भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

जवानी में जो सोयेगा बुढ़ापा में रोयेगा लिरिक्स

पढ़ें जवानी में जो सोयेगा बुढ़ापा में रोयेगा लिरिक्स - Bhaktilok का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

हिंदू सनातन धर्म और भारतीय लोक संस्कृति में भजनों का स्थान केवल ईश्वर की आराधना तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ये जीवन के परम सत्य, नैतिकता और समय के सदुपयोग का संदेश देने वाले सशक्त माध्यम भी हैं। "जवानी में जो सोयेगा, बुढ़ापा में रोयेगा" एक अत्यंत लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी चेतावनी भजन (Chetawani Bhajan) है। यह भजन मनुष्य को उसके जीवन की सबसे ऊर्जावान अवस्था—युवावस्था—में आलस्य और अज्ञानता की नींद से जागने का आह्वान करता है। इस भजन का मुख्य भाव 'वैराग्य' और 'चेतावनी' है, जो कबीरपंथ और संत परंपरा के दर्शन से गहराई से प्रेरित है। यह हमें याद दिलाता है कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है और यदि हमने युवावस्था की अमूल्य ऊर्जा को केवल भौतिक सुखों और आलस्य में गंवा दिया, तो वृद्धावस्था में शारीरिक और मानसिक असमर्थता के समय केवल पश्चाताप ही शेष रहेगा। इस विस्तृत लेख में हम इस भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, इसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ, पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ और जीवनोपयोगी सीखों का गहराई से विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ जवानी में जो सोयेगा बुढ़ापा में रोयेगा ॥


(स्थायी - मुखड़ा)
जवानी में जो सोयेगा, बुढ़ापा में रोयेगा।
यह जीवन अनमोल रे बंदे, काहे को इसे खोयेगा॥
जवानी में जो सोयेगा, बुढ़ापा में रोयेगा...

(अंतरा - 1)
बालपन तो खेल में खोया, आई जवानी मस्त रहा।
माया के इस जाल में फंसकर, तू हरदम मदमस्त रहा॥
जब तक शक्ति है काया में, हरि का नाम न ध्याएगा।
जवानी में जो सोयेगा, बुढ़ापा में रोयेगा॥

(अंतरा - 2)
हाथ-पैर जब कांपने लगेंगे, लाठी का सहारा लेगा।
आंखों से जब सूझेगा नहीं, तब तू किसको पुकारेगा॥
बीत गया जब समय सुहाना, फिर पीछे पछताएगा।
जवानी में जो सोयेगा, बुढ़ापा में रोयेगा॥

(अंतरा - 3)
यह संसार मुसाफिरखाना, कोई न यहां रहने पाएगा।
खाली हाथ आया था जग में, खाली हाथ ही जाएगा॥
कर ले भजन तू सच्चे मन से, भवसागर तर जाएगा।
जवानी में जो सोयेगा, बुढ़ापा में रोयेगा॥

(समर्पण - समापन)
चेत सके तो चेत रे बंदे, अवसर हाथ से जाएगा।
जो बोयेगा वही काटेगा, जैसा करेगा वैसा पायेगा॥
जवानी में जो सोयेगा, बुढ़ापा में रोयेगा।
यह जीवन अनमोल रे बंदे, काहे को इसे खोयेगा॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस चेतावनी भजन का मूल संदेश अत्यंत व्यावहारिक और आध्यात्मिक है। यह भजन हमें समय की महत्ता और कर्म के सिद्धांत (Law of Karma) से परिचित कराता है। 'जवानी' केवल शारीरिक अवस्था का नाम नहीं है, बल्कि यह जीवन का वह स्वर्णिम काल है जब मनुष्य के पास संकल्प, ऊर्जा, बुद्धि और पुरुषार्थ करने की असीम क्षमता होती है। भजनकार कहते हैं कि जो व्यक्ति इस ऊर्जावान समय में आलस्य, प्रमाद और अज्ञानता की नींद में सोया रहता है, वह अपने जीवन के उत्तरार्ध यानी वृद्धावस्था में केवल आंसू बहाने को विवश होता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से 'सोने' का अर्थ केवल शारीरिक निद्रा नहीं है, बल्कि इसका अर्थ 'मोह-माया' और 'अज्ञानता' की नींद में सोए रहना है। जब मनुष्य युवा होता है, तो वह सोचता है कि अभी तो पूरी जिंदगी पड़ी है, ईश्वर का नाम और सत्कर्म तो बुढ़ापे में भी किए जा सकते हैं। लेकिन यह उसकी सबसे बड़ी भूल है। बुढ़ापे में जब शरीर शिथिल हो जाता है, इंद्रियां कमजोर पड़ जाती हैं और मन अशांत रहता है, तब साधना या पुरुषार्थ करना अत्यंत कठिन हो जाता है। इसलिए, यह भजन हमें वर्तमान क्षण में जीने और अपनी युवावस्था का उपयोग परमार्थ, आत्म-कल्याण और समाज सेवा में करने की प्रेरणा देता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन भारतीय जनमानस में अत्यंत लोकप्रिय है क्योंकि यह सीधे दिल पर चोट करता है और जीवन की वास्तविकता को उजागर करता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • चेतावनी का स्वर: यह भजन किसी काल्पनिक दुनिया की बात नहीं करता, बल्कि जीवन के उस कड़वे सच को सामने रखता है जिससे हर मनुष्य को गुजरना है।
  • कर्म प्रधानता: इसमें स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य का भविष्य उसके वर्तमान कर्मों पर निर्भर करता है। यदि हम आज बोएंगे नहीं, तो कल काटेंगे क्या?
  • वैराग्य और भक्ति का समन्वय: यह संसार की नश्वरता को दर्शाते हुए ईश्वर की शरण में जाने और सत्कर्म करने का मार्ग दिखाता है।
  • सरल और सुबोध भाषा: इस भजन की भाषा इतनी सरल है कि एक आम ग्रामीण से लेकर प्रबुद्ध वर्ग तक, हर कोई इसके गहरे अर्थ को आसानी से समझ सकता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

चूंकि यह एक चेतावनी और उपदेशात्मक भजन है, इसलिए इसे गाने और सुनने का कोई एक विशेष नियम नहीं है, परंतु कुछ विशेष अवसरों पर इसका प्रभाव और भी अधिक बढ़ जाता है:

  • प्रातःकाल का समय: सुबह के समय जब हमारा मस्तिष्क शांत होता है, तब इस भजन को सुनने से दिनभर सत्कर्म करने और समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा मिलती है।
  • सत्संग और प्रवचन: धार्मिक सभाओं, सत्संगों और संतों के प्रवचनों के दौरान इस भजन का गायन विशेष रूप से किया जाता है ताकि श्रोताओं में वैराग्य और जागृति का भाव उत्पन्न हो सके।
  • संध्या आरती के बाद: शाम के समय जब हम दिनभर के कार्यों का विश्लेषण करते हैं, तब यह भजन हमें आत्मनिरीक्षण (Self-Reflection) करने में मदद करता है।
  • गायन विधि: इसे शांत चित्त होकर, ढोलक, मंजीरे या हारमोनियम की मध्यम लय के साथ गाना चाहिए। इसके शब्दों के उच्चारण में गंभीरता और करुणा का भाव होना आवश्यक है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन किसी एक विशिष्ट देवी या देवता को समर्पित न होकर निराकार परमेश्वर, 'हरि' और 'सत्य' को समर्पित है। इसकी वैचारिक पृष्ठभूमि महान संत कबीरदास जी, संत तुलसीदास जी और संत रैदास जी की शिक्षाओं से मेल खाती है। संत कबीर ने अपने अनेक दोहों में समय के महत्व और शरीर की नश्वरता पर बल दिया है। उदाहरण के लिए, कबीर का यह दोहा इस भजन के मूल भाव को पूरी तरह स्पष्ट करता है:

"काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरी करेगा कब॥"

इसी प्रकार, यह भजन हमें भगवान श्रीकृष्ण द्वारा श्रीमद्भगवद गीता में दिए गए निष्काम कर्मयोग के सिद्धांत की भी याद दिलाता है, जहां वे अर्जुन को प्रमाद (आलस्य) का त्याग कर अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने का उपदेश देते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन के मूल रचयिता के विषय में कोई स्पष्ट लिखित प्रमाण नहीं मिलता, क्योंकि यह लोक-परंपरा (Folk Tradition) का हिस्सा रहा है। भारत के ग्रामीण अंचलों में संतों और लोक-गायकों द्वारा पीढ़ियों से इस भजन को गाया जाता रहा है। इसकी पृष्ठभूमि भारत के 'भक्ति आंदोलन' और 'संत मत' से जुड़ी है, जहां संतों ने समाज को पाखंड और अंधविश्वास से दूर कर व्यावहारिक जीवन जीने और आत्म-साक्षात्कार करने की सीख दी थी। यह भजन उसी समृद्ध मौखिक परंपरा का एक अनमोल रत्न है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें अवधी और राजस्थानी लोक-भाषा के शब्दों का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है। इसकी काव्य शैली 'उपदेशात्मक' और 'चेतावनीपरक' है। इसमें रूपक और अनुप्रास अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है। 'जवानी में सोना' और 'बुढ़ापे में रोना' जैसे विरोधाभासी बिंबों के माध्यम से कवि ने जीवन के दो छोरों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। इसकी लयबद्धता और गेयता इतनी सटीक है कि यह सीधे सुनने वाले के अंतःकरण में उतर जाती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण व्यावहारिक और आध्यात्मिक सीख देता है:

  1. समय का मूल्य समझें: समय कभी किसी के लिए नहीं रुकता। जो क्षण एक बार चला गया, वह कभी वापस नहीं आता। इसलिए वर्तमान का सम्मान करें।
  2. आलस्य का त्याग करें: आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। युवावस्था में आलस्य करना अपने स्वयं के भविष्य को अंधकार में धकेलने जैसा है।
  3. कर्मफल का सिद्धांत: हम जैसा बोएंगे, वैसा ही काटेंगे। यदि हम युवावस्था में अच्छे कर्म, ज्ञानार्जन और भक्ति करेंगे, तो हमारा बुढ़ापा शांतिपूर्ण और आनंदमय होगा।
  4. जीवन की नश्वरता: यह शरीर और संसार क्षणभंगुर हैं। मृत्यु अटल सत्य है, इसलिए भौतिक सुखों में अंधे होने के बजाय आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक संदर्भ
बंदे हे मनुष्य / ईश्वर का सेवक मनुष्य को उसकी वास्तविक पहचान याद दिलाने के लिए प्रयुक्त संबोधन।
काया शरीर / भौतिक देह यह पंचतत्वों से बना नश्वर शरीर जो समय के साथ बूढ़ा और जर्जर हो जाता है।
मदमस्त अहंकार और मोह में अंधा युवावस्था के जोश और धन-दौलत के घमंड में चूर होकर सही-गलत का भेद भूल जाना।
मुसाफिरखाना सराय / धर्मशाला (Temporary Stay) यह संसार जहां हम कुछ समय के लिए आए हैं और अंततः हमें इसे छोड़कर जाना ही है।
भवसागर संसार रूपी सागर जन्म और मृत्यु का चक्र जिससे पार पाना ही मोक्ष या मुक्ति कहलाता है।
चेत सके तो चेत जाग सको तो जाग जाओ अज्ञानता की नींद से जागकर समय रहते सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त होने की चेतावनी।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

आइए, इस पावन भजन की प्रत्येक पंक्ति के गहरे अर्थ को विस्तार से समझते हैं:

"जवानी में जो सोयेगा, बुढ़ापा में रोयेगा। यह जीवन अनमोल रे बंदे, काहे को इसे खोयेगा॥"
भावार्थ: कवि कहते हैं कि हे मनुष्य! यह मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ और अनमोल है। यदि तुम अपनी युवावस्था की ऊर्जा और समय को आलस्य, प्रमाद और व्यर्थ के कार्यों में सोकर (गंवाकर) बिता दोगे, तो वृद्धावस्था में जब तुम्हारे पास न शक्ति होगी और न समय, तब तुम केवल पछताओगे और रोओगे। इसलिए इस अनमोल जीवन को व्यर्थ मत गंवाओ।

"बालपन तो खेल में खोया, आई जवानी मस्त रहा। माया के इस जाल में फंसकर, तू हरदम मदमस्त रहा॥"
भावार्थ: मनुष्य के जीवन का चक्र अद्भुत है। बचपन तो खेलकूद और नासमझी में बीत गया। जब जवानी आई, तो वह शारीरिक सौंदर्य, वासना और धन कमाने की अंधी दौड़ में मदमस्त हो गया। वह संसार की इस मायावी दुनिया के जाल में ऐसा फंसा कि उसे अपने वास्तविक लक्ष्य (आत्म-कल्याण) का ध्यान ही नहीं रहा।

"जब तक शक्ति है काया में, हरि का नाम न ध्याएगा। जवानी में जो सोयेगा, बुढ़ापा में रोयेगा॥"
भावार्थ: जब तक इस शरीर में ताकत है, सांसें सुचारू रूप से चल रही हैं, तब तक मनुष्य ईश्वर का स्मरण नहीं करता, न ही कोई सत्कर्म करता है। वह सोचता है कि यह सब करने के लिए तो बुढ़ापा पड़ा है। लेकिन वह भूल जाता है कि बिना अभ्यास के बुढ़ापे में भगवान का नाम लेना भी असंभव हो जाता है।

"हाथ-पैर जब कांपने लगेंगे, लाठी का सहारा लेगा। आंखों से जब सूझेगा नहीं, तब तू किसको पुकारेगा॥"
भावार्थ: कवि वृद्धावस्था का अत्यंत सजीव और कारुणिक चित्रण करते हुए कहते हैं कि एक दिन ऐसा आएगा जब तुम्हारे हाथ-पैर कांपने लगेंगे, तुम्हें चलने के लिए लाठी का सहारा लेना पड़ेगा। आंखों की रोशनी धुंधली हो जाएगी। उस शारीरिक लाचारी के समय तुम चाहकर भी कुछ नहीं कर पाओगे। तब तुम किसे पुकारोगे? कोई तुम्हारी मदद नहीं कर पाएगा।

"यह संसार मुसाफिरखाना, कोई न यहां रहने पाएगा। खाली हाथ आया था जग में, खाली हाथ ही जाएगा॥"
भावार्थ: यह पूरी दुनिया एक सराय की तरह है, जहां हम सब यात्री हैं। यहां कोई भी हमेशा के लिए रहने नहीं आया है। सिकंदर की तरह हर इंसान इस दुनिया में खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही चला जाता है। साथ केवल हमारे द्वारा किए गए अच्छे और बुरे कर्म ही जाते हैं।

"कर ले भजन तू सच्चे मन से, भवसागर तर जाएगा। जवानी में जो सोयेगा, बुढ़ापा में रोयेगा॥"
भावार्थ: इसलिए हे मनुष्य! अभी समय है, अपनी युवावस्था में ही सच्चे मन से ईश्वर की आराधना कर, सत्कर्म कर और परोपकार कर। यही वे नाव हैं जो तुझे इस संसार रूपी कठिन सागर से पार उतारेगी।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के मूल भाव को पुष्ट करने के लिए शास्त्रों में भी कई श्लोक दिए गए हैं। श्रीमद्भगवद गीता के दूसरे अध्याय का यह श्लोक कर्म की महत्ता को दर्शाता है:

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥"

अर्थात्, तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर नहीं। इसलिए तुम्हें कर्मों के फल का हेतु नहीं होना चाहिए और न ही तुम्हारी कर्म न करने (आलस्य) में आसक्ति होनी चाहिए।

इसी प्रकार, आदि शंकराचार्य जी ने अपने प्रसिद्ध स्तोत्र 'भज गोविंदम' में युवावस्था और बुढ़ापे की इस विडंबना का सुंदर वर्णन किया है:

"बालस्तावत्क्रीडासक्तस्तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः।
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः परमे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः॥"

अर्थात्, बचपन खेल में बीत जाता है, युवावस्था तरुणियों (सांसारिक आकर्षणों) के प्रति आसक्ति में बीत जाती है, और बुढ़ापा चिंताओं में डूब जाता है। अफसोस कि परम ब्रह्म परमात्मा में किसी की भी आसक्ति नहीं हो पाती!

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण (Field) जानकारी (Details)
भजन का नाम (Bhajan Name) जवानी में जो सोयेगा बुढ़ापा में रोयेगा
भजन का प्रकार (Type) चेतावनी भजन / उपदेशात्मक लोकगीत (Chetawani Bhajan)
मुख्य रस / भाव (Mood/Bhava) शांत रस, वैराग्य भाव, करुणा (Detachment & Awakening)
प्रेरक संत / दर्शन (Inspiration) संत कबीरदास एवं संत परंपरा का दर्शन
मुख्य संदेश (Core Message) समय का सदुपयोग, आलस्य का त्याग, सत्कर्म और ईश्वर भक्ति
गायन के लिए उपयुक्त अवसर सत्संग, प्रातःकालीन प्रार्थना, संध्या वंदन, आध्यात्मिक सभाएं

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश समय की महत्ता और कर्म का सिद्धांत है। यह हमें सचेत करता है कि युवावस्था जीवन का सबसे मूल्यवान समय है। यदि हम इस समय का उपयोग सत्कर्मों, ज्ञानार्जन और भक्ति में नहीं करेंगे, तो बुढ़ापे में शारीरिक असमर्थता के समय हमें केवल पछताना पड़ेगा।

यहाँ 'सोने' का अर्थ केवल शारीरिक नींद नहीं, बल्कि अज्ञानता, मोह-माया और आलस्य में जीवन गंवाना है। 'रोने' का अर्थ वृद्धावस्था में शारीरिक लाचारी, मानसिक अशांति और जीवन के व्यर्थ चले जाने पर होने वाले गहरे पश्चाताप से है।

यह भजन कबीरदास जी के विचारों और उनकी 'चेतावनी' शैली से अत्यधिक प्रेरित है, परंतु यह एक पारंपरिक लोक-भजन है जो मौखिक संत परंपरा के माध्यम से हम तक पहुंचा है। इसके रचयिता के रूप में किसी एक व्यक्ति का नाम प्रमाणित नहीं है।

आज के समय में जब युवा पीढ़ी सोशल मीडिया, अवसाद और दिशाहीनता में अपना कीमती समय गंवा रही है, यह भजन उन्हें अपने लक्ष्यों के प्रति सजग होने, चरित्र निर्माण करने और समय का मूल्य समझने की अत्यंत व्यावहारिक सीख देता है।

यह भजन आमतौर पर कहरवा ताल में और लोक-धुनों पर गाया जाता है। इसकी धुन अत्यंत सरल और मर्मस्पर्शी होती है ताकि इसके शब्द सीधे श्रोता के हृदय को प्रभावित कर सकें।

'मुसाफिरखाना' का अर्थ है अस्थायी निवास (धर्मशाला)। यह संसार भी अस्थायी है; यहाँ हमारा जन्म एक यात्रा की तरह है। हमें एक न एक दिन इस शरीर और संसार को छोड़कर जाना ही होगा, इसलिए यहाँ की भौतिक वस्तुओं से अत्यधिक मोह नहीं करना चाहिए।

यह भजन हमें 'प्रोक्रैस्टिनेशन' (काम टालने की आदत) से बचने और अपने दैनिक कार्यों को समय पर पूरा करने की प्रेरणा देता है। यह हमें मानसिक रूप से मजबूत और अनुशासित बनाता है।

हाँ, मनोविज्ञान के अनुसार, जो लोग अपनी युवावस्था में अनुशासित जीवन जीते हैं, कौशल सीखते हैं और स्वास्थ्य का ध्यान रखते हैं, उनका बुढ़ापा अधिक सुरक्षित, स्वस्थ और तनावमुक्त होता है। यह भजन इसी मनोवैज्ञानिक सत्य को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। हमारी संपादकीय टीम ने इस भजन के पाठ, इसके दार्शनिक पहलुओं और लोक-परंपरा में इसके महत्व का गहन विश्लेषण किया है। इस भजन का उद्देश्य किसी को डराना नहीं, बल्कि जीवन के प्रति सकारात्मक और कर्मठ दृष्टिकोण विकसित करना है। यह कबीरपंथ के 'चेतावनी' साहित्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो सदियों से समाज का मार्गदर्शन करता आ रहा है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद गीता: कर्मयोग और समय प्रबंधन के सिद्धांत।
  • कबीर ग्रंथावली: संत कबीरदास जी के चेतावनी और वैराग्य से जुड़े दोहे।
  • भज गोविंदम (आदि शंकराचार्य): मानव जीवन की नश्वरता और ईश्वर भक्ति का महत्व।
  • भारतीय लोक संगीत एवं मौखिक परंपरा: उत्तर भारत के ग्रामीण अंचलों में प्रचलित पारंपरिक चेतावनी भजन संग्रह।

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संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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