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माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंदे मोहे भजन लिरिक्स (Maati Kahe Kumbhar Se Lyrics in Hindi) - Parmod Ajmeri Sant Vani

प्रसिद्ध निर्गुण भजन 'माटी कहे कुम्हार से' के संपूर्ण लिरिक्स और हिंदी भावार्थ पढ़ें। जीवन की नश्वरता और वैराग्य का संदेश देने वाला यह भजन Bhaktilok पर उपलब्ध है।

"माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंदे मोहे" संत कबीरदास जी के अमर दोहों पर आधारित एक अत्यंत लोकप्रिय और कालजयी निर्गुण भजन है। इस भजन को प्रमोद अजमेरी जी सहित अनेक प्रतिष्ठित कलाकारों ने अपनी मधुर आवाज में गाकर जन-जन तक पहुँचाया है। यह भजन सनातन दर्शन के वैराग्य भाव, जीवन की नश्वरता, और अहंकार के विसर्जन का जीवंत दस्तावेज है। इस भजन का मुख्य भाव 'विनय', 'वैराग्य' और 'समर्पण' है, जो मनुष्य को उसके अस्तित्व की क्षणभंगुरता का स्मरण कराता है। सत्संगों, प्रातःकालीन प्रार्थनाओं और आध्यात्मिक सभाओं में इस भजन का गायन साधक के भीतर अंतर्मुखी चेतना को जाग्रत करता है। इस लेख में हम इस पावन भजन के संपूर्ण लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, दार्शनिक पृष्ठभूमि और जीवनोपयोगी संदेशों का गहन विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंदे मोहे


माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंदे मोहे ।
एक दिन ऐसा आएगा मैं रोंदूगी तोहे ।

आये हैं तो जायेंगे राजा रंक फ़कीर ।
एक सिंघासन चडी चले एक बंदे जंजीर ।

दुर्बल को ना सतायिये जाकी मोटी हाय ।
बिना जीब के स्वास से लोह भसम हो जाए ।

चलती चक्की देख के दिया कबीर रोये ।
दो पाटन के बीच में बाकी बचा ना कोई ।

दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करे ना कोई ।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख कहे को होए ।

पत्ता टूटा डाल से ले गयी पवन उडाय ।
अबके बिछड़े कब मिलेंगे दूर पड़ेंगे जाय ।

कबीर आप ठागायिये और ना ठगिये कोय ।
आप ठगे सुख उपजे और ठगे दुःख होए ।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

संत कबीरदास जी द्वारा रचित यह भजन मानव जीवन के परम सत्य को उजागर करता है। इस भजन के माध्यम से कबीर जी ने संसार की असारता और ईश्वर की सर्वव्यापकता का प्रतिपादन किया है। प्रथम पंक्ति में मिट्टी और कुम्हार के संवाद के माध्यम से यह समझाया गया है कि मनुष्य जिस शरीर पर इतना अहंकार करता है, वह अंततः इसी मिट्टी में मिल जाना है। कुम्हार मिट्टी को पैरों से रौंदकर बर्तन बनाता है, लेकिन मिट्टी उसे सचेत करती है कि मृत्यु के पश्चात जब यह पंचभौतिक शरीर नष्ट होगा, तब यही मिट्टी कुम्हार के शरीर को अपने भीतर विलीन कर लेगी।

भजन का मुख्य संदेश यह है कि संसार में कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है। चाहे कोई राजा हो, निर्धन (रंक) हो या संन्यासी (फ़कीर), सभी को एक न एक दिन इस धरा को छोड़कर जाना ही होगा। कबीर जी कर्म सिद्धांत की गहनता को समझाते हुए कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने जीवन में सत्कर्म करता है, वह सम्मानपूर्वक मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है, जबकि कुकर्मों में लिप्त व्यक्ति वासनाओं और कर्मों की जंजीरों में जकड़कर कष्ट पाता है। यह भजन हमें अहंकार का त्याग कर, दीन-दुखियों के प्रति करुणा रखने और निरंतर प्रभु सुमिरन में लीन रहने की प्रेरणा देता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह उपनिषदों और वेदांत के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में प्रस्तुत करने वाली एक आध्यात्मिक औषधि है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • अहंकार का नाश: यह भजन मनुष्य के भीतर छिपे 'मैं' (अहंकार) पर सीधा प्रहार करता है और उसे अपनी वास्तविक स्थिति का बोध कराता है।
  • कर्म की प्रधानता: कबीर जी ने स्पष्ट किया है कि मनुष्य के कर्म ही उसकी गति निर्धारित करते हैं। अच्छे कर्मों से मुक्ति और बुरे कर्मों से बंधन प्राप्त होता है।
  • सहानुभूति और करुणा: निर्बल और असहाय लोगों के प्रति संवेदनशीलता को इस भजन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
  • सुमिरन की महिमा: सुख और दुःख दोनों ही परिस्थितियों में समभाव रहकर ईश्वर का स्मरण करने की सीख दी गई है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन का गायन और श्रवण किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु आध्यात्मिक लाभ के लिए निम्नलिखित समय और विधि सर्वोत्तम मानी गई है:

  • ब्रह्ममुहूर्त या संध्याकाल: सुबह ४ से ६ बजे के बीच या संध्या आरती के पश्चात शांत वातावरण में इस भजन को सुनने या गाने से मन में शांति और वैराग्य का उदय होता है।
  • सत्संग और ध्यान: सामूहिक सत्संगों में इस भजन का कीर्तन करने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। ध्यान में बैठने से पूर्व इसका श्रवण मन को एकाग्र करने में सहायक है।
  • भावपूर्ण गायन: इस भजन को गाते समय शब्दों के अर्थ पर चिंतन करना आवश्यक है। केवल सुर-ताल ही नहीं, बल्कि हृदय में कबीर जी के संदेशों को आत्मसात करने का भाव होना चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से निर्गुण निराकार ब्रह्म को समर्पित है, जिसकी आराधना संत कबीरदास जी ने जीवनभर की। कबीर जी किसी साकार मूर्ति के बजाय घट-घट में बसने वाले राम (जो दशरथ पुत्र राम से भिन्न, सर्वव्यापी चेतना हैं) की आराधना करते थे। इस भजन में प्रयुक्त दोहे कबीरदास जी की 'साखी' और 'बीजक' ग्रंथ से लिए गए हैं। कबीर जी का जीवन स्वयं में एक संदेश था, जिन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता, सामाजिक समरसता और पाखंड-खंडन के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

संत कबीरदास जी का काल १५वीं शताब्दी का माना जाता है। उस समय समाज में बाह्याडंबर, जातिवाद और अंधविश्वास चरम पर थे। कबीर जी ने आम जनमानस को जगाने के लिए लोकभाषा (सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी) का प्रयोग किया। उन्होंने दैनिक जीवन के साधारण उदाहरणों जैसे- कुम्हार, चक्की, मिट्टी, पत्ता और पवन के माध्यम से परम दार्शनिक सत्यों को प्रकट किया। "माटी कहे कुम्हार से" दोहा कबीर जी के सबसे प्रसिद्ध दोहों में से एक है, जो सदियों से संतों की वाणी के रूप में गाया जाता रहा है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा 'सधुक्कड़ी' है, जिसमें खड़ी बोली, राजस्थानी, पंजाबी और अवधी का सुंदर मिश्रण है। इसकी काव्य शैली 'दोहा' और 'पद' प्रारूप में है। कबीर जी ने इसमें 'रूपक अलंकार' (मिट्टी और कुम्हार का रूपक) और 'दृष्टांत अलंकार' (चलती चक्की और टूटते पत्ते का दृष्टांत) का अत्यंत प्रभावी उपयोग किया है। भाषा की सरलता ही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है, जिससे अनपढ़ व्यक्ति भी इसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ को आसानी से समझ लेता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

इस कालजयी रचना से हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण जीवन सीख मिलती हैं:

  1. विनम्रता धारण करें: मिट्टी की तरह नम्र बनें। जिस प्रकार मिट्टी सभी को सहन करती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी सहनशील और विनम्र होना चाहिए।
  2. कमजोर को न सताएं: किसी भी निर्बल व्यक्ति का शोषण न करें। कबीर जी कहते हैं कि गरीब की आह (हाय) में इतनी शक्ति होती है कि वह अत्याचारी का सर्वनाश कर सकती है।
  3. सुख में भी सुमिरन करें: अधिकांश लोग केवल संकट के समय ईश्वर को याद करते हैं। यदि हम सुख के दिनों में भी ईश्वर के प्रति कृतज्ञ रहेंगे, तो जीवन में दुःख का प्रभाव स्वतः कम हो जाएगा।
  4. धोखाधड़ी से बचें: दूसरों को ठगने के बजाय स्वयं ठगा जाना बेहतर है, क्योंकि स्वयं ठगे जाने पर मन में संतोष रहता है, लेकिन दूसरों को ठगने पर अंततः दुःख ही प्राप्त होता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ दार्शनिक संदर्भ
रोंदे (Ronde) पैरों से कुचलना या मथना मनुष्य द्वारा प्रकृति और शरीर का अहंकारवश उपभोग करना।
रंक (Rank) अत्यंत निर्धन या दरिद्र संसार में भौतिक रूप से विपन्न व्यक्ति।
पाटन (Paatan) चक्की के दो पाट (पत्थर) जन्म और मृत्यु के दो चक्र, जिनके बीच संसार फंसा है।
सुमिरन (Sumiran) स्मरण या नाम जप ईश्वर की चेतना में निरंतर बने रहना।
हाय (Haay) निःश्वास या बद्दुआ पीड़ित व्यक्ति के हृदय से निकली आंतरिक पुकार।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

१. माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंदे मोहे...
मिट्टी कुम्हार से कहती है कि आज तू मुझे अपने पैरों तले रौंद रहा है, लेकिन अहंकार मत कर। एक दिन ऐसा समय भी आएगा जब मेरी शरण में ही तुझे आना होगा और मैं तुझे अपने भीतर विलीन कर लूंगी। यह शरीर मिट्टी का है और मिट्टी में ही मिल जाएगा।

२. आये हैं तो जायेंगे राजा रंक फ़कीर...
इस मृत्युलोक में जिसने भी जन्म लिया है, उसका जाना निश्चित है। चाहे वह वैभवशाली राजा हो, दरिद्र रंक हो या त्यागी फकीर। अंतर केवल इतना है कि कोई अपने सत्कर्मों के कारण मोक्ष रूपी सिंहासन पर बैठकर जाता है, तो कोई कुकर्मों के कारण वासनाओं की जंजीरों में बंधकर जाता है।

३. दुर्बल को ना सतायिये जाकी मोटी हाय...
किसी भी कमजोर या असहाय व्यक्ति को कभी कष्ट नहीं देना चाहिए। उसकी मूक प्रार्थना और आह में बहुत बड़ी शक्ति होती है। जिस प्रकार लोहार की धौंकनी (जो निर्जीव चमड़े की होती है) की हवा से कठोर लोहा भी भस्म हो जाता है, उसी प्रकार गरीब की आह अत्याचारी का विनाश कर देती है।

४. चलती चक्की देख के दिया कबीर रोये...
संसार रूपी चलती चक्की को देखकर कबीर जी दुखी होते हैं। काल (समय) रूपी चक्की के दो पाटों (आकाश और पृथ्वी, या जन्म और मृत्यु) के बीच में कोई भी जीव सुरक्षित नहीं बचता। सभी इस चक्रव्यूह में पिस जाते हैं।

५. दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करे ना कोई...
मनुष्य की यह प्रवृत्ति है कि वह विपत्ति में तो भगवान को याद करता है, लेकिन सुख के दिनों में उन्हें भूल जाता है। कबीर जी कहते हैं कि यदि मनुष्य सुख के समय भी ईश्वर का ध्यान रखे, तो उसके जीवन में दुःख का आगमन ही क्यों होगा?

६. पत्ता टूटा डाल से ले गयी पवन उडाय...
जिस प्रकार पेड़ से टूटा हुआ पत्ता हवा के झोंके के साथ दूर उड़ जाता है और दोबारा उस डाल से नहीं जुड़ पाता, उसी प्रकार जब आत्मा इस शरीर को छोड़ देती है, तो वह पुनः इस संसार के पुराने संबंधों में वापस नहीं लौटती।

७. कबीर आप ठागायिये और ना ठगिये कोय...
कबीर जी सीख देते हैं कि यदि जीवन में कभी ऐसी परिस्थिति आए, तो स्वयं ठगा जाना स्वीकार कर लें, लेकिन किसी अन्य को धोखा न दें। स्वयं ठगे जाने पर मन में शांति और सुख का अनुभव होता है, जबकि दूसरों को धोखा देने से आत्मा कलंकित होती है और अंततः घोर दुःख प्राप्त होता है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के वैराग्य और जीवन की नश्वरता के संदेश को पुष्ट करने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है:

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥

(श्रीमद्भगवद्गीता - द्वितीय अध्याय, श्लोक २७)

अर्थ: जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है। इसलिए इस बिना उपाय वाले विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंदे मोहे
मूल रचयिता संत कबीरदास जी (कबीर वाणी)
प्रसिद्ध गायक प्रमोद अजमेरी, अनूप जलोटा, एवं अन्य संत वाणी गायक
काव्य विधा दोहा / साखी / निर्गुण पद
मुख्य रस / भाव शांत रस, वैराग्य भाव (Vairagya Bhava)
भाषा सधुक्कड़ी (पंचमेल खिचड़ी)
उपयुक्त अवसर प्रातःकाल, सत्संग, संध्या वंदना, आध्यात्मिक प्रवचन

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन के मूल रचयिता १५वीं शताब्दी के महान समाज सुधारक और रहस्यवादी कवि संत कबीरदास जी हैं। यह उनके प्रसिद्ध दोहों का संकलन है।

इस भजन में 'मिट्टी' पंचभौतिक शरीर और पृथ्वी का प्रतीक है, जबकि 'कुम्हार' मनुष्य के अहंकार और कर्ता-भाव (स्वयं को सब कुछ समझने की भूल) का प्रतीक है।

इसका अर्थ है कि संसार रूपी चक्की निरंतर चल रही है, जिसमें जन्म और मृत्यु के दो पाटों के बीच फंसकर सभी जीव नष्ट हो रहे हैं। कबीर जी जीवों की इस अज्ञानता और नश्वरता को देखकर दुखी होते हैं।

यह दोहा हमें सिखाता है कि हमें कभी भी किसी गरीब, असहाय या कमजोर व्यक्ति पर अत्याचार नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनकी अंतरात्मा से निकली आह में अत्याचारी को नष्ट करने की असीम शक्ति होती है।

कबीर जी के अनुसार, यदि मनुष्य सुख के दिनों में भी ईश्वर को न भूले और उनका आभार व्यक्त करता रहे, तो उसके जीवन में दुःख का प्रभाव न्यूनतम हो जाता है या दुःख आता ही नहीं है।

यह पंक्ति जीवन की क्षणभंगुरता को दर्शाती है। जैसे पेड़ से गिरा पत्ता वापस नहीं जुड़ सकता, वैसे ही शरीर से प्राण निकलने के बाद आत्मा पुनः उस सांसारिक चोले और संबंधों में वापस नहीं आ सकती।

स्वयं ठगे जाने पर मनुष्य का अंतःकरण शुद्ध रहता है और उसे मानसिक शांति मिलती है। इसके विपरीत, दूसरों को ठगने से तात्कालिक लाभ तो हो सकता है, लेकिन भविष्य में कर्मफल के रूप में घोर मानसिक अशांति और दुःख भोगना पड़ता है।

यह भजन मन से क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी बुराइयों को शांत करता है। इसे सुनने से साधक के भीतर वैराग्य, संतोष और करुणा की भावना जाग्रत होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह आलेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन की दार्शनिक व्याख्या और दोहों का विश्लेषण कबीर ग्रंथावली, बीजक और सनातन धर्म के कर्म सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर किया गया है। कबीर जी की वाणी आज के आधुनिक युग में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी मध्यकाल में थी। यह सामग्री पाठकों को शुद्ध और प्रामाणिक आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करने के उद्देश्य से संकलित की गई है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • कबीर बीजक: संत कबीरदास जी के मूल उपदेशों और साखियों का संग्रह।
  • कबीर ग्रंथावली: कबीर जी के पदों और दोहों का शास्त्रीय संकलन।
  • श्रीमद्भगवद्गीता: कर्म और आत्मा की नश्वरता के सिद्धांत।
  • पारंपरिक संत वाणी परंपरा: भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित मौखिक और लिखित सत्संग साहित्य।

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

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