से सभी सुहागिनों का सौभाग्य अखंड रहे। भगवान शनि देव की कृपा से आपके सभी कष्ट दूर हों और आपके कर्मों का फल शुभ हो। आपके पितर तृप्त हों और आपके परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहे।

जय शनि देव! वट सावित्री व्रत की शुभकामनाएं!

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु व सनातन पंचांग परंपराओं के संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा संकलित किया गया है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा

अन्य महत्वपूर्ण सनातन त्यौहार व व्रत