भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

स्वास देना प्रभु इतनी तो कम से कम भजन इन हिंदी

स्वास देना प्रभु इतनी तो कम से कम भजन के बोल, हिंदी अर्थ और भावार्थ सहित पढ़ें। जानिए इस मर्मस्पर्शी भक्ति गीत का आध्यात्मिक महत्व Bhaktilok पर।

"स्वास देना प्रभु इतनी तो कम से कम भजन" (Swas Dena Prabhu Itani To Kam Se Kam Bhajan) सनातन हिंदू धर्म की शरणागति और भक्ति परंपरा का एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और भावपूर्ण भजन है। यह भजन जीवात्मा की परमात्मा के प्रति उस परम व्याकुलता और समर्पण को दर्शाता है, जहाँ भक्त अपने जीवन के अंतिम क्षण तक ईश्वर के नाम संकीर्तन में लीन रहने की कामना करता है। भारतीय अध्यात्म में श्वास (प्राण) को ईश्वर का वरदान माना गया है, और इस भजन के माध्यम से साधक प्रार्थना करता है कि उसका प्रत्येक श्वास प्रभु की सेवा और स्मरण में ही व्यतीत हो। यह भजन राग-द्वेष से परे, शांत रस और भक्ति रस से ओतप्रोत है, जो श्रोताओं और गायकों के हृदय में वैराग्य और अनन्य प्रेम का संचार करता है। इस लेख में हम इस पावन भजन के लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, दार्शनिक महत्व और इससे मिलने वाली आध्यात्मिक सीख का गहराई से विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

|| स्वास देना प्रभु इतनी तो कम से कम ||

मुखड़ा:
स्वास देना प्रभु इतनी तो कम से कम,
जब तक रहे प्राण गाता रहूँ तेरा भजन।
स्वास देना प्रभु इतनी तो कम से कम...

अंतरा 1:
भूलूँ कभी न मैं तो नाम तुम्हारा,
तुम ही तो हो प्रभु जीवन सहारा।
नैनों में ज्योति रहे, मन में तेरा ध्यान रहे,
मुख पर सदा ही प्रभु तेरा ही नाम रहे।
स्वास देना प्रभु इतनी तो कम से कम...

अंतरा 2:
सुख में भी याद करूँ, दुःख में भी ध्याऊँ,
हर पल मैं प्रभु तेरे ही गुण गाऊँ।
चाहे जैसी भी परिस्थिति आये जीवन में,
तेरी ही भक्ति का दीप जले मन में।
स्वास देना प्रभु इतनी तो कम से कम...

अंतरा 3:
अंतिम समय जब आये मेरा प्रभु,
सामने खड़े रहना तुम मेरे प्रभु।
प्राण तन से निकले जब गाते-गाते,
शरण तुम्हारी पाऊँ मैं मुस्काते।
स्वास देना प्रभु इतनी तो कम से कम,
जब तक रहे प्राण गाता रहूँ तेरा भजन।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन साधक के अंतर्मन की पुकार है। इसका सरल अर्थ यह है कि हे ईश्वर! मुझे इस संसार में जीवित रहने के लिए केवल उतनी ही सांसें प्रदान करें, जिससे मैं निरंतर आपका नाम जप सकूं और आपकी महिमा का गान कर सकूं। भक्त सांसारिक सुखों, धन, संपत्ति या दीर्घायु की कामना नहीं करता; उसकी एकमात्र इच्छा यह है कि जब तक उसके शरीर में प्राण वायु का प्रवाह हो रहा है, तब तक उसका मन और वाणी केवल भगवान के चरणों में समर्पित रहे।

भजन का गहरा भावार्थ जीवात्मा के उस परम लक्ष्य को उजागर करता है जिसे शास्त्रों में 'अनन्य भक्ति' कहा गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो मनुष्य अंतकाल में मेरा स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है, वह मेरे सायुज्य को प्राप्त होता है। यह भजन उसी अंतिम क्षण की तैयारी है। भक्त चाहता है कि उसका जीवन निष्काम कर्म और निरंतर भगवद-स्मरण का जीवंत उदाहरण बने। सुख और दुःख, दोनों ही परिस्थितियों में समभाव रखते हुए ईश्वर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना ही इस भजन का मूल संदेश है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह एक उच्च कोटि की आध्यात्मिक साधना (साधना मार्ग) का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • पूर्ण शरणागति (प्रपत्ति): इसमें भक्त अपने जीवन की डोर पूरी तरह से ईश्वर के हाथों में सौंप देता है। वह अपनी सांसों की गिनती भी ईश्वर की इच्छा पर छोड़ देता है।
  • प्रार्थना की सादगी: इस भजन में किसी जटिल अनुष्ठान या कठिन तपस्या की मांग नहीं की गई है, बल्कि एक सरल हृदय से की गई करुण पुकार है।
  • अंतिम समय की चेतना: हिंदू दर्शन में मृत्यु के समय की चेतना को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यह भजन साधक को जीवन के अंतिम क्षण में भी प्रभु के नाम का स्मरण बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
  • समभाव की शिक्षा: यह भजन सिखाता है कि जीवन में सुख आये या दुःख, साधक का मन विचलित नहीं होना चाहिए और उसे हर हाल में प्रभु की इच्छा का आदर करना चाहिए।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन का गायन और श्रवण किसी भी समय किया जा सकता है, क्योंकि ईश्वर का स्मरण हर क्षण फलदायी होता है। फिर भी, साधना की दृष्टि से निम्नलिखित समय और विधि अत्यंत उत्तम मानी गई है:

  • ब्रह्ममुहूर्त या प्रातः काल: सुबह उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर शांत चित्त से इस भजन का गायन करने से दिन की शुरुआत सकारात्मक ऊर्जा और भक्ति भाव के साथ होती है।
  • संध्या आरती के समय: शाम को मंदिर में दीप प्रज्वलित करने के बाद परिवार के साथ बैठकर सामूहिक रूप से इस भजन को गाना मन को शांति प्रदान करता है।
  • एकांत साधना: जब भी मन अशांत या विचलित हो, एकांत में बैठकर आंखें बंद करके इस भजन को सुनने से मानसिक तनाव दूर होता है और ईश्वर से जुड़ाव महसूस होता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन किसी एक विशिष्ट देवी या देवता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह निराकार और साकार दोनों रूपों में 'परमेश्वर' (प्रभु) को संबोधित है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार इसे भगवान श्री विष्णु, श्री कृष्ण, श्री राम या भगवान शिव के चरणों में समर्पित कर सकते हैं।

संत कबीर, गोस्वामी तुलसीदास और मीराबाई जैसी महान विभूतियों ने भी अपनी रचनाओं में इसी प्रकार की शरणागति का संदेश दिया है। कबीरदास जी कहते हैं कि "कबीरा सुमिरन सार है, और सकल जंजाल", जिसका अर्थ है कि केवल ईश्वर का स्मरण ही जीवन का वास्तविक सार है, बाकी सब सांसारिक प्रपंच है। यह भजन उसी संत परंपरा की आधुनिक अभिव्यक्ति है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की रचना पारंपरिक लोक-भक्ति और संकीर्तन परंपरा से प्रेरित है। यद्यपि इसके मूल रचयिता के विषय में विभिन्न मत हैं, परंतु यह भजन भारत के विभिन्न संकीर्तन मंडलों, मंदिरों और भक्ति उत्सवों में दशकों से गाया जा रहा है। इसकी लोकप्रियता का मुख्य कारण इसकी सरल शब्दावली और हृदय को छू लेने वाला संगीत है। जब कोई साधक इस भजन को गाता है, तो वह स्वयं को ईश्वर के अत्यंत निकट पाता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें कहीं-कहीं ब्रजभाषा और तत्सम शब्दों का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। इसकी काव्य शैली 'प्रार्थना गीत' की है, जिसमें लयबद्धता और गेयता का विशेष ध्यान रखा गया है। इसके अंतरे छोटे और सीधे दिल पर दस्तक देने वाले हैं। रूपक और अनुप्रास अलंकारों का सहज प्रयोग इसके सौंदर्य को और अधिक बढ़ा देता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें दैनिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख देता है:

  • कृतज्ञता का भाव: हमें जो जीवन और सांसें मिली हैं, वे ईश्वर का उपहार हैं। हमें हर सांस के लिए ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए।
  • अनासक्ति: संसार की नश्वरता को स्वीकार करते हुए, हमें भौतिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक मोह से बचना चाहिए।
  • निरंतरता (सतत स्मरण): भक्ति कोई एक दिन का कार्य नहीं है, बल्कि यह जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है। हमें हर कार्य को करते हुए भी मन में ईश्वर का ध्यान रखना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
स्वास (श्वास) सांस, प्राण वायु जीवन की शक्ति जो ईश्वर द्वारा प्रदत्त है।
प्राण जीवन, चेतना शरीर को सजीव रखने वाली सूक्ष्म ऊर्जा।
सहारा आश्रय, रक्षक ईश्वर ही इस भवसागर में एकमात्र रक्षक हैं।
ज्योति प्रकाश, दृष्टि आंतरिक और बाहरी ज्ञान का प्रकाश।
अंतिम समय मृत्यु का क्षण जीवन का वह पड़ाव जहाँ जीवात्मा शरीर का त्याग करती है।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

1. "स्वास देना प्रभु इतनी तो कम से कम, जब तक रहे प्राण गाता रहूँ तेरा भजन।"
हे प्रभु! मुझे केवल उतनी ही सांसें देना जो आपके नाम संकीर्तन के लिए आवश्यक हों। मेरे जीवन का कोई भी क्षण आपकी भक्ति के बिना व्यर्थ न जाए।

2. "भूलूँ कभी न मैं तो नाम तुम्हारा, तुम ही तो हो प्रभु जीवन सहारा।"
संसार के मायाजाल में फंसकर भी मैं आपके नाम को कभी न भूलूँ, क्योंकि इस अनित्य संसार में केवल आप ही मेरे सच्चे और स्थाई सहारे हैं।

3. "नैनों में ज्योति रहे, मन में तेरा ध्यान रहे, मुख पर सदा ही प्रभु तेरा ही नाम रहे।"
मेरी आँखों में हमेशा आपका दिव्य रूप बसा रहे, मेरे मन में आपका ही चिंतन चलता रहे और मेरी वाणी से सदैव आपके ही पावन नाम का उच्चारण होता रहे।

4. "सुख में भी याद करूँ, दुःख में भी ध्याऊँ, हर पल मैं प्रभु तेरे ही गुण गाऊँ।"
अक्सर लोग दुःख में ईश्वर को याद करते हैं और सुख में भूल जाते हैं। परंतु भक्त प्रार्थना करता है कि वह सुख और दुःख दोनों में समभाव रहकर प्रभु का ही गुणगान करे।

5. "अंतिम समय जब आये मेरा प्रभु, सामने खड़े रहना तुम मेरे प्रभु।"
जब मेरा इस संसार से जाने का समय आये, तब मुझे आपका साक्षात दर्शन प्राप्त हो, ताकि मेरा मन किसी सांसारिक वस्तु में न भटककर सीधे आपमें लीन हो जाए।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन की भावना श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय के सातवें श्लोक से अत्यंत मेल खाती है:

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च |
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ||

"इसलिए हे अर्जुन! तुम हर समय मेरा स्मरण करो और युद्ध भी करो। मुझमें अर्पित मन और बुद्धि से युक्त होकर तुम निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त होगे।"

इसके अतिरिक्त, भगवान विष्णु का यह पावन मंत्र भी निरंतर स्मरण की प्रेरणा देता है:

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम स्वास देना प्रभु इतनी तो कम से कम
मुख्य विषय शरणागति, निरंतर भगवद-स्मरण, प्रार्थना
देवता परमेश्वर (श्री कृष्ण / श्री राम / श्री विष्णु)
भाषा सरल हिंदी (खड़ी बोली)
भाव (Mood) शांत रस, भक्ति रस, समर्पण भाव
उपयुक्त अवसर प्रातः काल प्रार्थना, संध्या आरती, सत्संग, एकांत साधना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य को अपने जीवन की हर सांस का उपयोग ईश्वर के स्मरण और परोपकार में करना चाहिए। यह भजन पूर्ण शरणागति और निष्काम भक्ति की प्रेरणा देता है।

वैसे तो ईश्वर का नाम किसी भी समय लिया जा सकता है, परंतु ब्रह्ममुहूर्त (सुबह 4 से 6 बजे) और संध्या काल में इस भजन का गायन मन को असीम शांति और एकाग्रता प्रदान करता है।

यह भजन किसी एक विशिष्ट देवता तक सीमित नहीं है। यह 'प्रभु' यानी परमेश्वर को संबोधित है। आप अपनी श्रद्धा के अनुसार इसे श्री कृष्ण, श्री राम, शिव जी या विष्णु जी के ध्यान में गा सकते हैं।

सनातन धर्म में माना जाता है कि मृत्यु के समय मनुष्य के मन में जो विचार होते हैं, उसी के अनुसार उसकी अगली गति तय होती है। इसलिए भक्त प्रार्थना करता है कि अंतिम समय में उसके सामने प्रभु का रूप हो और मुख पर उनका नाम हो।

यह भजन शांत रस से भरपूर है। इसे सुनने से मानसिक तनाव कम होता है, मन की चंचलता दूर होती है और साधक के भीतर सकारात्मक ऊर्जा एवं संतोष का भाव जाग्रत होता है।

हाँ, इस भजन का मूल भाव गीता के 'अभ्यास योग' और 'भक्ति योग' से प्रेरित है, जहाँ भगवान निरंतर स्मरण (सतत चिन्तन) पर बल देते हैं।

इस भजन की भाषा अत्यंत सरल और सुबोध खड़ी बोली हिंदी है। इसकी सरलता के कारण ही यह बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के बीच अत्यंत लोकप्रिय है।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में यह भजन हमें याद दिलाता है कि भौतिक प्रगति के साथ-साथ आत्मिक शांति और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता भी अनिवार्य है। यह हमें जमीन से जुड़े रहने की सीख देता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के दार्शनिक पहलुओं, शब्दार्थों और शास्त्रीय संदर्भों का संकलन सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों जैसे श्रीमद्भगवद्गीता और भक्ति सूत्रों के आलोक में किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और प्रेरणादायक आध्यात्मिक ज्ञान पहुँचाना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 8, श्लोक 7)
  • शांडिल्य भक्ति सूत्र और नारद भक्ति सूत्र
  • सनातन धर्म की पारंपरिक संकीर्तन एवं भजन संग्रह पुस्तकें

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 11 Oct 2026

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