"तेरा भवन सजा जिन फूलों से" सनातन धर्म में मां दुर्गा की आराधना के लिए गाया जाने वाला एक अत्यंत लोकप्रिय, मधुर और भावपूर्ण देवी भजन है। यह भजन विशेष रूप से नवरात्रि, माता की चौकी, जगराता और दैनिक संध्या आरती के समय भक्तों द्वारा बड़े ही हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ गाया जाता है। इस भजन का मुख्य स्वर पूर्ण समर्पण, विनीत भाव और भगवती के प्रति अनन्य प्रेम का है। जब कोई भक्त इस भजन को गाता है, तो उसके अंतर्मन में मां के दिव्य दरबार का सजीव चित्रण होने लगता है। इस भजन में प्रयुक्त बिंब और उपमाएं भक्त को सांसारिक कोलाहल से दूर कर सीधे जगदंबा के चरणों में ले जाती हैं। प्रस्तुत लेख में हम इस पावन भजन के संपूर्ण लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व, कठिन शब्दों के अर्थ और इससे जुड़े शास्त्रीय प्रसंगों का सविस्तार विवेचन करेंगे ताकि साधक और संगीत प्रेमी दोनों ही इसका पूर्ण लाभ उठा सकें।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ तेरा भवन सजा जिन फूलों से ॥
(कोरस / मुखड़ा)
तेरा भवन सजा जिन फूलों से, वो फूल बड़े ही प्यारे हैं।
चमके हैं नसीब उन फूलों के, जिन्हें छूते हाथ तुम्हारे हैं॥
तेरा भवन सजा जिन फूलों से...
(अंतरा - 1)
कोई चम्पा है कोई चमेली है, कोई गुलाब की कली नवेली है।
कोई गेंदा है कोई जूही है, हर फूल की महिमा अनूठी है॥
सब अपनी सुगंध लुटाने को, मां तेरे चरणों में आए हैं।
तेरा भवन सजा जिन फूलों से, वो फूल बड़े ही प्यारे हैं॥
(अंतरा - 2)
कोई लाया है श्रद्धा के आंसू, कोई लाया है भक्ति के मोती।
तेरे द्वारे पे आकर मैया जी, हर बिगड़ी बात बन जाती है॥
जो आया शरण तुम्हारी मां, तुमने तो उसे अपना माना।
तेरा भवन सजा जिन फूलों से, वो फूल बड़े ही प्यारे हैं॥
(अंतरा - 3)
गंगा मैया भी बहती है, यमुना भी लहरें लेती है।
तेरे चरणों को धोने की खातिर, नदियां भी राह बनाती हैं॥
सूरज और चंदा भी मैया, तेरी आरती रोज उतारते हैं।
तेरा भवन सजा जिन फूलों से, वो फूल बड़े ही प्यारे हैं॥
(अंतरा - 4)
हम भी हैं फूल तेरे उपवन के, चरणों में जगह दे देना मां।
इस जीवन की नैया को मैया, भवसागर पार लगा देना॥
'भक्तों' की यही पुकार है मां, चरणों से कभी न दूर करना।
तेरा भवन सजा जिन फूलों से, वो फूल बड़े ही प्यारे हैं॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह एक भक्त के हृदय की व्याकुलता और मां के प्रति अगाध प्रेम की अभिव्यक्ति है। भजन का मुख्य संदेश यह है कि इस सृष्टि की प्रत्येक सुंदर वस्तु, चाहे वह प्रकृति के फूल हों या मानव हृदय के भाव, सब कुछ आदि शक्ति मां दुर्गा के चरणों में समर्पित होने के लिए ही बने हैं।
भजन के प्रारंभ में भक्त कहता है कि हे मां! आपका जो दिव्य और भव्य भवन (दरबार) जिन फूलों से सजाया गया है, वे फूल अत्यंत भाग्यशाली और प्यारे हैं। उन फूलों का सौभाग्य तो देखिए कि स्वयं जगत जननी के पावन हाथों ने उन्हें स्पर्श किया है। यह स्पर्श साधारण नहीं है; यह स्पर्श जीवात्मा को परमात्मा से मिलाने वाला और जन्म-जन्मांतर के बंधनों से मुक्त करने वाला है।
आगे के अंतरे में भक्त विभिन्न प्रकार के फूलों जैसे चम्पा, चमेली, गुलाब, गेंदा और जूही का वर्णन करता है। यह विविधता इस बात का प्रतीक है कि संसार में अनेक प्रकार के मनुष्य हैं, सबके स्वभाव अलग हैं, परंतु जब वे मां के चरणों में आते हैं, तो सब एक समान पावन हो जाते हैं। अंत में, भक्त स्वयं को भी मां के उपवन का एक छोटा सा फूल मानता है और प्रार्थना करता है कि हे मां, मुझे अपने चरणों में स्थान देकर इस संसार रूपी सागर से पार उतार दीजिए।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
इस भजन की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे अन्य भजनों से विशिष्ट और हृदयग्राही बनाती हैं:
- प्रकृति और परमात्मा का मिलन: इस भजन में फूलों, नदियों (गंगा-यमुना), सूरज और चंद्रमा का उल्लेख करके यह दर्शाया गया है कि संपूर्ण प्रकृति मां की सेवा में अहर्निश लगी हुई है।
- समर्पण भाव (शरणागति): भजन का मुख्य स्वर 'शरणागति' का है। भक्त अपने अस्तित्व को एक फूल के समान कोमल और समर्पित मानकर मां के चरणों में अर्पित कर देता है।
- सरलता और मधुरता: इसकी भाषा इतनी सरल और सुबोध है कि कोई भी साधारण व्यक्ति इसे आसानी से समझ और गा सकता है। इसकी लय अत्यंत कर्णप्रिय है जो मन को तुरंत शांत कर देती है।
- सकारात्मक ऊर्जा का संचार: इस भजन के श्रवण और कीर्तन से घर तथा मंदिर के वातावरण में एक अद्भुत सकारात्मक ऊर्जा और शांति का संचार होता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि ईश्वर की आराधना के लिए कोई भी समय अनुचित नहीं होता, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष अवसर और विधियां शास्त्रों एवं लोक परंपराओं में अत्यंत फलदायी मानी गई हैं:
सर्वोत्तम समय: इस भजन को गाने का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल की पूजा या संध्याकालीन आरती के बाद का होता है। विशेष रूप से शारदीय और चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों में इस भजन का गायन मां दुर्गा को अत्यंत प्रिय है।
गायन की विधि:
- सर्वप्रथम स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख घी का दीपक और धूप जलाएं।
- मां को लाल पुष्प (विशेषकर गुलाब या गुड़हल) अर्पित करें।
- हाथ में ताली बजाते हुए या मंजीरे के साथ सामूहिक रूप से इस भजन का कीर्तन करें।
- गायन के समय मन में यह भाव रखें कि आप स्वयं मां के भव्य भवन में उपस्थित हैं और उन्हें फूलों से सजा रहे हैं।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन सर्वशक्तिमयी, करुणामयी मां दुर्गा (शेरावाली) को समर्पित है। मां दुर्गा सनातन धर्म में शक्ति, बुद्धि, करुणा और सुरक्षा की अधिष्ठात्री देवी हैं। वे अपने भक्तों के कष्टों का निवारण करने वाली और उन्हें मोक्ष प्रदान करने वाली हैं।
इस भजन की रचना पारंपरिक लोक शैली में की गई है। यद्यपि इसके मूल रचयिता का नाम अज्ञात है, परंतु इसे उत्तर भारत के कई प्रसिद्ध लोक गायकों और संतों ने अपने कंठ से सजाकर जन-जन तक पहुंचाया है। इस भजन में व्यक्त भाव गोस्वामी तुलसीदास जी और सूरदास जी की विनय-पत्रिका के पदों से मेल खाते हैं, जहां भक्त स्वयं को अत्यंत लघु और भगवान को सर्वशक्तिमान मानकर दया की भीख मांगता है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
इस भजन की पृष्ठभूमि उत्तर भारतीय भक्ति आंदोलन और विशेष रूप से पंजाब एवं जम्मू के पहाड़ी क्षेत्रों में होने वाले माता के जगरातों से जुड़ी हुई है। जम्मू में स्थित माता वैष्णो देवी के दरबार की महिमा इस भजन के प्रत्येक शब्द में झलकती है। जब भक्त पहाड़ों की चढ़ाई करके माता के भवन पहुंचता है और वहां की अलौकिक सजावट तथा फूलों की सुगंध को महसूस करता है, तब उसके हृदय से स्वतः ही ऐसे भाव प्रस्फुटित होते हैं। यह भजन इसी दिव्य अनुभूति की काव्यात्मक परिणति है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें पंजाबी और ब्रजभाषा के शब्दों का सुंदर सम्मिश्रण देखने को मिलता है। इसकी काव्य शैली 'गीति काव्य' (Lyric Poetry) के अंतर्गत आती है। इसमें अलंकारों का बहुत ही सुंदर और स्वाभाविक प्रयोग किया गया है:
- अनुप्रास अलंकार: "फूल बड़े ही प्यारे हैं", "बिगड़ी बात बन जाती है" में वर्णों की आवृत्ति से संगीतात्मकता उत्पन्न हुई है।
- रूपक अलंकार: "हम भी हैं फूल तेरे उपवन के" में भक्त ने स्वयं को सीधे मां के उपवन का फूल मान लिया है, जो कि रूपक अलंकार का उत्कृष्ट उदाहरण है।
- बिंब योजना: भजन को सुनते ही आंखों के सामने फूलों से सजा हुआ मां का मंदिर, बहती हुई नदियां और आरती उतारते सूर्य-चंद्रमा का सजीव चित्र (Visual Imagery) उपस्थित हो जाता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें केवल भक्ति का मार्ग ही नहीं दिखाता, बल्कि व्यावहारिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण संदेश भी देता है:
- समता का भाव: जैसे मां के भवन में चम्पा, चमेली, गुलाब और गेंदा सभी फूल बिना किसी भेदभाव के एक साथ सजते हैं, वैसे ही समाज में भी हमें जाति, वर्ण या वर्ग के भेद को भुलाकर समरसता के साथ रहना चाहिए।
- अहंकार का त्याग: फूल अपनी सुंदरता और सुगंध देकर भी मौन रहता है। इसी प्रकार मनुष्य को भी परोपकार करना चाहिए परंतु उसका अहंकार नहीं करना चाहिए।
- प्रकृति के प्रति कृतज्ञता: भजन हमें सिखाता है कि नदियां, सूर्य, चंद्रमा और फूल सभी ईश्वर की बनाई सृष्टि का हिस्सा हैं और वे निरंतर अपनी सेवा दे रहे हैं। हमें भी प्रकृति का सम्मान और संरक्षण करना चाहिए।
- पूर्ण विश्वास: "तेरे द्वारे पे आकर मैया जी, हर बिगड़ी बात बन जाती है" - यह पंक्ति हमें सिखाती है कि कठिन से कठिन समय में भी ईश्वर पर अटूट विश्वास बनाए रखना चाहिए।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| भवन | मंदिर, दरबार या गृह | मां दुर्गा का अलौकिक निवास स्थान (हृदय रूपी मंदिर) |
| नसीब | भाग्य या प्रारब्ध | जीवात्मा का वह परम सौभाग्य जब उसे ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है |
| नवेली | नई, ताजी या सुंदर | भक्ति की नवीनता और उत्साह का प्रतीक |
| अनूठी | अद्भुत, अद्वितीय या विशेष | प्रत्येक भक्त की अपनी अनन्य साधना और विशेषता |
| श्रद्धा | विश्वास और आदर का भाव | भक्ति मार्ग का सबसे पहला और अनिवार्य सोपान |
| भवसागर | संसार रूपी समुद्र | जन्म और मृत्यु का चक्र जिससे पार पाना ही मोक्ष है |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
आइए, इस पावन भजन की प्रत्येक पंक्ति के गहरे आध्यात्मिक अर्थ को समझें:
"तेरा भवन सजा जिन फूलों से, वो फूल बड़े ही प्यारे हैं। चमके हैं नसीब उन फूलों के, जिन्हें छूते हाथ तुम्हारे हैं॥"
भावार्थ: हे जगत जननी! आपका मंदिर जिन पुष्पों से सुशोभित हो रहा है, वे अत्यंत भाग्यशाली हैं। उनका भाग्य इसलिए चमक उठा है क्योंकि उन्हें आपके उन पावन हाथों का स्पर्श प्राप्त हुआ है जो संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन करते हैं। यहां 'फूल' भक्त का प्रतीक है; जब गुरु या ईश्वर का हाथ भक्त के सिर पर आता है, तो उसका जीवन धन्य हो जाता है।
"कोई चम्पा है कोई चमेली है, कोई गुलाब की कली नवेली है। कोई गेंदा है कोई जूही है, हर फूल की महिमा अनूठी है॥"
भावार्थ: मां के दरबार में तरह-तरह के फूल हैं। कोई चम्पा है, कोई चमेली, कोई गुलाब की सुंदर कली है, तो कोई गेंदा और जूही। इन सबकी अपनी-अपनी सुगंध और सुंदरता है। इसी प्रकार, मां के दरबार में आने वाले भक्त भी अलग-अलग स्वभाव और पृष्ठभूमि के होते हैं, परंतु मां की दृष्टि में सभी का अपना विशेष महत्व है।
"कोई लाया है श्रद्धा के आंसू, कोई लाया है भक्ति के मोती। तेरे द्वारे पे आकर मैया जी, हर बिगड़ी बात बन जाती है॥"
भावार्थ: मां के चरणों में कोई धन-दौलत नहीं चढ़ाता, बल्कि कोई अपनी आंखों में श्रद्धा के आंसू लेकर आता है तो कोई अपने हृदय में भक्ति के अनमोल मोती। मां केवल भाव की भूखी हैं। जो भी सच्चे मन से मां के द्वार पर आता है, उसके जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और बिगड़े हुए काम बन जाते हैं।
"गंगा मैया भी बहती है, यमुना भी लहरें लेती है। तेरे चरणों को धोने की खातिर, नदियां भी राह बनाती हैं॥"
भावार्थ: पावन गंगा और यमुना नदियां भी मां के चरणों का प्रक्षालन (धोने) करने के लिए लालायित रहती हैं। वे पहाड़ों से रास्ता बनाते हुए मां के चरणों की ओर बढ़ती हैं। यह दर्शाता है कि समस्त तीर्थ और पवित्र नदियां भी आदि शक्ति के चरणों में ही समाहित हैं।
"हम भी हैं फूल तेरे उपवन के, चरणों में जगह दे देना मां। इस जीवन की नैया को मैया, भवसागर पार लगा देना॥"
भावार्थ: अंत में भक्त अत्यंत विनम्रतापूर्वक कहता है कि हे मां! हम भी आपके इस संसार रूपी उपवन के छोटे-छोटे फूल हैं। हमें अपने चरणों से दूर मत करना, बल्कि वहां स्थान देना। हमारे जीवन की नैया को इस संसार रूपी कठिन सागर से पार लगा देना, अर्थात हमें मोक्ष प्रदान करना।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के गायन के पूर्व या पश्चात मां दुर्गा के इस सिद्ध मंत्र का जाप करने से भजन का फल बहुगुणित हो जाता है। आप हमारे ब्लॉग पर श्री दुर्गा चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं जो मां की प्रसन्नता का अचूक साधन है।
"सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥"
अर्थ: जो शरण में आए हुए लोगों का कल्याण करने वाली हैं, जो सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली हैं, ऐसी कल्याणकारिणी, तीन नेत्रों वाली गौरी नारायणी आपको बारंबार नमस्कार है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विवरण बिंदु | महत्वपूर्ण जानकारी |
|---|---|
| भजन का नाम | तेरा भवन सजा जिन फूलों से (Tera Bhawan Saja Jin Phoolon Se) |
| मुख्य आराध्य देवी | मां दुर्गा / मां शेरावाली / माता वैष्णो देवी |
| भजन का प्रकार | देवी भजन / देवी गीत (Devi Bhajan) |
| मुख्य भाव (Bhava) | समर्पण, वात्सल्य, प्रेम और शरणागति |
| उपयुक्त अवसर | नवरात्रि, माता का जगराता, चौकी, दैनिक संध्या आरती |
| काव्य भाषा | सरल हिंदी (खड़ी बोली) |
| मुख्य संदेश | ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रकृति की सेवा भावना |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "तेरा भवन सजा जिन फूलों से" भजन के आध्यात्मिक, साहित्यिक और व्यावहारिक पहलुओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। हमारी संपादकीय टीम ने इस सामग्री को तैयार करने में पारंपरिक स्रोतों, देवी भागवत पुराण के प्रसंगों और प्रामाणिक लोक गीतों के संग्रह का उपयोग किया है। यह सामग्री पूरी तरह से मौलिक, त्रुटिहीन और पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है।
"संपादकीय रूप से तैयार सामग्री - भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा सत्यापित और परिष्कृत।"
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्देवीभागवत महापुराण - मां दुर्गा की महिमा और चरण वंदना प्रसंग।
- पारंपरिक उत्तर भारतीय भजन संग्रह एवं लोक संगीत परंपरा।
- सनातन धर्म की संकीर्तन पद्धति एवं नाम-महिमा ग्रंथ।
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