चैत्र नवरात्रि में अपराजिता पूजन की अद्भुत कथा | Aparajita Puja in Chaitra Navratri – Wonderful Story

26 Mar 2026 160 पाठ ~7 मिनट पाठ ~1094 शब्द 🕉️ Aparajita
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🏵️ अपराजिता पूजन – अजेयता की देवी

जब चैत्र नवरात्रि की नवमी पर अपराजिता ने बदली पराजय को विजय में

🙏 वह पूजन जिसने राजा को दिलाई अजेयता – पढ़ें अद्भुत कथा 🙏

🕉️ प्रस्तावना – अपराजिता कौन हैं?

नवरात्रि के नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा होती है। इनमें से अपराजिता नवमी (या दशमी) के दिन पूजित होने वाली देवी हैं। ‘अपराजिता’ का अर्थ है – ‘जिसे कोई पराजित न कर सके’। वे अजेय शक्ति हैं। चैत्र नवरात्रि में विशेष रूप से अपराजिता पूजन का विधान है। यह कथा एक राजा की है, जो युद्ध में हार रहा था, पर माँ अपराजिता की कृपा से उसने असंभव को संभव कर दिखाया। आइए, इस अद्भुत कथा को विस्तार से जानें।

📜 कथा – राजा सत्यव्रत की विपदा

प्राचीन काल में राजा सत्यव्रत नामक एक धर्मात्मा राजा थे। वे सदा प्रजा का कल्याण करते थे। उनके राज्य में सुख-समृद्धि थी। पर एक दिन दुर्गम पर्वतों से एक भयंकर असुर दुर्जय ने आक्रमण किया। दुर्जय को ब्रह्मा जी से वरदान मिला था कि वह किसी भी राजा, देवता या मानव से पराजित न होगा। उसने राजा सत्यव्रत की सेना को धूल चटा दी। राजा स्वयं युद्ध में घायल हो गए।

राजा ने सोचा – “मैंने सदा धर्म का पालन किया, फिर यह पराजय क्यों?” वे हताश होकर एक घने वन में चले गए। वहाँ उन्हें एक प्राचीन आश्रम दिखा। वहाँ महर्षि अगस्त्य तपस्या कर रहे थे। राजा ने ऋषि को प्रणाम किया और अपना दुखड़ा सुनाया।

ऋषि ने कहा – “हे राजन, दुर्जय को ब्रह्मा का वरदान है, पर वह वरदान केवल पुरुषों के विरुद्ध है। एक मात्र शक्ति है जो उसे पराजित कर सकती है – माँ अपराजिता, जो अजेय है। यदि तुम चैत्र नवरात्रि के नवमी के दिन विधि-विधान से अपराजिता पूजन करो, तो माँ स्वयं प्रकट होंगी और तुम्हें विजय दिलाएंगी।”

🌺 अपराजिता पूजन – अटूट संकल्प

राजा ने ऋषि से विधि पूछी। ऋषि ने बताया – “नवमी तिथि को प्रातः स्नान कर, श्वेत पुष्प, श्वेत वस्त्र, अक्षत, रोली, मौली, नारियल, और विशेष रूप से अपराजिता पुष्प (नीले रंग का एक पुष्प) से माँ की पूजा करना। नौ कन्याओं को भोजन कराना। दुर्गा सप्तशती का पाठ करना। इससे माँ प्रसन्न होती हैं।”

राजा सत्यव्रत ने उसी दिन से व्रत और संकल्प लिया। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से वे नवरात्रि के व्रत में रहे। उन्होंने माँ के नौ स्वरूपों की पूजा की। आठवें दिन अष्टमी को उन्होंने महाअष्टमी पूजन किया। फिर नवमी का दिन आया।

राजा ने ऋषि के निर्देशानुसार एक श्वेत वेदी बनवाई। उस पर माँ अपराजिता की प्रतिमा स्थापित की। उन्होंने श्वेत पुष्प, चन्दन, अक्षत, दूध, दही, घी, शहद, शक्कर से पंचामृत बनाकर अभिषेक किया। फिर दुर्गा सप्तशती के उन अध्यायों का पाठ किया जिनमें देवी की अजेयता का वर्णन है। साथ ही उन्होंने अपराजिता स्तोत्र का पाठ किया।

🗣️ राजा की प्रार्थना: “हे अपराजिते, तू सबकी रक्षा करती है। दुर्जय रूपी संकट को दूर कर। मैं तेरी शरण में हूँ।”

जैसे ही पूजा समाप्त हुई, आकाश में दिव्य प्रकाश हुआ और माँ अपराजिता सिंह पर सवार होकर प्रकट हुईं। उनके हाथों में त्रिशूल, चक्र, खड्ग और अभय मुद्रा थी। उन्होंने कहा – “हे राजन, तुम्हारी भक्ति से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। कल दशमी के दिन युद्ध में जाओ। मैं स्वयं तुम्हारी रक्षा करूंगी।”

दशमी के दिन राजा ने अपनी सेना लेकर दुर्जय पर आक्रमण किया। दुर्जय ने अपनी सारी मायाएँ लगा दीं, पर राजा के ऊपर दिव्य कवच दिखाई दे रहा था। अंत में राजा ने अपने बाण से दुर्जय का वध कर दिया। राज्य में विजय की धूम मच गई। तब से राजा ने प्रतिवर्ष चैत्र नवरात्रि की नवमी को अपराजिता पूजन का विधान स्थापित किया।

✨ अपराजिता पूजन का महत्व एवं फल

यह कथा दर्शाती है कि अपराजिता पूजन जीवन में अजेयता और विजय प्रदान करता है। इसके आध्यात्मिक और व्यावहारिक लाभ हैं:

  • अजेयता का वरदान: अपराजिता का अर्थ ही ‘अजेय’ है। इस पूजन से शत्रुओं पर विजय, प्रतिस्पर्धा में सफलता और बाधाओं का नाश होता है।
  • चैत्र नवरात्रि की नवमी का विशेष योग: यह दिन माँ दुर्गा के ‘अपराजिता’ स्वरूप की पूजा का मुख्य दिन है। इस दिन विधिपूर्वक पूजन करने से संपूर्ण नवरात्रि की साधना पूर्ण होती है।
  • संकटों से रक्षा: राजा सत्यव्रत की तरह जीवन में जब कोई संकट बहुत बड़ा लगे, तो अपराजिता पूजन उससे मुक्ति दिलाता है।
  • आत्मबल का विकास: इस पूजन से साधक में आत्मविश्वास, साहस और निर्भयता का संचार होता है।

जो भी भक्त श्रद्धा से अपराजिता पूजन करता है, उसे माँ का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उसके जीवन में किसी भी प्रकार की पराजय का भय नहीं रहता।

📿 अपराजिता पूजन विधि एवं मंत्र

यह विधि चैत्र नवरात्रि की नवमी तिथि को करनी चाहिए। यदि नवमी न हो तो विजयादशमी (दशमी) को भी कर सकते हैं:

  1. प्रातः स्नान करके श्वेत या लाल वस्त्र धारण करें।
  2. माँ अपराजिता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। श्वेत वेदी बनाएँ।
  3. श्वेत पुष्प (चमेली, कनेर, या अपराजिता पुष्प) अर्पित करें। यदि अपराजिता पुष्प न मिले तो श्वेत कमल या गुलाब अर्पित करें।
  4. पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें।
  5. दुर्गा सप्तशती का पाठ करें, विशेषकर ‘देवी कवच’, ‘अर्गला’, ‘कीलक’ और ‘सप्तशती के तीन चरित्र’।
  6. निम्न मंत्रों का 108 बार जाप करें:

अपराजिता मूल मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं अपराजितायै नमः।
अपराजिता स्तोत्र मंत्र: “अपराजिता असि दुर्गे, सर्वशत्रुविनाशिनी। विजयं देहि मे देवि, यशः कीर्तिं च सर्वदा।”

पूजा के अंत में नौ कन्याओं का भोजन कराएँ और उन्हें दक्षिणा दें। माँ की आरती करें और प्रसाद वितरित करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: अपराजिता पूजन कब किया जाता है?
उत्तर: यह पूजन मुख्यतः चैत्र नवरात्रि की नवमी तिथि को किया जाता है। कुछ स्थानों पर विजयादशमी (दशमी) को भी अपराजिता पूजन का विधान है।

प्रश्न 2: अपराजिता देवी कौन हैं?
उत्तर: अपराजिता माँ दुर्गा का एक स्वरूप हैं। ‘अपराजिता’ का अर्थ है ‘जिसे कोई पराजित न कर सके’। वे विजय, अजेयता और शक्ति की देवी हैं।

प्रश्न 3: क्या यह पूजन केवल राजाओं के लिए है?
उत्तर: नहीं, यह पूजन सभी भक्तों के लिए है। यह किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन के संघर्षों में विजय दिलाता है।

प्रश्न 4: क्या यह कथा वास्तविक है?
उत्तर: यह कथा शास्त्रों में वर्णित अपराजिता पूजन की महिमा पर आधारित है। देवी भागवत और अन्य पुराणों में अपराजिता स्तोत्र और पूजन विधि मिलती है।

प्रश्न 5: इस कथा का पाठ करने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: इस कथा का पाठ करने से साधक में साहस, आत्मविश्वास बढ़ता है, शत्रु बाधाएँ समाप्त होती हैं, और माँ अपराजिता की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

“चैत्र नवरात्रि में अपराजिता पूजन की यह अद्भुत कथा हमें बताती है कि जब सारी आशाएँ टूट जाएँ, तब भी माँ अपराजिता की शरण लेने से असंभव विजय भी संभव हो जाती है। राजा सत्यव्रत की तरह हम भी अपने जीवन के दुर्जय राक्षसों पर विजय पा सकते हैं।”

🙏 ॐ ऐं ह्रीं क्लीं अपराजितायै नमः। जय माँ अपराजिता। 🙏

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