Parvati Stotram

श्री सूक्तम् संस्कृत पाठ(Shri Suktam Lyrics in Sanskrit) - bhaktilok

478 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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श्री सूक्तम् संस्कृत पाठ - परिचय एवं महत्व

श्री सूक्तम् सनातन वैदिक परंपरा और ऋग्वेद के परिशिष्ट (खिला) भाग में संकलित एक अत्यंत पावन, शक्तिशाली और दिव्य वैदिक स्तोत्र है, जो जगत की पालनकर्ता, धन-धान्य, ऐश्वर्य, और मोक्ष की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी की स्तुति में समर्पित है। इस महान स्तोत्र में कुल 16 ऋचाएं (मंत्र) हैं, जिन्हें 'श्री सूक्तम्' के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो साधक पवित्रता, शुद्ध उच्चारण और पूर्ण भक्ति भाव के साथ श्री सूक्तम् का पाठ करता है, उसके जीवन से दरिद्रता, अभाव, मानसिक अशांति और अज्ञान का अंधकार हमेशा के लिए दूर हो जाता है। देवी लक्ष्मी केवल भौतिक धन की ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक वैभव, सद्बुद्धि, स्थिरता और आस्तिकता की भी प्रतीक हैं। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम श्री सूक्तम् के मूल संस्कृत पाठ, पद-विच्छेद, शब्दार्थ, सरल हिंदी भावार्थ, शास्त्रीय पृष्ठभूमि, पाठ विधि और इससे जुड़े सम्पूर्ण आध्यात्मिक रहस्यों का गहन अध्ययन करेंगे।

मूल मंत्र एवं शुद्ध पाठ | Complete Sri Suktam Lyrics

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरससस्रजाम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥ १ ॥

तां म आवह जातवेदो लक्ष्म्यमनपगािनीम् । यस्यां हिरण्यं विन्द्रेयं गां अश्वं पुरुषानहम् ॥ २ ॥

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम् । श्रियं देवीमुपयेह्येर्श्रीर्मा जुषताम् ॥ ३ ॥

कां सोस्मितां हिरण्यप्राज्ञार्द्रीं ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् । पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोपयेह्ये श्रियम् ॥ ४ ॥

चन्द्रां प्रभां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् । तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥ ५ ॥

आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तस्य वृक्षोऽथ बिल्वः । तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मयान्तराणि च बाह्यानि च श्रीया ॥ ६ ॥

उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिन सह । प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥ ७ ॥

क्षुपिधामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् । अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥ ८ ॥

गन्धद्वारां दुराधर्षों नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपयेह्ये श्रियम् ॥ ९ ॥

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि । पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥ १० ॥

कर्दमेन प्रजा भूता मयि संभव कर्दम् । श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥ ११ ॥

आपः सृजन्तु स्थूलानि गन्धद्वारां गृहे मम । बस वस कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥ १२ ॥

आदित्यवर्णे यः सूर्यश्च जातः तस्य रश्मयोऽपि तेजोमयाः । त्वां वृणे लक्ष्म्यमृतत्वस्य सत्यं माता श्रियं वासय मे कुले ॥ १३ ॥

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं स्वर्णप्राकारमृताम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥ १४ ॥

तां म आवह जातवेदो लक्ष्म्यमनपगािनीम् । यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥ १५ ॥

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् । सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीसततं जपेत्सदा ॥ १६ ॥

मंत्र उच्चारण एवं पद-विच्छेद | Mantra Pronunciation & Padaccheda

वैदिक मंत्रों की पूर्ण फलप्राप्ति के लिए उनका शुद्ध उच्चारण (Shuddha Uchcharana) और स्वर साधना अत्यंत आवश्यक है। श्री सूक्तम् के पाठ में दीर्घ स्वरों, विसर्गों और अनुस्वारों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। 'जातवेदो म आवह' (जातवेदः माम् आवह) जैसी संधियों को समझकर ही उच्चारण करना चाहिए। अशुद्ध उच्चारण से ऊर्जा का प्रवाह खंडित हो सकता है, इसलिए किसी योग्य गुरु के सानिध्य में या पारंपरिक ऑडियो के माध्यम से इसका अभ्यास करना श्रेष्ठ रहता है।

विस्तृत शब्दार्थ एवं पद-विच्छेद | Word-by-Word Meaning

संस्कृत शब्द पद-विच्छेद सरल हिंदी अर्थ संदर्भ / भावार्थ
हिरण्यवर्णां हिरण्य-वर्णा स्वर्ण के समान चमकने वाली दिव्य आभा और कांति से युक्त
जातवेदो जातवेदः (हे अग्नि देव) सब कुछ जानने वाले अग्नि देव देवताओं के दूत और हविष्य वाहक
अश्वपूर्वां अश्व-पूर्वा जिनके आगे घोड़ों का समूह हो राजसी वैभव और शक्ति की प्रतीक
पद्मस्थितां पद्म-स्थिता कमल पर विराजमान पवित्रता, कोमलता और निष्कलंकता
अलक्ष्मीः अ-लक्ष्मी दरिद्रता, अभाव, आलस्य समस्त नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश
बिल्वः बिल्व वृक्ष श्रीफल (बेलपत्र का वृक्ष) माता लक्ष्मी को अत्यंत प्रिय वृक्ष

सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Hindi Meaning & Bhavarth

श्री सूक्तम् का प्रत्येक मंत्र साधक को भौतिक समृद्धि के साथ-साथ आत्मिक उत्थान की प्रेरणा देता है। प्रथम मंत्र में अग्नि देव (जातवेद) से प्रार्थना की जाती है कि वे स्वर्ण के समान कांति वाली, हस्ती और घोड़ों से युक्त, चंद्रमा के समान शीतल और प्रकाशमान मां लक्ष्मी को हमारे पास लेकर आएं।

मध्यवर्ती मंत्रों में साधक मां लक्ष्मी से विनती करता है कि वे उसके घर में स्थायी रूप से निवास करें, जिससे कभी भी अन्न, धन, पशु, और पुरुषार्थ की कमी न हो। साथ ही, 'अलक्ष्मी' (दरिद्रता, आलस्य, कलह और नकारात्मकता) को दूर भगाने की प्रार्थना की गई है। अंत में, बिल्व वृक्ष (बेलपत्र) की महिमा का वर्णन करते हुए बताया गया है कि तपस्या से उत्पन्न बिल्व वृक्ष से माता लक्ष्मी अत्यधिक प्रसन्न होती हैं। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि वास्तविक समृद्धि वही है जो नैतिकता, भक्ति और परोपकार के मार्ग पर चलकर प्राप्त हो।

आप हमारी अन्य आरती संग्रह और विष्णु चालीसा की पावन श्रृंखलाओं का भी पाठ कर सकते हैं, जो आपके घर में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करेंगी।

मंत्र का भाव एवं आध्यात्मिक संदेश | Spiritual Message

श्री सूक्तम् केवल धन प्राप्ति का साधन नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर छिपी हुई दरिद्रता यानी संकीर्ण सोच, स्वार्थ, आलस्य और नकारात्मकता को समाप्त करने का महामंत्र है। मां लक्ष्मी का 'पद्मस्थिता' (कमल पर बैठना) होना यह सिखाता है कि धन कीचड़ (भौतिक संसार) में अवश्य उत्पन्न होता है, किंतु ज्ञानी मनुष्य वही है जो कमल की भांति उस संसार में रहकर भी उससे अनासक्त और पवित्र रहे।

शास्त्रीय संदर्भ, ऋषि, छंद एवं देवता | Scriptural Origin

श्री सूक्तम् ऋग्वेद के परिशिष्ट (खिला) का एक अत्यंत प्राचीन वैदिक सूक्त है। इस सूक्त के ऋषि 'आनंद कर्दम चिक्लीत' आदि बताए गए हैं, देवता 'श्री महालक्ष्मी' हैं और इसमें अनुष्टुप तथा त्रिष्टुप छंदों का प्रयोग किया गया है। वेदों में लक्ष्मी का यह रूप केवल धन की देवी का नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जा और पोषण शक्ति (प्रकृति) का है।

मंत्र जप विधि, नियम एवं शुभ मुहूर्त | Chanting Method & Rules

  • समय: श्री सूक्तम् का पाठ प्रातः काल स्नान के पश्चात सूर्योदय के समय या प्रदोष काल (संध्या बेला) में करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है।
  • आसन व दिशा: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठना चाहिए।
  • संख्या: इसका नित्य 1, 3 या 11 पाठ करना चाहिए। विशेष अनुष्ठान के दौरान सवा लाख आहुतियों या नित्य 108 पाठों का विधान है।
  • शुद्धता: पाठ के दौरान शरीर, मन और वस्त्र की पवित्रता का विशेष ध्यान रखें। गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें और कमल पुष्प या लाल फूल अर्पित करें।

मंत्र का दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व | Philosophical Significance

भारतीय दर्शन में 'श्री' शब्द का अर्थ केवल सिक्का या नोट नहीं है, बल्कि 'श्री' का अर्थ है तेज, ओज, कांति, प्रतिष्ठा, सद्गुण और भगवती शक्ति। जब मनुष्य अपने कर्तव्य का पालन पूरी निष्ठा और धर्म के साथ करता है, तो उसके जीवन में स्वतः 'श्री' का आगमन होता है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक उन्नति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

मंत्र के आध्यात्मिक लाभ | Spiritual Benefits

पारंपरिक मान्यताओं और वेदों के अध्ययन के अनुसार, श्री सूक्तम् का नियमित पाठ करने से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • घर में स्थायी सुख-शांति, वैभव और धन-धान्य की वृद्धि होती है।
  • आर्थिक तंगी, कर्ज के बोझ और व्यावसायिक बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
  • मन का भटकाव दूर होता है और एकाग्रता, सकारात्मकता एवं आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
  • माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा से आरोग्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।

मंत्र का दैनिक जीवन में महत्व | Daily Life Relevance

आज के तनावपूर्ण और भौतिकवादी युग में व्यक्ति धन के पीछे भागते-भागते अपनी शांति खो देता है। श्री सूक्तम् का स्मरण हमें यह सिखाता है कि धन साधन है, साध्य नहीं। जब हम अपने कार्यक्षेत्र में ईमानदारी और परिश्रम को अपनाते हैं और ईश्वर को अपने कर्मों का केंद्र मानते हैं, तो जीवन में संघर्ष कम और आनंद अधिक हो जाता है।

एक नजर में श्री सूक्तम् जानकारी | Quick Information Table

विशेषता विवरण
स्तोत्र नाम श्री सूक्तम् (Shri Suktam)
अधिष्ठात्री देवता देवी महालक्ष्मी (Shri Mahalakshmi)
स्रोत / ग्रंथ ऋग्वेद परिशिष्ट (Rigveda Khila)
कुल ऋचाएं (मंत्र) 16 (सोलह)
मुख्य उद्देश्य धन, ऐश्वर्य, स्थिरता, मोक्ष एवं दरिद्रता निवारण
उत्तम पाठ समय प्रातःकाल एवं प्रदोष काल (शुक्रवार विशेष)

मुख्य आध्यात्मिक संदेश | Key Takeaways

  • माता लक्ष्मी केवल भौतिक धन नहीं, अपितु सद्गुणों और पवित्रता की देवी हैं।
  • दरिद्रता केवल पैसों की कमी नहीं, बल्कि नकारात्मक सोच और आलस्य है।
  • नियमित वैदिक पाठ से घर की ऊर्जा सकारात्मक और पवित्र बनती है।
  • परिश्रम, भक्ति और दानशीलता ही वास्तविक समृद्धि का आधार हैं।

संबंधित मंत्र, श्लोक, स्तोत्र एवं प्रार्थनाएं

श्री सूक्तम् के साथ-साथ साधक श्री लक्ष्मी आरती, कनकधारा स्तोत्र और दुर्गा सप्तशती का पाठ करके अपनी साधना को और अधिक गहन और प्रभावी बना सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रશ્न 1: श्री सूक्तम् का पाठ कब करना चाहिए?

उत्तर: श्री सूक्तम् का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात अथवा शुक्रवार की संध्या को करना सर्वाधिक उत्तम माना गया है।

प्रश्न 2: श्री सूक्तम् में कुल कितने मंत्र हैं?

उत्तर: श्री सूक्तम् में मुख्य रूप से 16 ऋचाएं (मंत्र) संकलित हैं।

प्रश्न 3: क्या स्त्रियां श्री सूक्तम् का पाठ कर सकती हैं?

उत्तर: हां, वैदिक परंपरा के अनुसार कोई भी निष्कलंक भक्त, स्त्री या पुरुष, पूर्ण श्रद्धा के साथ श्री सूक्तम् का पाठ कर सकता है।

प्रश्न 4: श्री सूक्तम् किस वेद से लिया गया है?

उत्तर: यह ऋग्वेद के परिशिष्ट (खिला) भाग से लिया गया है।

प्रश्न 5: श्री सूक्तम् पाठ करने से क्या लाभ होता है?

उत्तर: इसके नियमित पाठ से आर्थिक संकट दूर होते हैं, घर में सुख-समृद्धि आती है और मानसिक शांति प्राप्त होती है।

प्रश्न 6: क्या श्री सूक्तम् के पाठ के लिए विशेष हवन आवश्यक है?

उत्तर: दैनिक पाठ के लिए हवन आवश्यक नहीं है, केवल शुद्ध उच्चारण और दीप प्रज्वलन पर्याप्त है। विशेष अनुष्ठान में हवन किया जाता है।

प्रश्न 7: पाठ के समय किस रंग के आसन का प्रयोग करें?

उत्तर: ऊनी या कुशा का लाल या पीले रंग का आसन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

प्रश्न 8: क्या इसे मोबाइल से देखकर पढ़ सकते हैं?

उत्तर: जी हां, यदि आपको शुद्ध पाठ याद नहीं है तो आप डिजिटल माध्यम या पुस्तक का उपयोग कर सकते हैं, भाव शुद्ध होना चाहिए।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख सनातन वेदों, पारंपरिक टीकाओं और विद्वानों के मार्गदर्शन के आधार पर संकलित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को authentic और शुद्ध सामग्री प्रदान करना है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।

स्रोत एवं संदर्भ

  • ऋग्वेद संहिता (खिल सूक्तम्)
  • वैदिक सूक्त संग्रह एवं सनातन परंपरा
  • प्राचीन ब्रह्मविद्या एवं उपनिषद ग्रंथ

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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