भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे (Agar Nath Dekhoge Avgun Humare Lyrics in Hindi) - पूज्य श्री देवेन्द्र जी महाराज

अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे भजन के लिरिक्स, अर्थ और वीडियो देखें। पूज्य श्री देवेन्द्र जी महाराज की मधुर वाणी में शरणागति का यह भाव पढ़ें।

अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे - परिचय एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

सनातन भक्ति परंपरा में शरणागति (Surrender) का मार्ग सबसे सरल और कल्याणकारी माना गया है। जब जीव अपनी समस्त योग्यताओं और अयोग्यताओं को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है, तभी वास्तविक कृपा का अवतरण होता है। पूज्य श्री देवेन्द्र जी महाराज की ओजस्वी और मधुर वाणी में गाया गया यह अनुपम भजन "अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे" (Agar Nath Dekhoge Avgun Humare) इसी परम शरणागति और करुणा के भाव का जीवंत प्रतीक है। कलयुग के इस भौतिकतावादी युग में जहां मनुष्य पग-पग पर त्रुटियां करता है, यह संकीर्तन जीवात्मा को भगवान की अहैतुत कृपा का स्मरण कराता है। इस भजन का मुख्य भाव यह है कि यदि परमपिता परमात्मा हमारे अवगुणों और पापों का हिसाब करने बैठ जाएं, तो इस संसार में किसी भी जीव का उद्धार संभव नहीं है। इसलिए भक्त अपनी कमजोरियों को स्वीकार करते हुए केवल और केवल भगवान की करुणा, वात्सल्य और क्षमाशीलता का आश्रय लेता है। इस पावन भजन का श्रवण और गायन करने मात्र से अंतःकरण की शुद्धि होती है और मन में अनन्य भक्ति का संचार होता है। साधक जब इस भजन को गाता है, तो उसके भीतर का अहंकार गल जाता है और वह प्रभु के चरणों में पूरी तरह से लीन हो जाता है। सनातन धर्म में नाम स्मरण और संकीर्तन को भवसागर से तरने का अचूक साधन बताया गया है, और श्री देवेन्द्र जी महाराज की शैली में यह भजन श्रोताओं को एक अलग ही आध्यात्मिक लोक में ले जाता है, जहां केवल करुणा, प्रेम और दिव्यता का अनुभव होता है.

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे, तो कैसे लगेंगे किनारे?
अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे, तो कैसे लगेंगे किनारे? ॥

भरे पाप से पालना ये हमारा, किया हमने जीवन को सारा गंवाया।
मगर तेरी ममता ने मुझको बचाया, ओ करुणा के सागर हमारे! ॥
अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे, तो कैसे लगेंगे किनारे? ॥

अधम से अधम को तारा तूने प्रभु जी, पतित पावन कहलाए हो जग में सभी जी।
जो छोड़े न संगी, वो तेरे भजन हैं, मेरे प्राणधन और सहारे! ॥
अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे, तो कैसे लगेंगे किनारे? ॥

भटकता रहा मैं अंधेरी गुफा में, मिला ना ठिकाना कोई इस जहां में।
तेरी एक कृपा से उजाला हुआ है, मिटे सारे मन के अंधेरे! ॥
अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे, तो कैसे लगेंगे किनारे? ॥

अब सौंप दिया इस जीवन का, सब भार तुम्हारे हाथों में।
है जीत तुम्हारे हाथों में, और हार तुम्हारे हाथों में! ॥
अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे, तो कैसे लगेंगे किनारे? ॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन साधक और परमात्मा के बीच के उस पवित्र संवाद को दर्शाता है जहां भक्त अपनी कमियों को छिपाने के बजाय उन्हें प्रभु के सामने पूरी विनम्रता से स्वीकार करता है। भजन की शुरुआती पंक्तियों में भक्त भगवान से कहता है कि हे नाथ! यदि आप हमारे अवगुणों (दोषों और पापों) को देखने लग जाएंगे, तो हम इस संसार रूपी भवसागर के पार कैसे उतर पाएंगे? मनुष्य स्वभाव से ही गलतियों का पुतला है, और यदि ईश्वर न्याय के तराजू पर केवल कर्मों का तौल करने लगें, तो कोई भी जीव तर नहीं सकता। इसलिए भक्त न्याय की नहीं, बल्कि भगवान की क्षमा और करुणा की भीख मांगता है।

आगे की पंक्तियों में भक्त स्वीकार करता है कि उसने अपना पूरा जीवन संसार के प्रपंचों और विकारों में गंवा दिया है, उसके कर्मों की झोली पापों से भरी हुई है। परंतु इसके बावजूद भगवान की अहैतुत कृपा और ममता ने उसकी रक्षा की है। भगवान को 'करुणा का सागर' कहकर संबोधित करते हुए भक्त यह मानता है कि ईश्वर की दया किसी योग्यता या पात्रता की मोहताज नहीं है, वह तो केवल भक्त की पुकार सुनती है। जिस प्रकार एक मां अपने बालक की हर गलती को माफ कर देती है, उसी प्रकार प्रभु भी अपने भक्तों के दोषों को नजरअंदाज कर उन्हें अपनी शरण में ले लेते हैं। यही कारण है कि भगवान को 'पतित पावन' और 'दीनबंधु' कहा गया है। अंत में यह भजन साधक को परम समर्पण की स्थिति में ले आता है जहां वह अपने जीवन की संपूर्ण डोर भगवान के हाथों में सौंप देता है - "अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में"। यह भाव मनुष्य के सभी प्रकार के भय, चिंता और अहंकार को समाप्त कर उसे पूर्णतः शांत और आनंदित कर देता है.

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

भक्ति साहित्य में इस प्रकार के विनय के पदों का विशेष स्थान है। यह भजन केवल एक गीत नहीं बल्कि आर्त ध्यान (पीड़ा और पुकार से उपजा ध्यान) का रूप है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • पूर्ण शरणागति (Surrender): यह भजन साधक को सिखाता है कि अपने बल पर भवसागर पार करना असंभव है, प्रभु की कृपा ही एकमात्र उपाय है।
  • अहंकार का शमन: अपनी गलतियों को खुलकर स्वीकार करना और भगवान के आगे झुकना मनुष्य के अहंकार को चकनाचूर कर देता है।
  • करुणा का गान: इसमें भगवान के न्यायवादी स्वरूप से अधिक उनके क्षमाशील और वात्सल्यमय स्वरूप का गुणगान किया गया है।
  • मानसिक शांति: इस भजन का निरंतर गायन या श्रवण करने से अवसाद, भय और मानसिक अशांति दूर होती है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भक्ति रस से ओत-प्रोत इस भजन का आनंद किसी भी समय लिया जा सकता है, परंतु इसकी दिव्यता को पूरी गहराई से अनुभव करने के लिए कुछ विशेष समय और नियम उत्तम माने गए हैं:

  • प्रातःकालीन बेला (ब्रह्म मुहूर्त): सुबह उठकर स्नान के पश्चात शांत चित्त से इस भजन का स्मरण करने से पूरा दिन सकारात्मक ऊर्जा से भरा रहता है।
  • संध्याकालीन पूजन: शाम को मंदिर में दीपक जलाने के बाद संध्या वंदन के समय इसे गाने से घर का वातावरण पवित्र और शांत होता है।
  • सत्संग और संकीर्तन: धार्मिक अनुศาสनों, साप्ताहिक सत्संग या एकादशी के पावन अवसरों पर समूह में इस भजन को गाने से विशेष आनंद की प्राप्ति होती है।
  • एकांत साधना: जब मन अशांत हो या जीवन में कठिनाइयां आ रही हों, तब एकांत में बैठकर इस भजन के माध्यम से प्रभु से प्रार्थना करना अत्यंत फलदायी होता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण, बांके बिहारी, श्री राम या विष्णु जी के किसी भी करुणामय स्वरूप को समर्पित किया जा सकता है। सनातन धर्म में भगवान को ही 'नाथ' (पतियों के पति, स्वामियों के स्वामी) और 'प्राणधन' माना गया है। पूज्य श्री देवेन्द्र जी महाराज ने अपनी सुमधुर आवाज और आत्मीय प्रस्तुति के माध्यम से इस भजन को घर-घर तक पहुंचाया है। संत परंपरा में ऐसे भजनों का गायन मीराबाई, सूरदास और तुलसीदास जैसे महापुरुषों की उस धारा का अनुसरण करता है जहां भगवान के साथ आत्मीय संबंध स्थापित किया जाता है। आप चाहें तो हमारी अन्य प्रस्तुतियां जैसे श्री हनुमान चालीसा और शिव तांडव स्तोत्र भी पढ़ सकते हैं जो भक्ति मार्ग को और प्रशस्त करती हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

पारंपरिक हिंदी भक्ति संगीत और संकीर्तनधारा में इस प्रकार के पद सदियों से गाए जाते रहे हैं। विभिन्न संतों और कवियों ने अपनी रचनाओं में जीव की लाचारी और भगवान की करुणा का सुंदर वर्णन किया है। श्री देवेन्द्र जी महाराज ने अपनी कथाओं और सत्संगों में इस भजन को जिस भाव के साथ प्रस्तुत किया है, उसने इसे आधुनिक भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय बना दिया है। इसकी पंक्तियां सीधे हृदय को स्पर्श करती हैं और श्रोता को आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित करती हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा बहुत ही सरल, सहज और प्रवाहमान ब्रज-मिश्रित हिंदी (संत भाषा) है। इसमें व्याकरण की क्लिष्टता के स्थान पर भाव की प्रधानता है। रूपकों और अलंकारों का प्रयोग बहुत ही स्वाभाविक रूप से किया गया है जैसे 'करुणा का सागर', 'अंधेरी गुफा', और 'भवसागर के किनारे'। यह शैली आम से लेकर खास हर व्यक्ति के दिल तक आसानी से उतर जाती है और जुबान पर स्वतः ही चढ़ जाती है.

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें जीवन के कई गहरे सत्यों से अवगत कराता है:

  • कभी भी अपने अच्छे कर्मों का अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि हमारे अवगुण प्रभु की कृपा के बिना मिट नहीं सकते।
  • जीवन की हर परिस्थिति में ईश्वर पर अटूट विश्वास रखना चाहिए और सभी चिंताओं को उनके चरणों में अर्पित कर देना चाहिए।
  • दूसरों की गलतियों को क्षमा करने का गुण हमें भगवान से सीखना चाहिए।
  • भक्ति कोई दिखावा नहीं बल्कि अंतःकरण की शुद्धि और समर्पण का नाम है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
नाथ स्वामी, प्रभु, ईश्वर समस्त ब्रह्मांड के पालक और संरक्षक
अवगुण दोष, पाप, बुराइयां मनुष्य के अज्ञानवश किए गए गलत कर्म
किनारे पार जाना, उद्धार होना संसार रूपी भवसागर से मुक्ति पाना
अधम नीच, पापी, पतित जो संसार में सबसे अधिक भूले भटके हों
प्राणधन प्राणों से भी प्रिय धन भगवान ही जिनका सबसे बड़ा सहारा हों

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे, तो कैसे लगेंगे किनारे?"
अर्थात हे प्रभु! यदि आप हमारे पापों और दोषों का लेखा-जोखा देखने लग जाएंगे, तो हम इस भवसागर को कभी पार नहीं कर सकेंगे। हमारा उद्धार केवल आपकी कृपा से ही संभव है, हमारे कर्म इसके योग्य नहीं हैं।

"अधम से अधम को तारा तूने प्रभु जी, पतित पावन कहलाए हो जग में सभी जी।"
अर्थात हे भगवान! आपने इतिहास में असाध्य और पापी से पापी जीवों का भी उद्धार किया है, इसीलिए इस संसार में आपको 'पतित पावन' (पापियों को पवित्र करने वाला) कहा जाता है। हमारी यही आशा है कि आप हमें भी तार देंगे।

"अब सौंप दिया इस जीवन का, सब भार तुम्हारे हाथों में।"
अर्थात मैंने अपनी मर्जी से संसार में भटकने के बाद अब अपने संपूर्ण जीवन की जिम्मेदारी और नियंत्रण आपके चरणों में सौंप दिया है। अब मेरी हार या जीत सब कुछ आपके ही आधीन है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव से मेल खाता हुआ श्रीमद्भगवद्गीता का प्रसिद्ध श्लोक निम्नलिखित है:

सर्वधर्मान्परित्यज्य मां एकमेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

(अर्थात: संपूर्ण धर्मों (कर्मों और उनके फलों) को मुझमें त्याग कर तू केवल एकमात्र मेरी ही शरण में आ जा। मैं तुझे समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा, तू शोक मत कर।)

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे (Agar Nath Dekhoge Avgun Humare)
गायक / प्रस्तोता पूज्य श्री देवेन्द्र जी महाराज
विधा भक्ति भजन, संकीर्तन, विनय पद
भाषा सरल हिंदी / ब्रज-मिश्रित अवधी
प्रमुख भाव शरणागति, करुणा, विनय, समर्पण
उपयुक्त अवसर दैनिक सत्संग, एकादशी पूजन, संध्या आरती

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह अत्यंत लोकप्रिय और भावपूर्ण भजन प्रसिद्ध संत एवं कथा व्यास पूज्य श्री देवेन्द्र जी महाराज की वाणी में विशेष रूप से गाया और सराहा गया है।

इस भजन का मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति (Surrender) और उनकी असीम करुणा पर भरोसा रखना है। यह सिखाता है कि मनुष्य अपनी योग्यताओं से नहीं, बल्कि प्रभु की क्षमाशीलता से ही तर सकता है।

इस भजन को प्रातः काल ध्यान के समय, संध्या वंदन के दौरान, या किसी भी सत्संग और धार्मिक अनुष्ठान के समय पूर्ण भक्ति भाव से गाया जा सकता है।

हाँ, सनातन परंपरा में भगवान के नाम का संकीर्तन और ऐसे विनय के पद मन को विकारों से मुक्त कर मोक्ष और शांति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

'पतित पावन' उसे कहते हैं जो गिरे हुओं, पापियों या अज्ञानियों को भी अपनी कृपा से पवित्र कर देता है और उनका उद्धार करता है। यह उपाधि भगवान के लिए प्रयुक्त होती है।

निश्चित रूप से। एकांत में बैठकर इस भजन का गान करने से मानसिक एकाग्रता बढ़ती है और भगवान के साथ आत्मीय संबंध मजबूत होता है।

साधक प्रार्थना करता है कि भगवान उसके अवगुणों को अनदेखा करें और अपनी ममतामयी छाया में लेकर उसे इस संसार सागर से पार लगाएं।

आप Bhaktilok की वेबसाइट पर नियमित रूप से जाकर विभिन्न देवी-देवताओं के संकीर्तन, चालीसा, स्तोत्र और प्रसिद्ध संतों के भजन पढ़ और सुन सकते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री सनातन भक्ति ग्रंथों, संत परंपरा और पारंपरिक संकीर्तन के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध लिरिक्स, प्रामाणिक भावार्थ और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करना है। किसी भी प्रकार के सुधार या सुझाव के लिए आप हमारी संपादकीय टीम से संपर्क कर सकते हैं।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता - गीताप्रेस गोरखपुर
  • पारंपरिक संत वाणी एवं संकीर्तन संग्रह
  • पूज्य श्री देवेन्द्र जी महाराज के सत्संग एवं प्रवचन संस्करण
  • सनातन धर्म की भक्ति मार्ग और शरणागति परंपरा के ग्रंथ

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 09 Oct 2026

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