Kabir Das Ke Dohe मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

कबीर सुता क्या करे जागी न जपे मुरारी दोहे का अर्थ(KAbir Suta Kya Kare Jaagi Na Jape Murari Dohe Ka Arth in Hindi)

पढ़ें कबीर सुता क्या करे जागी न जपे मुरारी दोहे का अर्थ(KAbir Suta Kya Kare Jaagi Na Jape Murari Dohe Ka Arth in Hindi) का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी

कबीर सुता क्या करे जागी न जपे मुरारी दोहे का अर्थ (Kabir Suta Kya Kare Meaning)

संत कबीर दास जी का यह कालजयी दोहा "कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी" न केवल एक साधारण चेतावनी है, बल्कि मानव जीवन के परम लक्ष्य और आध्यात्मिक जागृति की ओर ले जाने वाला एक महामार्गदर्शक सूत्र है। भक्ति आंदोलन के प्रखर संत और समाज सुधारक कबीर ने अपनी साखियों के माध्यम से हमेशा सोई हुई मानवता को मोह-माया की गहरी निद्रा से जागने और उस परम ब्रह्म 'मुरारी' (भगवान विष्णु/कृष्ण या निर्गुण निराकार परमेश्वर) के पावन नाम का स्मरण करने का संदेश दिया है। यह दोहा हमें जीवन की नश्वरता, समय के चक्र और मृत्यु की अटल सत्यता का गहरा बोध कराता है, ताकि मनुष्य अज्ञानता के अंधकार को त्यागकर सतनाम की आराधना में अपने जीवन को सार्थक बना सके।

भक्तिलोक के इस विस्तृत आलेख में हम कबीर दास जी की इस अमर साखी के शब्दार्थ, व्याकरणिक संरचना, गूढ़ दार्शनिक अर्थ, साहित्यिक विशेषताओं और दैनिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता का विस्तार से अध्ययन करेंगे। यह लेख पाठकों को संत कबीर के दार्शनिक विचारों से अवगत कराने के साथ-साथ आत्मचिंतन का अवसर भी प्रदान करता है।

मूल दोहा / साखी

कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी।
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी॥

संत कबीर साखी संग्रह

उच्चारण, पाठ एवं संरचना

कबीर दास जी की रचनाएं मौखिक परंपरा (श्रुति) का हिस्सा रही हैं, जिन्हें उनके शिष्यों द्वारा बाद में 'बीजक', 'कबीर ग्रन्थवली' और 'साखी संग्रह' के रूप में संकलित किया गया। यह पद 'साखी' (साक्षी या प्रत्यक्ष ज्ञान) शैली में रचित है। कबीर की भाषा को 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' कहा जाता है, जिसमें राजस्थानी, ब्रज, अवधी, भोजपुरी और पंजाबी शब्दों का अनूठा मिश्रण मिलता है।

छंद की दृष्टि से यह पारंपरिक दोहा छंद है, जिसके प्रथम और तृतीय चरण (विषम चरणों) में 13-13 मात्राएं तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण (सम चरणों) में 11-11 मात्राएं होती हैं। इसमें प्रवाहमयी गेयता (लय) का गुण है, जिससे संत-संगम, भजन-कीर्तन और सत्संग के दौरान इसे आसानी से गाया और स्मरण किया जा सकता है।

कठिन शब्दार्थ (Word Meanings)

शब्द (Word) सरल हिंदी अर्थ (Simple Meaning) आध्यात्मिक / संदर्भगत अर्थ (Contextual Meaning)
सुता सोया हुआ मोह-माया, अज्ञानता और सांसारिक भोग-विलास की गहरी नींद में सोया हुआ मनुष्य।
क्या करे क्या लाभ है / किस काम का है इस प्रकार अचेत जीवन जीने का कोई मूल्य नहीं है।
जागी जागकर / चेतना पाकर अज्ञान की निद्रा से जागृत होना, आत्म-बोध प्राप्त करना।
न जपे स्मरण न करना परमात्मा के नाम, हरिनाम या सतनाम से विमुख रहना।
मुरारी भगवान कृष्ण / विष्णु / परम ब्रह्म समस्त सृष्टि के पालनहार, मोक्षदाता और परम सत्य (निर्गुण-सगुण ब्रह्म)।
सोवेगा सोएगा / मृत्यु को प्राप्त होगा चिरनिद्रा यानी मृत्यु की गोद में सोना।
लम्बे पाँव पसारी पैर पसार कर नश्वर शरीर का मृत अवस्था में श्मशान भूमि या कब्र में सदा के लिए लेट जाना।

पदच्छेद एवं पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ

कबीर दास जी इस दोहे की प्रत्येक पंक्ति के माध्यम से मानव जीवन की दो प्रमुख अवस्थाओं—'जागृति (भक्ति)' और 'मृत्यु (नश्वरता)'—को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से रेखांकित करते हैं:

  • प्रथम पंक्ति: "कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी।"
    अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि हे मनुष्य! तू संसार के प्रपंचों और माया-मोह में सोया हुआ (अचेत) क्या कर रहा है? यदि तूने जागकर (ज्ञान प्राप्त करके) परमेश्वर 'मुरारी' का स्मरण नहीं किया, तो तेरा यह जीवन व्यर्थ जा रहा है। मनुष्य योनि केवल सोने और खाने के लिए नहीं, बल्कि परमात्मा को पाने के लिए मिली है।
  • द्वितीय पंक्ति: "एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी॥"
    अर्थ: आज तू अहंकार और जीविका के मद में मस्ता कर जाग रहा है, लेकिन याद रख कि एक दिन ऐसा आएगा जब तुझे इस नश्वर शरीर को छोड़कर मृत्यु की चिरनिद्रा में सोना पड़ेगा। उस समय श्मशान में हमेशा के लिए पैर पसार कर सोना होगा, फिर कोई तुझे नहीं जगा पाएगा। इसलिए समय रहते चेत जा।

सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ (Detailed Bhavarth)

इस साखी का मूल भाव वैराग्य और आत्म-जागृति से जुड़ा है। संत कबीर समाज को यह याद दिलाना चाहते हैं कि मानव जीवन अत्यधिक दुर्लभ है और यह सांसारिक सुख-सुविधाएं, रिश्ते-नाते और धन-दौलत सब कुछ क्षणिक हैं। मनुष्य जीवन भर केवल भौतिक उन्नति की दौड़ में लगा रहता है और अपनी आत्मा की उन्नति को भूल जाता है।

कबीर साहब रूपक के माध्यम से समझाते हैं कि जिस प्रकार रात को सोने वाला व्यक्ति सुबह उठकर अपने दैनिक कार्यों में लग जाता है, उसी प्रकार इस भवसागर में आया हुआ जीव अज्ञान रूपी रात्रि में सो रहा है। विषय-विकार (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) इसकी गाढ़ी नींद हैं। संत की वाणी अलार्म का काम करती है, जो जीव को झकझोर कर जगाती है कि हे प्राणी! जाग जा और उस 'मुरारी' (घट-घटवासी परमात्मा) का भजन कर ले, अन्यथा मौत का झपट्टा सब कुछ समाप्त कर देगा।

यह भावार्थ हमें याद दिलाता है कि काल (मृत्यु) किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। जब तक श्वासें चल रही हैं, तब तक ही सत्कर्म और ईश्वर का स्मरण संभव है। एक बार प्राण छूट जाने पर केवल पछतावा ही शेष रहता है।

मुख्य भाव एवं केंद्रीय विचार (Core Theme)

इस साखी के केंद्र में भक्ति, वैराग्य, काल की निश्चिंतता और आत्म-साक्षात्कार का विचार है। कबीर दास जी ने कभी भी पलायनवादी दृष्टिकोण नहीं सिखाया, बल्कि उन्होंने कर्म करते हुए ईश्वर स्मरण पर जोर दिया। उनका केंद्रीय विचार यह है कि मनुष्य अपनी प्राथमिकताओं को पहचाने। सांसारिक व्यस्तता के बीच यदि भगवान का स्मरण छूट जाए, तो वह जीवन पशुतुल्य हो जाता है।

आध्यात्मिक व दार्शनिक संदेश

भारतीय दर्शन (विशेषकर वेदांत और संत परंपरा) में संसार को एक स्वप्न या माया माना गया है। गीता में भी भगवान कृष्ण कहते हैं—"या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।" (जो स्थिति सब भूतों के लिए रात्रि है, उसमें संयमी पुरुष जागता है)। कबीर का यह दोहा इसी गीतात्मक दर्शन का व्यावहारिक रूप है।

दार्शनिक दृष्टि से 'सुता' (सोना) जीव की अविद्या (अज्ञान) को दर्शाता है, जहाँ वह आत्मा को शरीर मान बैठता है। 'जागी' का अर्थ है आत्म-ज्ञान (अहं ब्रह्मास्मि या सो 'हम' का अनुभव)। 'मुरारी' शब्द उस अद्वैत चेतना का प्रतीक है जो समस्त ब्रह्मांड का आधार है। जब तक मनुष्य माया के आवरण से मुक्त नहीं होता, तब तक उसे जन्म-मरण के चक्र (चौरासी लाख योनियों) से मुक्ति नहीं मिल सकती।

भक्ति परंपरा में महत्व

निर्गुण भक्ति धारा में कबीर दास का स्थान सर्वोच्च है। उनकी साखियां और पद उत्तर भारत के संतों—जैसे गुरु नानक देव, दादू दयाल, रज्जब जी और मीराबाई—को गहरे रूप से प्रभावित करते रहे हैं। संत वाणी के पाठ और सत्संग में इस दोहे का उपयोग साधकों को प्रमाद (आलस्य और अज्ञान) से मुक्त करने के लिए एक अचूक औषधि के रूप में किया जाता है। यह स्मरण कराता है कि भक्ति कोई सप्ताहांत का अनुष्ठान नहीं, बल्कि श्वास-प्रश्वास से जुड़ी निरंतर साधना है।

दैनिक जीवन में प्रासंगिकता एवं सीख

आज की भागदौड़ भरी आधुनिक जीवनशैली (Modern Lifestyle) में जहाँ तनाव, डिप्रेशन, भौतिकता की अंधी दौड़ और सोशल मीडिया की चकाचौंध ने मनुष्य को घेर रखा है, यह दोहा और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। आज का इंसान करियर और धन कमाने में इतना व्यस्त है कि वह अपने मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को भूल बैठा है।

  • समय का सदुपयोग: जीवन सीमित है, इसलिए समय को व्यर्थ की चिंताओं और नकारात्मकता में न गंवाएं।
  • नश्वरता का बोध: मृत्यु के सत्य को स्वीकार करने से मन का अहंकार और ईर्ष्या स्वतः समाप्त हो जाती है।
  • मानसिक शांति: प्रतिदिन कुछ समय ईश्वर स्मरण, ध्यान (Meditation) या सत्संग के लिए निकालना आवश्यक है।
  • नैतिक आचरण: जीवन में सत्य, दया और परोपकार को अपनाना ही सच्ची भगवद भक्ति है।

अधिक जानने के लिए हमारे अन्य लेख पढ़ सकते हैं, जैसे संत कबीर दास के अन्य प्रसिद्ध दोहे और भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत और उनका दर्शन।

प्रतीक, रूपक एवं साहित्यिक शैली

कबीर की कविता की सबसे बड़ी ताकत उसकी लोक-भाषा और सीधे, सटीक प्रतीक हैं। इस दोहे में:

  • 'सुना' और 'जागना' निद्रा और चेतना के रूपक हैं।
  • 'मुरारी' शब्द प्रेम और भक्ति की पराकाष्ठा का प्रतीक है।
  • 'लम्बे पाँव पसारी सोना' मृत्यु और विवशता का अत्यंत सजीव दृश्य प्रस्तुत करता है।

इसमें अनुप्रास अलंकार ('सुता क्या', 'लम्बे पाँव') और दृष्टांत शैली का सुंदर प्रयोग हुआ है जो पाठक के हृदय को सीधे स्पर्श करता है।

दोहा से मिलने वाली प्रमुख सीख (Key Takeaways)

  1. सांसारिक मोह-माया और अज्ञान की नींद से शीघ्र जागृत हों।
  2. परमात्मा के नाम का सिमरन (स्मरण) दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं।
  3. मृत्यु अटल सत्य है, इसलिए अहंकार का त्याग कर विनम्र जीवन जिएं।
  4. समय अनमोल है, इसे केवल भौतिक भोग-विलास में नष्ट न करें।
  5. आत्मा के कल्याण को जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकता दें।

एक नजर में (Quick Summary Table)

विवरण तथ्य / जानकारी
रचना / साखी कबीर सुता क्या करे जागी न जपे मुरारी
रचनाकार / संत संत कबीर दास जी
भाषा / शैली सधुक्कड़ी (पंचमेल खिचड़ी), साखी शैली
छंद प्रकार दोहा छंद (13-11 मात्राएं)
मुख्य थीम / भाव वैराग्य, भक्ति, आत्म-जागृति और मृत्यु का बोध
प्रमुख संदेश मोह-निद्रा त्यागकर ईश्वर का स्मरण करें और सत्कर्म करें।
स्रोत ग्रंथ कबीर बीजक / साखी संग्रह

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस प्रसिद्ध दोहे के रचयिता महान भक्त कवि और समाज सुधारक संत कबीर दास जी हैं।

'सुता' शब्द का अर्थ 'सोया हुआ' होता है। यहाँ इसका तात्पर्य मोह-माया और अज्ञान की गहरी नींद में सोए हुए मनुष्य से है।

'मुरारी' भगवान कृष्ण या विष्णु का नाम है, जिसका प्रयोग कबीर दास जी ने निर्गुण-सगुण रूप में व्याप्त परम ब्रह्म या परमात्मा के अर्थ में किया है।

इसका आशय मनुष्य की मृत्यु से है। एक दिन सबको नश्वर शरीर छोड़कर मृत्यु की चिरनिद्रा में सोना ही पड़ता है।

कबीर दास जी की भाषा को 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' कहा जाता है, क्योंकि इसमें कई बोलियों के शब्द सहज रूप से समाहित हैं।

यह दोहा पारंपरिक 'दोहा' छंद है, जिसमें पहले और तीसरे चरण में 13 तथा दूसरे और चौथे चरण में 11 मात्राएं होती हैं।

आज की तनावपूर्ण और भौतिकवादी जीवनशैली में यह दोहा हमें आत्म-चिंतन करने, जीवन के असली उद्देश्य को समझने और मानसिक शांति प्राप्त करने की प्रेरणा देता है।

कबीर दास जी की वाणियों का मुख्य संग्रह 'बीजक' है, जिसके तीन प्रमुख भाग साखी, सबद और रमैनी हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह आलेख संत कबीर साहित्य, कबीर ग्रन्थवली और पारंपरिक साखी संग्रहों के गहन अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। सामग्री की प्रामाणिकता और साहित्यिक सुंदरता का विशेष ध्यान रखा गया है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है जो पाठकों को आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण प्रदान करती है।

स्रोत एवं संदर्भ (Sources & References)

  • 1. कबीर बीजक - सम्पादक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी / स्वामी युगानन्द
  • 2. कबीर ग्रन्थवली - श्याम सुंदर दास
  • 3. हिंदी साहित्य का इतिहास - आचार्य रामचंद्र शुक्ल
  • 4. संत वाणी और भारतीय भक्ति परंपरा - धार्मिक एवं दार्शनिक अध्ययन

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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