Kabir Das Ke Dohe बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

कबीर कहा गरबियौ ऊंचे देखि अवास दोहे का अर्थ(Kabir Kaha Garabiyo Unche Dekhi Aawas Dohe Ka Arth in Hindi)

कबीर दास जी के प्रसिद्ध दोहे 'कबीर कहा गरबियौ ऊंचे देखि अवास' का सरल हिंदी अर्थ, भावार्थ और जीवन में इसकी सार्थकता को विस्तार से समझें।

कबीर कहा गरबियौ ऊंचे देखि अवास दोहे का परिचय एवं पृष्ठभूमि

कबीर दास जी की संत वाणी और उनकी अमर साखियां भारतीय सनातन आध्यात्मिक परंपरा, निर्गुण भक्ति और जीवन के परम सत्य का सबसे जीवंत दस्तावेज हैं। 'कबीर कहा गरबियौ, ऊंचे देखि अवास' दोहा मानव मन के भीतर छिपे अंहकार, भौतिकता की अंधी दौड़ और नश्वर शरीर की वास्तविकता पर एक करारा प्रहार है। यह केवल एक दोहा नहीं, बल्कि जीवन की क्षणभंगुरता और परमात्मा की महानता का बोध कराने वाला एक महान दार्शनिक संदेश है। संत कबीर दास जी ने अपनी सधुक्कड़ी भाषा में समाज को यह समझाने का प्रयास किया है कि मनुष्य इस नश्वर संसार में आकर अपनी ऊँची हवेलियों, धन-সম্পদ और भौतिक सुख-सुविधाओं पर गर्व (अभिमान) करने लगता है, जबकि इस संसार का अंतिम सत्य केवल और केवल मृत्यु और मिट्टी में विलीन हो जाना है। भक्तिलोकी.इन के इस विस्तृत और विद्वत्तापूर्ण लेख में हम कबीर दास जी के इस प्रसिद्ध दोहे के शाब्दिक अर्थ, गूढ़ दार्शनिक भावार्थ, साहित्यिक सौंदर्य और दैनिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

मूल दोहा / साखी

कबीर कहा गरबियौ, ऊंचे देखि अवास ।
काल्हि परयौ भू लेटना, ऊपरि जामे घास ॥

उच्चारण, पाठ एवं संरचना

कबीर दास जी के दोहे दोहा छंद में रचित होते हैं, जिनमें मात्राओं का विशेष अनुशासन होता है। संत भाषा या सधुक्कड़ी भाषा में रचित होने के कारण इनके उच्चारण में सरलता और सहज प्रभाव होता है। 'कबीर कहा गरबियौ ऊंचे देखि अवास' साखी का पाठ करते समय प्रत्येक शब्द के मर्म को समझना आवश्यक है। 'गरबियौ' का अर्थ गर्व या घमंड करना है, और 'अवास' का अर्थ ऊंचे भवन, महल या निवास स्थान से है। कबीर साहब साधकों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मनुष्य! तू अपने इस सुंदर और भव्य आवास को देखकर किस बात का अहंकार कर रहा है?

कठिन शब्दार्थ

शब्द / पद सरल हिंदी अर्थ संदर्भगत अर्थ
कबीर संत कबीर दास रचयिता संत का संबोधन
कहा किस लिए, क्यों अहंकार करने पर प्रश्न
गरबियौ गर्व करना, घमंड करना भौतिक संपदा का अभिमान
ऊंचे देखि ऊंचे देखकर भव्य और विशाल महलों को देखकर
अवास आवास, महल, घर भौतिक संपत्ति और ऊंचे मकान
काल्हि कल, आने वाले समय में, शीघ्र निश्चित और निकट भविष्य
परयौ पड़ेगा शारीरिक अवस्था का बदलना
भू लेटना भूमि पर लेटना शव का मिट्टी पर पड़ना / मृत्यु
ऊपरि ऊपर शरीर या कब्र के ऊपर
जामे घास घास उग आएगी जीवन का अंत और प्रकृति में विलीन होना

पदच्छेद एवं पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ

इस दोहे का पदच्छेद इस प्रकार है: कबीर / कहा / गरबियौ / ऊंचे / देखि / अवास / काल्हि / परयौ / भू / लेटना / ऊपरि / जामे / घास। प्रथम पंक्ति 'कबीर कहा गरबियौ, ऊंचे देखि अवास' का अर्थ है कि हे जीव! तू अपने बड़े-बड़े और ऊंचे महलों-भवनों को देखकर किस बात का घमंड कर रहा है? तेरी यह संपदा और यह शरीर सदा रहने वाले नहीं हैं। द्वितीय पंक्ति 'काल्हि परयौ भू लेटना, ऊपरि जामे घास' का अर्थ है कि कल ही (अर्थात थोड़े ही समय में) तुझे इसी नश्वर शरीर के साथ भूमि पर लेटना पड़ेगा (मृत्यु को प्राप्त होना होगा), और तब तेरे इस शरीर के ऊपर घास उग आएगी। यह जीवन की नश्वरता का सबसे बड़ा सत्य है।

सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ

संत कबीर दास जी इस साखी के माध्यम से मानव जाति को अज्ञानता की नींद से जगाना चाहते हैं। मनुष्य का स्वभाव है कि वह थोड़ा सा धन, वैभव, पद या ऊंचे मकान प्राप्त करते ही अहंकार से भर जाता है। वह भूल जाता है कि यह संसार एक रैन बसेरा है। कबीर साहब कहते हैं कि तू अपने इन ऊंचे और भव्य महलों को देखकर किस बात पर इतरा रहा है? जीवन का सच तो यह है कि आज जो शरीर गर्व से अकड़कर चल रहा है, कल वह प्राणहीन होकर इस धरती पर लेट जाएगा। जब यह शरीर पंचतत्वों में विलीन हो जाएगा, तब इस पर हरी-हरी घास उग आएगी। इस प्रकार, धन, वैभव और शरीर का यह सारा अहंकार मिट्टी में मिल जाता है। इस दोहे का मुख्य भाव वैराग्य, विनम्रता और आत्म-बोध है। कबीर साहब हमें याद दिलाते हैं कि जीवन अनिश्चित है, अतः अहंकार का त्याग करके प्रभु भक्ति और सत्कर्मों में मन लगाना ही मनुष्य का असली कर्तव्य है। सनातन धर्म में भी गरुड़ पुराण और उपनिषदों में शरीर की नश्वरता का बार-बार उल्लेख किया गया है, जो इस दोहे के दार्शनिक पक्ष से पूरी तरह मेल खाता है।

मुख्य भाव एवं केंद्रीय विचार

इस साखी का केंद्रीय विचार 'अहंकार का त्याग और शरीर की नश्वरता' है। संसार में आने वाला हर जीव यह मान बैठता है कि यह संपत्ति और यह शरीर हमेशा उसके साथ रहेंगे। कबीर दास जी इस भ्रम को तोड़ते हुए कहते हैं कि भौतिक उपलब्धियां क्षणिक हैं। वास्तविक संपदा तो भगवान का नाम और सत्कर्म है। इस दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें कभी भी अपने बल, रूप, धन या मकान पर घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि अंततः सबको इस मिट्टी में ही मिलना है।

आध्यात्मिक व दार्शनिक संदेश

दार्शनिक दृष्टि से यह दोहा अद्वैत और वेदान्त के उस सिद्धांत की पुष्टि करता है जिसमें शरीर को असत्य (नश्वर) और आत्मा को अमर माना गया है। कबीर साहब निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे और वे रूप-रंग, जाति-पाति और भौतिक अहंकार के कड़े विरोधी थे। 'ऊंचे देखि अवास' केवल मकान का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह उन तमाम झूठे दर्जों और अंहकारों का प्रतीक है जो मनुष्य अपने जीवन में पाल लेता है। जब साधਕ को यह ज्ञान हो जाता है कि यह देह केवल मिट्टी का पुतला है, तब उसके भीतर से सारे विकार, ईर्ष्या और द्वेष स्वतः समाप्त हो जाते हैं। इसके साथ ही, आप श्री हनुमान चालीसा के पाठ से अपने मन को एकाग्र कर सकते हैं और शिव तांडव स्तोत्र के माध्यम से वैराग्य के मार्ग को अपना सकते हैं।

भक्ति परंपरा में महत्व

भक्ति आंदोलन के स्वर्ण युग में संत कबीर दास जी ने समाज को झकझोरने का जो कार्य किया, उसमें उनकी साखियों का बहुत बड़ा योगदान है। कबीर वाणी का पाठ संत समाज, सत्संगों और कबीरपंथियों के बीच अत्यंत श्रद्धा के साथ किया जाता है। यह दोहा हमें स्मरण कराता है कि भक्ति का मार्ग अहंकार रहित शून्यता और शरणागति का मार्ग है। जब तक मनुष्य के हृदय में 'मैं' और 'मेरी संपत्ति' का भाव रहेगा, तब तक वह परमात्मा के प्रेम को प्राप्त नहीं कर सकता।

दैनिक जीवन में प्रासंगिकता एवं सीख

आधुनिक युग में जहाँ भौतिकता और अंधी दौड़ ने मनुष्य को अपनी जड़ों से काट दिया है, कबीर दास जी का यह दोहा और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। आज लोग बड़े-बड़े मकान, गाड़ियां और बैंक बैलेंस को ही जीवन की सफलता मान बैठे हैं और इसके लिए अनैतिक मार्ग अपनाने से भी नहीं हिचकिचाते। यह दोहा हमें यह सीख देता है:

  • भौतिक वस्तुओं का घमंड कभी स्थायी नहीं होता।
  • जीवन अत्यंत क्षणभंगुर है, इसलिए इसे सत्कर्मों में बिताना चाहिए।
  • अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, जिससे हमेशा बचना चाहिए।
  • दूसरों को नीच या छोटा समझना अज्ञानता की निशानी है।
  • सादगी और विनम्रता से भरा जीवन ही सबसे उत्तम जीवन है।

प्रतीक, रूपक एवं साहित्यिक शैली

कबीर साहब की काव्य शैली में प्रतीकों का अद्भुत प्रयोग मिलता है। 'अवास' (महल) भौतिक सुख-सुविधाओं का प्रतीक है, और 'भू लेटना' तथा 'जामे घास' मृत्यु एवं प्रकृति के चक्र का प्रतीक है। उनकी भाषा में लोक-जीवन की शब्दावली का ऐसा सहज प्रयोग है कि अनपढ़ व्यक्ति भी उनके मर्म को आसानी से समझ लेता है। शांत रस और उपदेशात्मक शैली इस दोहे के सौंदर्य को चार चांद लगाती है।

दोहा/साखी से मिलने वाली प्रमुख सीख

प्रमुख जीवन संदेश

  • अहंकार का त्याग: शरीर और संपत्ति पर कभी घमंड न करें।
  • मृत्यु का स्मरण: जीवन के अंतिम सत्य (मृत्यु) को हमेशा याद रखें।
  • सादगी अपनाएं: जीवन में दिखावे और आडंबर से दूर रहें।
  • परमात्मा का स्मरण: नश्वर संसार में रहते हुए ईश्वर भक्ति को ही मुख्य लक्ष्य बनाएं।
  • सत्कर्म: ऐसे कार्य करें जो मरने के बाद भी आपकी अच्छी यादें छोड़ जाएं।

एक नजर में | Quick Summary

विषय विवरण
रचना का नाम कबीर कहा गरबियौ ऊंचे देखि अवास दोहा
रचियता / संत संत कबीर दास जी
भाषा सधुक्कड़ी / संत भाषा (प्राकृत, राजस्थानी, अवधी, ब्रज का मिश्रण)
काव्य रूप साखी / दोहा
मुख्य विषय अहंकार का त्याग, शरीर की नश्वरता और वैराग्य
केंद्रीय संदेश भौतिक महलों और शरीर पर घमंड व्यर्थ है, अंततः सबको मिट्टी में मिलना है।
स्रोत ग्रंथ कबीर बीजक / कबीर ग्रथनावली

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस प्रसिद्ध दोहे के रचयिता महान संत और समाज सुधारक कबीर दास जी हैं।

इस दोहे का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य को अपने धन, वैभव, ऊंचे मकान और सुंदर शरीर पर कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह जीवन नश्वर है और अंत में सबको मिट्टी में ही मिलना है।

'अवास' का अर्थ है ऊंचे महल, घर या निवास स्थान, और 'गरबियौ' का अर्थ है गर्व या घमंड करना।

कबीर दास जी ने मुख्य रूप से 'सधुक्कड़ी' या पंचमेल खिचड़ी भाषा का प्रयोग किया है, जिसमें हिंदी की विभिन्न बोलियों के शब्द सहज रूप से समाहित हैं।

इस पंक्ति का तात्पर्य यह है कि शीघ्र ही यह शरीर प्राणहीन होकर भूमि पर लेट जाएगा (मृत्यु को प्राप्त होगा) और इसके ऊपर घास उग आएगी, जो शरीर की नश्वरता को दर्शाती है।

हाँ, यह दोहा आज के भौतिकवादी युग में और भी अधिक प्रासंगिक है जहाँ लोग अपनी संपत्ति और ओहदे को लेकर अत्यधिक अहंकार में रहते हैं।

कबीर साखी संत साहित्य और भक्तिकाल की निर्गुण काव्य धारा के अंतर्गत आती है।

हमें अपने जीवन से अहंकार, घमंड और दिखावे की भावना को त्यागकर विनम्रता, प्रेम और सत्कर्मों को अपनाना चाहिए।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तिलोकी.इन पर प्रकाशित यह सामग्री संत कबीर दास जी की वाणियों, कबीर बीजक, कबीर ग्रंथावली और पारंपरिक दार्शनिक व्याख्याओं के गहन अध्ययन पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध, प्रामाणिक और उच्च कोटि की आध्यात्मिक जानकारी पहुँचाना है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत इस लेख की भाषा, व्याकरण और भावार्थ की सूक्ष्मता से जाँच की गई है ताकि सनातन संस्कृति के सच्चे संदेश जन-जन तक पहुँच सकें।

स्रोत एवं संदर्भ

  • कबीर बीजक - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी / संत समागम ग्रंथ
  • कबीर ग्रंथावली - श्याम सुंदर दास
  • भारतीय संत साहित्य और दर्शन - प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ
  • भक्तिकालीन निर्गुण काव्यधारा और उसका सामाजिक प्रभाव

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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