Radha Kriya Kataksh Stotram

श्री महालक्ष्मी स्तोत्रम् लिरिक्स (Mahalakshmi Stotram Lyrics in Hindi) - Vishnupuran Shubhangi Joshi - Bhaktilok

174 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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प्रस्तावना एवं परिचय

श्री महालक्ष्मी स्तोत्र: समृद्धि और सौभाग्य की देवी का मंत्र

इस स्तोत्र का पाठ करें और श्री महालक्ष्मी की कृपा से समृद्धि एवं सुख प्राप्त करें।

श्री महालक्ष्मी स्तोत्रम् लिरिक्स (Mahalakshmi Stotram  Lyrics in Hindi) - श्रीगणेशाय नमः श्रीपराशर उवाच सिंहासनगतः शक्रस्सम्प्राप्य त्रिदिवं पुनःदेवराज्ये स्थितो देवीं तुष्टावाब्जकरां ततःइन्द्र उवाचनमस्ये सर्वलोकानां जननीमब्जसम्भवाम्श्रियमुन्निद्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम् २पद्मालयां पद्मकरां पद्मपत्रनिभेक्षणाम्वन्दे पद्ममुखीं देवीं पद्मनाभप्रियाम्यहम् ३त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा सुधा त्वं लोकपावनीसन्ध्या रात्रिः प्रभा भूतिर्मेधा श्रद्धा सरस्वती ४यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या च शोभनेआत्मविद्या च देवि त्वं विमुक्तिफलदायिनी ५आन्वीक्षिकी त्रयीवार्ता दण्डनीतिस्त्वमेव चसौम्यासौम्यैर्जगद्रूपैस्त्वयैतद्देवि पूरितम् ६का त्वन्या त्वमृते देवि सर्वयज्ञमयं वपुःअध्यास्ते देवदेवस्य योगचिन्त्यं गदाभृतः ७त्वया देवि परित्यक्तं सकलं भुवनत्रयम्विनष्टप्रायमभवत्त्वयेदानीं समेधितम् ८दाराः पुत्रास्तथाऽऽगारं सुहृद्धान्यधनादिकम्भवत्येतन्महाभागे नित्यं त्वद्वीक्षणान्नृणाम् ९शरीरारोग्यमैश्वर्यमरिपक्षक्षयः सुखम्देवि त्वद्दृष्टिदृष्टानां पुरुषाणां न दुर्लभम् १०त्वमम्बा सर्वभूतानां देवदेवो हरिः पितात्वयैतद्विष्णुना चाम्ब जगद्व्याप्तं चराचरम् ११मनःकोशस्तथा गोष्ठं मा गृहं मा परिच्छदम्मा शरीरं कलत्रं च त्यजेथाः सर्वपावनि १२मा पुत्रान्मा सुहृद्वर्गान्मा पशून्मा विभूषणम्त्यजेथा मम देवस्य विष्णोर्वक्षःस्थलाश्रये १३सत्त्वेन सत्यशौचाभ्यां तथा शीलादिभिर्गुणैःत्यज्यन्ते ते नराः सद्यः सन्त्यक्ता ये त्वयाऽमले १४त्वयाऽवलोकिताः सद्यः शीलाद्यैरखिलैर्गुणैःकुलैश्वर्यैश्च पूज्यन्ते पुरुषा निर्गुणा अपि 15सश्लाघ्यः सगुणी धन्यः स कुलीनः स बुद्धिमान्स शूरः सचविक्रान्तो यस्त्वया देवि वीक्षितः १६सद्योवैगुण्यमायान्ति शीलाद्याः सकला गुणाःपराङ्गमुखी जगद्धात्री यस्य त्वं विष्णुवल्लभे १७न ते वर्णयितुं शक्तागुणाञ्जिह्वाऽपि वेधसःप्रसीद देवि पद्माक्षि माऽस्मांस्त्याक्षीः कदाचन 18श्रीपराशर उवाचएवं श्रीः संस्तुता सम्यक् प्राह हृष्टा शतक्रतुम्शृण्वतां सर्वदेवानां सर्वभूतस्थिता द्विज १९श्रीरुवाचपरितुष्टास्मि देवेश स्तोत्रेणानेन ते हरेःवरं वृणीष्व यस्त्विष्टो वरदाऽहं तवागता २०इन्द्र उवाचवरदा यदिमेदेवि वरार्हो यदिवाऽप्यहम्त्रैलोक्यं न त्वया त्याज्यमेष मेऽस्तु वरः परः २१स्तोत्रेण यस्तवैतेन त्वां स्तोष्यत्यब्धिसम्भवेस त्वया न परित्याज्यो द्वितीयोऽस्तुवरो मम २२श्रीरुवाचत्रैलोक्यं त्रिदशश्रेष्ठ न सन्त्यक्ष्यामि वासवदत्तो वरो मयाऽयं ते स्तोत्राराधनतुष्ट्या २३यश्च सायं तथा प्रातः स्तोत्रेणानेन मानवःस्तोष्यते चेन्न तस्याहं भविष्यामि पराङ्गमुखी २४श्रीपाराशर उवाचएवं वरं ददौ देवी देवराजाय वै पुरामैत्रेय श्रीर्महाभागा स्तोत्राराधनतोषिता २५भृगोः ख्यात्यां समुत्पन्ना श्रीः पूर्वमुदधेः पुनःदेवदानवयत्नेन प्रसूताऽमृतमन्थने २६एवं यदा जगत्स्वामी देवराजो जनार्दनःअवतारः करोत्येषा तदा श्रीस्तत्सहायिनी २७पुनश्चपद्मा सम्भूता यदाऽदित्योऽभवद्धरिःयदा च भार्गवो रामस्तदाभूद्धरणीत्वियम् २८राघवत्वेऽभवत्सीता रुक्मिणी कृष्णजन्मनिअन्येषु चावतारेषु विष्णोरेखाऽनपायिनी २९देवत्वे देवदेहेयं मानुषत्वे च मानुषीविष्णोर्देहानुरुपां वै करोत्येषाऽऽत्मनस्तनुम् ३०यश्चैतशृणुयाज्जन्म लक्ष्म्या यश्च पठेन्नरःश्रियो न विच्युतिस्तस्य गृहे यावत्कुलत्रयम् ३१पठ्यते येषु चैवर्षे गृहेषु श्रीस्तवं मुनेअलक्ष्मीः कलहाधारा न तेष्वास्ते कदाचन ३२एतत्ते कथितं ब्रह्मन्यन्मां त्वं परिपृच्छसिक्षीराब्धौ श्रीर्यथाjata पूर्वं भृगुसुता सती ३३इति सकलविभूत्यवाप्तिहेतुः स्तुतिरियमिन्द्रमुखोद्गता हि लक्ष्म्याःअनुदिनमिह पठ्यते नृभिर्यैर्वसति न तेषु कदाचिदप्यलक्ष्मीः ३४इति श्रीविष्णुपुराणे महालक्ष्मी स्तोत्रं सम्पूर्णम्
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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

श्री महालक्ष्मी स्तोत्रम का उद्देश्य देवी लक्ष्मी की कृपा की प्राप्ति और समस्त कल्याण की कामना करना है। इस स्तोत्र में लक्ष्मी जी को सर्व-सृष्टि की माता तथा समस्त सुख-समृद्धि की स्रोत माना गया है। पहले श्लोक में देवी लक्ष्मी को 'अभिज्ञानं' कहा गया है, जिससे संकेत मिलता है कि वे सभी प्राणियों के हृदय में निवास करती हैं। इससे सिद्ध होता है कि लक्ष्मी जी केवल धन-वैभव की देवी नहीं, अपितु ज्ञान, श्रद्धा और संतोष की देवी भी हैं। आगे के श्लोकों में लक्ष्मी जी की अनेक रूप और स्वरूप का उल्लेख होता है, जैसे कि 'पद्मकराम्', 'पद्ममुखीं' और 'अम्बा सर्वभूतानां'। ये सभी नाम उन्हें प्रतिष्ठित करते हैं और भक्तों को उनके प्रति श्रद्धा पूर्वक प्रणाम करने की प्रेरणा देते हैं।

इस स्तोत्र के भावार्थ में निहित गहन महत्व को समझना आवश्यक है। उदाहरण के लिए, 'यज्ञविद्या', 'महाविद्या', 'गुह्यविद्या' इत्यादि नाम लक्ष्मी जी की बुद्धिमत्ता और उच्च ज्ञान की ओर संकेत करते हैं। यह हमारे जीवन में ज्ञान और समझ का महत्व दर्शाता है। भक्त को इस स्तोत्र का पाठ करते समय यह अनुभव होता है कि लक्ष्मी जी उनके साथ हैं, और उनके आशीर्वाद से जीवन के समस्त दुख दूर होते हैं। लक्ष्मी जी की आराधना से व्यक्ति में संयम, आत्मसंयम, और शांति का जागरण होता है। यह साधना हमें न केवल भौतिक संपत्ति, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक धन प्रदान करती है।

यह स्तोत्र भक्ति मार्ग का एक अभिन्न हिस्सा है, जो हमें यह सिखाता है कि जितनी भक्ति हम लक्ष्मी जी के प्रति करेंगे, उतनी ही सिद्धि और मुक्ति प्राप्त करेंगे। 'सर्वयज्ञमयं वपुः' से स्पष्ट होता है कि देवी लक्ष्मी की उपासना से सभी प्रकार के यज्ञ और पूजा सफल होती हैं। बहुधा भक्त लक्ष्मी जी को शक्ति, धन, सौभाग्य और समृद्धि की देवी मानते हैं, लेकिन इस स्तोत्र के माध्यम से यह स्पष्ट हो जाता है कि देवी लक्ष्मी ज्ञान, साधना के मार्ग और स्थिरता की देवी भी हैं। यहीं से भक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है जिससे हमारा जीवन सफल और अभिस्विकृत होता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

महालक्ष्मी स्तोत्र का महत्त्व हमारे शास्त्रों, विशेषकर विष्णुपुराण और महाभारत में निहित है। लक्ष्मी जी का चरित्र केवल भौतिक धन की देवी तक सीमित नहीं है, अपितु वे समस्त सृष्टि की और हर जीव की माता हैं। जब भगवान श्री विष्णु ने सृष्टि की रचना की, तब लक्ष्मी जी उनके साथ चयनित हुईं। उनका महात्म्य इतनी बड़ा है कि सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक समृद्धि के लिए उनका पूजन आवश्यक माना गया है। यह स्तोत्र न केवल भक्तों को धन देता है, बल्कि मानसिक शांति और संतुलन भी प्रदान करता है। विभिन्न पुराणों में देवी लक्ष्मी के विभिन्न अवतारोंका वर्णन मिलता है, जो इस स्तोत्र की महत्ता को और बढ़ाते हैं।

प्रभु श्री राम के आदर्शों और मर्यादा पुरुषोत्तम के सम्पूर्ण चरित्र का रसास्वादन करने के लिए रामायण महाग्रंथ अन्वेषक का उपयोग करें। महालक्ष्मी स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भक्त को मानसिक शांति, धन-संपत्ति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यह स्तोत्र न केवल भौतिक संसाधनों की प्राप्ति का माध्यम है, बल्कि यह मानसिक संतुलन और शांति का भी स्रोत है। लक्ष्मी जी की कृपा से भय और नकारात्मकताओं से मुक्त होकर व्यक्ति सकारात्मकता की ओर अग्रसर होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

महालक्ष्मी स्तोत्र का पाठ सुबह सूर्योदय से पूर्व या संध्या समय करना श्रेष्ठ होता है। इस दौरान स्वच्छता का ध्यान रखते हुए पवित्र स्थान पर बैठकर उपासना करें। दीया जलाने, पुष्प अर्पित करने तथा मीठे चढ़ावे का भोग लगाने से देवी लक्ष्मी को प्रसन्न किया जा सकता है। सामान्यत: एकाग्रता और भक्ति भाव के साथ पाठ करना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

महालक्ष्मी स्तोत्र का क्या महत्व है?

महालक्ष्मी स्तोत्र का महत्व धन, समृद्धि, और मानसिक शांति की प्राप्ति में है। यह स्तोत्र देवी लक्ष्मी की कृपा की कामना के लिए महत्वपूर्ण है।

कब और कैसे महालक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करें?

महालक्ष्मी स्तोत्र का पाठ सुबह या संध्या के समय करना उत्तम है। स्वच्छ स्थान पर बैठकर ध्यान और भक्ति के साथ पाठ करना चाहिए।

महालक्ष्मी की पूजा के लिए किन वस्तुओं की आवश्यकता होती है?

महालक्ष्मी की पूजा हेतु देवी को फूल, फल, मिठाई, और विशेषकर एक शुद्धता का प्रतीक दिए की आवश्यकता होती है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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