Krishna Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

कन्हैया ले चल परली पार लिरिक्स (Kanhaiya Le Chal Parli Paar Lyrics in Hindi) - Krishna Bhajan

कन्हैया ले चल परली पार भजन के भावपूर्ण लिरिक्स यहाँ पढ़ें। श्री कृष्ण के प्रति समर्पण और भक्ति से ओत-प्रोत इस सुंदर भजन का अर्थ एवं पाठ हिंदी में उपलब्ध है।

"कन्हैया ले चल परली पार" सनातन धर्म की समृद्ध संकीर्तन परंपरा का एक अत्यंत भावपूर्ण और लोकप्रिय भजन है। यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा रानी के प्रति अनन्य समर्पण, शरणागति और विरह की भावना को दर्शाता है। इस भजन में जीवात्मा स्वयं को एक असहाय नौका के रूप में देखती है और भगवान श्री कृष्ण को उस नौका का खेवनहार (नाविक) मानती है। इस भजन का मुख्य स्वर 'विनय' और 'समर्पण' (प्रपत्ति) का है, जहाँ भक्त सांसारिक मोह-माया के इस भवसागर से पार उतरकर गोलोक धाम या उस परम सत्ता के सानिध्य में पहुँचने की व्याकुलता प्रकट करता है। इस भजन को गाते समय भक्त का हृदय करुणा, प्रेम और अश्रुपूर्ण समर्पण से भर जाता है। यह भजन विशेष रूप से जन्माष्टमी, राधाष्टमी, सत्संगों और संध्या कालीन आरती के समय भक्तों द्वारा बड़े ही चाव और श्रद्धा के साथ गाया जाता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

कन्हैया ले चल परली पार लिरिक्स (Kanhaiya Le Chal Parli Paar Lyrics in Hindi)


॥ कोरस ॥

कन्हैया ले चल परली पार,
कन्हैया ले चल परली पार।
जहाँ विराजे राधा प्यारी,
जहाँ विराजे राधा प्यारी,
अलबेली सरकार,
कन्हैया ले चल परली पार॥

॥ अंतरा - १ ॥

गुनहगार हूँ मैं तो भारी,
पाप की गठरी सिर पर धारी।
अब तो आकर बांह पकड़ लो,
अब तो आकर बांह पकड़ लो,
कर दो बेड़ा पार,
कन्हैया ले चल परली पार॥

॥ अंतरा - २ ॥

मैं तो हूँ इक दीन दुखारी,
शरण पड़ा हूँ शरण तिहारी।
तुम बिन मेरा और न कोई,
तुम बिन मेरा और न कोई,
सुन लो मेरी पुकार,
कन्हैया ले चल परली पार॥

॥ अंतरा - ३ ॥

भवसागर की नैया डोले,
मन मेरा ये गोते खाए।
तुम ही खेवैया तुम ही पतवार,
तुम ही खेवैया तुम ही पतवार,
कर दो नैया पार,
कन्हैया ले चल परली पार॥

॥ अंतरा - ४ ॥

छोड़ दिया है सब जग मैंने,
अपना माना केवल तुमको।
अब मत और परीक्षा ले लो,
अब मत और परीक्षा ले लो,
हे नटवर सरकार,
कन्हैया ले चल परली पार॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन जीवात्मा और परमात्मा के बीच के शाश्वत संबंध को उजागर करता है। यहाँ 'परली पार' का अर्थ केवल नदी का दूसरा किनारा नहीं है, बल्कि इसका आध्यात्मिक अर्थ इस भौतिक संसार (भवसागर) से मुक्त होकर गोलोक धाम या वैकुंठ धाम की प्राप्ति है, जहाँ श्री राधा-कृष्ण की नित्य लीलाएं चलती रहती हैं।

भक्त भगवान श्री कृष्ण से प्रार्थना करता है कि हे कन्हैया! मुझे इस संसार रूपी नदी के उस पार ले चलो जहाँ मेरी स्वामिनी, अलबेली सरकार श्री राधा रानी विराजमान हैं। भक्त स्वीकार करता है कि वह इस संसार में रहते हुए अनेक पापों और गलतियों का भागी बना है, जिसके कारण उसके सिर पर पापों की भारी गठरी लदी हुई है। अपनी असमर्थता को स्वीकार करते हुए भक्त कहता है कि अब केवल आपकी कृपा ही मुझे बचा सकती है। आप मेरी बांह पकड़कर मुझे इस दलदल से बाहर निकालें।

भजन के अंतिम चरणों में भक्त अपनी पूर्ण शरणागति व्यक्त करता है। वह कहता है कि इस संसार में उसका कोई अन्य सहारा नहीं है। उसकी जीवन रूपी नौका इस संसार की लहरों में डगमगा रही है, और केवल श्री कृष्ण ही उसके सच्चे खेवनहार और पतवार बन सकते हैं। यह भावार्थ श्रीमद्भगवद्गीता के 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' के सिद्धांत को चरितार्थ करता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे हर वैष्णव भक्त के हृदय के करीब लाती हैं:

  • पूर्ण शरणागति (प्रपत्ति): यह भजन वैष्णव दर्शन के प्रपत्ति मार्ग का अनुसरण करता है, जहाँ भक्त अपने अहंकार को पूरी तरह शून्य कर भगवान के चरणों में समर्पित हो जाता है।
  • राधा-तत्व की प्रधानता: भजन में 'परली पार' जाने का मुख्य उद्देश्य श्री राधा रानी के दर्शन और उनकी सेवा प्राप्त करना बताया गया है, जो कि गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय का सर्वोच्च लक्ष्य है।
  • सरलता और सुगमता: इस भजन की भाषा अत्यंत सरल और सुबोध है, जिससे कोई भी साधारण व्यक्ति भी इसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ को आसानी से समझ सकता है।
  • संगीत की मधुरता: इसकी लय और धुन इतनी शांत और ध्यानमयी है कि यह मन को तुरंत एकाग्र कर देती है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान का नाम संकीर्तन किसी भी समय कल्याणकारी होता है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष परिस्थितियां और समय अत्यधिक फलदायी माने गए हैं:

सर्वोत्तम समय: संध्या काल (गोधूलि बेला) में जब दिन और रात का मिलन होता है, तब इस भजन को गाना मन को असीम शांति प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त, ब्रह्ममुहूर्त में भी इसका पाठ किया जा सकता है।

गायन की विधि:

  1. सर्वप्रथम शांत और स्वच्छ स्थान पर बैठें। अपने सामने ठाकुर जी (श्री कृष्ण) या राधा-कृष्ण की छवि स्थापित करें।
  2. एक दीपक प्रज्वलित करें और धूप-दीप से उनका पूजन करें।
  3. अपनी आँखें बंद कर भगवान के 'खेवनहार' स्वरूप का ध्यान करें और अत्यंत दीन भाव से इस भजन का गायन करें।
  4. गायन के समय करताल या मंजीरे का धीमा प्रयोग किया जा सकता है ताकि मन एकाग्र रहे।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से युगल सरकार यानी श्री राधा-कृष्ण को समर्पित है। सनातन धर्म में श्री कृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम परमेश्वर और श्री राधा को उनकी ह्लादिनी शक्ति माना गया है।

इस भजन की पृष्ठभूमि में ब्रज के संतों की वह रस-साधना छिपी है जो मानती है कि बिना राधा रानी की कृपा के श्री कृष्ण की प्राप्ति असंभव है। इसलिए भक्त कन्हैया से प्रार्थना करता है कि उसे उस पार ले चलें जहाँ 'राधा प्यारी' विराजती हैं। यह भाव ब्रज मंडल के महान संतों जैसे स्वामी हरिदास, श्री हित हरिवंश और चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाओं से प्रेरित है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन पारंपरिक ब्रज लोक-भक्ति शैली पर आधारित है। इसकी रचना किसी एक विशिष्ट आधुनिक कवि द्वारा नहीं, बल्कि ब्रज की लोक-परंपरा और संतों के मौखिक गीतों से विकसित हुई मानी जाती है। सदियों से ब्रज के घाटों पर, यमुना जी के किनारे मल्लाह (नाविक) और भक्त इस प्रकार के गीत गाते आए हैं, जहाँ यमुना पार करने के भौतिक कार्य को भवसागर पार करने के आध्यात्मिक कार्य से जोड़ा गया है। समय के साथ यह गीत परिष्कृत होकर एक अत्यंत लोकप्रिय कृष्ण भजन के रूप में स्थापित हो गया।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा खड़ी बोली मिश्रित ब्रजभाषा है। इसमें प्रयुक्त शब्द जैसे 'कन्हैया', 'परली पार', 'खेवैया', 'नैया', 'बेड़ा पार' आदि ग्रामीण और लोक जीवन से लिए गए हैं, जो इसे अत्यंत जीवंत बनाते हैं।

काव्य शैली: इसमें रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग किया गया है। यहाँ मानव जीवन को एक 'नैया' (नाव) और इस संसार को एक 'भवसागर' (अथाह समुद्र) के रूप में दर्शाया गया है। भगवान श्री कृष्ण को 'खेवैया' (नाविक) के रूप में चित्रित किया गया है, जो इस डगमगाती नाव को सुरक्षित किनारे तक पहुँचाने में सक्षम हैं।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल एक संगीतमय प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण पाठ सिखाता है:

  • अहंकार का त्याग: जब भक्त कहता है कि "गुनहगार हूँ मैं तो भारी", तो वह अपने अहंकार को नष्ट करता है। अध्यात्म की पहली सीढ़ी अपनी कमियों को स्वीकार करना है।
  • पूर्ण विश्वास: "तुम बिन मेरा और न कोई" - यह पंक्ति हमें सिखाती है कि संसार के अस्थायी संबंधों के बजाय उस शाश्वत परमात्मा पर अटूट विश्वास रखना चाहिए।
  • धैर्य और समर्पण: जीवन में जब भी कठिनाइयों के थपेड़े लगें और हमारी जीवन रूपी नैया डगमगाने लगे, तो घबराने के बजाय पतवार भगवान के हाथों में सौंप देनी चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
परली पार दूसरे किनारे पर भौतिक संसार से मुक्त होकर गोलोक धाम पहुँचना।
अलबेली सरकार अनोखी और कृपालु स्वामिनी श्री राधा रानी का एक अत्यंत प्रिय नाम।
गुनहगार पापी या गलतियाँ करने वाला मनुष्य द्वारा अनजाने में किए गए सांसारिक पाप।
भवसागर संसार रूपी समुद्र जन्म और मृत्यु का चक्र जिसमें जीवात्मा फंसी रहती है।
खेवैया नाव चलाने वाला (नाविक) भगवान श्री कृष्ण जो जीवन को सही दिशा देते हैं।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"कन्हैया ले चल परली पार, जहाँ विराजे राधा प्यारी अलबेली सरकार..."
हे कृष्ण! मुझे इस भौतिक जगत की सीमाओं से दूर उस दिव्य धाम में ले चलिए जहाँ आपकी आह्लादिनी शक्ति श्री राधा रानी निवास करती हैं। उनके चरणों की शरण ही मेरा अंतिम गंतव्य है।

"गुनहगार हूँ मैं तो भारी, पाप की गठरी सिर पर धारी..."
मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने इस जीवन में कई गलतियाँ की हैं। मेरे कर्मों का बोझ बहुत भारी है, जिसे मैं अकेले नहीं उठा सकता। अब केवल आपकी दया ही मेरा उद्धार कर सकती है।

"भवसागर की नैया डोले, मन मेरा ये गोते खाए..."
इस संसार की कठिनाइयाँ, चिंताएँ और वासनाएँ मेरी जीवन रूपी नाव को हिला रही हैं। मेरा मन विचलित हो रहा है। हे प्रभु, आप ही मेरी पतवार बनकर मुझे स्थिरता प्रदान करें।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के शरणागति के भाव को श्रीमद्भगवद्गीता के इस प्रसिद्ध श्लोक के माध्यम से समझा जा सकता है:

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः॥

अर्थ: सभी धर्मों (कर्तव्यों) को मुझमें समर्पित करके केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।

इसके साथ ही, राधा-कृष्ण की कृपा प्राप्ति के लिए इस महामंत्र का जाप भी अत्यंत फलदायी माना गया है:

"हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥"

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम कन्हैया ले चल परली पार (Kanhaiya Le Chal Parli Paar)
मुख्य आराध्य भगवान श्री कृष्ण एवं श्री राधा रानी (युगल सरकार)
भजन का भाव समर्पण, विनय, शरणागति और विरह भाव
भाषा सरल ब्रजभाषा मिश्रित हिंदी
काव्य शैली रूपक अलंकार (नाव और नाविक का रूपक)
गायन का उपयुक्त अवसर जन्माष्टमी, राधाष्टमी, दैनिक संध्या आरती, सत्संग

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश पूर्ण शरणागति (Surrender) है। यह सिखाता है कि जब मनुष्य अपने अहंकार को छोड़कर भगवान को अपना रक्षक मान लेता है, तो भगवान स्वयं उसकी जीवन रूपी नैया को पार लगा देते हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से 'परली पार' का अर्थ इस भौतिक संसार (जन्म-मृत्यु के चक्र) से मुक्त होकर भगवान के परम धाम (गोलोक या वैकुंठ) में पहुँचना है।

इस भजन में 'अलबेली सरकार' भगवान श्री कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति श्री राधा रानी को कहा गया है, जो अत्यंत कृपालु और दयालु हैं।

इस भजन को संध्या काल के समय या सुबह के शांत वातावरण में गाना सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि इस समय मन स्वतः ही शांत और एकाग्र होता है।

यह भजन मुख्य रूप से सुगम संगीत और लोक धुन पर आधारित है, परंतु इसके गायन में राग पीलू या राग भैरवी के स्वर सहज ही दिखाई देते हैं जो विरह और समर्पण को दर्शाते हैं।

'पाप की गठरी' मनुष्य के उन संचित कर्मों, वासनाओं और अज्ञानता को दर्शाती है जो उसे इस भौतिक संसार से बांधकर रखती हैं और उसे ईश्वर से दूर करती हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को विभिन्न प्रामाणिक वैष्णव ग्रंथों, संतों के प्रवचनों और पारंपरिक संकीर्तन पद्धतियों के आधार पर संकलित और विश्लेषित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और त्रुटिहीन भजन के बोल पहुँचाना और उनके आध्यात्मिक अनुभव को समृद्ध करना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता - शरणागति योग (अध्याय १८)
  • ब्रज लोक साहित्य एवं संकीर्तन परंपरा
  • कल्याण (भजन अंक) - गीताप्रेस गोरखपुर

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संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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