Punjabi Devi Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

येषां न विद्या न तपो न दानं लिरिक्स (Yeshaan Na Vidya Na Tapo Na Danan Lyrics in Hindi) - मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति Maanas Poja Devi Mantra

येषां न विद्या न तपो न दानं श्लोक का अर्थ और महत्व जानें। यह मानस पूजा देवी मंत्र अज्ञानता दूर कर विवेक जागृत करता है। संदर्भ एवं व्याख्या सहित पढ़ें।

मानस पूजा देवी मंत्र परिचय

सनातन धर्म और शाक्त परंपरा में जगत जननी आदिशक्ति मां दुर्गा, महालक्ष्मी और महासरस्वती की उपासना का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। 'येषां न विद्या न तपो न दानं' यह श्लोक और स्तोत्र रूपी मानस पूजा देवी मंत्र साधक के भीतर छिपे अज्ञान, अहंकार और पशुवत वृत्तियों का नाश कर दिव्यता का जागरण करता है। यह पावन रचना इस बात का उद्घोष करती है कि जिस मनुष्य के जीवन में न तो विद्या का प्रकाश है, न तपस्या की ऊर्जा है, न ही दानशीलता का सद्गुण है, उसका इस धरा पर मनुष्य रूप में जन्म लेना मात्र पशुओं के समान विचरण करने जैसा है। आदिशक्ति की कृपा से ही मनुष्य को वास्तविक विवेक और मोक्ष मार्ग की प्राप्ति होती है। देवी सूक्तम् स्तोत्र और दुर्गा सप्तशती पाठ विधि के साथ इस मानस पूजा मंत्र का स्मरण करने से साधक को अनंत गुना आध्यात्मिक फल प्राप्त होता है। शरद नवरात्रि, गुप्त नवरात्रि, और दैनिक संध्या वंदन के अवसर पर इस मंत्र का उच्चारण चित्त को शुद्ध करता है और माता के चरणों में अगाध भक्ति का संचार करता है।

मूल संस्कृत श्लोक एवं मानस पूजा मंत्र | Complete Sanskrit Shloka & Lyrics

॥ येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः। ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥

अथ मानस पूजा देवी मंत्र एवं स्तोत्र पाठ


येषां न विद्या न तपो न दानं
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥

आदिशक्त्वे जगन्मातर्जगदानन्दकारिणी।
सीता राधारमा गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

श्लोक का उच्चारण एवं पदच्छेद | Pronunciation & Padaccheda

संस्कृत के इस गूढ श्लोक का सही उच्चारण और पद-विच्छेद साधक को इसका सटीक अर्थ समझने में सहायता करता है। श्लोक का पदच्छेद इस प्रकार है: येषां - न - विद्या - न - तपः - न - दानं - ज्ञानं - न - शीलं - न - गुणः - न - धर्मः। ते - मर्त्यलोके - भुवि - भारभूताः - मनुष्यरूपेण - मृगाः - चरन्ति॥ इस श्लोक में मानव जीवन के उन मूल स्तंभों की चर्चा की गई है जिनके बिना जीवन सार्थक नहीं होता। आदिशक्ति की कृपा से इन सद्गुणों की प्राप्ति सुलभ हो जाती है। दैनिक पूजा के समय श्री दुर्गा चालीसा पाठ के पश्चात इस श्लोक का स्मरण करने से विशेष मानसिक शांति मिलती है।

पदच्छेद एवं अन्वय | Padaccheda & Anvaya

श्लोक का अन्वय (शब्दों का क्रम): येषां विद्या न, तपः न, दानं न, ज्ञानं न, शीलं न, गुणः न, धर्मः न (अस्ति), ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः (सन्त), मनुष्यरूपेण मृगाः चरन्ति। इसका भाव यह है कि विद्या, तप, दान, ज्ञान, शील (सदाचरण), गुण और धर्म - ये सात मनुष्य जीवन के आभूषण हैं। यदि किसी व्यक्ति के पास इनमें से एक भी विशेषता नहीं है, तो वह पृथ्वी पर भारस्वरूप है और केवल मनुष्य की खाल में पशु के समान जीवन बिता रहा है।

विस्तृत शब्दार्थ | Word-by-Word Meaning

संस्कृत शब्द पदच्छेद सरल Hindi Meaning प्रसंग / संदर्भ
येषां येषाम् जिन लोगों के पास मानव जीवन का मूल्यांकन
विद्या विद्या शिक्षा, ज्ञान, अविद्या का नाश करने वाली विद्या प्रथम मानवीय गुण
तपः तपस् तपस्या, साधना, संयम शरीर और मन का अनुशासन
दानं दानम् परोपकार, दानशीलता, त्याग सामाजिक कर्तव्य
ज्ञानं ज्ञानम् सत्य और असत्य का विवेक आध्यात्मिक चेतना
शीलं शीलम् सदाचार, उत्तम स्वभाव, विनय नैतिक चरित्र
गुणः गुणः सद्गुण, दया, क्षमा, परोपकार आंतरिक सुंदरता
धर्मः धर्मः कर्तव्यनिष्ठा, सनातन धर्म का पालन जीवन का आधार
मर्त्यलोके मर्त्य + लोके इस मृत्युलोक (पृथ्वी) पर कर्म भूमि
भारभूताः भार + भूताः पृथ्वी के लिए भारस्वरूप, बोझ निष्क्रिय जीवन
मनुष्यरूपेण मनुष्य + रूपेण मनुष्य के शरीर में बाहरी आवरण
मृगाः मृगाः पशु, हिरण, वन्य जीव पशुवृत्ति
चरन्ति चरन्ति विचरण करते हैं, घूमते हैं लक्ष्यहीन जीवन

सरल हिंदी भावार्थ एवं व्याख्या | Hindi Meaning & Bhavarth

इस महान श्लोक और मानस पूजा देवी मंत्र के माध्यम से महर्षि भर्तृहरि या प्राचीन नीतिशास्त्रकारों ने मनुष्य जीवन के वास्तविक उद्देश्यों को रेखांकित किया है। भावार्थ यह है कि मनुष्य योनि समस्त योनियों में सर्वश्रेष्ठ मानी गई है, क्योंकि इसी योनि में जीव को अच्छे और बुरे का विवेक करने की स्वतंत्रता और क्षमता प्राप्त होती है। परंतु यदि कोई व्यक्ति मनुष्य का शरीर पाकर भी विद्यार्जन नहीं करता, अपने जीवन में तप और संयम का आचरण नहीं अपनाता, दूसरों की भलाई के लिए दान या परोपकार नहीं करता, सत्य का ज्ञान प्राप्त नहीं करता, जिसका शील और आचरण भ्रष्ट है, जिसके भीतर कोई सद्गुण नहीं है और जो धर्म के मार्ग से विमुख होकर जीवन जीता है, वह इस पृथ्वी पर केवल एक बोझ के समान है।

बाहरी रूप से वह मनुष्य दिखाई देता है, परंतु उसकी वृत्तियां, आहार, और आचरण पशुओं (मृग या अन्य वन्य जीवों) के समान ही होते हैं। वह केवल खाने, सोने और अपनी इंद्रियों को तृप्त करने में जीवन बिता देता है। आदिशक्ति माता दुर्गा की मानस पूजा करते समय साधक इस बात का संकल्प लेता है कि वह अपने भीतर विद्या, तप, दान और धर्म का विकास करे ताकि उसका जीवन सार्थक हो सके। माता लक्ष्मी जी की आरती और दुर्गा स्तोत्र का पाठ करने से साधक को भगवती की ऐसी कृपा मिलती है जिससे उसका अंतःकरण इन सभी दिव्य गुणों से परिपूर्ण हो जाता है।

श्लोक का मुख्य भाव एवं आध्यात्मिक संदेश | Core Bhava & Spiritual Message

यह श्लोक केवल एक नैतिक उपदेश नहीं है, बल्कि यह आत्म-विश्लेषण का एक महान दर्पण है। आध्यात्मिक दृष्टि से, मनुष्य योनि चौरासी लाख योनियों के भ्रमण के पश्चात मिलने वाला एक दुर्लभ अवसर है। यदि इस जन्म में जीव ने अपने भीतर आध्यात्मिक चेतना, ज्ञान और भगवद्भक्ति को जाग्रत नहीं किया, तो उसका जीवन व्यर्थ चला जाता है। मानस पूजा का संदेश यह है कि बाहरी पूजा-पाठ, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करने से भी अधिक महत्वपूर्ण है अपने आंतरिक स्वभाव को बदलना। जब तक मन में करुणा, ज्ञान और सदाचार का उदय नहीं होता, तब तक सच्ची पूजा संपन्न नहीं होती। यह हमें अहंकार त्यागकर सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ | Scriptural & Mythological Context

यह सुप्रसिद्ध श्लोक नीतिशतकम् (ग्रंथकार: महर्षि भर्तृहरि) से लिया गया है और इसे सनातन धर्म के विभिन्न पुराणों जैसे देवीभागवत पुराण, मारुति पुराण तथा नीति ग्रंथों में उच्चकोटि के सुभाषित के रूप में स्थान मिला है। आदिशक्ति जगत जननी को समर्पित मानस पूजा स्तोत्र के साथ इस श्लोक का पाठ करने से साधक को ज्ञान और शक्ति दोनों की प्राप्ति होती है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि जो व्यक्ति भगवती दुर्गा की शरण में जाकर अपने अवगुणों का त्याग करता है, माता उसे विद्या और मोक्ष प्रदान करती हैं। नवरात्रि के पावन पर्व पर इस स्तोत्र का अनुष्ठान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व | Philosophical Significance

भारतीय दर्शन में मनुष्य को 'नर से नारायण' बनने की क्षमता दी गई है। वेदांत दर्शन के अनुसार, अविद्या (अज्ञान) के कारण ही मनुष्य अपनी वास्तविक दिव्य प्रकृति को भूलकर पशुवत् भोग-विलास में लिप्त रहता है। विद्या और तप के द्वारा जब अविद्या का आवरण हटता है, तब ज्ञान का प्रकाश होता है। यह श्लोक इसी दार्शनिक सत्य को उजागर करता है कि कर्म और विद्या के बिना मनुष्य का जीवन पशु तुल्य है। माता दुर्गा, जो कि विद्या (महासरस्वती), ऐश्वर्य (महालक्ष्मी) और शक्ति (महाकाली) का समन्वित रूप हैं, उनकी आराधना से इन सभी गुणों की स्वतः प्राप्ति हो जाती है।

दैनिक जीवन में उपयोगिता एवं सीख | Daily Life Lessons

  • विद्या अर्जन: जीवन भर कुछ नया सीखने और ज्ञान प्राप्त करने की जिजीविषा बनाए रखें।
  • तप और संयम: अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मानसिक और शारीरिक अनुशासन (तप) बहुत आवश्यक है।
  • दानशीलता: अपनी कमाई और ज्ञान का कुछ हिस्सा समाज के कल्याण और जरूरतमंदों की सहायता के लिए समर्पित करें।
  • सदाचार (शील): बड़ों का सम्मान, छोटों को प्यार और सत्य का आचरण ही मनुष्य की असली पहचान है।
  • धर्म का पालन: अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना ही सबसे बड़ा धर्म है।
  • अहंकार का त्याग: मनुष्य योनि के अहंकार से दूर रहकर विनम्रता पूर्वक जीवन व्यतीत करें।

साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त | Sadhana & Recitation Vidhi

इस मानस पूजा देवी मंत्र और श्लोक का पाठ करने के लिए प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या संध्या बेला का समय सबसे उत्तम माना जाता है। स्नान आदि से निवृत्त होकर माता दुर्गा के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। लाल आसन पर बैठकर मन को शांत करें और इस श्लोक का कम से कम 108 बार या 21 बार जप करें। नवरात्रि के नौ दिनों में इस मंत्र का नियमित पाठ करने से कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है और मानसिक विकारों का नाश होता है। पाठ के अंत में माता को क्षमा प्रार्थना और पुष्प अर्पित करें।

एक नजर में भजन एवं मंत्र की जानकारी | Quick Information

विषय विवरण
मंत्र / श्लोक नाम येषां न विद्या न तपो न दानं (मानस पूजा देवी मंत्र)
आराध्य देवी आदिशक्ति माता दुर्गा, महालक्ष्मी, महासरस्वती
मूल ग्रंथ नीतिशतकम् (भर्तृहरि) एवं शाक्त स्तोत्र संग्रह
भाषा संस्कृत एवं हिंदी भावार्थ
मुख्य थीम मानवीय गुण, ज्ञान, तप, सदाचार और धर्म का महत्व
प्रधान भाव विवेक जागरण, आत्म-सुधार और भगवद् समर्पण
उपयुक्त अवसर दैनिक पूजा, नवरात्रि, सत्संग, संध्या वंदन

मुख्य सीख | Key Takeaways

  1. मनुष्य योनि केवल भोग के लिए नहीं, बल्कि विद्या, तप और सेवा के लिए मिली है।
  2. ज्ञान और सदाचार के बिना मानव जीवन पशु के समान व्यर्थ हो जाता है।
  3. आदिशक्ति माता दुर्गा की कृपा से समस्त सद्गुणों और पुरुषार्थों की सिद्धि होती है।
  4. दैनिक जीवन में दान, धर्म और शील का पालन करना प्रत्येक सनातनधर्मी का कर्तव्य है।
  5. नियमित मानस पूजा से अंतःकरण शुद्ध होता है और चित्त में शांति स्थापित होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह प्रसिद्ध श्लोक महाकवि भर्तृहरि द्वारा रचित 'नीतिशतकम्' ग्रंथ से लिया गया है, जिसे सनातन परंपरा में उच्च कोटि के नीति और ज्ञान का पाठ माना जाता है।

इसका शाब्दिक अर्थ है - "वे मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर पशुओं (हिरण या अन्य वन्य जीवों) की भांति विचरण करते हैं।" इसका भाव यह है कि जिनके पास विद्या, शील और धर्म नहीं है, वे केवल शरीर से मनुष्य हैं परंतु उनके कर्म पशुओं जैसे होते हैं।

इस मंत्र का जाप प्रातःकाल पूजा के समय, संध्या वंदन में या विशेषकर नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान करना अत्यंत फलदायी माना गया है।

यह शहमें शिक्षा, तपस्या, दान, सदाचार और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है ताकि हमारा जीवन सार्थक और कल्याणकारी बन सके।

हाँ, यह एक सार्वभौमिक नीति श्लोक और देवी स्तुति है जिसे गृहस्थ, विद्यार्थी और साधक कोई भी श्रद्धापूर्वक पढ़ सकता है।

मानस पूजा का अर्थ मन ही मन अपने आराध्य को समर्पित होना है। इससे मानसिक एकाग्रता बढ़ती है और ईश्वरीय प्रेम की प्राप्ति होती है।

विद्या अज्ञान को दूर करती है और तप व्यक्ति को सहनशील एवं मजबूत बनाता है, जिससे जीवन में सफलता और शांति मिलती है।

प्रतिदिन स्नान के पश्चात माता के चित्र या विग्रह के समक्ष दीप प्रज्वलित कर इस श्लोक का 11 या 21 बार सस्वर पाठ करना चाहिए।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह मार्गदर्शिका और पाठ सामग्री सनातन धर्म के प्राचीन नीति ग्रंथों, शाक्त परंपराओं और वेदान्त दर्शन के आधार पर तैयार की गई है। इसमें पाठकों की सुगमता के लिए शुद्ध उच्चारण, पदच्छेद, शब्दार्थ और विस्तृत भावार्थ को समाहित किया गया है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पाठकों के आध्यात्मिक ज्ञान को समृद्ध करने और जीवन में उच्च नैतिक मूल्यों को स्थापित करने के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • नीतिशतकम् - महर्षि भर्तृहरि विरचित
  • देवीभागवत पुराण - गीताप्रेस गोरखपुर
  • शाक्त प्रमोद एवं स्तोत्र रत्नाकर
  • सनातन धर्म संस्कृति एवं आचार संहिता ग्रंथ

संबंधित भजन एवं लेख | Related Bhajans & Articles

श्री दुर्गा चालीसा पाठ | देवी सूक्तम् स्तोत्र अर्थ सहित | दुर्गा सप्तशती पाठ विधि एवं नियम | माता लक्ष्मी जी की पावन आरती | या कुन्देन्दु तुषार हार ध्ला वा श्वेतपद्मासना

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!