Holi Bhajan

मोरा कौन हरे दुःख पीरा बिना रघुवीरा लिरिक्स (Mora Kaun Hare Dukh Peera Bina Raghuveera Lyrics in Hindi) - Holi Geet

260 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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"मोरा कौन हरे दुःख पीरा बिना रघुवीरा" यह अत्यंत ही पावन, मर्मस्पर्शी और करुणा रस से ओतप्रोत भजन है, जो प्रभु श्री राम के प्रति अनन्य शरणागति और विरह-भक्ति को दर्शाता है। होली के पावन पर्व पर जब संपूर्ण सृष्टि रंगों के उत्सव में सराबोर होती है, तब एक अनन्य भक्त का हृदय अपने आराध्य के बिना सूनापन अनुभव करता है। यह भजन केवल एक पारंपरिक होली गीत नहीं है, बल्कि यह जीवात्मा की उस व्याकुल पुकार को अभिव्यक्त करता है जो संसार के कोलाहल से दूर अपने स्वामी, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी के दर्शनों के लिए लालायित है। इस लेख में हम इस दिव्य भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, उसके गहरे आध्यात्मिक भावार्थ, साहित्यिक सौंदर्य और सांस्कृतिक महत्व का विस्तृत विवेचन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मोरा कौन हरे दुःख पीरा, बिना रघुवीरा।
बिना रघुवीरा, प्रभु बिना रघुवीरा॥

सावन बरसे, मनवा तरसे, सूनी है मेरी कुटिया,
कब आओगे, दर्शन दोगे, मिटेगी मन की त्रुटिया।
मोरा कौन हरे दुःख पीरा, बिना रघुवीरा॥

होली आई, रंग लाई, सबने खुशियाँ मनाई,
मैं हूँ अकेली, रंग की बेली, प्रभु याद तुम्हारी आई।
मोरा कौन हरे दुःख पीरा, बिना रघुवीरा॥

पतित पावन, नाम तुम्हारा, जग में सबसे न्यारा,
मेरी नैया, डगमग डोले, कर दो प्रभु किनारा।
मोरा कौन हरे दुःख पीरा, बिना रघुवीरा॥

दास पुकारे, चरण पखारे, आस लगी है मन में,
रघुवर आओ, गले लगाओ, बसा लो अपने नयन में।
मोरा कौन हरे दुःख पीरा, बिना रघुवीरा॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का मूल भाव 'विरह' और 'समर्पण' है। भक्त अपने जीवन की असहाय अवस्था का वर्णन करते हुए कहता है कि हे प्रभु रघुवीर! आपके अतिरिक्त इस संसार में मेरी पीड़ा और दुखों को हरने वाला कोई दूसरा नहीं है। जब सावन की बूंदें बरसती हैं, तो भक्त का मन प्रभु दर्शन के लिए तरस उठता है। सूनी कुटिया उस हृदय का प्रतीक है जिसमें अभी तक ज्ञान और भक्ति का प्रकाश पूर्ण रूप से नहीं फैला है। भक्त प्रार्थना करता है कि प्रभु आकर दर्शन दें ताकि मन के सारे संशय, विकार और त्रुटियां समाप्त हो जाएं।

होली के संदर्भ में यह भजन और भी अधिक मार्मिक हो जाता है। होली का त्योहार हर्ष, उल्लास और रंगों का प्रतीक है। संसार के लोग आपस में रंग खेल रहे हैं और खुशियां मना रहे हैं, परंतु प्रभु के बिना भक्त स्वयं को अकेला महसूस करता है। वह 'रंग की बेली' (अर्थात भक्ति के रंग में रंगी हुई लता) की तरह केवल अपने आराध्य के रंग में रंगना चाहता है। सांसारिक रंग उसे फीके लगते हैं। वह प्रभु से करुण पुकार करता है कि इस संसार रूपी भवसागर में उसकी जीवन-नैया डगमगा रही है, और केवल प्रभु का नाम ही उसे पार लगा सकता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन भारतीय भक्ति परंपरा की 'मधुरा' और 'करुणा' भाव की साधना को प्रदर्शित करता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • अनन्य शरणागति: भजन की प्रत्येक पंक्ति में यह स्पष्ट है कि भक्त का भगवान के अतिरिक्त कोई अन्य सहारा नहीं है। यह गीता के 'मामेकं शरणं व्रज' के सिद्धांत को चरितार्थ करता है।
  • सांसारिक विरक्ति: होली जैसे आनंदमयी उत्सव में भी प्रभु की स्मृति का बने रहना यह दर्शाता है कि भक्त के लिए ईश्वर-प्रेम से बढ़कर कोई लौकिक सुख नहीं है।
  • सुलभ भाषा: अवधी और लोकभाषा के मिश्रण से बना यह भजन जन-साधारण के हृदय को सीधे स्पर्श करता है।
  • आध्यात्मिक सांत्वना: यह भजन दुःख और निराशा के क्षणों में मनुष्य को यह विश्वास दिलाता है कि जब कोई साथ नहीं देता, तब रघुवीर अवश्य सहायक होते हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान के भजन के लिए कोई भी समय अनुचित नहीं होता, परंतु इस भजन की प्रकृति और भाव को देखते हुए इसके गायन और श्रवण के विशेष अवसर निर्धारित हैं:

  • होली उत्सव के दौरान: फाल्गुन मास में जब होली का पर्व आता है, तब इस भजन को गाकर भक्त अपने हृदय को प्रभु के चरणों में समर्पित करते हैं।
  • संध्या काल की प्रार्थना: दिनभर की व्यस्तता के बाद संध्या समय शांत मन से इस भजन का गायन करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है।
  • सत्संग और संकीर्तन: सामूहिक सत्संगों में जब इस भजन को ऊंचे स्वर और वाद्य यंत्रों (जैसे मंजीरा और ढोलक) के साथ गाया जाता है, तो संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम (रघुवीर) को समर्पित है। भगवान राम को 'करुणाकर' और 'आर्तत्राणपरायण' (दुखियों की रक्षा करने वाले) कहा गया है। भारतीय भक्ति साहित्य में गोस्वामी तुलसीदास, संत कबीर और मीराबाई जैसी महान विभूतियों ने इसी प्रकार के विरह और आर्तभाव के पदों की रचना की है। यह भजन उसी समृद्ध संत परंपरा की देन है, जो लोकमानस में सदियों से मौखिक रूप से जीवित रही है और आज भी भक्तों के कंठ का हार बनी हुई है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की रचना पारंपरिक लोक-भक्ति शैली में हुई है। उत्तर भारत के ग्रामीण अंचलों में, विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार के क्षेत्रों में, होली के अवसर पर गाए जाने वाले गीतों में केवल आमोद-प्रमोद ही नहीं होता, बल्कि उनमें एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी छिपा होता है। इस भजन की पृष्ठभूमि भी यही है कि सांसारिक उत्सवों के बीच मनुष्य को अपने परम लक्ष्य यानी ईश्वर को नहीं भूलना चाहिए।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और मिठास से भरी अवधी-मिश्रित हिंदी है। इसमें प्रयुक्त अलंकार और रूपक अत्यंत सुंदर हैं:

  • रूपक अलंकार: 'सूनी है मेरी कुटिया' में कुटिया केवल भौतिक घर नहीं, बल्कि सूना और अंधकारमय हृदय है।
  • प्रतीकात्मकता: 'नैया डगमग डोले' मानव जीवन के संघर्षों और अस्थिरता का प्रतीक है।
  • लयबद्धता: भजन का छंद और राग ऐसा है कि इसे सुनते ही मन में करुणा और शांति का संचार होने लगता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:

  1. धैर्य और विश्वास: जीवन में जब भी कठिन समय आए, हमें विचलित हुए बिना ईश्वर पर अटूट विश्वास रखना चाहिए।
  2. सच्चा सुख ईश्वर में है: सांसारिक सुख क्षणभंगुर हैं। होली के रंग मिट जाएंगे, परंतु राम-नाम का रंग शाश्वत है।
  3. विनम्रता: स्वयं को 'पतित' और प्रभु को 'पावन' मानकर की गई प्रार्थना ही सच्ची प्रार्थना है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
रघुवीरा श्री रामचंद्र जी (रघुवंश के वीर) परमेश्वर, रक्षक
पीरा कष्ट, दुःख, वेदना भवसागर का संताप
त्रुटिया गलतियां, कमियां, अज्ञान साधक के अंतःकरण के दोष
रंग की बेली रंगों की लता भक्ति के रंग में रंगी जीवात्मा
पतित पावन पापियों का उद्धार करने वाले भगवान की दयालुता

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"मोरा कौन हरे दुःख पीरा, बिना रघुवीरा..."
भक्त कहता है कि हे प्रभु, आपके बिना इस संसार में मेरी मानसिक और शारीरिक पीड़ा को दूर करने वाला कोई नहीं है। आप ही मेरे एकमात्र रक्षक हैं।

"सावन बरसे, मनवा तरसे, सूनी है मेरी कुटिया..."
जैसे सावन की वर्षा होने पर चातक पक्षी स्वाति नक्षत्र की बूंद के लिए तरसता है, वैसे ही मेरा मन आपके दर्शनों के लिए व्याकुल है। मेरा हृदय रूपी मंदिर आपके बिना सूना पड़ा है।

"होली आई, रंग लाई, सबने खुशियाँ मनाई..."
संसार के लोग होली के रंगों में मग्न हैं, परंतु मैं आपके विरह में अकेली बैठी हूँ। मुझे केवल आपकी याद सता रही है क्योंकि मेरा असली रंग तो आपका प्रेम ही है।

"पतित पावन, नाम तुम्हारा, जग में सबसे न्यारा..."
आपका नाम पतितों का उद्धार करने वाला है। मेरी जीवन रूपी नैया इस संसार के थपेड़ों से डगमगा रही है, कृपया इसे किनारे लगा दीजिए (मोक्ष प्रदान कीजिए)।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव को सुदृढ़ करने के लिए रामचरितमानस का यह प्रसिद्ध श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है:

"आर्तत्राणपरायण सुमुखं धर्मार्थकामप्रदं,
रामं शरणं प्रपद्ये।"

अर्थात: दुखियों की रक्षा करने वाले, सुंदर मुख वाले और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्रदान करने वाले भगवान श्री राम की मैं शरण लेता हूँ।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम मोरा कौन हरे दुःख पीरा बिना रघुवीरा
मुख्य आराध्य भगवान श्री राम (रघुवीर)
भजन का प्रकार होली भजन / विरह गीत
मुख्य भाव करुणा, समर्पण, विरह भक्ति
भाषा अवधी एवं लोकभाषा
उपयुक्त अवसर होली, रामनवमी, दैनिक संध्या आरती

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और अटूट विश्वास है। यह सिखाता है कि सांसारिक सुखों के बीच भी मनुष्य को अपने वास्तविक रक्षक भगवान राम को नहीं भूलना चाहिए।

होली के समय जब सब लोग सांसारिक रंगों में रंगे होते हैं, तब भक्त इस भजन के माध्यम से भगवान के प्रेम के रंग में रंगने की इच्छा व्यक्त करता है। इसलिए इसे होली गीत के रूप में गाया जाता है।

'रंग की बेली' का अर्थ है भक्ति के रंग में सराबोर लता। यहाँ भक्त स्वयं को एक ऐसी लता के रूप में प्रस्तुत कर रहा है जो केवल प्रभु राम के प्रेम रूपी वृक्ष के सहारे जीवित रहना चाहती है।

यह भजन पारंपरिक रूप से लोक धुनों पर आधारित है, जिसमें करुण और शांत रस की प्रधानता होती है। इसे सुगम संगीत और शास्त्रीय दोनों शैलियों में गाया जा सकता है।

हाँ, यह भजन दैनिक संध्या आरती या सुबह की प्रार्थना के समय गाया जा सकता है। यह मन को शांत करने और ध्यान केंद्रित करने में अत्यंत सहायक है।

'पतित' का अर्थ है गिरे हुए या पापी, और 'पावन' का अर्थ है पवित्र करने वाला। भगवान राम का एक नाम 'पतित पावन' है क्योंकि वे पापी से पापी व्यक्ति का भी उद्धार कर देते हैं।

यह भजन मुख्य रूप से अवधी और लोकभाषा के मिश्रण में लिखा गया है, जो उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में अत्यंत लोकप्रिय है।

इस भजन के श्रवण से मानसिक तनाव दूर होता है, हृदय में भक्ति भाव जाग्रत होता है और साधक को ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। हमारी विद्वत मंडली ने इस भजन के पाठ की शुद्धता और उसके दार्शनिक पक्षों की गहन जांच की है। यह भजन केवल एक लोकगीत नहीं है, बल्कि यह श्रीमद्भागवत महापुराण और रामचरितमानस में वर्णित 'नवधा भक्ति' के 'आर्त' और 'शरणागति' भावों का सुंदर समन्वय है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण एवं श्री रामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास)।
  • उत्तर भारतीय लोक भजन एवं होली गीत संग्रह परंपरा।
  • भक्ति संप्रदाय के पारंपरिक पद एवं संकीर्तन ग्रंथ।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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