Jaishri Yamuna Maharani

यमुनाष्टक लिरिक्स हिंदी (Yamunashtak Lyrics in Hindi) - Jaishri Yamuna Maharani Lata Mangeshkar - Bhaktilok

656 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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प्रस्तावना एवं परिचय

यमुनाष्टक: भक्ति का अनूठा पाठ

इसे गाने से मन में शांति और भक्ति का संचार होता है।

नमामि यमुनामहं सकल सिद्धि हेतुं मुदामुरारि पद पंकज स्फ़ुरदमन्द रेणुत्कटाम।तटस्थ नव कानन प्रकटमोद पुष्पाम्बुनासुरासुरसुपूजित स्मरपितुः श्रियं बिभ्रतीम।।१।।कलिन्द गिरि मस्तके पतदमन्दपूरोज्ज्वलाविलासगमनोल्लसत्प्रकटगण्ड्शैलोन्न्ता।सघोषगति दन्तुरा समधिरूढदोलोत्तमामुकुन्दरतिवर्द्धिनी जयति पद्मबन्धोः सुता।।२।।भुवं भुवनपावनी मधिगतामनेकस्वनैःप्रियाभिरिव सेवितां शुकमयूरहंसादिभिः।तरंगभुजकंकण प्रकटमुक्तिकावालूकानितन्बतटसुन्दरीं नमत कृष्ण्तुर्यप्रियाम।।३।।अनन्तगुण भूषिते शिवविरंचिदेवस्तुतेघनाघननिभे सदा ध्रुवपराशराभीष्टदे।विशुद्ध मथुरातटे सकलगोपगोपीवृतेकृपाजलधिसंश्रिते मम मनः सुखं भावय।।४।।यया चरणपद्मजा मुररिपोः प्रियं भावुकासमागमनतो भवत्सकलसिद्धिदा सेवताम।तया सह्शतामियात्कमलजा सपत्नीवयहरिप्रियकलिन्दया मनसि मे सदा स्थीयताम।।५।।नमोस्तु यमुनें सदा तव चरित्र मत्यद्भुतंन जातु यमयातना भवति ते पयः पानतः।यमोपि भगिनीसुतान कथमुहन्ति दुष्टानपिप्रियो भवति सेवनात्तव हरेर्यथा गोपिकाः।।६।।ममास्तु तव सन्निधौ तनुनवत्वमेतावतान दुर्लभतमारतिर्मुररिपौ मुकुन्दप्रिये।अतोस्तु तव लालना सुरधुनी परं सुंगमात्तवैव भुवि कीर्तिता न तु कदापि पुष्टिस्थितैः।।७।।स्तुति तव करोति कः कमलजासपत्नि प्रियेहरेर्यदनुसेवया भवति सौख्यमामोक्षतः।इयं तव कथाधिका सकल गोपिका संगमस्मरश्रमजलाणुभिः सकल गातरजैः संगमः।।८।।तवाष्टकमिदं मुदा पठति सूरसूते सदासमस्तदुरितक्षयो भवति वै मुकुन्दे रतिः।तया सकलसिद्धयो मुररिपुश्च सन्तुष्यतिस्वभावविजयो भवेत वदति वल्लभः श्री हरेः।।९।।।इति श्री वल्लभाचार्य विरचितं यमुनाष्टकं सम्पूर्णम।
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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यमुनाष्टक में यमुनाजी की महिमा का वर्णन किया गया है। यह भजन समर्पित है भगवान श्री कृष्ण की लीला को प्रसंग में रखकर। पहले श्लोक में यमुनाजी की स्तुति की गई है, जो श्री कृष्ण के चरणकमलों से सदैव प्रफुल्लित रहती हैं और सभी सिद्धियों को प्रदान करती हैं। यह भजन यमुनाजी के तट पर सुख की वाणी का उल्लेख करता है, जिसमें सुखदाई वृक्षों की तरह श्री कृष्ण की सेवा में भक्ति का संकेत मिलता है। दूसरा श्लोक यमुना के जल की पवित्रता का वर्णन करता है, जो सभी भक्तों के लिए आनन्द की प्राप्ति का साधन है। इस प्रकार, यमुनाजी की महिमा में डूबा यह गीत भक्तों को भक्ति और विश्वास में भर देता है।

भावात्मक दृष्टि से, यमुनाष्टक में यमुनाजी के प्रति गहरी श्रद्धा और प्रेम व्यक्त किया गया है। प्रत्येक श्लोक में वर्णित चित्रकला और भावनात्मक भावनाएँ भक्त के मन में यमुनाजी के प्रतीकों के प्रति अत्यधिक श्रद्धा को जागृत करती हैं। विशेष रूप से, जब भक्त इस पवित्र नदी की महिमा का गान करता है, तो उसमें प्रेम और भक्ति का अद्वितीय मिलन होता है। इसका अर्थ है कि यमुनाजी की कृपासे, भक्त अपनी सभी बाधाओं को पार कर सकता है। यमुनाजी का ध्यान करते हुए, भक्त श्री कृष्ण की टीका-चिंतन में मन को लगा देता है, जिससे उसकी भक्ति और समर्पण में वृद्धि होती है।

तत्त्वज्ञान की दृष्टि से, यमुनाष्टक भक्ति मार्ग का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह दर्शाता है कि किस प्रकार भक्त अपने इष्ट देवता की स्तुति करते हैं और इससे उनके हृदय में प्रेम एवं भक्ति की भावना जागृत होती है। यमुनाजी को अति पवित्र माना जाता है, और उनके जल में स्नान करना, भक्तों की आत्मा को शुद्ध करता है। यह गीत संपूर्ण मानवता को यमुनाजी की भक्ति में लिप्त होकर प्रेम और सद्भावना का संदेश देता है। भगवान कृष्ण और यमुनाजी का संबंध अद्वितीय है और यह गहन आध्यात्मिक अनुभव का आधार प्रदान करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

यमुनाष्टक का महत्त्व भारतीय धर्म-संस्कृति में अत्यधिक है। यह भजन विशेष रूप से श्री कृष्ण और यमुनाजी दोनों की स्तुति में है; यहाँ तक कि पुराणों में भी यमुनाजी को पवित्र देवी माना गया है। यमुन देवी की पूजा को विशेष स्थान दिया गया है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि उनके जल में स्नान करने से सभी पाप दूर हो जाते हैं। साथ ही, कथाएँ भी हैं जो यमुनाजी के द्वारा भक्तों को मुक्ति प्रदान करने की शक्ति दर्शाती हैं। गीता में भक्ति का महत्व है, और यमुनाष्टक भक्तों को इस पवित्र भाव में लाने का कार्य करती है।

श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य उपदेशों को जानने के लिए भगवद्गीता खंड अवश्य पढ़ें और भगवान कृष्ण की लीलाओं के गहन अध्ययन के लिए ब्रह्म पुराण का पाठ करें। यमुनाष्टक का पाठ करने से मानसिक शांति, आध्यात्मिक शुद्धता और आत्मिक आनंद की प्राप्ति होती है। यह भजन भक्तों को प्रेरणादायक भावनाओं से भरता है और जीवन में सकारात्मकता का संचार करता है। नियमित रूप से इस भजन का पाठ करने से, भक्त अपने जीवन में कठिनाइयों का सामना शांतिपूर्ण ढंग से कर सकते हैं।

🕒 साधना एवं गायन विधि

यमुनाष्टक का पाठ सुबह या संध्या के समय करना उत्तम माना जाता है। भक्त को ध्यान केंद्रित करते हुए, साफ स्थान पर बैठकर यह भजन गाना चाहिए। पूजा करते समय, दीप जलाएं और यमुनाजी के प्रतीक के रूप में फल या पुष्प चढ़ाएं। इस भजन का पाठ करते समय भावुकता और श्रद्धा के साथ मन लगाकर गाना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

यमुनाष्टक का पाठ क्यों करना चाहिए?

यमुनाष्टक का पाठ करने से भक्त को यमुनाजी की कृपा प्राप्त होती है, जो जीवन की सभी बाधाओं को दूर करता है और आत्मिक शुद्धता प्रदान करता है।

यमुनाष्टक की उत्पत्ति कैसे हुई?

यमुनाष्टक की रचना महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा की गई थी, जिन्होंने इसे यमुनाजी की महिमा को बढ़ाने और भक्तों के मन में श्रद्धा जगाने के लिए लिखा।

क्या यमुनाष्टक का कोई विशेष समय है?

यमुनाष्टक का पाठ सुबह या सांयकाल किया जाता है, जब मन अधिक शांति में होता है। इस समय भक्ति और ध्यान में अधिकता होती है।

श्रेणियां: Jaishri Yamuna Maharani Yamunashtak

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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