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सूर्य नमस्कार के मंत्र अर्थ सहित(Surya Namskar Ke Mantra Arth Sahit) - Bhaktilok

सूर्य देवता नमस्कार के मंत्र अर्थ सहित (Surya Namskar Ke Mantra Arth Sahit):-

सूर्य नमस्कार के मंत्र अर्थ सहित(Surya Namskar Ke Mantra Arth Sahit) - Bhaktilok

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सूर्य नमस्कार के मंत्र अर्थ सहित(Surya Namskar Ke Mantra Arth Sahit):-

सूर्य नमस्कार एक व्यायाम है। एक योगासन है और यह हिंदू धर्म में भगवान सूर्य की पूजा करने का एक तरीका भी है। इसे बच्चे, जवान और बूढ़े, पुरुष और महिलाएं कोई भी कर सकता है।

वेदो में प्रसिद्ध ऋग्वेद कहता है कि, “सूर्य पूरे विश्व की आत्मा है, सूर्य ही एकमात्र ईश्वर है, जो अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करता है। इसलिए, हमें स्वास्थ्य और लंबे जीवन के लिए सूर्य देवता की पूजा करनी चाहिए।”


सूर्य नमस्कार के विषय में शास्त्रों में एक श्लोक लिखा गया है ( (Shastranusar Surya Namaskar Kya Hota Hai ) : –


आदित्यस्य नमस्कारान् ये कुर्वन्ति दिने दिने।

आयुः प्रज्ञा बलं वीर्यं तेजस्तेषां च जायते ॥


जो भी मनुष्य सूर्य नमस्कार प्रतिदिन करते है, उनकी आयु , प्रज्ञा, बल, वीर्य और तेज बढ़ता है और इसके साथ ही सूर्य नमस्कार प्रतिदिन करने से त्वचा से जुड़े हुए रोग दूर होते है |

पौराणिक ग्रन्थों में मित्र कर्मों के प्रेरक धरा-आकाश के पोषक तथा निष्पक्ष व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है।

प्रातःकालीन सूर्य भी दिवस के कार्यकलापों को प्रारम्भ करने का आह्वान करता है, तथा सभी जीव-जन्तुओं को अपना प्रकाश प्रदान करता है। 

सूर्य के बारह मंत्र हैं। सूर्य नमस्कार के प्रत्येक भाग को शुरू करने से पहले आपको प्रत्येक मंत्र को दोहराना होगा। सूर्य नमस्कार के एक भाग में 12 चरण (अर्थात सूर्य नमस्कार के 12 मंत्र) होते हैं।

आसन के प्रत्येक में 5 सेकंड का समय लगेगा। जब तक आप एक चक्र पूरा करते हैं, तब तक इसमें एक मिनट का समय भी लग जाएगा। इस सेट को सभी बारह मंत्रों के लिए दोहराया जाना है।

जब आप एक चक्र पूरा करते हैं, तब तक यह लगभग कुल 12 से 15 मिनट का होगा। समय इस बात पर निर्भर करता है कि आप प्रत्येक आसन पर कुल कितना समय व्यतीत करते हैं। कुल बारह मंत्र नीचे सूचीबद्ध हैं। प्रत्येक मंत्र की शुरुआत ओम् से होनी चाहिए।

सूर्य नमस्कार की प्रत्येक मुद्रा में मंत्र दोहराए जा सकते हैं, यदि इन मंत्रों को दोहराते हुए सूर्य नमस्कार किया जाता है ,तो व्यक्ति अपने जीवन में बहुत लाभ प्राप्त कर सकता है। 

ॐ मित्राय नमः मंत्र का अर्थ (Om Maitray Namha Mantra Ka Arth):-

ॐ मित्राय नमः ( मित्र को प्रणाम ) - 

मंत्र मित्राय का मतलब मित्रता। सूर्य देव हम सब के सच्चे मित्र है, और सहायक है। सच्चे मित्र का सम्बोधन मित्र कहके किया गया है | उनसे इस मंत्र का प्रयोग हम सूर्य देव से मित्रता का भाव प्रकट कर रहे हैं। उसी तरह हम इस बात का विश्वाश भी जगता है, हमें सबके साथ मित्रता की भावना रखनी चाहिए।


ॐ रवये नमः मंत्र का अर्थ (Om Ravaye Namaha Mantra Ka Arth):-

ॐ रवये नमः मंत्र का अर्थ ( प्रकाशवान को प्रणाम ) - 

“रवये“ का तात्पर्य है, जो स्वयं प्रकाशवान है, तथा सम्पूर्ण जीवधारियों को दिव्य आशीष प्रदान करता है। तृतीय स्थिति हस्तउत्तानासन में इन्हीें दिव्य आशीषों को ग्रहण करने के उद्देश्य से शरीर को प्रकाश के स्त्रोत की ओर ताना जाता है। 


ॐ सूर्याय नमः मंत्र का अर्थ( Om Suryaya Namaha Mantra Ka Arth ):- 

ॐ सूर्याय नमः मंत्र का अर्थ( क्रियाओं के प्रेरक को प्रणाम ):- 

इस मंत्र में भगवान सूर्य को ईश्वर के रूप में अत्यन्त सक्रिय माना गया है। प्राचीन वैदिक ग्रंथों में सात घोड़ों के जुते रथ पर सवार होकर सूर्य के आकाश गमन की कल्पना की गई है और ये सात घोड़े परम चेतना से निकलने वाल सप्त किरणों के प्रतीक है।


ॐ भानवे नम: मंत्र का अर्थ (Om Bhanave Namaha Mantra Ka Arth):- 

ॐ भानवे नमः ( प्रदीप्त होने वाले को प्रणाम ):-

सूर्य भौतिक स्तर पर गुरू का प्रतीक है। इसका सूक्ष्म तात्पर्य है, कि गुरू हमारी भ्रांतियों के अंधकार को दूर करता है, उसी प्रकार जैसे प्रातः वेला में रात्रि का अंधकार दूर हो जाता है। अश्व संचालनासन की स्थिति में हम उस प्रकाश ( अर्थात सूर्य की ओर) की ओर मुँह करके अपने अज्ञान रूपी अंधकार की समाप्ति हेतु प्रार्थना करते हैं।


ॐ खगाय नमः मंत्र का अर्थ(Om Khagaya Namaha Mantra Ka Arth):-

ॐ खगाय नमः ( आकाशगामी को प्रणाम ) -

समय का ज्ञान - प्राप्त करने हेतु प्राचीन काल से सूर्य यंत्रों  के प्रयोग से लेकर वर्तमान कालीन यंत्रों के प्रयोग तक के लंबे काल में समय का ज्ञान प्राप्त करने के लिए आकाश में सूर्य की गति को ही आधार माना गया है। हम इस शक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं , जो समय का ज्ञान प्रदान करती है , तथा उससे जीवन को उन्नत बनाने की प्रार्थना करते हैं।


ॐ पूष्णे नमः मंत्र का अर्थ (Om Pushne Namaha Mantra ka Arth ):-

ॐ पूष्णे नमः ( पोषक को प्रणाम ) - 

सूर्य देवता सभी शक्तियों का स्त्रोत है। एक पिता की भाँति वह हमें शक्ति, प्रकाश तथा जीवन देकर हमारा पोषण और जीवन यापन करता है। साष्टांग नमस्कार की स्थिति में हमे शरीर के सभी आठ केन्द्रों को भूमि से स्पर्श करते हुए, उस पालनहार को अष्टांग प्रणाम करते हैं।तत्पश्चात हम उसे अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को समर्पित करते है, और आशा करते हैं कि वह हमें शारीरिक व् मानसिक तथा आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करें।


ॐ हिरण्यगर्भाय नमः मंत्र का अर्थ(Om Hiranyagarbhaya Namaha Mantra Ka Arth ) :- 

ॐ हिरण्यगर्भाय नमः ( स्वर्णिम् विश्वात्मा को प्रणाम ) - 

हिरण्यगर्भ स्वर्ण के अण्डे के समान सूर्य की तरह दिव्यमान, ऐसी संरचना है जिससे सृष्टिकर्ता ब्रह्म की उत्पत्ति हुई है। हिरण्यगर्भ प्रत्येक कार्य का परम कारण है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, प्रकटीकरण के पूर्व अन्तर्निहित अवस्था में हिरण्यगर्भ के अन्दर निहित रहता है। इसी प्रकार समस्त जीवन सूर्य (जो महत् विश्व सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करता है। ) में अन्तर्निहित है।

भुजंगासन में हम सूर्य देवता के प्रति सम्मान प्रकट करते है तथा यह प्रार्थना करते है, कि हममें रचनात्मकता का उदय हो।


ॐ मरीचये नमः मंत्र का अर्थ (Om Marichaye Namaha Mantra Ka Arth) :- 

ॐ मरीचये नमः ( सूर्य रश्मियों को प्रणाम ) :- 

मारीच ब्रह्मपुत्रों में से एक है , परन्तु इसका अर्थ मृग मरीचिका भी होता है। हम जीवन भर सत्य की खोज में उसी प्रकार भटकते रहते हैं |

जिस प्रकार एक प्यासा व्यक्ति मरूस्थल में मरीचिकाओं के जाल में फँसकर जल के लिए मूर्ख की भाँति इधर-उधर दौड़ता रहता है। उसी तरह पर्वतासन की स्थिति में हम सच्चे ज्ञान तथा विवके को प्राप्त करने के लिए नतमस्तक होकर प्रार्थना करते हैं जिससे हम सत् अथवा असत् के अन्तर को समझ सकें।


ॐ आदित्याय नमः मंत्र का अर्थ(Om Adityaya Namaha Mantra Ka Arth) :-

ॐ आदित्याय नमः ( अदिति-सुत को प्रणाम) - 

विश्व जननी ( जिन्हे हम महाशक्ति भी कहते है ) के अनन्त नामों में एक नाम अदिति भी है। वहीं समस्त देवों की जननी, अनन्त तथा सीमारहित है। वह आदि रचनात्मक शक्ति है, जिससे सभी शक्तियाँ निःसृत हुई हैं। अश्व संचलानासन में हम उस अनन्त विश्व-जननी को प्रणाम करते हैं।


ॐ सवित्रे नमः मंत्र का अर्थ(Om Savitre Namaha Mantra Ka Arth):-

ॐ सवित्रे नमः ( सूर्य की उद्दीपन शक्ति को प्रणाम ) - 

सवित्र जागृत करने वाला देव है। इसका संबंध सूर्य देवता से स्थापित किया जाता है। सवित्री उगते हुए सूर्य का प्रतिनिधि है, जो मनुष्य को जागृत करता है, और क्रियाशील बनाता है। “सूर्य“ पूर्ण रूप से उदित सूरज का प्रतिनिधित्त्व करता है। जिसके प्रकाश में सारे कार्यकलाप होते है। सूर्य नमस्कार की हस्तपादासन स्थिति में सूर्य की जीवनदायनी शक्ति की प्राप्ति हेतु सवित्र को प्रणाम किया जाता है।


ॐ अर्काय नमः मंत्र का अर्थ (Om Arkaya Namaha Mantra Ka Arth) :-

ॐ अर्काय नमः ( प्रशंसनीय को प्रणाम ) - 

अर्क का तात्पर्य है – उर्जा जो की सूर्य विश्व की शक्तियों का प्रमुख स्त्रोत है। हस्तउत्तानासन में हम जीवन तथा उर्जा के इस स्त्रोत के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते है।


ॐ भास्कराय नमः मंत्र का अर्थ (Om Bhaskaraya Namaha Mantra Ka Arth):-  

ॐ भास्कराय नमः ( आत्मज्ञान-प्रेरक को प्रणाम ) - 

सूर्य नमस्कार की अंतिम स्थिति प्रणामासन (जिसे हम नमस्कारासन भी कहते है। ) में अनुभवातीत तथा आघ्यात्मिक सत्यों के महान प्रकाशक के रूप में सूर्य को अपनी श्रद्वा समर्पित की जाती है।

सूर्य देवता हमारे चरम लक्ष्य-जीवनमुक्ति के मार्ग को प्रकाशित करता है। प्रणामासन में हम यह प्रार्थना करते हैं, कि वह हमें यह मार्ग दिखायें। इस प्रकार सूर्य नमस्कार पद्धति में बारह मंत्रों का अर्थ सहित भावों का समावेश किया जा रहा है।


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