भक्ति काव्य व भजन बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

ओ मैया तू जग की पालनहार भजन इन हिंदी

पढ़ें ओ मैया तू जग की पालनहार भजन इन हिंदी का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

सनातन धर्म में आदिशक्ति माँ दुर्गा की आराधना का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। "ओ मैया तू जग की पालनहार" एक ऐसा पावन और हृदयस्पर्शी भजन है, जो भगवती जगदम्बा के प्रति पूर्ण समर्पण, श्रद्धा और अनन्य भक्ति भाव को प्रकट करता है। यह भजन साधक के अंतःकरण में करुणा, विनय और शरणागति के भाव जागृत करता है। जब कोई भक्त व्याकुल मन से जगज्जननी के चरणों में अपनी पुकार लगाता है, तो उसे इस भजन के माध्यम से परम शांति और संबल प्राप्त होता है। इस लेख में हम इस दिव्य भजन के संपूर्ण लिरिक्स, उसका गूढ़ आध्यात्मिक भावार्थ, शास्त्रीय संदर्भ, कठिन शब्दों के अर्थ और इसके गायन-श्रवण के आध्यात्मिक लाभों पर सविस्तार चर्चा करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

|| ओ मैया तू जग की पालनहार ||

(कोरस / मुखड़ा)
ओ मैया तू जग की पालनहार,
तेरे चरणों में शीश झुकाएं, कर दे मैया बेड़ा पार।
ओ मैया तू जग की पालनहार...

(अंतरा - 1)
मैया तेरे द्वारे जो भी आए, खाली झोली भर-भर जाए,
तेरी महिमा अपरम्पार, कोई अंत न पावे पार।
तू ही लक्ष्मी, तू ही गौरी, तू ही बांटे खुशियों की बोरी,
मैया कर दे कृपा की बौछार, ओ मैया तू जग की पालनहार...

(अंतरा - 2)
तू ही दुर्गा, तू ही भवानी, तेरी महिमा सबने मानी,
मैया सिंह पे हो के सवार, दुष्टों का करती संहार।
भक्तों की तू लाज बचाती, बिगड़ी सबकी तू ही बनाती,
मैया सुन ले मेरी पुकार, ओ मैया तू जग की पालनहार...

(अंतरा - 3)
अंधियारे जीवन में मैया, ज्ञान का दीप जला देना,
भटके हुए इस बालक को, अपनी राह दिखा देना।
तेरे सिवा कोई और न मेरा, चारों तरफ है गम का अंधेरा,
मैया तू ही है पतवार, ओ मैया तू जग की पालनहार...

(अंतरा - 4)
सच्चे मन से जो ध्यावे, मनवांछित फल वो पावे,
तेरी भक्ति में सुख सारा, तू ही जीवन का सहारा।
शरण पड़े की लाज बचाना, चरणों से अपने लिपटाना,
मैया कर दे बेड़ा पार, ओ मैया तू जग की पालनहार...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन मूलतः माँ भगवती के जगज्जननी और पालनहार स्वरूप की वंदना करता है। इसका मुख्य संदेश यह है कि संपूर्ण सृष्टि का संचालन, पोषण और रक्षण करने वाली आदि शक्ति ही हैं। जब मनुष्य संसार के दुखों, कष्टों और मोह-माया के बंधनों से थक जाता है, तब वह माँ की शरण में आकर अपनी मुक्ति की प्रार्थना करता है।

भजन के प्रथम भाग में भक्त माँ के चरणों में अपना मस्तक झुकाकर संसार रूपी भवसागर से पार उतरने की याचना करता है। दूसरे भाग में माँ के विभिन्न रूपों जैसे लक्ष्मी, गौरी और दुर्गा का स्मरण किया गया है, जो यह दर्शाता है कि वे ही ऐश्वर्य, ज्ञान, शक्ति और शांति की प्रदाता हैं। माँ का सिंहवाहिनी रूप दुष्ट प्रवृत्तियों और आंतरिक शत्रुओं (काम, क्रोध, मद, लोभ) के संहार का प्रतीक है। अंतिम पंक्तियों में भक्त अपने अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाने की प्रार्थना करता है, जो कि आध्यात्मिक उन्नति का चरम लक्ष्य है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय और प्रभावशाली बनाती हैं:

  • पूर्ण शरणागति (प्रपत्ति): यह भजन वैष्णव और शाक्त दर्शन के 'प्रपत्ति' या पूर्ण आत्मसमर्पण के सिद्धांत पर आधारित है, जहां भक्त स्वयं को पूरी तरह से ईश्वर की इच्छा पर छोड़ देता है।
  • त्रिदेवी का समन्वय: इसमें महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली (गौरी, दुर्गा, लक्ष्मी) के एकीकृत स्वरूप की स्तुति की गई है।
  • सरलता और सुगमता: इसकी भाषा अत्यंत सरल और सुबोध है, जिससे सामान्य जन भी माँ की भक्ति में लीन हो सकते हैं।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार: इसके नियमित श्रवण और कीर्तन से घर तथा मन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवद्-भक्ति के लिए कोई भी समय वर्जित नहीं है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए निम्नलिखित समय और विधियां अत्यंत फलदायी मानी गई हैं:

  • नवरात्रि पर्व: चैत्र और शारदीय नवरात्रि के पावन नौ दिनों में इस भजन का गायन माँ दुर्गा को अत्यंत प्रिय है। इस दौरान श्री दुर्गा चालीसा के साथ इसका पाठ करना चाहिए।
  • संध्या आरती के समय: प्रतिदिन शाम को घर के मंदिर में घी का दीपक जलाकर, कपूर आरती के पश्चात इस भजन का सस्वर कीर्तन करने से पारिवारिक क्लेश दूर होते हैं।
  • गायन विधि: इसे शांत चित्त होकर, आँखें बंद करके माँ के ममतामयी स्वरूप का ध्यान करते हुए गाना चाहिए। वाद्ययंत्रों में ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम का प्रयोग इसके माधुर्य को और बढ़ा देता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन साक्षात् पराशक्ति, जगदम्बा, माँ दुर्गा को समर्पित है। सनातन परंपरा में माँ दुर्गा को आदिशक्ति माना गया है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति, स्थिति और लय की स्वामिनी हैं। श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के अनुसार, माँ ही आदि और अंत हैं। इस भजन की रचना लोक-परंपरा के संतों द्वारा की गई है, जिन्होंने शास्त्रीय ज्ञान को जन-सामान्य की सरल भाषा में पिरोकर समाज में भक्ति का प्रचार-प्रसार किया।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि भारतीय लोक-चेतना और शाक्त परंपरा से जुड़ी है। मध्यकाल से ही भारत में कीर्तन और भजन मंडलियों की समृद्ध परंपरा रही है। जब समाज में जटिल कर्मकांडों के स्थान पर सरल भक्ति मार्ग को अपनाया गया, तब ऐसे भजनों का प्रादुर्भाव हुआ। यह भजन किसी एक विशिष्ट कवि की रचना न होकर, समय के साथ लोक-गायकों द्वारा परिष्कृत और संवर्धित किया गया एक सामूहिक भक्ति पुष्प है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें ब्रजभाषा और अवधी के पुट भी देखने को मिलते हैं। इसकी काव्य शैली 'गेय' (गाने योग्य) है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है। जैसे "ज्ञान का दीप जला देना" में रूपक अलंकार है, जो अज्ञान को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने का संकेत करता है। इसकी लयबद्धता और छंद योजना ऐसी है कि यह सुनते ही मन को एकाग्र कर देती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन जीने के कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:

  1. अहंकार का त्याग: जब हम कहते हैं "तेरे चरणों में शीश झुकाएं", तो यह हमारे अहंकार के विसर्जन का प्रतीक है। बिना अहंकार त्यागे ईश्वर की कृपा प्राप्त नहीं हो सकती।
  2. समता का भाव: माँ के दरबार में अमीर-गरीब, ज्ञानी-अज्ञानी सभी एक समान हैं। माँ सभी की झोली भरती हैं।
  3. सच्चा मार्गदर्शक: संसार रूपी सागर में जब हम भटक जाते हैं, तो केवल ईश्वर ही हमारी नैया को पार लगा सकते हैं। हमें सदैव धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा लेनी चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
पालनहार पोषण करने वाली, रक्षा करने वाली सृष्टि का भरण-पोषण करने वाली जगदम्बा।
बेड़ा पार भवसागर से मुक्ति, संकटों से उद्धार जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति और सांसारिक कष्टों का निवारण।
अपरम्पार जिसकी कोई सीमा न हो, अनंत ईश्वर की असीम शक्ति और लीला।
पतवार नाव चलाने का साधन (चप्पू) जीवन रूपी नैया को सही दिशा देने वाली ईश्वरीय शक्ति।
मनवांछित मन की इच्छा के अनुसार भक्त की सात्विक कामनाओं की पूर्ति।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"ओ मैया तू जग की पालनहार, तेरे चरणों में शीश झुकाएं, कर दे मैया बेड़ा पार।"
हे माता! आप इस संपूर्ण चराचर जगत की स्वामिनी और इसका पालन करने वाली हैं। हम आपके श्रीचरणों में अपना मस्तक झुकाकर वंदन करते हैं। कृपा करके हमारे इस जीवन रूपी नैया को संसार रूपी सागर से पार लगा दीजिए।

"मैया तेरे द्वारे जो भी आए, खाली झोली भर-भर जाए, तेरी महिमा अपरम्पार..."
हे माँ, आपके द्वार से कभी कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता। जो भी आपके शरण में आता है, आप उसकी झोली खुशियों और आशीषों से भर देती हैं। आपकी महिमा का गान करने में वेद और पुराण भी स्वयं को असमर्थ पाते हैं।

"तू ही दुर्गा, तू ही भवानी, तेरी महिमा सबने मानी, मैया सिंह पे हो के सवार..."
आप ही दुष्टों का नाश करने वाली महाकाली और दुर्गा हैं। संपूर्ण जगत आपकी शक्ति को स्वीकार करता है। सिंह पर सवार होकर आप हमारे भीतर के भय और असुरक्षा की भावनाओं का मर्दन करती हैं।

"अंधियारे जीवन में मैया, ज्ञान का दीप जला देना, भटके हुए इस बालक को..."
हे करुणामयी माँ! हमारे जीवन में जो अज्ञान, मोह और भ्रम का अंधकार फैला हुआ है, उसे अपने ज्ञान रूपी प्रकाश से दूर कर दीजिए। हम अज्ञानी बालक हैं, हमें सन्मार्ग दिखाइए।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के गायन के पूर्व या पश्चात माँ दुर्गा के इस सिद्ध मंत्र का जाप करने से भजन का प्रभाव अनंत गुना बढ़ जाता है:

"सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥"

अर्थ: जो शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली, गौरी और नारायण की शक्ति हैं, उन सर्वकल्याणकारी माँ को नमस्कार है।

इसके साथ ही, सुख-समृद्धि की कामना के लिए श्री सूक्तम पाठ का श्रवण भी अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम ओ मैया तू जग की पालनहार
मुख्य आराध्य देवी माँ दुर्गा / आदि शक्ति जगदम्बा
भजन का मुख्य भाव समर्पण, विनय, करुणा और भक्ति भाव (भक्ति रस)
भाषा सरल हिंदी (खड़ी बोली)
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, दुर्गा पूजा, दैनिक संध्या आरती, जगराता
मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन आदि शक्ति माँ दुर्गा (भगवती जगदम्बा) को समर्पित है, जो इस सृष्टि की रचना और पालन करने वाली हैं।

इस भजन को सुबह या शाम की आरती के समय, नवरात्रि के पावन दिनों में, या किसी भी धार्मिक उत्सव पर गाना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

हाँ, इस भजन के गायन के बाद माँ दुर्गा के प्रसिद्ध मंत्र "सर्वमंगल मांगल्ये..." का जाप करना अत्यंत कल्याणकारी होता है।

इससे मानसिक शांति मिलती है, घर का वातावरण शुद्ध होता है, नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और साधक में आत्मविश्वास तथा भक्ति भाव का उदय होता है।

यह भजन अत्यंत सरल और सुबोध हिंदी भाषा में लिखा गया है, ताकि समाज का प्रत्येक वर्ग इसे आसानी से समझ सके और गा सके।

"बेड़ा पार" का अर्थ है संसार रूपी दुखों के सागर से मुक्ति पाना और मोक्ष की प्राप्ति करना, साथ ही जीवन के सभी संकटों से पार पाना।

हाँ, बच्चों के लिए यह भजन अत्यंत लाभदायक है। इससे उनमें अच्छे संस्कार, एकाग्रता और बड़ों के प्रति आदर भाव का विकास होता है।

सिंह शक्ति, साहस और निर्भयता का प्रतीक है। माँ का सिंह पर सवार होना यह दर्शाता है कि वे अपने भक्तों को निर्भय बनाती हैं और बुराइयों का दमन करती हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को विभिन्न प्रामाणिक शाक्त ग्रंथों, लोक-परंपराओं और संकीर्तन पद्धतियों के आधार पर संकलित एवं विश्लेषित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और त्रुटिहीन भक्ति साहित्य पहुंचाना है, ताकि वे अपनी आध्यात्मिक साधना को सुदृढ़ कर सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्देवीभागवत महापुराण - स्कंध १ एवं ९ (भगवती महिमा वर्णन)
  • श्री दुर्गा सप्तशती - अर्गला स्तोत्र एवं कीलक स्तोत्र
  • सनातन धर्म कीर्तन परंपरा एवं लोक भजन संग्रह

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 14 Oct 2026

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