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कशी जाऊ मी वृंदावना मूरली वाजवितो कान्हा लिरिक्स (Kashi Jau Mi Vrundavana Murali Wajvito Kanha Lyrics in Hindi) - Krishna Bhajan

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SEO Title कशी जाऊ मी वृंदावना मूरली वाजवितो कान्हा लिरिक्स | Kashi Jau Mi Vrundavana Lyrics
Meta Description संत एकनाथ महाराज रचित प्रसिद्ध कृष्ण भजन 'कशी जाऊ मी वृंदावना मूरली वाजवितो कान्हा' के हिंदी व मराठी लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या।
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URL Slug 2023/09/kashi-jau-mi-vrundavana-murali-wajvito.html

महान संत कवि एकनाथ महाराज द्वारा रचित 'कशी जाऊ मी वृंदावना मूरली वाजवितो कान्हा' (Kashi Jau Mi Vrundavana Murali Wajvito Kanha) महाराष्ट्र की समृद्ध भक्ति परंपरा का एक अत्यंत लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी भजन (गौळण) है। इस भजन में भगवान श्री कृष्ण की दिव्य मुरली की ध्वनि से व्याकुल एक गोपी (अथवा जीवात्मा) की विरह-वेदना, असीम श्रद्धा और समर्पण का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया है। यह रचना केवल एक मधुर लोकगीत नहीं है, बल्कि यह जीव और ब्रह्म के मिलन की तड़प को दर्शाने वाला एक गहरा आध्यात्मिक दस्तावेज है। जब कन्हैया यमुना के उस पार (पैलतीर) खड़े होकर अपनी बांसुरी बजाते हैं, तो उसकी तान सुनकर संसार रूपी बंधनों में बंधी जीवात्मा सब कुछ भूलकर उनकी ओर खिंची चली जाती है। इस मार्गदर्शिका में हम इस पावन भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, उसके गहरे दार्शनिक अर्थ, संत एकनाथ के जीवन दर्शन और इस भजन के आध्यात्मिक महत्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

कशी जाऊ मी वृंदावना

कशी जाऊ मी वृंदावना
मूरली वाजवितो कान्हा || धृ ||

पैलतिरी हरी, वाजवी मूरली
नदी भरली भरली जमूना || १ ||

कासे पितांबर कस्तूरी टिळक
कूंडल शोभे काना || २ ||

कशी जाऊ मी वृंदावना
मूरली वाजवितो कान्हा ||

काय करू बाई, कुणाला सांगू
हरीनामाची सांगड आणा || ३ ||

नंदाच्या हरीने कौतूक केले
जाणे अंतरीच्या खूणा || ४ ||

कशी जाऊ मी वृंदावना
मूरली वाजवितो कान्हा ||

एका जनार्दनी मनी म्हणा
देव महात्मे ना कळे कोणा || ५ ||

कशी जाऊ मी वृंदावना
मूरली वाजवितो कान्हा ||

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

संत एकनाथ महाराज द्वारा रचित इस 'गौळण' (गोपियों के गीत) का भावार्थ अत्यंत गहरा और रहस्यमयी है। ऊपरी तौर पर यह एक गोपी की व्यथा लगती है जो यमुना नदी में बाढ़ आने के कारण श्री कृष्ण से मिलने वृंदावन नहीं जा पा रही है, लेकिन आध्यात्मिक स्तर पर यह प्रत्येक मनुष्य (जीवात्मा) की कहानी है।

संसार रूपी यमुना और परमात्मा की पुकार: भजन की शुरुआत में गोपी कहती है कि "मैं वृंदावन कैसे जाऊँ? वहां कान्हा अपनी बांसुरी बजा रहा है।" यहाँ 'वृंदावन' शुद्ध चेतना और भक्ति का वह परम धाम है जहाँ परमात्मा का निवास है। 'मुरली की ध्वनि' ईश्वर की वह अनहद नाद या पुकार है जो हर क्षण हमारे भीतर गूंज रही है। परंतु, बीच में 'जमूना' (यमुना नदी) बह रही है जो पूरी तरह से उफान पर है। यह उफनती हुई यमुना नदी हमारे सांसारिक मोह-माया, वासनाओं, क्रोध और अहंकार का प्रतीक है। इस संसार रूपी नदी के कारण जीवात्मा परमात्मा से मिलन के मार्ग में स्वयं को असहाय पाती है।

हरिनाम की नौका: जब गोपी कहती है कि "काय करू बाई, कुणाला सांगू, हरीनामाची सांगड आणा" (मैं क्या करूँ, किससे कहूँ, मेरे लिए हरिनाम की नौका लेकर आओ), तो वह इस भवसागर को पार करने का एकमात्र उपाय बताती है। 'सांगड' का अर्थ है दो नावों या लकड़ियों को जोड़कर बनाया गया सहारा (बेड़ा)। संत एकनाथ समझाते हैं कि इस मायावी संसार रूपी नदी को पार करने के लिए केवल 'हरिनाम' (भगवान के नाम का स्मरण) ही एकमात्र सहारा है। बिना नाम-स्मरण के इस उफनती नदी को पार करना असंभव है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय और कृष्ण भक्ति मार्ग में एक विशिष्ट स्थान रखता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • मधुरा भक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण: इसमें शांत, दास्य और सख्य भाव से ऊपर उठकर 'मधुरा भक्ति' (कांत भाव) को दर्शाया गया है, जहाँ भक्त स्वयं को प्रेयसी और ईश्वर को प्रियतम मानता है।
  • रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग: यमुना नदी को संसार, मुरली को ईश्वर की पुकार और सांगड को गुरु-कृपा या हरिनाम के रूप में चित्रित किया गया है।
  • सरलता और गेयता: संत एकनाथ की भाषा अत्यंत सरल और लोक-हृदय को छूने वाली है। इसे शास्त्रीय संगीत से लेकर साधारण कीर्तन तक हर मंच पर सहजता से गाया जा सकता है।
  • अद्वैत और द्वैत का समन्वय: यद्यपि यह सगुण भक्ति का गीत है, परंतु इसके अंत में निर्गुण-निराकार ईश्वर की महिमा का संकेत मिलता है, जिसे बुद्धि से नहीं बल्कि केवल प्रेम से जाना जा सकता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान के भजन के लिए कोई भी समय अनुचित नहीं है, परंतु इस विशिष्ट भजन को गाने और सुनने की एक पारंपरिक विधि और समय है:

  • प्रातःकाल और संध्या वंदन: इस भजन को सुबह के समय या संध्या आरती के समय गाना अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसकी शांत और मधुर धुन मन को एकाग्र करने में मदद करती है।
  • कृष्ण जन्माष्टमी और उत्सव: राधा कृष्ण भजन के रूप में इसे जन्माष्टमी, गोकुलाष्टमी, और कार्तिक मास के दौरान विशेष रूप से गाया जाता है।
  • कीर्तन और भजन संध्या: वारकरी संप्रदाय के कीर्तनों में 'गौळण' के रूप में इस भजन का गायन अनिवार्य रूप से किया जाता है। इसे गाते समय हाथ में करताल या चिपली लेकर भावविभोर होकर नृत्य करने की परंपरा है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से दो महान सत्ताओं से जुड़ा हुआ है:

भगवान श्री कृष्ण (कान्हा)

इस भजन के केंद्र में लीला पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण हैं। यहाँ उनका स्वरूप 'मुरलीधर' का है। उनकी पीतांबर धारी छवि, माथे पर कस्तूरी तिलक और कानों में झूलते कुंडल भक्त के मन को आकर्षित करते हैं। वे अंतर्यामी हैं जो अपने भक्तों के मन की हर बात (अंतरीच्या खूणा) जानते हैं।

संत एकनाथ महाराज

इस भजन के रचयिता संत एकनाथ महाराज (१५३३-१५९९) हैं, जो महाराष्ट्र के पैठण के रहने वाले थे। वे संत ज्ञानेश्वर और संत नामदेव की भागवत परंपरा के एक महान स्तंभ थे। उन्होंने समाज में समानता, बंधुत्व और भक्ति का प्रचार किया। उनके भजनों के अंत में 'एका जनार्दनी' आता है, जो उनके गुरु 'जनार्दन स्वामी' के प्रति उनके पूर्ण समर्पण को दर्शाता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

१६वीं शताब्दी में जब भारत में मुगलों का शासन था और समाज में सांस्कृतिक व धार्मिक संकट था, तब संतों ने लोकभाषा में भक्ति आंदोलन को गति दी। संत एकनाथ ने देखा कि संस्कृत के कठिन ग्रंथ आम जनता की समझ से बाहर थे। इसलिए उन्होंने 'भारुड' और 'गौळण' जैसी लोक शैलियों का उपयोग किया।

'कशी जाऊ मी वृंदावना' की रचना इसी पृष्ठभूमि में हुई थी। उन्होंने गोपियों के माध्यम से सामान्य गृहस्थों को यह सिखाया कि कैसे अपने दैनिक कार्यों को करते हुए भी मन को भगवान कृष्ण के चरणों में लगाया जा सकता है। यह भजन दर्शाता है कि संसार की बाधाएं कितनी भी बड़ी क्यों न हों, यदि हृदय में तड़प है, तो ईश्वर स्वयं मार्ग प्रशस्त करते हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा प्राचीन मराठी (जुनी मराठी) है, जिसमें ब्रजभाषा का भी सुंदर प्रभाव दिखाई देता है। इसकी काव्य शैली अत्यंत सरल, प्रवाहमयी और संगीतमय है।

  • छंद और लय: यह भजन 'अभंग' और 'गौळण' छंद के नियमों के अनुकूल है। इसमें अंत्यानुप्रास (Rhyming words) का सुंदर प्रयोग है, जैसे - वृंदावना/कान्हा, जमूना/काना, आणा/खूणा।
  • प्रतीकात्मकता (Symbolism): संत एकनाथ ने बहुत ही सूक्ष्म आध्यात्मिक सत्यों को रोजमर्रा के प्रतीकों (नदी, नाव, आभूषण) के माध्यम से प्रस्तुत किया है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें आधुनिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख देता है:

  1. संसार की असारता: उफनती हुई यमुना हमें याद दिलाती है कि यह संसार अनिश्चित और बाधाओं से भरा है। यहाँ सुख और दुःख की लहरें उठती रहती हैं।
  2. हरिनाम की शक्ति: जैसे नदी पार करने के लिए नाव की आवश्यकता होती है, वैसे ही जीवन के तनावों और दुखों से पार पाने के लिए ईश्वर का नाम ही सबसे बड़ा संबल है।
  3. ईश्वर की अंतर्यामी प्रकृति: "जाणे अंतरीच्या खूणा" - भगवान हमारे दिखावे को नहीं, बल्कि हमारे हृदय के सच्चे भावों को देखते हैं। इसलिए भक्ति में निष्कपटता अनिवार्य है।
  4. समर्पण और व्याकुलता: जब तक भक्त के हृदय में भगवान से मिलने की तीव्र व्याकुलता (जैसे गोपी की व्याकुलता) नहीं होगी, तब तक आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

मराठी शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ / महत्व
कशी जाऊ (Kashi Jau) कैसे जाऊँ जीवात्मा की असमर्थता और व्याकुलता का सूचक।
पैलतिरी (Pailtiri) नदी के उस पार (दूसरे किनारे पर) परमात्मा का धाम, जो माया के पार है।
जमूना (Jamuna) यमुना नदी संसार, माया और वासनाओं का प्रतीक।
कासे पितांबर (Kase Pitambar) कमर पर पीला वस्त्र धारण किए हुए भगवान श्री कृष्ण का दिव्य सगुण रूप।
सांगड (Sangad) नाव, बेड़ा या सहारा गुरु-कृपा और हरिनाम स्मरण रूपी साधन।
अंतरीच्या खूणा (Antarichya Khuna) हृदय के गुप्त संकेत / भाव परमात्मा का अंतर्यामी होना, जो बिना कहे सब समझता है।
एका जनार्दनी (Eka Janardani) जनार्दन स्वामी के शिष्य एकनाथ संत एकनाथ की साहित्यिक छाप (मुद्रा)।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

१. कशी जाऊ मी वृंदावना, मूरली वाजवितो कान्हा...

व्याख्या: गोपी कहती है कि हे सखी! मैं उस पावन वृंदावन धाम में कैसे प्रवेश करूँ? वहाँ मेरा प्रियतम कान्हा अपनी बांसुरी बजा रहा है। उसकी बांसुरी की तान मुझे अपनी ओर खींच रही है, लेकिन मेरे पैर बंधे हुए हैं।

२. पैलतिरी हरी, वाजवी मूरली, नदी भरली भरली जमूना...

व्याख्या: श्री हरि यमुना नदी के उस पार खड़े होकर मुरली बजा रहे हैं। लेकिन इस पार से उस पार जाने का मार्ग बंद है क्योंकि यमुना नदी पानी से पूरी तरह लबालब भरी हुई है। यह संसार रूपी नदी मेरे और मेरे ईश्वर के बीच की दूरी बनकर खड़ी है।

३. कासे पितांबर कस्तूरी टिळक, कूंडल शोभे काना...

व्याख्या: उस पार खड़े कन्हैया का रूप अत्यंत मनमोहक है। उन्होंने अपनी कमर पर पीला पीतांबर बांधा हुआ है, माथे पर सुगंधित कस्तूरी का तिलक सुशोभित है और उनके कानों में सुंदर मकराकृत कुंडल हिल रहे हैं। यह रूप भक्त के मन को पूरी तरह से हर लेता है।

४. काय करू बाई, कुणाला सांगू, हरीनामाची सांगड आणा...

व्याख्या: गोपी अपनी सखियों से कहती है कि अब मैं क्या करूँ? अपनी इस विरह वेदना को किसे जाकर सुनाऊँ? इस उफनती नदी को पार करने के लिए मेरे पास कोई साधन नहीं है। इसलिए हे सखियों! मेरे लिए 'हरिनाम' रूपी मजबूत नौका लेकर आओ, ताकि मैं इस भवसागर को पार कर सकूँ।

५. नंदाच्या हरीने कौतूक केले, जाणे अंतरीच्या खूणा...

व्याख्या: नंदबाबा के उस प्यारे कन्हैया ने अद्भुत लीला रची है। वह केवल बाहर से नहीं देखता, बल्कि वह तो अंतर्यामी है। वह मेरे हृदय की तड़प और मेरे मन के गुप्त संकेतों को भली-भाँति जानता है।

६. एका जनार्दनी मनी म्हणा, देव महात्मे ना कळे कोणा...

व्याख्या: अंत में संत एकनाथ महाराज (अपने गुरु जनार्दन स्वामी का स्मरण करते हुए) कहते हैं कि अपने मन में निरंतर भगवान का ध्यान करो। उस परमात्मा की महिमा और उसके दिव्य स्वरूप को बुद्धि के बल पर कोई नहीं समझ सकता। उसे केवल प्रेम और अनन्य भक्ति से ही पाया जा सकता है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

भगवान श्री कृष्ण की मुरली और उनके दिव्य रूप का ध्यान करने के लिए श्रीमद्भागवत महापुराण का यह प्रसिद्ध श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है:

बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं
बिभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्।
रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दैर्-
वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥

अर्थ: जिनके मस्तक पर मयूरपंख का मुकुट है, कानों में कनेर के पुष्प हैं, शरीर पर सुवर्ण के समान पीला वस्त्र (पीतांबर) है और गले में वैजयंती माला है। जो अपने अधरामृत से वेणु (बांसुरी) के छिद्रों को भरते हुए और ग्वालबालों के साथ अपने यश का गान करते हुए वृंदावन धाम में प्रवेश कर रहे हैं, उन नटवरवपु श्री कृष्ण को मैं नमन करता हूँ।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम कशी जाऊ मी वृंदावना मूरली वाजवितो कान्हा
मूल रचयिता (कवि) संत एकनाथ महाराज (महाराष्ट्र)
मुख्य आराध्य देव भगवान श्री कृष्ण (मुरलीधर कन्हैया)
भजन की भाषा प्राचीन मराठी (गौळण विधा)
मुख्य भक्ति भाव मधुरा भक्ति, विरह भाव, पूर्ण शरणागति
प्रतीकात्मक अर्थ यमुना = संसार/माया, सांगड = हरिनाम, वृंदावन = मोक्ष/परमपद
उपयुक्त अवसर कृष्ण जन्माष्टमी, नित्य भजन संध्या, वारकरी दिंडी यात्रा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस अत्यंत लोकप्रिय भजन के रचयिता १६वीं शताब्दी के महान वारकरी संत कवि संत एकनाथ महाराज हैं। भजन की अंतिम पंक्ति "एका जनार्दनी मनी म्हणा" में उनका नाम स्पष्ट रूप से अंकित है।

अध्यात्म में उफनती हुई 'जमूना नदी' मनुष्य के जीवन में आने वाली संसारिक मोह-माया, वासनाओं, विकारों और अहंकार का प्रतीक है, जो जीवात्मा को परमात्मा (श्री कृष्ण) से मिलने से रोकती है।

'सांगड' का अर्थ है नाव या बेड़ा। इसका अर्थ

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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