Parvati Stotram

आये है तो जायेंगे राजा रंक फ़कीर दोहे का अर्थ(Aaye Hai To Jayenge Raja Rank Phakir Dohe Ka Arth in Hindi) - Bhaktilok

224 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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आये है तो जायेंगे राजा रंक फ़कीर दोहे का अर्थ: जीवन की नश्वरता और कर्म का शाश्वत सत्य

सनातन धर्म और संत परंपरा में वैराग्य, ज्ञान और भक्ति को मोक्ष का परम साधन माना गया है। संत कबीर दास जी द्वारा रचित यह अमर दोहा "आये हैं सो जायेंगे, राजा रंक फ़कीर। एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बंधे जंजीर॥" मानव जीवन की क्षणभंगुरता, मृत्यु की अपरिहार्यता और कर्मों की गहन गति को अत्यंत सरल किंतु मर्मस्पर्शी शब्दों में अभिव्यक्त करता है। यह दोहा केवल एक काव्य रचना नहीं है, बल्कि यह श्रीमद्भगवद्गीता के निष्काम कर्मयोग और उपनिषदों के आत्मज्ञान का व्यावहारिक निचोड़ है। इस विस्तृत लेख में हम इस पावन दोहे के गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ, दार्शनिक पृष्ठभूमि, व्यावहारिक प्रासंगिकता और मानव जीवन पर इसके प्रभाव का गहन विश्लेषण करेंगे।

मूल दोहा / साखी | Original Text

आये हैं सो जायेंगे, राजा रंक फ़कीर।
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बंधे जंजीर॥

उच्चारण, पाठ एवं संरचना | Pronunciation & Structure

इस दोहे का शुद्ध उच्चारण और इसकी काव्य संरचना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह दोहा 'दोहा छंद' के शास्त्रीय नियमों के अनुसार रचित है। दोहा एक अर्धसम मात्रिक छंद होता है, जिसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रथम और तृतीय चरण में 13-13 मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं।

  • भाषा: इस दोहे की भाषा 'सधुक्कड़ी' या 'संत भाषा' है, जिसमें अवधी, ब्रजभाषा, खड़ी बोली और राजस्थानी के तत्वों का सुंदर समन्वय है।
  • शैली: उपदेशात्मक और वैराग्य प्रधान शैली, जो सीधे साधक के अंतःकरण को झंकृत करती है।
  • लय और ताल: इसे शांत रस में गाया या पढ़ा जाता है, जिससे मन में संसार के प्रति अनासक्ति और परमात्मा के प्रति अनुराग उत्पन्न होता है।

कठिन शब्दार्थ | Word Meanings

शब्द (Word) सरल हिंदी अर्थ (Simple Meaning) संदर्भगत आध्यात्मिक अर्थ (Contextual Meaning)
आये हैं जन्म लिया है संसार में जीवात्मा का देह धारण करना
जायेंगे मृत्यु को प्राप्त होंगे स्थूल शरीर का त्याग और महाप्रयाण
राजा सम्राट या वैभवशाली व्यक्ति सांसारिक सत्ता, अहंकार और भौतिक समृद्धि का प्रतीक
रंक दरिद्र या निर्धन भौतिक अभावों से ग्रस्त सामान्य मनुष्य
फ़कीर संन्यासी या त्यागी सांसारिक बंधनों से मुक्त, विरक्त साधक
सिंहासन राजगद्दी या विमान पुण्य कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त होने वाली सद्गति या मोक्ष
जंजीर लोहे की सांकल या बंधन पाप कर्मों और वासनाओं के कारण मिलने वाला बंधन या अधोगति

पदच्छेद एवं पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ | Line-by-Line Explanation

प्रथम पंक्ति: "आये हैं सो जायेंगे, राजा रंक फ़कीर।"

इस पंक्ति का पदच्छेद है: आये हैं | सो | जायेंगे | राजा | रंक | फ़कीर।

अर्थ: इस मृत्युलोक (पृथ्वी) पर जिसने भी जन्म लिया है, उसे एक न एक दिन यहाँ से अवश्य प्रस्थान करना होगा। चाहे वह कोई महान ऐश्वर्यशाली राजा हो, अत्यंत निर्धन रंक हो, या फिर सब कुछ त्याग चुका कोई फ़कीर (संन्यासी) हो। मृत्यु के समक्ष सभी सामाजिक और आर्थिक भेद समाप्त हो जाते हैं। काल की दृष्टि में सभी समान हैं।

द्वितीय पंक्ति: "एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बंधे जंजीर।"

इस पंक्ति का पदच्छेद है: एक | सिंहासन | चढ़ि | चले | एक | बंधे | जंजीर।

अर्थ: यद्यपि मृत्यु सभी की होती है, परंतु मृत्यु के पश्चात की गति सबकी एक समान नहीं होती। जिसने जीवन भर सत्कर्म किए, ईश्वर की भक्ति की और निष्काम भाव से जीवन जिया, वह सम्मानपूर्वक 'सिंहासन' (अर्थात दिव्य विमान या मोक्ष रूपी उच्च गति) पर आरूढ़ होकर जाता है। इसके विपरीत, जिसने जीवन भर पाप कर्म किए, वासनाओं और विकारों में लिप्त रहा, वह यमदूतों के द्वारा 'जंजीरों' में बंधकर (अर्थात कष्ट और दुर्गति को प्राप्त करते हुए) जाता है।

सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ | Hindi Meaning & Bhavarth

संत कबीर दास जी इस दोहे के माध्यम से संसार के सबसे बड़े और अकाट्य सत्य 'मृत्यु' की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं। वे कहते हैं कि यह संसार एक सराय की भांति है, जहाँ मनुष्य कुछ समय के लिए ठहरता है। जन्म और मृत्यु इस सृष्टि के दो छोर हैं। जो जन्मा है, उसका अंत निश्चित है। इस शाश्वत नियम से न तो कोई राजा बच सकता है जिसके पास अपार सेना और धन-दौलत है, न कोई दरिद्र बच सकता है जिसके पास भोजन की भी व्यवस्था नहीं है, और न ही कोई ऐसा साधु-संत बच सकता है जिसने संसार का त्याग कर दिया है।

परंतु, कबीर जी यहाँ केवल निराशावाद या मृत्यु का भय नहीं दिखा रहे हैं, बल्कि वे कर्म सिद्धांत (Law of Karma) की गहन व्याख्या कर रहे हैं। वे कहते हैं कि मृत्यु के समय भौतिक धन-दौलत, महल, सेना या सामाजिक प्रतिष्ठा यहीं धरी रह जाती है। जीव के साथ केवल उसके संचित कर्म (पुण्य और पाप) ही जाते हैं।

जो मनुष्य इस संसार में रहते हुए परोपकार करता है, ईश्वर का स्मरण करता है और आसक्ति रहित जीवन जीता है, उसकी मृत्यु एक उत्सव बन जाती है। वह मानों सिंहासन पर बैठकर परमधाम की यात्रा पर निकलता है। वहीं दूसरी ओर, जो मनुष्य अहंकार, लोभ, मोह और ईर्ष्या के वशीभूत होकर दूसरों को कष्ट पहुंचाता है, वह अंत समय में अत्यंत पीड़ा और पश्चाताप की जंजीरों में जकड़ा हुआ जाता है। इसलिए, यह दोहा हमें सचेत करता है कि हम अपने वर्तमान जीवन को सत्कर्मों और भक्ति से सुसज्जित करें।

मुख्य भाव एवं केंद्रीय विचार | Core Theme

इस दोहे का केंद्रीय विचार निम्नलिखित तीन स्तंभों पर आधारित है:

  1. वैराग्य (Detachment): संसार की नश्वरता को समझकर भौतिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक मोह का त्याग करना।
  2. कर्म की प्रधानता (Supremacy of Karma): मनुष्य का भाग्य और उसकी मरणोपरांत गति केवल उसके कर्मों से निर्धारित होती है, उसकी सामाजिक स्थिति से नहीं।
  3. समानता (Equality): काल (मृत्यु) के दरबार में कोई छोटा-बड़ा नहीं है। वहाँ केवल आत्मा के गुणों का मूल्यांकन होता है।

यह विचार हमें सिखाता है कि हम अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पहचानें। जैसे हम ॐ जय जगदीश हरे आरती में गाते हैं कि सब कुछ ईश्वर का ही है और हमें समर्पण भाव से जीना चाहिए, वैसे ही यह दोहा भी हमें पूर्ण शरणागति की ओर ले जाता है।

आध्यात्मिक व दार्शनिक संदेश | Spiritual & Philosophical Message

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:

"जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।" (गीता 2.27)

अर्थात, जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मृत का पुनः जन्म निश्चित है।

कबीर दास जी का यह दोहा इसी दार्शनिक सत्य को लोकभाषा में प्रस्तुत करता है। यहाँ 'सिंहासन' और 'जंजीर' दो अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक हैं:

  • सिंहासन का दार्शनिक अर्थ: यह 'मुक्ति' या 'सद्गति' का प्रतीक है। जब जीवात्मा अज्ञान के बंधनों से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप (ब्रह्म) को प्राप्त करती है, तो उसे ही सिंहासन पर चढ़ना कहा गया है।
  • जंजीर का दार्शनिक अर्थ: यह 'अज्ञान', 'वासना' और 'जन्म-मरण के चक्र' का प्रतीक है। जब तक मनुष्य संसार को सत्य मानकर उसमें आसक्त रहता है, वह बार-बार जन्म लेता है और कष्ट भोगता है। यही जंजीरों में बंधना है।

यह दोहा हमें 'अहंकार' से बचने का संदेश देता है। राजा को अपनी सत्ता का, रंक को अपनी लाचारी का और फ़कीर को अपने त्याग का अहंकार नहीं होना चाहिए, क्योंकि अंततः सभी को मिट्टी में मिल जाना है।

भक्ति परंपरा में महत्व | Importance in Bhakti Tradition

मध्यकालीन भारत के भक्ति आंदोलन में संतों ने समाज को पाखंड, अंधविश्वास और जातिगत भेदभाव से मुक्त कराने के लिए लोकभाषा का सहारा लिया। कबीर दास जी की साखियां और दोहे इस आंदोलन के प्राण थे।

यह दोहा भक्ति मार्ग में 'दैन्य भाव' और 'समर्पण' को सुदृढ़ करता है। जब साधक को यह बोध हो जाता है कि उसका शरीर और सांसारिक वैभव क्षणभंगुर हैं, तब उसका मन स्वतः ही ईश्वर की ओर उन्मुख होता है। संतों ने सदा से ही नाम-स्मरण और सत्संग को जीवन का सार माना है। इस दोहे का श्रवण और मनन साधक को अंतर्मुखी होने की प्रेरणा देता है, जिससे वह श्री कृष्ण स्तोत्र या अन्य देव आराधनाओं में लीन होकर परम शांति का अनुभव कर सकता है।

दैनिक जीवन में प्रासंगिकता एवं सीख | Daily Life Relevance & Lessons

आज के आधुनिक और भागदौड़ भरे जीवन में, जहाँ मनुष्य तनाव, अवसाद और अंधी प्रतिस्पर्धा का शिकार है, यह दोहा एक संजीवनी की तरह काम करता है:

क्षेत्र (Area) व्यावहारिक समस्या (Problem) दोहे से समाधान (Solution from Doha)
मानसिक शांति भविष्य की चिंता और अत्यधिक महत्वाकांक्षा यह बोध कि सब कुछ नश्वर है, मन को शांत और वर्तमान में केंद्रित करता है।
नैतिक आचरण भ्रष्टाचार, लोभ और अनुचित साधनों का प्रयोग यह स्मरण कि बुरे कर्मों का फल 'जंजीर' (कष्ट) के रूप में भुगतना होगा, गलत राह पर जाने से रोकता है।
सामाजिक समरसता जाति, वर्ग और धन के आधार पर भेदभाव यह ज्ञान कि मृत्यु के बाद राजा और रंक दोनों का अंत समान है, समानता और बंधुत्व की भावना जगाता है।
पारिवारिक संबंध अहंकार और आपसी मनमुटाव जीवन की क्षणभंगुरता का अहसास अपनों के प्रति प्रेम और क्षमाशीलता बढ़ाता है।

प्रतीक, रूपक एवं साहित्यिक शैली | Literary Analysis

साहित्यिक दृष्टि से यह दोहा अत्यंत समृद्ध है। इसमें प्रयुक्त अलंकार और बिंब योजना पाठक के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती है:

  • अनुप्रास अलंकार: 'राजा रंक' में 'र' वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है।
  • विरोधाभास और विषमता: 'सिंहासन' (वैभव/मुक्ति) और 'जंजीर' (बंधन/दंड) के माध्यम से जीवन के दो विपरीत परिणामों को दर्शाया गया है।
  • रूपक बिंब: 'सिंहासन चढ़ि चले' और 'बंधे जंजीर' क्रमशः पुण्य और पाप के फल को मूर्त रूप में प्रस्तुत करते हैं।
  • शांत रस: संपूर्ण दोहे में शांत रस की प्रधानता है, जो पाठक के मन में वैराग्य और शांति का संचार करती है।

दोहा/साखी से मिलने वाली प्रमुख सीख | Key Lessons

  • मृत्यु अटल सत्य है: संसार की कोई भी शक्ति, धन या पद मनुष्य को काल के चक्र से नहीं बचा सकती।
  • अहंकार का त्याग करें: अपनी सुंदरता, धन, ज्ञान या पद का कभी घमंड न करें, क्योंकि ये सब अस्थायी हैं।
  • सत्कर्म ही सच्चे साथी हैं: मृत्यु के बाद केवल हमारे द्वारा किए गए अच्छे कार्य और ईश्वर की भक्ति ही हमारे साथ जाती है।
  • समता का भाव रखें: सभी मनुष्यों को समान समझें, क्योंकि ईश्वर की दृष्टि में और काल के दरबार में सब एक समान हैं।
  • जीवन का सदुपयोग करें: समय अत्यंत मूल्यवान है, इसे व्यर्थ के वाद-विवाद और वासनाओं में नष्ट न करके आत्म-कल्याण में लगाएं।

एक नजर में | Quick Summary

रचना (Composition) आये हैं सो जायेंगे, राजा रंक फ़कीर (साखी)
रचयिता (Poet/Saint) संत कबीर दास जी
भाषा (Language) सधुक्कड़ी (संत भाषा - ब्रज, अवधी, खड़ी बोली का मिश्रण)
काव्य विधा (Genre) दोहा छंद (अर्धसम मात्रिक)
मुख्य रस (Main Rasa) शांत रस और वैराग्य भाव
केंद्रीय संदेश (Key Message) संसार की नश्वरता, कर्म की प्रधानता और अहंकार का त्याग
उपयुक्त अवसर (Occasion) सत्संग, प्रातःकालीन प्रार्थना, वैराग्य चिंतन, जीवन दर्शन चर्चा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

"आये हैं सो जायेंगे..." दोहे के वास्तविक रचयिता कौन हैं?

यह दोहा महान समाज सुधारक और संत कबीर दास जी द्वारा रचित माना जाता है। उनकी साखियों और बीजक संग्रह में इस प्रकार के वैराग्य प्रधान दोहों का विस्तृत संकलन मिलता है।

इस दोहे में 'सिंहासन' और 'जंजीर' का क्या अर्थ है?

'सिंहासन' का अर्थ है सत्कर्मों के फलस्वरूप मिलने वाली सद्गति, मोक्ष या स्वर्गिक आनंद। 'जंजीर' का अर्थ है पाप कर्मों, वासनाओं और आसक्तियों के कारण मिलने वाला बंधन, कष्ट और बार-बार जन्म-मरण का चक्र।

क्या यह दोहा हमें कर्महीन बनने की शिक्षा देता है?

बिल्कुल नहीं। यह दोहा कर्महीनता की नहीं, बल्कि 'सत्कर्म' और 'निष्काम कर्म' की शिक्षा देता है। यह हमें सचेत करता है कि हम जो भी कर्म कर रहे हैं, उसके परिणाम के लिए तैयार रहें, क्योंकि अंततः कर्म ही हमारी गति निर्धारित करते हैं।

'राजा, रंक और फ़कीर' शब्दों का प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है?

ये शब्द समाज के तीन अलग-अलग वर्गों को दर्शाते हैं: 'राजा' (अत्यंत समृद्ध), 'रंक' (अत्यंत निर्धन) और 'फ़कीर' (त्यागी/संन्यासी)। इनके माध्यम से कबीर जी स्पष्ट करते हैं कि मृत्यु की दृष्टि में सामाजिक या आर्थिक स्थिति का कोई महत्व नहीं है।

इस दोहे का हमारे दैनिक जीवन में क्या उपयोग है?

यह दोहा हमें मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाता है, हमारे अहंकार को शांत करता है, और हमें दूसरों के प्रति दया, करुणा और परोपकार की भावना के साथ जीने की प्रेरणा देता है।

क्या यह दोहा श्रीमद्भगवद्गीता के सिद्धांतों से मेल खाता है?

हाँ, यह दोहा पूरी तरह से गीता के कर्म सिद्धांत और आत्मा की अमरता तथा शरीर की नश्वरता के सिद्धांत से मेल खाता है। गीता में भी शरीर को वस्त्र की भांति बदलने की बात कही गई है।

इस दोहे में कौन सा रस मुख्य रूप से पाया जाता है?

इस दोहे में मुख्य रूप से 'शांत रस' पाया जाता है, जो मन में वैराग्य, शांति और ईश्वर के प्रति अनन्य अनुराग उत्पन्न करता है।

'सधुक्कड़ी' भाषा क्या है?

मध्यकाल में संतों द्वारा प्रयुक्त वह भाषा जिसमें विभिन्न प्रांतीय भाषाओं जैसे ब्रज, अवधी, पंजाबी, राजस्थानी और खड़ी बोली के शब्दों का मिश्रण होता था, उसे सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी भाषा कहा जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख सनातन धर्म की संत परंपरा, कबीर साहित्य और वैदिक दर्शन के गहन अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें प्रस्तुत व्याख्याएं प्रामाणिक ग्रंथों और संतों के प्रवचनों पर आधारित हैं। यह सामग्री पाठकों के आध्यात्मिक उत्थान और ज्ञानवर्धन के लिए पूर्णतः शोधपरक और "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • कबीर ग्रंथावली: बाबू श्यामसुंदर दास द्वारा संपादित संस्करण।
  • श्रीमद्भगवद्गीता: द्वितीय अध्याय (सांख्य योग), कर्म और शरीर की नश्वरता का प्रसंग।
  • संत मत प्रकाश: विभिन्न संतों के दोहों और साखियों का दार्शनिक विवेचन।

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समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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